भारत-पाक तनाव: दुनिया का झुकाव किस ओर?

Politics

लेखक: PoliticalAdda.com डेस्क | दिनांक: 10 मई 2025

भारत और पाकिस्तान के बीच एक बार फिर हालात जंग की कगार पर हैं। पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकवादी हमले और उसके बाद भारत द्वारा किए गए मिसाइल हमलों के जवाब में पाकिस्तान की आक्रामकता ने दक्षिण एशिया के माहौल को विस्फोटक बना दिया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या दुनिया एक बार फिर इन दोनों परमाणु संपन्न पड़ोसी देशों के टकराव के सामने केवल मूक दर्शक बनी रहेगी, या कोई स्पष्ट पक्ष ले रही है?

बीते कुछ दशकों में वैश्विक राजनीति और आर्थिक समीकरण पूरी तरह से बदल चुके हैं। ऐसे में यह जानना ज़रूरी है कि दुनिया के प्रमुख और प्रभावशाली देश इस संघर्ष में किसके साथ खड़े हैं — भारत या पाकिस्तान?

अमेरिका: रणनीति अब कारोबार से तय होती है

अमेरिका, जो कभी पाकिस्तान का बड़ा समर्थक रहा करता था, अब वैश्विक रणनीति में भारत को ज्यादा अहमियत दे रहा है। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद पाकिस्तान की सामरिक उपयोगिता काफी घट चुकी है। वहीं भारत, दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और अमेरिका के साथ उसका द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है।

ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की विदेश नीति और भी स्पष्ट हो चुकी है — जो ज्यादा खरीदेगा, वही करीबी बनेगा। भारत अमेरिका से रक्षा, ऊर्जा और तकनीक में भारी खरीद कर रहा है, जबकि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस स्थिति में नहीं है।

मौजूदा स्थिति में अमेरिका युद्ध नहीं चाहता, लेकिन भारत के साथ खड़ा दिख रहा है।

रूस: दोस्ती पुरानी, मजबूती आज भी कायम

1971 में भारत ने जब बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने के लिए पाकिस्तान से युद्ध किया था, तब सोवियत संघ ने भारत का खुला समर्थन किया था। अब सोवियत संघ नहीं, लेकिन रूस है — और रूस भारत के साथ ‘रणनीतिक साझेदारी’ के रिश्ते को बनाए हुए है।

यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने रूस से संबंध नहीं तोड़े। दोनों देशों के बीच व्यापार 65 अरब डॉलर के पार पहुंच गया है। रूस, भारत को ऊर्जा, रक्षा उपकरण और कूटनीतिक समर्थन देता रहा है।

इस टकराव में रूस भारत के पक्ष में झुका हुआ नजर आता है।

चीन: चुप्पी में समझदारी

पाकिस्तान का सबसे करीबी सहयोगी चीन इस पूरे टकराव में बेहद सतर्क रुख़ अपनाए हुए है। एक तरफ़ उसकी अरबों डॉलर की निवेश परियोजनाएं पाकिस्तान में चल रही हैं, दूसरी तरफ भारत के साथ उसका व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक है।

चीन नहीं चाहेगा कि उसके दोनों पड़ोसी युद्ध में उलझ जाएं, खासकर तब जब उसकी खुद की अर्थव्यवस्था मंदी से गुजर रही है और अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर के हालात हैं।

चीन तटस्थ है, लेकिन छुपे तौर पर पाकिस्तान के साथ खड़ा है — खासकर कूटनीतिक मंचों पर।

तुर्की: खुला समर्थन पाकिस्तान को

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने भारत-पाक तनाव पर बयान देते हुए सिर्फ पाकिस्तान के लोगों के लिए संवेदना प्रकट की और पहलगाम हमले की अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की। यह पाकिस्तान की ही लाइन है।

तुर्की और पाकिस्तान के बीच सैन्य और वैचारिक समीकरण भी मेल खाते हैं — दोनों सुन्नी मुस्लिम बहुल देश हैं। तुर्की, भारत की तुलना में पाकिस्तान के ज्यादा करीब है, भले ही व्यापारिक दृष्टि से भारत उससे कहीं आगे हो।

