विश्व जल दिवस पर विशेष
मेहर-ए-आलमख़ान
मुख्य संपादक, नर्सरी टुडे (अंग्रेज़ी मासिक), नई दिल्ली
सलाहकार, सिने इंक पॉडकास्ट्स, लंदन (यू.के.)
सदियों पहले प्रसिद्ध कवि अब्दुल रहीम ख़ान ए ख़ाना ने एक दोहे में जीवन और पर्यावरण की सबसे बड़ी सच्चाई को बयान कर दिया था —
“रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।
पानी गये न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥”
रहीम की यह चेतावनी आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है। पानी के बिना सब कुछ सूना और निर्जीव है। ये पंक्तियाँ अब केवल कविता नहीं रहीं, बल्कि हमारे समय की कड़वी सच्चाई बन चुकी हैं। जल संकट भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की चुनौती है—जो हमारी आँखों के सामने खड़ी है।

हर वर्ष 22 मार्च को संयुक्त राष्ट्र के आह्वान पर मनाया जाने वाला विश्व जल दिवस इस संकट पर वैश्विक ध्यान केंद्रित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। हर साल एक विशिष्ट थीम के माध्यम से यह दिवस जल से जुड़ी किसी एक गंभीर चुनौती—जैसे जल सुरक्षा, भूजल संरक्षण, स्वच्छ जल तक समान पहुंच या जलवायु परिवर्तन के प्रभाव—को रेखांकित करता है। इसका उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना नहीं, बल्कि सरकारों, संस्थानों और आम नागरिकों को ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करना है। सेमिनार, नीति संवाद, शैक्षणिक चर्चाएँ और जन-अभियान इस बात पर जोर देते हैं कि जल संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व है, जिसे टालने की अब कोई गुंजाइश नहीं बची है।
धरती पर पानी प्रचुर मात्रा में दिखाई देता है, लेकिन उपयोग योग्य मीठा पानी बेहद सीमित है। वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, पृथ्वी पर उपलब्ध कुल पानी का केवल लगभग 3 प्रतिशत ही मीठा है, और इसमें से भी बड़ा हिस्सा ग्लेशियरों और बर्फीली चोटियों में कैद है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले दस वर्षों में वैश्विक स्तर पर प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में निरंतर गिरावट आई है। आज दुनिया की करीब 72 प्रतिशत आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहाँ पानी की उपलब्धता असुरक्षित मानी जाती है। इसका सीधा असर स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता पर पड़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। इससे अल्पकाल में बाढ़ का खतरा बढ़ता है और दीर्घकाल में नदियों के स्थायी जल स्रोत कमजोर हो जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया के लगभग 2 अरब लोग अपनी रोजमर्रा की जल जरूरतों के लिए पर्वतीय जल स्रोतों पर निर्भर हैं। जैसे-जैसे ये स्रोत अस्थिर हो रहे हैं, वैसे-वैसे करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में पड़ता जा रहा है।
भारत की स्थिति इस वैश्विक संकट के केंद्र में दिखाई देती है। दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, लेकिन देश के पास मीठे पानी के संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा है। नीति आयोग पहले ही चेतावनी दे चुका है कि भारत अपने इतिहास के सबसे गंभीर जल संकट से गुजर रहा है। आज करीब 60 करोड़ भारतीय अत्यधिक जल तनाव की स्थिति में जीवन जी रहे हैं।
भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घटती रही है। 1951 में यह लगभग 5,200 घन मीटर थी, जो 2025 तक घटकर करीब 1,341 घन मीटर रह जाने का अनुमान है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह स्तर 1,000 घन मीटर से नीचे चला गया, तो देश ‘अत्यधिक जल किल्लत’ की श्रेणी में पहुंच जाएगा। इसका अर्थ होगा—खेती पर संकट, शहरों में पानी के लिए संघर्ष और सामाजिक तनाव में वृद्धि।
देश के बड़े शहर भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। कई इलाकों में टैंकर पानी रोजमर्रा की जरूरत बन चुका है। विशेषज्ञों का आकलन है कि यदि मौजूदा हालात बने रहे, तो 2030 तक कई बड़े शहरों में भूजल के भंडार लगभग समाप्त हो सकते हैं।
भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। ग्रामीण इलाकों में लगभग 85 प्रतिशत घरों को पीने का पानी भूजल से मिलता है, जबकि करीब 65 प्रतिशत सिंचाई इसी पर निर्भर है। लेकिन भूजल का यह अंधाधुंध दोहन टिकाऊ नहीं है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार, देश के 250 से अधिक जिले ऐसे हैं जहाँ भूजल स्तर ‘क्रिटिकल’ या ‘ओवर-एक्सप्लॉइटेड’ श्रेणी में पहुंच चुका है। इसका मतलब है कि जितना पानी जमीन के भीतर भर पा रहा है, उससे कहीं अधिक हम निकाल रहे हैं।
खेती भारत की अर्थव्यवस्था और समाज की रीढ़ है, लेकिन यही क्षेत्र सबसे ज्यादा पानी भी खर्च करता है। देश के कुल जल उपयोग का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा कृषि में चला जाता है। धान और गन्ने जैसी फसलें अत्यधिक पानी मांगती हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में इन फसलों का लगातार विस्तार जल संकट को और गहरा करता है। दूसरी ओर, उद्योगों की जल मांग भी तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि 2050 तक औद्योगिक कार्यों के लिए पानी की आवश्यकता कई गुना बढ़ सकती है।
इसके बावजूद, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। दुनिया के कई देशों ने दिखाया है कि सही नीति, तकनीक और जनभागीदारी से पानी का बेहतर प्रबंधन संभव है। इज़राइल इसका बड़ा उदाहरण है, जहाँ ड्रिप सिंचाई, जल पुनर्चक्रण और कुशल वितरण प्रणालियों के जरिए सीमित जल संसाधनों का प्रभावी उपयोग किया गया है। भारत में भी ऐसी तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने की जरूरत है।
रेनवाटर हार्वेस्टिंग को केवल कानून की बाध्यता नहीं, बल्कि सामाजिक आदत बनाना होगा। शहरों में छतों से गिरने वाला पानी सहेजा जाए, खेतों में माइक्रो-इरिगेशन को बढ़ावा मिले और नदियों को प्रदूषण से मुक्त किया जाए। अपशिष्ट जल को साफ कर दोबारा इस्तेमाल करना भी अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।
हर साल 22 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व जल दिवस हमें याद दिलाता है कि पानी कोई असीम संसाधन नहीं है। यह सीमित है, कीमती है और जीवन का आधार है। रहीम की चेतावनी आज भी उतनी ही सटीक है—अगर पानी चला गया, तो जीवन की चमक भी चली जाएगी। पानी बचाना केवल पर्यावरण की चिंता नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व का सवाल है। अब भी अगर हमने पानी का सम्मान करना नहीं सीखा, तो भविष्य हमें माफ़ नहीं करेगा।
