Dr. Ravindra Rana
सियासी पंचायत यू टयूब चैनल के लिए | विशेष बातचीत
चौधरी चरण सिंह का भारतीय राजनीति में कद सिर्फ एक पूर्व प्रधानमंत्री या किसान नेता के रूप में नहीं देखा जाता। उनके समर्थकों के लिए वह उस राजनीतिक बदलाव के प्रतीक थे, जिसमें गांव की पृष्ठभूमि से आया एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक पहुंचा।
28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह ने भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनका प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल भले ही बेहद छोटा रहा, लेकिन भारतीय राजनीति पर उसका प्रभाव लंबे समय तक दिखाई दिया। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक प्रधानमंत्री रहे।
इसी दौर की राजनीति, जनता पार्टी के भीतर के संघर्ष, चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनने की परिस्थितियों और उस ऐतिहासिक रात की कहानी को लेकर सियासी पंचायत से बातचीत में पूर्व सांसद और राष्ट्रीय लोक दल के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष केसी त्यागी ने कई दिलचस्प संस्मरण साझा किए।
सवाल: सबसे पहले आपको बधाई। राष्ट्रीय लोक दल के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष की जिम्मेदारी आपको मिली है। आप इसके लिए किसे धन्यवाद देंगे?
केसी त्यागी: इसका धन्यवाद जयंत चौधरी जी को कीजिए।
सवाल: 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। उस समय दिल्ली में किस तरह का राजनीतिक माहौल था?
केसी त्यागी: इसकी बुनियाद तो उस समय पड़ गई थी जब चौधरी साहब और राजनारायण जी को मंत्रिमंडल से हटाया गया था।
चौधरी साहब के 102 सांसद थे और आधा दर्जन मुख्यमंत्री उनके साथ थे। मोरारजी भाई को प्रधानमंत्री बनाने में सिर्फ और सिर्फ चौधरी साहब का योगदान था। अन्यथा बाबू जगजीवन राम का नाम लगभग तय हो गया था।
चौधरी साहब का तर्क था कि मोरारजी भाई ने आपातकाल से जुड़ा प्रस्ताव पेश किया था। इसलिए ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री नहीं बनाया जा सकता जिसने उस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया हो।
चौधरी साहब ने कई बार आपातकाल से जुड़े सवाल उठाए। वह चाहते थे कि आपातकाल के दौरान हुए घटनाक्रम की गंभीर जांच हो और जिम्मेदारी तय हो।
इसके बाद हमने दिल्ली में एक किसान रैली की। समूचे देश का किसान और ग्रामीण भारत दुखी था कि चौधरी साहब को क्यों हटाया गया। उस रैली में देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग आए। अंडमान-निकोबार तक से लोग पहुंचे थे।
उसके बाद सरकार पर दबाव पड़ा। जनता पार्टी चिंतित हुई। उपचुनावों में भी उसे नुकसान उठाना पड़ा। आखिरकार चौधरी साहब को वापस मंत्रिमंडल में बुलाया गया।
सवाल: उन्हें वापस बुलाए जाने के बाद क्या हुआ?
केसी त्यागी: मोरारजी भाई ने उन्हें बुलाया। मैं चौधरी करतार सिंह जी, जो चौधरी साहब के अंगरक्षक थे, उनके साथ गया।
पहले शायद कृषि मंत्रालय की पेशकश की गई, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया। वित्त मंत्रालय ऐसा विभाग था जिससे गांव, खेत, किसान और गरीब की मदद की जा सकती थी। बाद में चौधरी साहब ने वित्त मंत्रालय संभाला।
लेकिन इसी बीच देवीलाल जी और कर्पूरी ठाकुर जी को भी एक साजिश के तहत हटा दिया गया। रामनरेश यादव जी पहले ही हट चुके थे। इससे चौधरी साहब के समर्थकों में बहुत गुस्सा था।

देवीलाल जी के हटने के बाद जिन लोगों ने यह फैसला किया, उन्हें लेकर भी सवाल उठे कि वे आपातकाल के दौरान जेल नहीं गए थे।
राजनारायण जी, कर्पूरी ठाकुर और देवीलाल जी बेहद नाराज थे। चौधरी साहब के समर्थक सांसदों में भी असंतोष बढ़ने लगा। सांसद इस्तीफा देने लगे।
सवाल: यह इस्तीफों का सिलसिला कितने दिन चला?
