टिकैत से अन्ना आंदोलन तक, ऐतिहासिक आंदोलनों का गवाह रहा जंतर-मंतर
दिल्ली का जंतर-मंतर दशकों तक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों, किसानों के संघर्ष, पूर्व सैनिकों की मांगों, महिला सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की लड़ाई का प्रमुख केंद्र रहा। अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन से लेकर पहलवानों के धरने और NEET-UG विवाद तक, इस जगह ने कई आंदोलनों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। अक्टूबर 2026 में चुनाव आयोग के खिलाफ इंडिया ब्लॉक और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों के बीच दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर रोड को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया है। अब रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के CBD ग्राउंड को वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल बनाया गया है। आखिर जंतर-मंतर का इतिहास क्या है, यहां कौन-कौन से बड़े आंदोलन हुए और मौजूदा बदलाव का विरोध प्रदर्शनों पर क्या असर पड़ सकता है?
जंतर-मंतर का इतिहास: वेधशाला से आंदोलनों के केंद्र तक
दिल्ली का जंतर-मंतर मूल रूप से खगोलीय गणनाओं और ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था। जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1724 में इसका निर्माण कराया था। आधुनिक भारत में इस ऐतिहासिक परिसर के आसपास का इलाका धीरे-धीरे राजनीतिक विरोध, धरनों और जन आंदोलनों के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
आजादी के बाद दिल्ली में बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों का एक प्रमुख केंद्र इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब लॉन्स था। अक्टूबर 1988 में भारतीय किसान यूनियन के नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने यहां बड़ा आंदोलन किया। इस प्रदर्शन ने कृषि संकट और किसानों की मांगों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।
बोट क्लब क्षेत्र में बड़े प्रदर्शनों पर प्रतिबंधों के बाद 1990 के दशक में जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों के प्रमुख स्थलों में उभरा। संसद और केंद्रीय सरकारी कार्यालयों के निकट होने के कारण यहां होने वाले धरने और भूख हड़ताल राष्ट्रीय मीडिया तथा राजनीतिक नेतृत्व का ध्यान आकर्षित करते रहे।

2011: अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन
5 अप्रैल 2011 को सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। आंदोलन का उद्देश्य भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाना और सरकारी जवाबदेही सुनिश्चित करना था।
अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण और कई अन्य सामाजिक कार्यकर्ता इस अभियान से जुड़े। कुछ ही दिनों में आंदोलन को देशव्यापी समर्थन मिलने लगा। भ्रष्टाचार और राजनीतिक व्यवस्था में सुधार राष्ट्रीय बहस के प्रमुख विषय बन गए।
अन्ना हजारे का अगस्त 2011 का चर्चित अनशन रामलीला मैदान में हुआ था, जबकि अप्रैल का अनशन जंतर-मंतर पर आयोजित किया गया था। दोनों घटनाएं एक ही भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हिस्सा थीं, लेकिन उनके स्थल अलग थे।

2012-2014: महिला सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के आंदोलन
दिसंबर 2012 में दिल्ली के निर्भया सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। जंतर-मंतर पर भी महिला सुरक्षा, न्याय और यौन हिंसा के मामलों में प्रभावी कार्रवाई की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए।
इस दौर में महिलाओं के खिलाफ अपराध, पुलिस की भूमिका और न्याय व्यवस्था में सुधार जैसे मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई।
मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला के AFSPA विरोधी अनशन के समर्थन में भी दिल्ली में एकजुटता अभियान चलाए गए। इसी तरह 2014 में अरुणाचल प्रदेश के छात्र नीडो तानिया की मृत्यु के बाद पूर्वोत्तर के विद्यार्थियों के साथ कथित नस्लीय भेदभाव और उनकी सुरक्षा का प्रश्न भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना।
2015: पूर्व सैनिकों का वन रैंक वन पेंशन आंदोलन
2015 में पूर्व सैनिकों का वन रैंक वन पेंशन (OROP) आंदोलन जंतर-मंतर पर प्रमुखता से सामने आया। पूर्व सैनिकों की मांग थी कि समान रैंक और समान सेवा अवधि के आधार पर पेंशन में समानता सुनिश्चित की जाए।
पूर्व सैनिकों ने यहां धरना और रिले भूख हड़ताल की। सरकार की ओर से योजना लागू करने की घोषणा के बावजूद पेंशन की गणना और क्रियान्वयन से संबंधित सवालों पर विरोध जारी रहा।
इस आंदोलन ने पूर्व सैनिकों के सम्मान, आर्थिक सुरक्षा और सरकारी नीतियों की जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय चर्चा में जगह दिलाई।

