26 जुलाई 2026। मेरठ की सिवालखास विधानसभा सीट का पूठखास गांव।
पूठखास स्थित सीआरएस फार्म हाउस में रालोद संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष और पूर्व सांसद केसी त्यागी का स्वागत समारोह था। सामने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान, रालोद कार्यकर्ता और अलग अलग सामाजिक वर्गों के लोग मौजूद थे। मौका स्वागत का था, लेकिन केसी त्यागी का भाषण धीरे धीरे एक ऐसी कहानी में बदल गया, जिसमें चौधरी चरण सिंह की यादें थीं, किसान राजनीति का इतिहास था, टूटे सामाजिक समीकरणों की चिंता थी और जयंत चौधरी के नेतृत्व को लेकर भविष्य का सपना भी था।
केसी त्यागी ने अपनी बात 28 जुलाई से शुरू की। उनके लिए 28 जुलाई सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब किसान और गांव की मिट्टी से निकले चौधरी चरण सिंह ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।
लेकिन इस तारीख से जुड़ी केसी त्यागी की एक ऐसी याद है, जो किसी इतिहास की किताब में नहीं मिलती।
राष्ट्रपति भवन से आया फोन
मोरारजी देसाई के इस्तीफे के बाद दिल्ली में राजनीतिक हलचल थी। चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनने की संभावना बढ़ रही थी। फिर एक दिन राष्ट्रपति भवन से फोन आया।
समस्या यह थी कि चौधरी चरण सिंह उस समय आराम कर रहे थे।
केसी त्यागी बताते हैं कि उन लोगों में से कुछ ही लोग ऐसे थे जिन्हें चौधरी साहब को नींद से जगाने की हिम्मत थी। वे कमरे में पहुंचे। चौधरी चरण सिंह को जगाया गया।
नींद से उठे चौधरी साहब ने पूछा, आखिर बात क्या है?
जवाब मिला, राष्ट्रपति भवन से फोन आया है। आपको प्रधानमंत्री पद के लिए आमंत्रित किया गया है।

केसी त्यागी कहते हैं कि उस पल के वे खुद गवाह थे।
इसके बाद का इतिहास सब जानते हैं।
लेकिन त्यागी के लिए उस घटना का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। उनके लिए असली सवाल यह है कि आखिर वह कौन सी ताकत थी जिसने गांव के एक किसान नेता को दिल्ली की सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाया था।
और फिर उनका भाषण सीधे किसान की कहानी में उतर जाता है।

जिस देश में गेहूं भी बाहर से आता था
आज भारत के पास खाद्यान्न का बड़ा भंडार है। जरूरत पड़ने पर करोड़ों लोगों तक राशन पहुंचाने की व्यवस्था है। लेकिन आजादी के बाद भारत की तस्वीर ऐसी नहीं थी।
केसी त्यागी बताते हैं कि उस समय गेहूं, चावल और चीनी जैसी जरूरत की चीजों के लिए भारत को विदेशों की ओर देखना पड़ता था।
फिर खेतों में किसान ने तस्वीर बदलनी शुरू की।
किसान ने देश का पेट भरा। कृषि वैज्ञानिकों ने नई तकनीक और नई किस्मों पर काम किया। धीरे धीरे भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुआ।
केसी त्यागी का कहना है कि आज देश में करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन मिल पा रहा है तो उसके पीछे उस किसान की मेहनत है, जिसने खेत में पसीना बहाकर देश का अनाज भंडार भरा।
लेकिन इसी कहानी में एक विरोधाभास भी है।
जिस किसान ने देश को भुखमरी से बाहर निकाला, उसे अपनी फसल का दाम तय करने का अधिकार लंबे समय तक नहीं मिला।