केसी त्यागी: करीब 10 से 15 दिन तक। धीरे-धीरे लगभग 80 से 85 सांसद चौधरी साहब के इर्द-गिर्द आ गए थे। एक तरह से विद्रोह का माहौल था।
जनता भी मोरारजी भाई की सरकार से बहुत प्रसन्न नहीं थी। जनता के बीच यह धारणा बन रही थी कि सरकार किसान और ग्रामीण भारत के सवालों पर अपेक्षित काम नहीं कर रही है।
फिर एक दिन चौधरी साहब ने उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद तय हो गया कि सरकार अब ज्यादा दिन नहीं चल सकती।
वामपंथी दलों ने भी इसका स्वागत किया। अकाली दल ने भी समर्थन किया। चौधरी साहब के समर्थक पहले से उनके साथ थे।
सवाल: फिर प्रधानमंत्री के रूप में चौधरी चरण सिंह के नाम पर सहमति कैसे बनी?
केसी त्यागी: करीब एक सप्ताह तक चर्चा चली कि प्रधानमंत्री किसे बनाया जाए। मोरारजी भाई का इस्तीफा तय हो गया था।
उस समय नेता प्रतिपक्ष वाई. बी. चव्हाण थे, लेकिन इंदिरा गांधी उन्हें स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थीं, क्योंकि वह कांग्रेस से अलग होकर आए थे।
फिर चौधरी साहब की कद-काठी और उनका राजनीतिक रुतबा ऐसा था कि उस समय भारतीय राजनीति में उनके अलावा कोई दूसरा विकल्प दिखाई नहीं देता था।
आखिरकार चौधरी साहब को नेता चुना गया।
राजनारायण जी तो चौधरी साहब को नहीं बुलाए जाने से इतने नाराज थे कि उन्होंने कहा था कि अगर अगले दिन तक निमंत्रण नहीं आया तो हम रामलीला मैदान में रैली करेंगे।
सवाल: वह मशहूर किस्सा क्या है जब चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बनने की सूचना मिलने के समय सो रहे थे?
केसी त्यागी: चौधरी साहब के स्वभाव का हिस्सा था कि वह दोपहर में खाना खाने के बाद करीब आधा-पौना घंटा आराम करते थे।
उस दिन पूरी दिल्ली की प्रेस वहां आ चुकी थी। धीरे-धीरे समर्थक भी इकट्ठा होने लगे थे। राष्ट्रपति भवन से फोन भी आ चुका था।
लेकिन समस्या यह थी कि चौधरी साहब को जगाए कौन?
माताजी भी नहीं जगा सकती थीं। मैं थोड़ा उनके मुंह लगा हुआ था। मैं गया, उनके पैर छुए और थोड़ा जोर से दबाया।
उन्होंने पूछा, “क्या हुआ?”
मैंने कहा, “जी, माफी चाहता हूं। राष्ट्रपति भवन से फोन है। आपको सुनना होगा।”

इसके बाद मैंने रामअजोर जी को अंदर से फोन की सूचना देने को कहा। राष्ट्रपति की ओर से बातचीत हुई और उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए सरकार बनाने का निमंत्रण दिया गया।
चौधरी साहब ने अगले दिन लोगों से बातचीत की और राष्ट्रपति भवन को अपनी मंत्रिपरिषद की सूची दी।
सवाल: चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनने के दिन गांवों से लोग गुड़ लेकर पहुंचे थे। यह किस्सा क्या है?