2017: तमिलनाडु के किसानों का 40 दिन तक चला धरना
मार्च और अप्रैल 2017 में तमिलनाडु से आए किसानों ने जंतर-मंतर पर लगभग 40 दिनों तक प्रदर्शन किया। किसानों ने सूखे, कर्ज, कृषि संकट और आर्थिक बदहाली से राहत की मांग उठाई।
उनकी प्रमुख मांगों में सूखा राहत पैकेज, कृषि कर्ज से राहत और कावेरी नदी के जल बंटवारे से जुड़ा विवाद सुलझाना शामिल था।
प्रदर्शनकारी किसानों ने अपनी स्थिति की गंभीरता दिखाने के लिए खोपड़ियों और मृत चूहों जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल किया। इन तस्वीरों ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया और कृषि संकट पर बहस को तेज किया।

2017-2018: प्रदर्शन पर रोक और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
जंतर-मंतर पर लगातार प्रदर्शनों के कारण आसपास के निवासियों ने शोर और सार्वजनिक असुविधा की शिकायतें की थीं। अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने यहां प्रदर्शन गतिविधियां रोकने और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया।
जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में जंतर-मंतर और बोट क्लब क्षेत्र में प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया।
इस फैसले का महत्व इसलिए था क्योंकि इससे स्पष्ट हुआ कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाए जा सकते हैं, लेकिन नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को पूरी तरह समाप्त करना अलग प्रश्न है।

2019: नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन
दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए। जंतर-मंतर पर भी नागरिकता नीति, संविधान और कानून के संभावित सामाजिक प्रभावों को लेकर विरोध दर्ज कराया गया।
प्रदर्शनकारियों ने कानून पर अपनी आपत्तियां उठाईं, जबकि केंद्र सरकार ने इसका बचाव करते हुए इसे पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न झेलने वाले कुछ समुदायों को नागरिकता देने की व्यवस्था बताया।
2021: किसान संसद और तीन कृषि कानूनों का विरोध
तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलन के दौरान संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े किसानों ने जुलाई-अगस्त 2021 में जंतर-मंतर पर किसान संसद आयोजित की।
22 जुलाई से 9 अगस्त तक चले इस कार्यक्रम में निर्धारित संख्या में किसानों को प्रदर्शन की अनुमति दी गई थी। किसान संसद में कृषि कानूनों, न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी व्यवस्था और खेती की आर्थिक स्थिति जैसे विषय उठाए गए। महिलाओं ने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया।
यह प्रदर्शन संसद के मानसून सत्र के समानांतर किसानों की मांगों को सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास था।

2023: पहलवानों का धरना और खेल प्रशासन पर सवाल
अप्रैल 2023 में विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, बजरंग पूनिया और अन्य पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना शुरू किया।
पहलवानों ने यौन उत्पीड़न के आरोपों, शिकायतों पर कार्रवाई और कुश्ती प्रशासन की जवाबदेही की मांग उठाई। यह धरना कई सप्ताह तक चला और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना।
28 मई 2023 को नए संसद भवन की ओर मार्च करने की कोशिश के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोका और उन्हें धरना स्थल से हटा दिया। इस घटना ने महिला खिलाड़ियों की सुरक्षा, खेल संस्थाओं की जवाबदेही और खिलाड़ियों के विरोध के अधिकार पर बहस को तेज किया।

