Dr. Ravindra Rana
एक थैली में 77 लाख रुपये थे।
पैसा चौधरी चरण सिंह को दिया गया था। यह सिर्फ जन्मदिन का तोहफा नहीं था। इसके पीछे देश के किसानों और गांवों की उम्मीदें थीं। सवाल था कि इस पैसे का इस्तेमाल कैसे किया जाए?
चौधरी चरण सिंह ने तय किया कि इस धन से किसानों के लिए काम होना चाहिए।
यहीं से एक ऐसी संस्था की कहानी शुरू हुई, जिसका रिश्ता सिर्फ किसान राजनीति से नहीं बल्कि पत्रकारिता, कृषि, शिक्षा और चौधरी चरण सिंह की वैचारिक विरासत से भी जुड़ गया।
नाम था किसान ट्रस्ट।
आज उसी किसान ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं डॉ. यशवीर सिंह। चौधरी चरण सिंह के बेहद करीब रहे डॉ. यशवीर सिंह ने सियासी पंचायत के विशेष पॉडकास्ट में उस दौर की कई ऐसी कहानियां सुनाईं, जो किताबों में दर्ज इतिहास से कहीं ज्यादा दिलचस्प हैं।

77 लाख रुपये और एक ट्रस्ट की शुरुआत
साल 1977। चौधरी चरण सिंह का जन्मदिन।
देश के अलग अलग हिस्सों से आए किसानों और पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें 77 लाख रुपये की थैली भेंट की। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, राजस्थान, बंगाल और दूसरे इलाकों से कार्यकर्ता इस अभियान से जुड़े थे।
इंडिया गेट पर बड़ी किसान रैली हुई थी।
पैसा सामने था, लेकिन चौधरी चरण सिंह के सामने सवाल था कि इसका किया क्या जाए?
कई सुझाव आए।
फिर तय हुआ कि इस पैसे से एक ट्रस्ट बनाया जाए और किसानों के हित में उसका इस्तेमाल किया जाए।
यहीं से किसान ट्रस्ट की नींव पड़ी।
लेकिन चौधरी चरण सिंह की सोच सिर्फ एक संस्था बनाने तक सीमित नहीं थी।
वे चाहते थे कि किसानों की आवाज अपनी जगह खुद बनाए।
और इसी सोच से निकला अखबार।

चौधरी चरण सिंह ने शुरू किए थे दो अखबार
किसान ट्रस्ट के जरिए दो अखबार शुरू हुए।
हिंदी में असली भारत और अंग्रेजी में रियल इंडिया।
मकसद था गांव और किसान की आवाज को सामने लाना।
अखबार कुछ वर्षों तक चलते रहे। फिर मुरादाबाद के दंगों से जुड़ी खबरें प्रकाशित होने के बाद हालात बदल गए।
सरकार बदल चुकी थी।
अखबारों पर कार्रवाई हुई। किसान ट्रस्ट के कार्यालय पर पुलिस ने ताला लगा दिया। अखबार जब्त कर लिए गए।
बाद में कानूनी कार्रवाई खत्म हुई तो अखबार दोबारा शुरू करने की कोशिश हुई, लेकिन पहले जैसी स्थिति नहीं बन पाई। सरकारी विज्ञापन बंद हो चुके थे और आर्थिक मुश्किलें बढ़ती चली गईं।
चौधरी चरण सिंह की तबीयत भी खराब रहने लगी।
आखिरकार अखबार बंद हो गए।
लेकिन किसान ट्रस्ट की कहानी खत्म नहीं हुई।

अखबार बंद हुआ, किसान ट्रस्ट चलता रहा
किसान ट्रस्ट ने किसानों के बीच अपनी दूसरी भूमिका जारी रखी।
हर साल किसान सेमिनार आयोजित किए जाते।
कृषि वैज्ञानिक बुलाए जाते।
अर्थशास्त्रियों को बुलाया जाता।
किसानों के साथ कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर चर्चा होती।
मथुरा से लेकर शुक्रताल, लखनऊ और प्रयागराज तक ऐसी गोष्ठियां हुईं।
ट्रस्ट ने कृषि शिक्षा के क्षेत्र में भी काम किया। कृषि विश्वविद्यालयों में बेहतर प्रदर्शन करने वाले छात्रों को पुरस्कार दिए गए। स्कॉलरशिप की व्यवस्था भी की गई।
यानी चौधरी चरण सिंह ने जिस पैसे को किसानों के लिए छोड़ा था, वह धीरे धीरे एक संस्था के जरिए ज्ञान, शिक्षा और किसान संवाद की परंपरा में बदल गया।
और फिर एक दिन चौधरी चरण सिंह ने डॉ. यशवीर सिंह को बुलाया
किसान ट्रस्ट की कहानी में डॉ. यशवीर सिंह का प्रवेश भी अपने आप में दिलचस्प है।
ट्रस्ट में चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवीलाल, राज नारायण और कई बड़े नेता ट्रस्टी थे।
डॉ. यशवीर सिंह बाद में ट्रस्ट से जुड़े।
एक समय ट्रस्ट का इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल नहीं हुआ। मामला चौधरी चरण सिंह तक पहुंचा।