केसी त्यागी: अगले दिन हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के ग्रामीण इलाकों से हजारों लोग गुड़ लेकर पहुंचे थे।
यह गांव की एकजुटता थी। हमारे यहां कलाकंद, जलेबी और इमरती नहीं होती। हम तो गुड़ वाले लोग हैं।
उस दिन इतना गुड़ आया कि चौधरी साहब के आवास पर गुड़ का भंडार लग गया। जो भी आता, उसे गुड़ दिया जाता। पत्रकारों को भी गुड़ दिया जाता था।
यह ग्रामीण भारत की एकजुटता और चेतना का प्रतीक था।
सवाल: क्या उद्योग जगत और चौधरी चरण सिंह की राजनीति के बीच वैचारिक दूरी थी?
केसी त्यागी: चौधरी साहब का पूरा दर्शन ग्रामीण भारत के उत्थान पर आधारित था। पूंजीपतियों से उनका मेल कभी बहुत नहीं रहा।
मुझे 1977 का एक प्रसंग याद है। जब वह गृह मंत्री बने तो दो बड़े नेताओं के आग्रह पर वह के. के. बिड़ला से मिलने के लिए तैयार हुए।
बिड़ला जी पर आरोप था कि 1971 के चुनाव में उन्होंने इंदिरा गांधी को जीपें दी थीं। उस मामले में जांच चल रही थी।
मैं उस समय गांव की पृष्ठभूमि से आया था। जून का महीना था और बिड़ला जी काला कोट पहनकर आए थे।
चौधरी साहब ने उनसे बातचीत की और कहा, “अगर कोई गलत काम नहीं किया है तो फंसोगे नहीं, किया है तो बचोगे नहीं।”
चौधरी साहब किसी के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं थे। लेकिन न्याय को लेकर उनका मन हमेशा आंदोलित रहता था।
सवाल: आपके लिए चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री बनना कितना बड़ा बदलाव था?
केसी त्यागी: मुझे लगता है कि वह एक तरह की लिबरेशन थी।
लिबरेशन यानी आजादी। सदियों की गुलामी के बाद 1947 में राजनीतिक आजादी मिली, लेकिन चौधरी साहब ने उसके बाद एक नए तरीके से आजादी का सपना दिखाया।

गांव की पृष्ठभूमि में एक मामूली घर में पैदा हुआ व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। उन्होंने हम लोगों को यह सपना दिखाया कि अगर आप गांव से आते हैं, तब भी आप देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकते हैं।
बाद में देवगौड़ा, चंद्रशेखर और नरेंद्र मोदी जैसे सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले लोग भी देश के प्रधानमंत्री बने।
सवाल: चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद दिल्ली की राजनीति में क्या बदलाव आया?
केसी त्यागी: ब्यूरोक्रेसी और धनाढ्य वर्ग के लोगों ने उन्हें पसंद नहीं किया। चौधरी साहब लुटियंस जोन के आदमी नहीं थे।
यह भारतीय राजनीति में एक नया प्रयोग था कि खेत चलाने वाले किसान का बेटा भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकता है।
यह एक मिसाल बनी और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सबक भी।
सवाल: चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री आवास 7 रेसकोर्स रोड क्यों नहीं गए?
केसी त्यागी: उन्हें बड़े मकान, कोठी या बंगले का कोई लोभ नहीं था।
जब वह गृह मंत्री थे तो तुगलक रोड के सरकारी आवास में रहते थे। गृह मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भी छोटे सरकारी आवास में रहे।
मुख्यमंत्री रहते हुए भी वह उसी घर में रहे जिसमें मंत्री के रूप में रहते थे।
करीब 50 साल तक विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उनका लखनऊ में कोई मकान नहीं था। दिल्ली में भी उनका निजी मकान नहीं था। गाजियाबाद और मेरठ में उन्होंने वकालत की, वहां भी उनका अपना मकान नहीं था।
आज नगर पालिका के सदस्य तक कोठियों में रहते हैं। वह थे चौधरी चरण सिंह। वह एक सबक था।
सवाल: दिसंबर 2027 में चौधरी चरण सिंह की 125वीं जयंती होगी। आज की राजनीति में उनकी प्रासंगिकता को आप किस तरह देखते हैं?