2024: NEET-UG विवाद और विद्यार्थियों की मांगें
2024 में NEET-UG के परिणामों और कथित अनियमितताओं के खिलाफ विद्यार्थियों तथा राजनीतिक दलों ने विरोध दर्ज कराया। जंतर-मंतर पर भी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता, कथित पेपर लीक और जांच की मांग को लेकर प्रदर्शन हुए।
इस विवाद ने लाखों विद्यार्थियों के भविष्य, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की जवाबदेही और मेडिकल शिक्षा में प्रवेश की प्रतिस्पर्धा से जुड़े प्रश्नों को राष्ट्रीय बहस में प्रमुख स्थान दिया।
2026: NEET-UG विवाद से CJP के आंदोलन तक
2026 में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और उससे जुड़े युवा कार्यकर्ताओं ने NEET-UG विवाद को लेकर प्रदर्शन किए। कथित पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग इस अभियान के प्रमुख मुद्दे रहे। इससे पहले जंतर-मंतर पर CJP के लंबे विरोध प्रदर्शन ने भी राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया था।
अक्टूबर 2026 में आंदोलन का केंद्र बदलकर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर आ गया।
CJP और अन्य प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। चुनाव आयोग ने पक्षपात के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि गलत तरीके से हटाए गए पात्र मतदाता दोबारा पंजीकरण करा सकते हैं। भाजपा ने भी विपक्ष के आरोपों को निराधार बताया है।