डॉ. यशवीर सिंह उस समय जेएनयू में थे और उन्हें इस तरह के मामलों की जानकारी थी। उन्होंने चौधरी साहब से कहा कि वह मामला संभाल सकते हैं।
कागज उनके हाथ में आया।
और फिर अचानक एक बड़ा बदलाव हुआ।
चौधरी चरण सिंह ने चौधरी देवीलाल को ट्रस्ट के उपाध्यक्ष पद से हटाकर डॉ. यशवीर सिंह को जिम्मेदारी दे दी।
बहुत कम उम्र में एक युवा पर इतना भरोसा।
यही वह रिश्ता था जो आगे चलकर दशकों की राजनीतिक और वैचारिक यात्रा में बदल गया।
1971 में एक युवा ने चौधरी चरण सिंह को चुनाव को लेकर चेताया
डॉ. यशवीर सिंह बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह से उनकी नजदीकी किसी एक घटना से नहीं बनी थी।
साल 1971 में चौधरी चरण सिंह चुनाव लड़ने की तैयारी में थे।
डॉ. यशवीर सिंह उस समय मेरठ में पढ़ रहे थे। एक सुबह सर्किट हाउस में उनकी चौधरी चरण सिंह से मुलाकात हुई।
उन्होंने सहज ही कह दिया कि चौधरी साहब को बागपत से चुनाव लड़ना चाहिए, मुजफ्फरनगर से नहीं।
चौधरी साहब ने बात सुनी और चुनाव लड़ लिया।
डॉ. यशवीर सिंह भी छुट्टी लेकर उनके चुनाव प्रचार में शामिल हो गए।
लेकिन उन्हें माहौल ठीक नहीं लग रहा था।
अखबारों में भी खबरें आने लगी थीं कि चौधरी चरण सिंह चुनाव हार सकते हैं।
और फिर वही हुआ।
चौधरी चरण सिंह चुनाव हार गए।

हार के बाद चौधरी साहब ने पूछा, तुम्हें कैसे पता था?
चुनाव हारने के बाद चौधरी चरण सिंह ने डॉ. यशवीर सिंह को बुलाया।
उन्होंने पूछा कि उस दिन तुमने कैसे कह दिया था कि चुनाव खराब है?
डॉ. यशवीर सिंह ने जवाब दिया कि वह बात उनके दिल से निकल गई थी।
चौधरी चरण सिंह ने इसे सिर्फ राजनीतिक अनुमान नहीं माना।
उन्होंने उस युवा की बात में अपने प्रति लगाव और ईमानदारी देखी।
यहीं से शायद भरोसे की वह डोर और मजबूत हुई, जो आगे किसान ट्रस्ट की जिम्मेदारी तक पहुंची।
कैराना में गायत्री देवी की कहानी
फिर आया एक और चुनाव।
चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री थे और उनकी उनकी पत्नी गायत्री देवी कैराना से चुनाव लड़ रही थीं।
डॉ. यशवीर सिंह को लगा कि चुनाव आसान नहीं होगा।
उन्होंने चौधरी चरण सिंह से कहा कि यहां एक मुस्लिम उम्मीदवार खड़ा करना जरूरी है।
तर्क सीधा था।
सामने गुर्जर उम्मीदवार था। अगर मुस्लिम, गुर्जर और अनुसूचित जाति का वोट एक तरफ चला गया तो चुनाव का समीकरण बदल सकता था।
चौधरी चरण सिंह ने बात को गंभीरता से लिया।
उनकी सरकार में रहे खलील उल्लाह को चुनाव लड़ाया गया।
डॉ. यशवीर सिंह ने उनके चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी संभाली।
नतीजा चौंकाने वाला था।
मुस्लिम उम्मीदवार को करीब 65 हजार वोट मिले और चौधरी चरण सिंह की माता जी लगभग 62 हजार वोट से चुनाव जीत गईं।
डॉ. यशवीर सिंह के लिए यह सिर्फ एक चुनावी रणनीति नहीं थी।
यह उस दौर की राजनीति का उदाहरण था जिसमें चुनाव को जातीय और सामाजिक समीकरणों की जमीन पर पढ़ा जाता था।

जब चौधरी चरण सिंह तांगे से सफर कर रहे थे
चौधरी चरण सिंह की राजनीति का एक दूसरा चेहरा भी था।
सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने वाला नेता गांव की सादगी से दूर नहीं हुआ था।
डॉ. यशवीर सिंह ने उनसे जुड़ा एक किस्सा सुनाया।
एक दौर में वे बड़ौत से छपरौली की तरफ जा रहे थे। उस समय बसों की सुविधा नहीं थी। तांगे से सफर करना पड़ा।
रास्ते में पता चला कि वारंट जारी हो चुके हैं।
अब छपरौली जाना मुश्किल था।
तांगा मोड़ दिया गया और दूसरे जिले की तरफ निकल गए।
ऐसी कई घटनाओं को चौधरी चरण सिंह खुद सुनाया करते थे।
यानी जिस नेता ने बाद में दिल्ली के सत्ता केंद्र को प्रभावित किया, उसकी राजनीतिक यात्रा में तांगे, गांव, जेल और संघर्ष भी उतने ही महत्वपूर्ण थे।

28 जुलाई 1979 को दिल्ली में क्या हो रहा था?
