अमेरिका से लेकर बागपत की गलियों तक, किसानों की आवाज़ बने चौधरी साहब – एक प्रेरक राजनीतिक जीवन
किसानों के बीच छोटे चौधरी के नाम से मशहूर चौधरी अजित सिंह की पुण्य तिथि 6 मई पर विशेष
चौधरी अजित सिंह पर दो वीडियो के लिंक भी खबर में नीचे दिए गए हैं। ये वीडियो जरूर देखें।
Dr. Ravindra Rana
जब राजनीति में चकाचौंध, प्रचार और पावर ही सब कुछ मान लिया गया हो, तब एक ऐसा नेता सामने आता है जो न सुरक्षाकर्मी लेकर चलता है, न कैमरे के लिए पोज़ देता है — बस ठेठ किसान अंदाज़ में मुद्दों की लड़ाई लड़ता है। चौधरी अजित सिंह, एक ऐसा नाम जिसने भारत की राजनीतिक धारा में किसानों की आवाज़ को मजबूती से स्थापित किया। अमेरिका में कंप्यूटर इंजीनियर का करियर छोड़कर चौधरी साहब ने अपने जीवन को गांव-गिरांव के हक में लगा दिया।
किसान ही पहचान था चौधरी अजित सिंह की
वेस्ट यूपी का वो इलाका जहां गन्ने की मिठास और राजनीति की तल्खी साथ-साथ चलती है, वहां के किसानों के बीच चौधरी अजित सिंह सिर्फ नेता नहीं, परिवार के बुजुर्ग जैसे थे। 45 साल तक राजनीति में सक्रिय रहते हुए उन्होंने किसानों के मुद्दों को संसद से सड़क तक उठाया। गाजीपुर बॉर्डर से लेकर दिल्ली के लाल किले तक किसान आंदोलनों में उन्होंने जान फूंकी।

सादगी, लेकिन शख्सियत में गहराई
सर्दियों में भी न जैकेट, न शॉल — बस चश्मा और सहज मुस्कान। गंभीर मुद्दों को ठहाकों में कह देने की कला। दिल्ली के लुटियन जोन में भी उनकी अलग पहचान थी।
राजनीतिक नेटवर्किंग में भी मास्टर
देवगौड़ा, लालू यादव, ममता बनर्जी, केसीआर, फारुख अब्दुल्ला जैसे नेताओं से उनके मधुर संबंध थे। बागपत और मेरठ की रैलियों में ये बड़े नाम उनके मंच पर होते, जो उनकी जनप्रियता और राजनीतिक कद को दर्शाता है।
पत्रकारों और जनता के लिए हमेशा उपलब्ध
पत्रकारों के सवालों पर कभी नाराज़ न होना — जवाब ठहाके में देना उनकी स्टाइल थी। पत्रकार से व्यक्तिगत संबंध बनाना, फोन पर नियमित संवाद, और कभी भी मदद के लिए तैयार रहना। “तुम ही बताओ, क्या मैं बदमाशों को पसंद करता हूं?” — यह जवाब तब दिया जब एक बदनाम व्यक्ति ने उनके नाम से विज्ञापन छपवा दिया था।

उसूलों के आगे समझौता नहीं
धनबल और बाहुबल के विरोधी, अपराधी छवि वालों को पार्टी में जगह नहीं दी। तेलंगाना चुनाव में एक सीट पर 100 करोड़ खर्च का उदाहरण देकर राजनीति के गिरते स्तर पर चिंता जताई।
रैली में जनता नहीं, जनता में रैली
मंचों पर गन्ना चूसते चौधरी साहब की छवि आज भी किसानों के दिल में बसी है। कार्यकर्ता उन्हें कंधों पर उठाकर मंच तक लाते, गांवों में ढोल-नगाड़े के साथ स्वागत होता।
पत्रकारों के अनुभवों में जीवंतता
पत्रकार से समय न मिलने पर भी 12 तुगलक रोड में भीड़ के बीच से निकलकर खुद मिलने आना। एक पत्रकार के लिए लंदन एयरपोर्ट पर फंसे वरिष्ठ व्यक्ति की मदद मिनटों में करना।
किसान आंदोलनों की रीढ़
गन्ने का समर्थन मूल्य वापस दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में राकेश टिकैत को डटे रहने का हौसला दिया, जिसने आंदोलन में जान फूंकी।

सामाजिक न्याय की जंग
जाटों को केंद्र में आरक्षण दिलाने के लिए केंद्रीय मंत्री रहते संघर्ष किया। बीजेपी के एनडीए में शामिल होने से इनकार किया क्योंकि सिद्धांतों से समझौता मंज़ूर नहीं था।
व्यक्तिगत जीवन में भी मददगार
दोस्तों, पत्रकारों और आम लोगों की निजी समस्याओं का समाधान करना उनकी प्राथमिकता में था। “तुम्हें जानता हूं, तुम्हारा धन्यवाद काफी है।” — ये बात उन्होंने तब कही जब एक प्रधान संपादक उनका आभार प्रकट करना चाहता था।
फिटनेस और अनुशासन में भी मिसाल
सुबह 5 बजे उठकर लोदी गार्डन में वॉक, नींबू पानी और फोन कॉल्स का सिलसिला। सादा खानपान — उड़द की दाल, चपाती, गुड़ और समोसा।
अंतिम वर्षों में भी संघर्ष जारी
मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भाईचारे को पुनर्जीवित करने का मिशन लेकर 2019 में चुनाव लड़ा। चुनाव के बाद बोले, “अब राजनीति करने की कोई जरूरत नहीं। बस जान-पहचान बनी रहे, गपशप करते रहेंगे।”

चौधरी साहब की विरासत — नई पीढ़ी के लिए संदेश
गांव, गरीब, किसान, मज़दूर और सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वालों को उनके विचारों को आत्मसात करना चाहिए। चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजित सिंह की विचार यात्रा ही भविष्य का रास्ता है।
चौधरी अजित सिंह कोई साधारण राजनेता नहीं थे। वो विचार थे, विश्वास थे, और एक आंदोलन थे। आज जब लोकतंत्र की बुनियादें कमजोर होती दिखती हैं, उनके जैसे उसूलों वाले नेताओं की और ज्यादा जरूरत है। अगर राजनीति में जनसेवा की भावना बची है, तो उसमें चौधरी साहब जैसी सादगी, गंभीरता और दृढ़ता का अंश जरूर होना चाहिए।