मंडी में किसान इंतजार करता था
केसी त्यागी अपने बचपन की याद सुनाते हैं।
वे अपने पिता के साथ मुरादनगर की मंडी जाया करते थे। गन्ने के लिए मोदीनगर की मंडी भी जाना होता था।
किसान फसल लेकर पहुंचता था और फिर इंतजार करता था कि आज उसकी फसल का भाव क्या तय होगा।
भाव किसान तय नहीं करता था।
किसी व्यापारी की जुबान से निकली कीमत उस दिन किसान की मेहनत का मूल्य बन जाती थी।
फिर उसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मिट्टी से चौधरी चरण सिंह की आवाज उठी।
किसान की फसल का न्यूनतम मूल्य होना चाहिए।
यहीं से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की राजनीति का एक बड़ा अध्याय सामने आता है।
केसी त्यागी चौधरी चरण सिंह और कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की भूमिका को याद करते हुए कहते हैं कि किसान को उसकी फसल के लिए एक न्यूनतम मूल्य की गारंटी की सोच मजबूत हुई।

कभी किसान तय करता था कि दिल्ली में कौन बैठेगा
केसी त्यागी की कहानी अब खेत से निकलकर संसद तक पहुंचती है।
वे उस दौर को याद करते हैं जब चौधरी चरण सिंह के साथ बड़ी संख्या में सांसद खड़े थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों के सांसद किसान राजनीति के साथ थे।
उस समय गांव का आदमी सिर्फ वोट देने वाला नहीं था।
वह सत्ता के समीकरण बनाने वाला था।
प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल के जवाब में किसान राजनीति की ताकत दिखाई देती थी।
केसी त्यागी का सवाल है, वह ताकत आज कहां चली गई?
जिस समाज के नेता प्रधानमंत्री बनाने की स्थिति में थे, आज वही समाज ग्राम प्रधान और जिला पंचायत की सदस्यता के लिए क्यों संघर्ष कर रहा है?
यही सवाल उनके भाषण को अतीत की कहानी से वर्तमान की राजनीति में ले आता है।

हल सिर्फ चुनाव निशान नहीं था
चौधरी चरण सिंह के दौर की राजनीति का जिक्र करते हुए केसी त्यागी कहते हैं कि उस समय पार्टी का टिकट और हल का निशान अपने आप में एक राजनीतिक ताकत हुआ करता था।
जिस उम्मीदवार के कंधे पर हल आ गया, उसके पीछे गांव खड़ा हो जाता था।
किसान राजनीति में उस समय संगठन सिर्फ पार्टी कार्यालयों में नहीं था। वह गांव की चौपालों में था। खेतों की मेड़ पर था। सामाजिक रिश्तों में था।
आज केसी त्यागी उसी राजनीतिक ताकत को फिर से खड़ा करने की बात करते हैं।
और इसी बिंदु पर कहानी जयंत चौधरी तक पहुंचती है।

अब विरासत जयंत चौधरी के कंधों पर
केसी त्यागी साफ कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता।
न चौधरी अजित सिंह वही बन सकते थे और न जयंत चौधरी चौधरी चरण सिंह की हूबहू तस्वीर हो सकते हैं।
लेकिन विरासत की अपनी एक ताकत होती है।
विचार आगे बढ़ते हैं।
केसी त्यागी के मुताबिक किसान, मजदूर और मेहनतकश समाज की राजनीति को फिर मजबूत करने की जरूरत है और इसके लिए जयंत चौधरी के नेतृत्व को मजबूत करना होगा।
उनका संदेश रालोद कार्यकर्ताओं के लिए सीधा है। पार्टी जिस उम्मीदवार को टिकट दे, उसके पीछे मजबूती से खड़ा होना चाहिए।
कहानी सिर्फ किसानों की नहीं है
चौधरी चरण सिंह की राजनीति को याद करते हुए केसी त्यागी एक और जरूरी सवाल उठाते हैं।
क्या किसान राजनीति अकेले अपने दम पर अपनी पुरानी ताकत हासिल कर सकती है?
उनका जवाब है, नहीं।
किसान समाज के साथ दलित और अल्पसंख्यक समाज को जोड़ना होगा।
त्यागी बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह की राजनीति सिर्फ एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं थी। उनकी राजनीति में किसानों के साथ दलित और अल्पसंख्यक समाज की भागीदारी की सोच भी मौजूद थी।
उनके मुताबिक अगर किसान राजनीति को दोबारा दिल्ली और लखनऊ में प्रभावी बनाना है तो सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करना होगा।
यानी यह कहानी सिर्फ सत्ता की नहीं है।
यह सामाजिक रिश्तों की कहानी भी है।