केसी त्यागी: दो काम सरकारों ने अच्छे किए हैं। पहला, 23 दिसंबर को किसान दिवस मनाया जाने लगा है। देशभर में कार्यक्रम होते हैं और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति समेत विभिन्न दलों के लोग संसद में लगी चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हैं।
मुझे यह देखकर प्रसन्नता होती है कि जिस जवाहरलाल नेहरू से वह वैचारिक तौर पर संघर्ष करते थे, उसी संसद परिसर में चौधरी चरण सिंह की प्रतिमा उनके सामने खड़ी है।
दूसरा, मैं इस सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं कि चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न दिया गया। यह सम्मान लंबे समय तक विशिष्ट वर्गों तक सीमित माना जाता था।
2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने चौधरी चरण सिंह को मरणोपरांत भारत रत्न प्रदान किया था, जिसे उनके पौत्र जयंत चौधरी ने ग्रहण किया।
सवाल: आज चौधरी चरण सिंह की विचारधारा कितनी प्रासंगिक है?
केसी त्यागी: चौधरी साहब कई सवाल छोड़ गए हैं।
आज जिस मंडल राजनीति की बात होती है, उसके भी वह एक तरह से जन्मदाता थे। 1935 में कांग्रेस पार्टी की एक बैठक में उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि किसान जातियों के बच्चों को 50 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। दलितों के लिए भी उन्होंने 25 प्रतिशत आरक्षण की बात रखी थी।
वह प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ।
चौधरी साहब सामाजिक न्याय के अलमबरदार थे। 1977 और 1980 के दौर में सबसे ज्यादा किसान और पिछड़ी जातियों के विधायक और सांसद उसी राजनीतिक दौर में दिखाई दिए।
चौधरी साहब थे तो रामनरेश यादव बने। चौधरी साहब थे तो मुलायम सिंह यादव का कद इतना बड़ा हुआ। चौधरी साहब थे तो देवीलाल जी आगे बढ़े। चौधरी साहब थे तो ओडिशा में नीलमणि राउत राय जैसे नेता आगे आए। चौधरी साहब थे तो कर्पूरी ठाकुर जैसे नेता मजबूत हुए।
उन्होंने राजनीति में अभिजात वर्ग के आधिपत्य को चुनौती दी।
सवाल: क्या चौधरी चरण सिंह ने गांव और शहर के बीच की दूरी कम करने की राजनीति भी की?
केसी त्यागी: बिल्कुल।
आज एनसीआर में आपको शायद यह महसूस नहीं होगा कि कभी गांवों में अस्पताल नहीं थे, सड़कें नहीं थीं, स्कूल नहीं थे और बुनियादी सुविधाओं का अभाव था।

आजादी के बाद की राजनीति काफी हद तक शहरी केंद्रित थी। गांवों की उपेक्षा थी।
चौधरी साहब ने इस सवाल को उठाया कि गांव और शहर के बीच की दूरी कम होनी चाहिए।
सवाल: अब जयंत चौधरी की बात करते हैं। क्या वह चौधरी चरण सिंह की विरासत को आगे ले जा सकते हैं?
केसी त्यागी: जयंत चौधरी बदले हुए संदर्भों के नेता हैं।
आज की चुनौतियां नई हैं। आज शहरीकरण बहुत बढ़ गया है। बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी शहरों की ओर आई है। आज का युवा, मीडिया और राजनीति का स्वरूप भी पूरी तरह बदल गया है।
चौधरी साहब के समय छोटे-छोटे कस्बे थे। आज मेरठ और गाजियाबाद जैसे शहर महानगर बन चुके हैं।
जयंत चौधरी के सामने न्यू इंडिया की चुनौतियां हैं। उन्हें शहरी युवाओं को भी आकर्षित करना है और उनके सवालों को संबोधित करना है।
सवाल: आपको राष्ट्रीय लोक दल के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया है। इसे आप किस तरह देखते हैं?