तुर्की इस वक्त खुलकर पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है।

सऊदी अरब: कारोबारी रिश्तों ने बदली नीतियां

सऊदी अरब कभी पाकिस्तान का सबसे भरोसेमंद सहयोगी था। 1998 में पाकिस्तान के परमाणु परीक्षणों से पहले सऊदी ने उसे हर दिन 50 हजार बैरल मुफ्त तेल देने का वादा किया था। लेकिन आज भारत के साथ उसका व्यापार 50 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।

पहलगाम हमले के बाद सऊदी के विदेश राज्य मंत्री अदेल अल-जुबैर अचानक भारत पहुंचे और प्रधानमंत्री मोदी से मुलाक़ात की — यह दौरा बताता है कि सऊदी अब भारत के साथ संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

सऊदी अरब अब तटस्थता की मुद्रा में है, लेकिन भारत के साथ उसका झुकाव ज़्यादा है।

ईरान: मध्यस्थता की भूमिका में

ईरान पारंपरिक रूप से पाकिस्तान के ज्यादा करीब रहा है और कश्मीर मुद्दे पर भारत की आलोचना करता रहा है। लेकिन हाल के दिनों में वह भारत के साथ संबंधों को लेकर संतुलन बना रहा है। पहलगाम हमले के बाद ईरानी विदेश मंत्री भारत भी आए और पाकिस्तान भी — यानी ईरान खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहा है।

ईरान तटस्थ दिख रहा है, पर भरोसे का पात्र नहीं।

आज की दुनिया में समर्थन सैन्य से ज्यादा आर्थिक है

भारत अब सिर्फ एक सैन्य शक्ति नहीं, दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्था बन चुका है। पाकिस्तान जहां आज भी आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है, वहीं भारत वैश्विक निवेश का आकर्षण बन चुका है।

इस बार की लड़ाई केवल बारूद और बंदूक की नहीं, बल्कि वैश्विक सहानुभूति और समर्थन की भी है — और इसमें भारत स्पष्ट रूप से पाकिस्तान से आगे है।

अमेरिका, रूस, सऊदी अरब, ईरान जैसे देश भारत के करीब हैं या तटस्थ हैं, जबकि पाकिस्तान को बस तुर्की और कुछ इस्लामी देशों का ही भावनात्मक समर्थन मिल रहा है।


पाकिस्तान ने भारत से 1965 और 1971 की जंग तब लड़ी थी, जब शीत युद्ध का ज़माना था

शीत युद्ध में पाकिस्तान अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गठबंधन का हिस्सा था. शीत युद्ध के दौरान ही 1979 में अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ ने हमला किया था

सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान में कम्युनिस्ट सरकार चाहता था और इस्लामी कट्टरपंथियों को सत्ता से दूर रखना चाहता था. दूसरी तरफ़ अमेरिका का अभियान था कि जिन देशों में कम्युनिस्ट सरकारें हैं, उन्हें कमज़ोर किया जाए.

अमेरिका अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ को हराने के लिए पाकिस्तान की मदद ले रहा था. इसके बदले में पाकिस्तान को अमेरिका से आर्थिक और सैन्य मदद मिलती रही.
अमेरिका की पाकिस्तान से क़रीबी उसकी रणनीतिक ज़रूरत के लिए थी और यह ज़रूरत अंतहीन नहीं थी.

अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान और अमेरिका ने जिन कट्टरपंथियों को आगे बढ़ाया, वही उनके लिए चुनौती बन गए और ये चुनौती आज तक कायम है.

1962 में चीन ने भारत पर हमला किया था. चीनी हमले के क़रीब तीन साल बाद पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया लेकिन उसका आकलन ग़लत साबित हुआ.

पाकिस्तान का आकलन ग़लत साबित हुआ

तब पाकिस्तान को लगा था कि चीन से जंग के कारण भारत का मनोबल बहुत गिरा हुआ है, ऐसे में उसे हराया जा सकता है. लेकिन पाकिस्तान अपना मक़सद हासिल नहीं कर सका. 1965 की जंग में अमेरिका ने पाकिस्तान को कोई सैन्य मदद नहीं दी थी लेकिन भारत के प्रति उसका कोई समर्थन नहीं था.