फिर कहानी उस तारीख पर पहुंचती है जिसे किसान राजनीति आज भी याद करती है।
28 जुलाई 1979।
चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री बने।
डॉ. यशवीर सिंह उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि जनता पार्टी सरकार अल्पमत में आ चुकी थी। सरकार बनाने के लिए समर्थन जुटाना था।
कांग्रेस की तरफ से समर्थन का प्रस्ताव आया।
कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति भी महत्वपूर्ण थी।
आपातकाल के बाद उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट राजनीति को बड़ा नुकसान हुआ था और उसका वोट आधार चौधरी चरण सिंह की तरफ खिसक चुका था।
फिर समर्थन की चिट्ठियां आईं।
सरकार बनने का रास्ता साफ हुआ।
और दिल्ली में एक अलग ही माहौल था।
दिल्ली में बंट रहा था गुड़
चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनने की खबर ने किसानों में उत्साह भर दिया था।
डॉ. यशवीर सिंह बताते हैं कि दिल्ली में किसान गुड़ बांट रहे थे। लोग लड्डू बांट रहे थे। किसान उत्साह में कनॉट प्लेस तक घूम रहे थे।
दूसरी तरफ उद्योग जगत में चिंता थी।
क्यों?
क्योंकि चौधरी चरण सिंह की आर्थिक सोच साफ थी।
उनका मानना था कि देश की आर्थिक नीति में गांव और किसान की प्राथमिकता बढ़नी चाहिए।
उर्वरक सस्ता होना चाहिए।
किसानों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ना चाहिए।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहिए।
इसलिए चौधरी चरण सिंह के प्रधानमंत्री बनने को सिर्फ राजनीतिक बदलाव के रूप में नहीं देखा जा रहा था।
यह आर्थिक दिशा बदलने की संभावना भी थी।
चौधरी चरण सिंह की आर्थिक सोच का ‘गांव की तरफ यू टर्न’
उस दौर के बजट और आर्थिक नीतियों को लेकर डॉ. यशवीर सिंह कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह देश की आर्थिक गति को गांव की तरफ मोड़ना चाहते थे।
उनका मानना था कि अगर सरकार को पर्याप्त समय मिलता और दो बजट पेश करने का अवसर मिलता तो शायद ग्रामीण भारत के लिए एक अलग आर्थिक रोडमैप सामने आता।
लेकिन सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकी।
कहानी अधूरी रह गई।
चौधरी चरण सिंह ट्रैक्टरों के भी खिलाफ क्यों बोलते थे?
यह शायद चौधरी चरण सिंह की कृषि सोच का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।
आज ट्रैक्टर किसान की खेती का जरूरी हिस्सा है।
लेकिन चौधरी चरण सिंह भारी मशीनरी और कृषि के अत्यधिक मशीनीकरण को लेकर चिंतित थे।
उनका तर्क था कि अगर खेती में ट्रैक्टर बहुत ज्यादा बढ़ेंगे तो बैल खत्म हो जाएंगे।
बैल खत्म होंगे तो गोबर की उपलब्धता घटेगी।
गोबर की खाद कम होगी।
फिर रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ेगी।
डॉ. यशवीर सिंह मानते हैं कि चौधरी चरण सिंह की वह चिंता आज कहीं ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती है।
गांवों से बैल लगभग गायब हो चुके हैं।
कृषि का चेहरा बदल चुका है।
ट्रैक्टर और मशीनें खेती का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी हैं।
लेकिन चौधरी चरण सिंह की चिंता सिर्फ मशीनों को लेकर नहीं थी। वह कृषि, रोजगार, पशुधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पूरे संतुलन को लेकर थी।
चौधरी अजित सिंह ने ग्लोबलाइजेशन की नींव रखी?