केसी त्यागी: मैं इसके लिए जयंत चौधरी जी को धन्यवाद देना चाहता हूं।
पहली बार ऐसा हुआ है कि एक क्षेत्रीय राजनीतिक संगठन में संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष परिवार का सदस्य नहीं है और परिवार का कोई सदस्य बोर्ड का सदस्य भी नहीं है।
मुझे देवीलाल जी, लालू प्रसाद जी, मुलायम सिंह जी, शरद यादव जी, नीतीश कुमार जी, रामविलास पासवान जी और कर्पूरी ठाकुर जी जैसे नेताओं के साथ काम करने का मौका मिला।
लेकिन चौधरी साहब मेरे मानसिक पटल पर इतने मजबूत तरीके से छाए हुए थे कि मीडिया की बहस हो या समाचार पत्र, मैं उनके सवालों से कभी अलग नहीं हुआ।
सवाल: किसान आंदोलन के दौरान भी आपका नाम सामने आया था। क्या आपको चौधरी चरण सिंह की विचारधारा की वजह से किसान नेताओं का भरोसा मिला?

केसी त्यागी: किसान आंदोलन के दौरान एक समय राकेश टिकैत ने कहा था कि केसी त्यागी को मध्यस्थ बना दिया जाए। यह मेरे लिए सम्मान की बात थी।
अगर किसान आंदोलन का नेतृत्व यह मानता है कि मैं उनके वर्ग के सवालों की ठीक से वकालत कर सकता हूं, तो यह मेरे लिए सम्मान है।
यह भरोसे का सवाल है।
मैंने पूरी जिंदगी चौधरी साहब की विचारधारा को लेकर काम किया है। यही मेरी पूंजी है, यही मेरा कैपिटल है।
सवाल: 2027 के विधानसभा चुनाव में आरएलडी कितनी सीटों पर दावा कर सकती है?
केसी त्यागी: राष्ट्रीय लोक दल का सामाजिक असर करीब 100 सीटों पर है।
भाजपा बहुत मजबूत पार्टी है और लगातार दो बार से उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ काम कर रहे हैं।
लेकिन आरएलडी का प्रभाव सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। उसका प्रभाव एक जिले की कई विधानसभा सीटों तक हो सकता है।
हम चाहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हर जिले में आरएलडी को ऐसी भूमिका मिले जिससे वह भाजपा के लिए भी असरदार सहयोगी साबित हो।
दूसरी बात यह है कि जिन सीटों को भाजपा कठिन या असंभव मानती है, अगर ऐसी सीटें हमें दी जाएं तो हम वहां भी चुनाव लड़ना चाहेंगे।
चौधरी साहब के दौर में नौ मुस्लिम सांसद आरएलडी या उनके राजनीतिक प्रभाव वाले क्षेत्र से संसद पहुंचे थे। कैराना, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बिजनौर और संभल जैसे क्षेत्रों में उनका राजनीतिक प्रभाव रहा।
आज भी मुस्लिम समाज के एक हिस्से में यह भावना है कि उनका प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हुआ है। आरएलडी उन वर्गों तक पहुंच बनाने की क्षमता रखती है।

सवाल: क्या आरएलडी 2027 में उम्मीदवारों की घोषणा जल्दी कर सकती है?
केसी त्यागी: पिछले 15-20 वर्षों में जयंत चौधरी के नेतृत्व में परिपक्वता के लक्षण स्पष्ट दिखाई देते हैं।
हम जितने भी उम्मीदवार खड़े करेंगे, हमारी कोशिश होगी कि हमारा स्ट्राइक रेट 90 से 100 प्रतिशत के बीच रहे।
पिछले चुनाव में भी हमारा स्ट्राइक रेट 100 प्रतिशत रहा था, हालांकि हमारे हिस्से में केवल दो सीटें थीं।
सवाल: जयंत चौधरी की राजनीति को आप किस नजर से देखते हैं?