1971 की जंग में अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद की थी. यहाँ तक कि अमेरिकी यु्द्धपोत यूएसएस एंटरप्राइज़ वियतनाम से बंगाल की खाड़ी में पहुँच गया था. कहा जाता है कि अमेरिका ने ऐसा सोवियत यूनियन को संदेश देने के लिए किया था कि अमेरिका पाकिस्तान को ज़रूरत पड़ने पर मदद कर सकता है.

हालांकि अमेरिका ने सीधे हस्तक्षेप के लिए कोई आदेश नहीं दिया था लेकिन डिप्लोमैटिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर पाकिस्तान के साथ था.

1971 के अगस्त महीने में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘इंडिया-सोवियत ट्रीटी ऑफ़ पीस, फ़्रेंडशिप एंड कोऑपरेशन’ पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते के तहत सोवियत यूनियन ने भारत को आश्वस्त किया कि युद्ध की स्थिति में वो राजनयिक और हथियार दोनों से समर्थन देगा.

1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच 13 दिनों का युद्ध हुआ था. यह युद्ध पूर्वी पाकिस्तान में उपजे मानवीय संकट के कारण हुआ था. इस युद्ध के बाद ही पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बना था. यानी पाकिस्तान को भारत दो टुकड़ों में बाँटने में कामयाब रहा था.

पाकिस्तान पश्चिम का सहयोगी था, तब भी भारत के ख़िलाफ़ हर युद्ध में उसे हार मिली. पाकिस्तान को भारत के ख़िलाफ़ न केवल पश्चिम का समर्थन हासिल था बल्कि खाड़ी के इस्लामी देश भी उसके साथ थे. शीत युद्ध ख़त्म होने के क़रीब नौ साल बाद 1999 में पाकिस्तान ने एक बार फिर करगिल में हमला किया और इस बार भी उसे अपने क़दम पीछे खींचने पड़े थे.

भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था
रूस को लेकर भारत ने पश्चिम देशों की बात भी अनसुनी कर दी थी लेकिन पश्चिम ने फिर भी भारत के ख़िलाफ़ सख़्ती नहीं दिखाई
इन तीन युद्धों के बाद से दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है. सोवियत संघ कई हिस्सों में बँट गया और अब रूस बचा है. लेकिन दुनिया दो ध्रुवीय से एक ध्रुवीय हुई और अब चीन दूसरे ध्रुव की मज़बूत दावेदारी कर रहा है.

दूसरी तरफ़ भारत भी दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. बदलती दुनिया में भारत का भी अपना एक स्थान है लेकिन पाकिस्तान अब भी आर्थिक मोर्चों पर सऊदी अरब, चीन और वैश्विक संस्थाओं पर निर्भर है.

अमेरिका को अब अफ़ग़ानिस्तान में किसकी सरकार है इससे ख़ास मतलब नहीं है. ऐसे में उसे पाकिस्तान की भी पहले जैसी ज़रूरत नहीं है.

दो देशों के संबंध कितने गहरे और पारस्परिक हैं, अब इस बात पर भी निर्भर करता है कि दोनों एक दूसरे की अर्थव्यवस्था में कितना योगदान कर रहे हैं. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं – अमेरिका और चीन से भारत का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के पार है जबकि खाड़ी के अहम देश यूएई से भी भारत का द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर पार हो चुका है. वहीं सऊदी अरब से भी भारत का सालाना द्विपक्षीय व्यापार क़रीब 50 अरब डॉलर पहुँच चुका है.

फ़रवरी 2022 में यूक्रेन और रूस की जंग शुरू होने के बाद रूस से भी भारत का द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर 65 अरब डॉलर पार कर चुका है. भारत के तीन सबसे बड़े ट्रेड पार्टनर और सऊदी अरब या तो पाकिस्तान के दोस्त हैं या दोस्त थे.