10 अक्टूबर: CJP का प्रदर्शन, हिरासत और दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था
10 अक्टूबर 2026 को CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली में बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया। इस दौरान जंतर-मंतर और राजधानी के अन्य हिस्सों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाई गई। पुलिस ने बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जिनमें CJP संस्थापक अभिजीत दिपके तथा नेता आशुतोष रांका और सौरव दास भी शामिल थे।
इस घटनाक्रम के दौरान दिल्ली के कुछ हिस्सों में यातायात और सार्वजनिक परिवहन पर प्रतिबंध लगाए गए। CJP ने हिरासत की कार्रवाई का विरोध किया और प्रदर्शन जारी रखने की घोषणा की। अगले दिन उसके प्रमुख नेताओं की रिहाई के बाद भी आंदोलन जारी रहने की बात कही गई।
12 अक्टूबर: इंडिया ब्लॉक का ‘चलो दिल्ली—मार्च फॉर डेमोक्रेसी’
CJP के विरोध के साथ-साथ अक्टूबर में चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी इंडिया ब्लॉक ने भी अपना आंदोलन तेज किया। 12 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी के नेतृत्व में ‘चलो दिल्ली—मार्च फॉर डेमोक्रेसी’ निकाला गया। इसमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, प्रियंका गांधी वाड्रा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और गठबंधन के अन्य नेता शामिल हुए।
मार्च का प्रमुख उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करना और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर सवाल उठाना था। विपक्षी दलों का आरोप है कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर गंभीर सवाल हैं।
इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करते हुए मतदाता सूची में बदलाव की जांच, नाम हटाने की प्रक्रिया में सुरक्षा उपाय और पुनरीक्षण पर अंतरिम रोक जैसी मांगों के साथ याचिका दायर की। 13 अक्टूबर की खबरों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने याचिका में प्रक्रियागत कमियां दर्ज की थीं, जिसके कारण उस समय यह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हुई थी।
राहुल गांधी ने मार्च से पहले कहा कि उनके मुताबिक ये अलग-अलग विरोध नहीं, बल्कि मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग से जुड़ा एक साझा आंदोलन है। दूसरी ओर, भाजपा ने विपक्ष पर संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने का आरोप लगाया है। चुनाव आयोग और भाजपा ने मतदाता सूची में कथित पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है।
मार्च के बाद रात में कांग्रेस सेवा दल के कार्यकर्ता दिल्ली की सड़कों पर सफाई करते भी नजर आए। इस पहल ने राजनीतिक विरोध के साथ सार्वजनिक स्थानों की सफाई और नागरिक जिम्मेदारी के पहलू को भी चर्चा में ला दिया।
11. 11-13 अक्टूबर: जंतर-मंतर से प्रदर्शन स्थल का दर्जा हटाने का आदेश और CJP की वापसी
11 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के हस्ताक्षर से जारी स्थायी आदेश के तहत जंतर-मंतर रोड को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया। यह फैसला 12 अक्टूबर को सार्वजनिक हुआ। आदेश में रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के CBD ग्राउंड को नए निर्धारित प्रदर्शन स्थल के रूप में शामिल किया गया।
13 अक्टूबर को CJP के आशुतोष रांका, सौरव दास और अजिंक्य शिंदे समेत कई कार्यकर्ता बैरिकेड पार कर जंतर-मंतर पहुंचे। उन्होंने भारतीय ध्वज के साथ नारे लगाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग दोहराई। पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया।
इस घटनाक्रम ने जंतर-मंतर को लेकर बहस को नया आयाम दिया है। एक तरफ प्रशासन वैकल्पिक स्थलों के जरिए प्रदर्शन प्रबंधन की व्यवस्था बदल रहा है, वहीं CJP का कहना है कि निर्धारित स्थल की सूची से नाम हटाने से विरोध की आवाज को समाप्त नहीं किया जा सकता।
अब प्रदर्शन कहां होंगे? दिल्ली पुलिस के तीन नए स्थल
दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर के स्थान पर तीन स्थल निर्धारित किए हैं।
रामलीला मैदान: दिल्ली के पुराने और प्रमुख सार्वजनिक आयोजन स्थलों में शामिल है। यहां राजनीतिक रैलियों और जन आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है।
बुराड़ी मैदान: उत्तरी दिल्ली में स्थित यह बड़ा मैदान व्यापक जनसमूहों के आयोजन के लिए इस्तेमाल होता रहा है।
CBD ग्राउंड, शाहदरा: पूर्वी दिल्ली का यह मैदान भी अब निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची में शामिल है।
दिल्ली पुलिस के अनुसार, नए स्थलों पर प्रदर्शनों के संचालन और अनुमति से संबंधित विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) अलग से जारी की जाएगी।
जंतर-मंतर की तुलना में वैकल्पिक स्थलों की दूरी और उनकी पहुंच महत्वपूर्ण होगी। संसद और केंद्रीय सरकारी कार्यालयों के निकट होने के कारण जंतर-मंतर पर आयोजित छोटे प्रदर्शनों को भी व्यापक मीडिया और राजनीतिक ध्यान मिलता रहा है। नए स्थलों पर भीड़ की क्षमता अधिक हो सकती है, लेकिन उनकी राजनीतिक केंद्रों से दूरी आंदोलनकारियों के लिए पहुंच, दृश्यता और खर्च के लिहाज से महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है।
क्या जंतर-मंतर से दर्जा हटने का मतलब विरोध का अधिकार समाप्त होना है?
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाना और शांतिपूर्ण विरोध के संवैधानिक अधिकार को समाप्त करना अलग-अलग बातें हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। इन अधिकारों पर सार्वजनिक व्यवस्था सहित संविधान में निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया था। इसलिए मौजूदा बदलाव का मूल्यांकन करते समय यह देखना जरूरी होगा कि नए स्थल कितने सुलभ हैं, अनुमति प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और प्रदर्शनकारियों को अपनी मांगें सार्वजनिक रूप से रखने के पर्याप्त अवसर मिलते हैं।
जंतर-मंतर का इतिहास और लोकतंत्र के सामने नया सवाल
जंतर-मंतर का आधुनिक इतिहास देश के प्रमुख जन आंदोलनों से जुड़ा रहा है। अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर किसानों के धरने, OROP की मांग, पहलवानों के प्रदर्शन और NEET-UG विवाद तक, इस जगह ने नागरिकों को अपनी आवाज उठाने का महत्वपूर्ण मंच दिया।
अक्टूबर 2026 में चुनाव आयोग के खिलाफ CJP और इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शनों ने जंतर-मंतर की राजनीतिक भूमिका को फिर चर्चा में ला दिया है। एक ओर मतदाता सूची के पुनरीक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त की जवाबदेही को लेकर विरोध हो रहा है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों में बदलाव किया है।
अब सवाल केवल यह नहीं है कि प्रदर्शन कहां होगा। यह भी महत्वपूर्ण है कि वैकल्पिक स्थल नागरिकों को कितनी आसानी से उपलब्ध होते हैं, क्या वहां विरोध की सार्वजनिक दृश्यता बनी रहती है और क्या प्रशासनिक व्यवस्था शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार तथा सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बना पाती है।
जंतर-मंतर की विरासत इसी सवाल को महत्वपूर्ण बनाती है: लोकतंत्र में असहमति के लिए मंच बदल सकता है, लेकिन उस असहमति को सुनने और उस पर जवाब देने की संस्थागत जिम्मेदारी बनी रहती है।