तीन पीढ़ियों की राजनीति को करीब से देखने वाले डॉ. यशवीर सिंह चौधरी अजित सिंह के दौर को भी अलग नजर से देखते हैं।
उनके मुताबिक परिस्थितियां बदल चुकी थीं।
देश आर्थिक उदारीकरण की तरफ बढ़ रहा था।
उद्योग मंत्री के तौर पर चौधरी अजित सिंह ने लाइसेंसिंग व्यवस्था में बदलाव की दिशा में काम किया।
शुगर मिलों और उद्योगों से जुड़े लाइसेंस नियमों में ढील दी गई।
डॉ. यशवीर सिंह का मानना है कि आर्थिक उदारीकरण और औद्योगिक विकास की दिशा में चौधरी अजित सिंह की भूमिका को भी याद किया जाना चाहिए।
एथेनॉल की कहानी भी पुरानी है
आज जब एथेनॉल ब्लेंडिंग देश की ऊर्जा नीति में महत्वपूर्ण विषय है, डॉ. यशवीर सिंह इसकी कहानी को चौधरी अजित सिंह के दौर तक ले जाते हैं।
खाद्य मंत्री रहते हुए चौधरी अजित सिंह ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की दिशा में पहल की थी।
उस समय एथेनॉल की उपलब्धता बहुत कम थी।
लेकिन चीनी मिलों के साथ डिस्टिलरी की व्यवस्था को बढ़ावा देने का प्रयास हुआ ताकि एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाया जा सके।
आज जिस एथेनॉल ब्लेंडिंग की चर्चा देशभर में होती है, उसकी शुरुआती राजनीतिक और नीतिगत कहानियों में यह अध्याय भी शामिल है।
अब कहानी जयंत चौधरी तक पहुंचती है
तीन पीढ़ियों को करीब से देखने वाले डॉ. यशवीर सिंह के सामने अब चौथी राजनीतिक तस्वीर है।
जयंत चौधरी।
उनके मुताबिक आज जयंत चौधरी के पास कौशल विकास जैसा महत्वपूर्ण विभाग है।
और यहां उन्हें चौधरी चरण सिंह की पुरानी सोच की एक कड़ी दिखाई देती है।
चौधरी चरण सिंह मानते थे कि गांव के युवाओं को सिर्फ नौकरी की तलाश में नहीं छोड़ना चाहिए। उन्हें हुनर दिया जाना चाहिए।
इसी सोच के तहत ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण देकर रोजगार के योग्य बनाने की योजनाओं को बढ़ावा दिया गया था।
उस समय इसे ग्रामीण युवाओं के रोजगार के लिए प्रशिक्षण की सोच के रूप में आगे बढ़ाया गया।
आज कौशल विकास के रूप में वही विचार एक नए रूप में सामने है।
डॉ. यशवीर सिंह का मानना है कि जयंत चौधरी के पास इस सोच को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाने का अवसर है।
उनकी उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में कौशल विकास के क्षेत्र में अच्छे परिणाम सामने आएंगे।
2027 का चुनाव और जयंत चौधरी की राह
बात जब 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर पहुंचती है तो डॉ. यशवीर सिंह का जवाब स्पष्ट है।
उनका मानना है कि राष्ट्रीय लोकदल को बीजेपी के साथ रहना चाहिए।
सीटों की संख्या को लेकर वह कोई निश्चित आंकड़ा नहीं देते, लेकिन उनका दावा है कि रालोद जितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा, उन्हें जीतने की पूरी कोशिश करेगा।
उनके मुताबिक इस समय गठबंधन में किसी तरह का मिसमैच नहीं होना चाहिए।
यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डॉ. यशवीर सिंह का जयंत चौधरी के साथ पुराना रिश्ता है और वह खुद कहते हैं कि आज भी उनके लिए राजनीति का मतलब पद नहीं है।
‘मुझे टिकट नहीं चाहिए, मुझे काम चाहिए’
शायद पूरी बातचीत की सबसे अलग लाइन यही है।
डॉ. यशवीर सिंह से जब उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा और चुनावी संभावनाओं के बारे में बात होती है तो वह कहते हैं कि उन्हें टिकट नहीं चाहिए।
