Dr.Ravindra Rana / Rajesh Sharma

अदब की दुनिया में इन दिनों कथ्य और शिल्प को लेकर गहरी बहसें चल रही हैं। कुछ लेखक कथ्य को केंद्र में रखकर समय की सच्चाइयों को दर्ज़ करने की कोशिश कर रहे हैं, तो कुछ शिल्प की परंपराओं से बँधे हुए हैं। इसी बहस के बीच पत्रकार और लेखक विपिन धनकड़ का नया उपन्यास उस ज़रूरी समकालीन लेखन का हिस्सा है, जो यह बताता है कि साहित्य में कथ्य और कहन सिर्फ शैलीगत तत्व नहीं, बल्कि समय के दस्तावेज़ को दर्ज़ करने के उपकरण हैं।
इस उपन्यास का केंद्र एक बीमारी है—सोनम की बीमारी और उसका इलाज। लेकिन यह सिर्फ एक मरीज़ की कहानी नहीं है, यह अस्पतालों की भीतरू दुनिया, वहाँ की व्यवस्था, मशीनों से भरे पर भावशून्य हो चले माहौल और इलाज के नाम पर चल रहे कारोबार का संवेदनशील दस्तावेज़ है। यह उपन्यास पढ़ते हुए बीते दौर के उन ज़िला अस्पतालों की याद ताज़ा हो जाती है, जिन्हें लोग भरोसे का ठिकाना मानते थे। जहाँ डॉक्टर की डांट में भी स्नेह होता था, और शफ़ा किसी दवाई से ज़्यादा डॉक्टर के व्यवहार में बसती थी।

विपिन धनकड़ की पत्रकारिता का अनुभव इस उपन्यास की पंक्तियों में जगह-जगह झलकता है। दृश्य-संवेदना इतनी प्रबल है कि पाठक किसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की तरह घटनाओं को घटते देखता है। यह बात तब भी महसूस होती है जब नायक अस्पताल की लिफ्ट के पास खेतों की तस्वीर देखकर ठिठकता है—जिसे वह शहरी चिकित्सा के चमकते ढाँचे के बीच एक बेमेल, मगर ज़रूरी स्मृति की तरह देखता है।
यह उपन्यास केवल अस्पतालों का वातावरण नहीं रचता, यह हमारे बदलते समाज का भी आइना है—जहाँ डॉक्टरों के चेहरे से ‘इंसान’ जैसे ग़ायब हो रहे हैं, और मरीज़ एक संख्या बनकर मशीनों के हवाले कर दिए जाते हैं। यह संवेदनशील पाठक के भीतर एक प्रश्न पैदा करता है—क्या तरक़्क़ी की इस दौड़ में हमने अपने सबसे ज़रूरी मानवीय मूल्यों को कहीं पीछे छोड़ दिया है?

‘हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी’ के संस्मरणों के बाद यह उपन्यास विपिन के लेखन का एक नया पड़ाव है—जहाँ वे आत्मकथ्य से आगे बढ़कर समाज और व्यवस्था के भीतर उतरते हैं। यह साहित्य के सामाजिक उत्तरदायित्व का जीवंत उदाहरण है, और यह भी कि उपन्यास अब भी अपने समय की जटिलताओं को कहने का सबसे ताक़तवर माध्यम है।

हाउस हसबैंड ऑन डयूटी पर डॉ विपिन धनकड़ से विशेष बातचीत यहां देखें सुनें।
डॉ विपिन धनकड़ के इस उपन्यास की भूमिका वरिष्ठ पत्रकार, संपादक और लेखक प्रभात सिंह ने लिखी है। प्रभात सिंह ने जो लिखा है वो हम यहां ज्यों का त्यों दे रहे हैं ……