केसी त्यागी: हर नेता अपने दौर की पैदाइश होता है। इसलिए तुलना नहीं करनी चाहिए।
चौधरी साहब का किसी से कंपैरिजन नहीं है।
जयंत चौधरी में असीम संभावनाएं हैं। जिन वर्गों और समूहों से पिछले दिनों राजनीतिक दूरी बनी थी, उन्हें फिर से जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है।
मैं शामली की बैठक देख रहा था। अगर वह उसका संकेत है तो लोकदल का रिवाइवल हो रहा है। यह ग्रामीण भारत और असली भारत के लिए शुभ संकेत है।
किसानों के सवाल आज भी खत्म नहीं हुए हैं।
जयंत चौधरी हमारे लिए जरूरी हैं। हम जयंत के लिए कितने जरूरी हैं, यह तो नहीं जानते, लेकिन जयंत चौधरी हमारे लिए एक जरूरी जरूरत हैं।
सवाल: केंद्र सरकार में जयंत चौधरी के पोर्टफोलियो को लेकर भी चर्चाएं होती रहती हैं। क्या आपको लगता है कि उनकी भूमिका बढ़ सकती है?
केसी त्यागी: जयंत चौधरी के पास दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं। नई पीढ़ी और नए भारत के लिए स्किल इंडिया जैसी जिम्मेदारी है और शिक्षा मंत्रालय में राज्य मंत्री की जिम्मेदारी भी है।
उनके शुभचिंतक और चाहने वाले तो उन्हें बड़े पद की इच्छा और अभिलाषा के साथ देखते हैं, लेकिन यह प्रधानमंत्री का अधिकार क्षेत्र है।
हां, राजनीतिक संकेतों का अपना महत्व होता है। हमारे पास भी ऐसी चर्चाएं आती रहती हैं कि प्रधानमंत्री उन्हें बहुत स्नेहभाव से रखते हैं।
सवाल: क्या आरएलडी और जयंत चौधरी के लिए 2027 एक बड़ा अवसर है?
केसी त्यागी: निश्चित रूप से।
आरएलडी की राजनीति बहुजातीय और बहुवर्गीय है। चौधरी साहब के समय से ही इसमें अलग-अलग जातियों और समुदायों के लोग जुड़े रहे हैं।
हम सिर्फ किसी एक जाति या वर्ग की पार्टी नहीं हैं।
सवाल: आपने चौधरी चरण सिंह, चौधरी अजीत सिंह और जयंत चौधरी तीनों पीढ़ियों को करीब से देखा है। तीनों में क्या फर्क देखते हैं?
केसी त्यागी: हर नेता अपने दौर की पैदाइश होता है। इसलिए तुलना नहीं करनी चाहिए।
चौधरी साहब का किसी से कंपैरिजन नहीं है।
जयंत चौधरी अभी राजनीतिक यात्रा के अलग दौर में हैं। उनमें बहुत संभावनाएं हैं और मुझे लगता है कि वह बदलते राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों को समझते हैं।
सवाल: राजनीतिक पंडित कहते हैं कि जयंत चौधरी का जन्मदिन ही वह मौका था जब चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनने का रास्ता मिला। क्या यह कहानी सही है?

केसी त्यागी: राजनीतिक पंडित कहते हैं कि जयंत चौधरी का जन्मदिन ही चौधरी साहब को प्रधानमंत्री बनवा गया।
चौधरी साहब और इंदिरा गांधी के बीच जो दूरी थी, वह बाद में कुछ कम हुई।
जयंत चौधरी के जन्मदिन के अवसर पर इंदिरा गांधी को निमंत्रण देने जो दो लोग गए थे, उनमें मैं भी था। मैं पहली बार यह बात आपके सामने कह रहा हूं कि मैं इंदिरा गांधी के पास निमंत्रण देने गया था।
उन्होंने अपने हाथ से चाय पिलाई थी।
सवाल: आज सोशल मीडिया के दौर में क्या पुरानी तरह की जनसंपर्क वाली राजनीति खत्म हो रही है?