उन्हें कोई पद नहीं चाहिए।
उन्हें काम चाहिए।
उनके लिए राजनीति का मतलब चुनाव लड़ना नहीं बल्कि काम करना है।
यही बात उन्हें तीन पीढ़ियों की राजनीति के बीच एक अलग जगह देती है।
चौधरी चरण सिंह के समय उन्होंने काम किया।
चौधरी अजित सिंह के समय जिम्मेदारी निभाई।
अब जयंत चौधरी के दौर में भी वह उसी भूमिका में बने हुए हैं।
28 जुलाई फिर करीब है
हर साल 28 जुलाई आती है।
लेकिन डॉ. यशवीर सिंह के लिए यह सिर्फ एक तारीख नहीं है।
यह वह दिन है जब चौधरी चरण सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी।
उनकी नजर में उस दिन दिल्ली में सिर्फ सरकार नहीं बदली थी।
दिल्ली का सामाजिक और राजनीतिक दृश्य भी बदल गया था।
पहली बार बड़ी संख्या में गांव के लोग, किसान परिवारों से आने वाले लोग संसद में पहुंचे।
वे लोग, जिन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि दिल्ली की सत्ता के गलियारों में उनकी आवाज होगी।
डॉ. यशवीर सिंह इसे चौधरी चरण सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासतों में से एक मानते हैं।
दिल्ली में पहली बार किसान को ‘किसान जी’ कहकर बुलाया गया
डॉ. यशवीर सिंह के मुताबिक चौधरी चरण सिंह के दौर में दिल्ली के लोगों की भाषा तक बदलने लगी थी।
पहले गांव से आए आदमी को शायद सामान्य ग्रामीण समझा जाता था।
लेकिन चौधरी चरण सिंह के दौर में लोग किसान को सम्मान से किसान जी कहकर बुलाने लगे।
यह सिर्फ संबोधन का बदलाव नहीं था।
यह सामाजिक सम्मान के बदलने का संकेत था।
जिस दिल्ली में कभी राजा, महाराजा, उद्योगपति और बड़े राजनीतिक परिवारों का प्रभाव दिखाई देता था, उसी दिल्ली की संसद में सामान्य किसान परिवारों से आए लोग पहुंचने लगे।
नाम बदले।
चेहरे बदले।
पृष्ठभूमि बदली।
और डॉ. यशवीर सिंह के शब्दों में कहें तो पूरा दृश्य बदल गया।
चौधरी चरण सिंह से जयंत चौधरी तक, सिर्फ राजनीति नहीं एक विरासत
डॉ. यशवीर सिंह की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा नहीं है।
यह किसान ट्रस्ट से शुरू होकर चौधरी चरण सिंह तक जाती है।
फिर चौधरी अजित सिंह के दौर से गुजरती है।
और आज जयंत चौधरी तक पहुंचती है।
इस पूरी यात्रा में एक चीज लगातार दिखाई देती है।

किसान और गांव को राजनीति के केंद्र में रखने की कोशिश।
चौधरी चरण सिंह ने इसे राजनीतिक ताकत में बदला।
अजित सिंह ने बदलती अर्थव्यवस्था के साथ इसे नए तरीके से देखने की कोशिश की।
और अब जयंत चौधरी के सामने कौशल विकास, रोजगार और नई पीढ़ी की चुनौतियां हैं।
डॉ. यशवीर सिंह इस यात्रा के गवाह भी हैं और सहभागी भी।
उनकी कहानी में 77 लाख की वह थैली भी है, जिसने किसान ट्रस्ट को जन्म दिया।
1971 की वह चुनावी रात भी है, जब चौधरी चरण सिंह हार गए थे।
कैराना का वह चुनाव भी है, जहां एक मुस्लिम उम्मीदवार ने चुनावी समीकरण बदल दिया।
28 जुलाई 1979 की वह दिल्ली भी है, जहां किसान गुड़ बांट रहे थे।
और आज का वह दौर भी है, जब जयंत चौधरी कौशल विकास के जरिए चौधरी चरण सिंह की एक पुरानी सोच को नई दिशा देने की कोशिश कर रहे हैं।
कहानी के आखिर में डॉ. यशवीर सिंह अपने लिए कुछ नहीं मांगते।
न टिकट।
न पद।
सिर्फ काम।
शायद यही इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा सार है।
चौधरी चरण सिंह की राजनीति में किसान सबसे ऊपर था। डॉ. यशवीर सिंह की कहानी में आज भी वही किसान केंद्र में है।