अदब की दुनिया में कथ्य और शिल्प की ताज़ा बहस के बीच विपिन धनकड़ का यह उपन्यास इस बात की बानगी ज़रूर है कि कथ्य और कहन कितने अहम हैं. यह भी कि अदब की ज़िम्मेदारी अगर अपने वक़्त को दर्ज़ करने की भी है, तो इसमें शिल्प के शास्त्रीय बोध की कितनी अनिवार्यता है. जैसा कि इस उपन्यास के नाम से ज़ाहिर होता है कि इसका नाता बीमार और बीमारी हैं. सोनम की बीमारी और इलाज से हवाले से यह उपन्यास अस्पतालों के भीतर की दुनिया और वहाँ के माहौल में झाँकने का ऐसा मौक़ा देता है, जहाँ पढ़ने वाले इसे अपने पूर्वानुभवों की कसौटी पर कस भी सकते हैं.
इसे पढ़ते हुए, अभी आधी सदी पहले तक किसी एमबीबीएस डॉक्टर के पास जाने वाले मरीज़ के ऐतबार के बारे में सोच सकते हैं, जब किसी इमरजेंसी की नौबत आने पर ज़िला अस्पताल उम्मीद का बड़ा ठिकाना हुआ करते थे. चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में हुई तरक़्क़ी, नई बीमारियाँ, उनकी पहचान और इलाज के नए तरीक़ों की ईजाद और मॉल की तरह के लकदक अस्पतालों से आश्वस्ति कितनी बड़ी आबादी के हिस्से में आई है, यह कोई छिपी हुई बात नहीं है. अभी कुछ बरस पहले ही कोविड की महामारी के दौरान चिकित्सा तंत्र की असलियत को बहुतेरों ने बहुत क़रीब से देखा-जाना. यह उपन्यास पढ़ते हुए एक सदी पुरानी फ़िल्म ‘मेट्रोपोलिस’ के कई मंज़र आँखों के सामने आ जाते हैं, हालाँकि दोनों कहानियों से कोई सीधा साम्य नहीं है.
इस मौज़ू पर देश-दुनिया में जाने कितनी ही कहानियाँ कही जा चुकी हैं, आगे भी कही-सुनी जाती रहेंगी, फ़िल्में भी बनी हैं पर ज़ाहिर है कि ये सब अपने-अपने काल खंड में ख़ास नज़रिये से देखे-बताए गए प्रतिनिधि क़िस्से हैं, यह उपन्यास उसमें ही कुछ नया अनुभव जोड़ेगा. विपिन ने अर्से तक अख़बारनवीसी की है, और उनका यह तजुर्बा उन्हें अपने समय और आसपास की दुनिया को मुख़्तलिफ़ नज़र से देखने और जानने की सलाहियत देता है. इस उपन्यास की अनौपचारिक कहन में यह बात बार-बार रेखांकित होती है, तब जब उपन्यास का नायक लिफ़्ट के क़रीब खेतों की हरियाली के बीच काम करते लोगों की तस्वीर देखकर ठिठक जाता है, जो उस अस्पताल के ठाठ के बीच उसे बेमेल लगती है और अपने कृषि प्रधान देश की बड़ी आबादी के बरक्स विरोधाभास रचती है, और तब भी जब एनेस्थिसिया के असर पर वह इलाज के कारगर तरीक़े की तरह से ग़ौर करता है.
गुज़रे ज़माने के एमबीबीएस डॉक्टर मर्ज़ का इलाज तो ख़ैर करते ही थे, हाथ में शिफ़ा होने के बाद भी उनका मानवीय चेहरा हमेशा नुमायाँ रहता था, उनकी हिदायतों पर अमल न करने वाले मरीज़ डांट भी खाते थे. बच्चों और बड़ों के इलाज के लिए लोग अमूमन एक ही डॉक्टर के आसरे रहते थे. विशेषज्ञता वाले इस दौर में, तमाम तरह की उपलब्धियों के बीच डॉक्टर का इंसानी चेहरा कहीं छूट गया क्यों लगता है! बड़ी-बड़ी इमारतों में आबाद अस्पताल हैं, तरह-तरह की मशीनें, और मशीनों की तरह ही चलते हाथ-पाँव हैं, और भावशून्य चेहरे. यह अस्पतालों का परिवेश भर नहीं, बदलते हुए समाज का अक्स भी मालूम होता है.
इसके पहले विपिन ने ‘हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी’ के नाम से अपने संस्मरण दर्ज़ किए हैं. उनका यह उपन्यास कहीं-कहीं उसका भी विस्तार मालूम होता है. मेरी शुभकामनाएं. उम्मीद करता हूँ कि पढ़ने वालों की दुनिया में ‘हाउस हसबैंड ऑन ड्यूटी’ की तरह ही उनके इस उपन्यास का भी स्वागत होगा.
हमने विपिन से इस उपन्यास पर लंबी बातचीत की, जो यूट्यूब चैनल Dr.RavindraRana और Save India News पर साक्षात्कार के रूप में उपलब्ध है। यह बातचीत और यह उपन्यास, दोनों मिलकर हमारे समय के उस चेहरे को सामने रखते हैं, जो अक्सर अस्पतालों की दीवारों के भीतर छिपा रह जाता है।
सेव इंडिया न्यूज पर भी आप डॉ विपिन धनकड़ से गेट वेल सून सोनम पर चर्चा देख सकते हैं।