केसी त्यागी: जनसभाओं का दौर कम हुआ है। आज फोन, इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया पर बहुत कुछ चलता है।
उसमें अफवाहें भी हैं और चरित्र हनन भी।
लेकिन हमारा नेतृत्व इन चीजों से अलग हटकर लगातार जनसंपर्क के जरिए अपनी पुरानी राजनीतिक पूंजी को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
मुझे लगता है कि 1977-80 के दौर वाला लोकदल फिर से रिवाइव होगा और जयंत चौधरी चौधरी चरण सिंह के बाजू में खड़े दिखाई देंगे।
सवाल: आखिर ऐसी क्या वजह थी कि आप जैसे सामान्य पृष्ठभूमि से आए व्यक्ति को चौधरी चरण सिंह पर इतना भरोसा था कि आप उन्हें सोते हुए भी जगा सकते थे?
केसी त्यागी: सिर्फ और सिर्फ उनका असीम प्रेम और विश्वास।
हम उनके रंग में रंग गए थे। हमारा किसी पूंजीपति से रिश्ता नहीं था। मेरे मित्र स्वर्गीय ओमपाल सिंह और मैं, हम दोनों बहुत कम उम्र में उनके साथ काम करते थे।
चौधरी साहब का व्यक्तित्व हमारे अंदर बस गया था।
हम उनके जैसा होना चाहते थे। ईमानदार रहें, चरित्रवान रहें और अपने सिद्धांतों पर कायम रहें।
यही सबसे बड़ा कारण था।
सवाल: क्या आज भी चौधरी चरण सिंह की तस्वीर और व्यक्तित्व को नई तकनीक और एआई के जरिए नई पीढ़ी के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए?

केसी त्यागी: एआई के जरिए नहीं करेंगे। हम वास्तविक रूप में करेंगे।
सवाल: अंत में समकालीन राजनीति को लेकर आपका क्या संदेश है?
केसी त्यागी: समकालीन राजनीति पारंपरिक राजनीति से कुछ अलग होगी।
आज की राजनीति में सोशल मीडिया और नए संचार माध्यमों की भूमिका बढ़ गई है, लेकिन जनसंपर्क की जरूरत खत्म नहीं हुई है।
मुझे लगता है कि लोकदल की वह राजनीति, जो 1977, 1978 और 1980 के दौर में दिखाई देती थी, फिर से रिवाइव होगी।
और जयंत चौधरी चौधरी चरण सिंह के बाजू में खड़े हुए दिखाई देंगे।
चौधरी चरण सिंह: एक विरासत, जिसने गांव की राजनीति को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया

चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री पद पर पहुंचना भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार उनका जन्म 1902 में मेरठ जिले के नूरपुर में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने गाजियाबाद में वकालत शुरू की और बाद में मेरठ में भी वकालत की।
28 जुलाई 1979 को वह भारत के पांचवें प्रधानमंत्री बने। उनका कार्यकाल लंबा नहीं रहा, लेकिन उनकी राजनीति का प्रभाव भारतीय किसान राजनीति, सामाजिक न्याय और ग्रामीण भारत के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर लंबे समय तक रहा।
उनकी 125वीं जयंती 23 दिसंबर 2027 को मनाई जाएगी। 2024 में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया।
केसी त्यागी के अनुसार चौधरी चरण सिंह की सबसे बड़ी विरासत सिर्फ उनका प्रधानमंत्री बनना नहीं, बल्कि यह विश्वास पैदा करना था कि भारत के गांव से निकलने वाला व्यक्ति भी देश की सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच सकता है।
और शायद यही वजह है कि चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी चौधरी चरण सिंह का नाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति से आगे निकलकर भारतीय किसान राजनीति की एक स्थायी पहचान बना हुआ है।
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