मुजफ्फरनगर के बाद क्या बदल गया?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का जिक्र हो और मुजफ्फरनगर की घटना का नाम न आए, यह मुश्किल है।
केसी त्यागी के भाषण में भी यह घटना एक महत्वपूर्ण मोड़ बनकर सामने आती है।
उनका कहना है कि मुजफ्फरनगर की घटना के बाद किसान और मुस्लिम समाज दोनों राजनीतिक रूप से कमजोर हुए।
जिस सामाजिक भाईचारे ने कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को ताकत दी थी, उसमें दरार आई।
और जब सामाजिक एकता कमजोर हुई तो राजनीतिक ताकत भी बिखर गई।
केसी त्यागी अब उसी भाईचारे को फिर मजबूत करने की बात कर रहे हैं।
लोकदल से निकली कई राजनीतिक धाराएं
केसी त्यागी की अपनी राजनीतिक यात्रा भी चौधरी चरण सिंह और लोकदल की कहानी से जुड़ी है।
वे 1974 से लोकदल की राजनीति से जुड़े रहे हैं। उन्होंने देश की राजनीति में कई बड़े नेताओं के साथ काम किया। लेकिन उनके लिए चौधरी चरण सिंह का स्थान हमेशा अलग रहा।
त्यागी बताते हैं कि हरियाणा, बिहार और उत्तर प्रदेश में बाद में उभरी कई राजनीतिक धाराओं के पीछे किसी न किसी रूप में लोकदल की राजनीतिक विरासत दिखाई देती है।
कई नेता अलग हुए।
कई पार्टियां बनीं।
राजनीतिक रास्ते बदलते गए।
लेकिन चौधरी चरण सिंह की बनाई हुई किसान और ग्रामीण राजनीति की छाप लंबे समय तक बनी रही।

अब सवाल भविष्य का है
पूठखास में 26 जुलाई को केसी त्यागी का भाषण सिर्फ चौधरी चरण सिंह को याद करने वाला भाषण नहीं था।
यह एक राजनीतिक सवाल भी था।
क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश फिर अपनी पुरानी राजनीतिक ताकत हासिल कर सकता है?
क्या किसान, दलित और अल्पसंख्यक समाज फिर किसी साझा राजनीतिक मंच पर खड़े हो सकते हैं?
क्या जयंत चौधरी चौधरी चरण सिंह की उस विरासत को नई राजनीतिक परिस्थितियों में आगे ले जा सकते हैं?
केसी त्यागी को इसका जवाब जयंत चौधरी के नेतृत्व में दिखाई देता है।
वे चाहते हैं कि किसान और मेहनतकश समाज फिर ऐसी राजनीतिक ताकत बने, जिसकी आवाज लखनऊ और दिल्ली दोनों में सुनी जाए।
एक फोन कॉल से शुरू हुई कहानी, एक सपने पर खत्म हुई
26 जुलाई की उस शाम पूठखास में केसी त्यागी ने कई दशक पीछे जाकर एक कमरा याद किया।
उस कमरे में चौधरी चरण सिंह सो रहे थे।
बाहर दिल्ली की राजनीति करवट ले रही थी।
फिर राष्ट्रपति भवन से फोन आया।
एक किसान नेता को देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए बुलाया जा रहा था।
वह फोन इतिहास बन गया।
अब केसी त्यागी उसी इतिहास को भविष्य से जोड़ते हैं।
उनका सपना है कि किसान और मेहनतकश समाज फिर अपनी राजनीतिक ताकत हासिल करे। दलित और अल्पसंख्यक समाज साथ आए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का पुराना भाईचारा मजबूत हो और जयंत चौधरी के नेतृत्व में ऐसी राजनीतिक ताकत बने कि लखनऊ और दिल्ली की राजनीति में उन्हें नजरअंदाज करना संभव न हो।
चौधरी चरण सिंह के कमरे में आया वह फोन इतिहास बन चुका है।
लेकिन पूठखास की सभा से केसी त्यागी ने एक नया सवाल जरूर छोड़ दिया है।
क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश फिर ऐसी राजनीतिक ताकत पैदा करेगा, जिसकी घंटी एक दिन दोबारा दिल्ली में बजे?