लेकिन पाकिस्तान के साथ इन देशों का द्विपक्षीय कारोबार कोई ख़ास नहीं है.

कोई भी देश नहीं चाहेगा कि पाकिस्तान के लिए भारत जैसे बड़े बाज़ार की उपेक्षा की जाए. जब सऊदी अरब ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने पर भारत का विरोध नहीं किया तो पाकिस्तान के विश्लेषकों का यही कहना था कि भारत के साथ उसके कारोबारी हित जुड़े हैं.

यहाँ तक कि हिन्दुत्व की छवि वाले पीएम मोदी को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बड़े भाई कहते हैं.

शीत युद्ध के बाद बदली दुनिया में भारत की प्रासंगिकता बढ़ी है जबकि पाकिस्तान अपनी पुरानी अहमियत बचाने में भी नाकाम रहा है.

ट्रंप इसी साल जनवरी में दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो लेन-देन के संबंधों को और बढ़ावा मिला. यानी आप अमेरिका से कितना ख़रीदते हैं और कितना बेचते हैं, ये ज़्यादा मायने रखता है न कि शीत युद्ध में कौन साथ था और कौन ख़िलाफ़.

ट्रंप यहां तक चाहते हैं कि रूस से भी संबंध अच्छे हों. लेकिन पाकिस्तान अभी जिस आर्थिक कमज़ोरी से जूझ रहा है, उसमें न ख़रीदने की बहुत गुंजाइश है और न ही बेचने की.

भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और बढ़ते तनाव को देखते हुए वैश्विक स्तर पर दोनों देशों से शांति वार्ता की अपील की जा रही है. दुनिया भर के देशों की इन अपीलों से एक समझ बन रही है कि किसकी सहानुभूति पाकिस्तान के साथ है और किसकी भारत के साथ जबकि कौन पूरी तरह से तटस्थ है.

गुरुवार रात तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ”भारत और पाकिस्तान में बढ़ते तनाव को लेकर हम चिंतित हैं. ये तनाव युद्ध में बदल सकता है. मिसाइल हमलों के कारण बड़ी संख्या में आम नागरिकों की जान जा रही है. पाकिस्तान और यहां के लोग हमारे भाई की तरह हैं और उनके लिए हम अल्लाह से दुआ करते हैं.”



अर्दोआन ने कहा, ”पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से फोन पर मेरी बात हुई है. मेरा मानना है कि जम्मू-कश्मीर में हुए भयावह आतंकवादी हमले की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जांच होनी चाहिए. कुछ लोग आग में घी डालने का काम कर रहे हैं लेकिन तुर्की तनाव कम करने और संवाद शुरू करने का पक्षधर है. हालात हाथ से निकल जाने से पहले हम चाहते हैं कि दोनों देशों में संवाद शुरू हो.”

अर्दोआन ने जो कहा है, वह पाकिस्तान की लाइन का समर्थन है.

पाकिस्तान भी मांग कर रहा है कि पहलगाम हमले की जांच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कराई जाए. इसके अलावा अर्दोआन ने केवल पाकिस्तान में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी है और वहां के लोगों को भाई समान बताया है.

अर्दोआन के पास जब से तुर्की की कमान आई है, तब से पाकिस्तान के साथ सैन्य स्तर पर संबंध बढ़े हैं और भारत के साथ दूरियां बढ़ी हैं.

तुर्की और पाकिस्तान दोनों सुन्नी मुस्लिम बहुल देश हैं और दोनों इस्लामी देशों में एकता की बात करते रहे हैं. इसके बावजूद भारत और तुर्की में सालाना द्विपक्षीय व्यापार 10 अरब डॉलर पार कर चुका है जबकि पाकिस्तान से किसी तरह एक अरब डॉलर ही पार हुआ है.

दूसरी तरफ़ सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री अदेल अल-जुबैर गुरुवार को अचानक भारत पहुँचे थे. अदेल अल-जुबैर का यह अघोषित दौरा था. गुरुवार को जुबैर ने भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाक़ात की. कहा जा रहा है कि इसके बाद अदेल पाकिस्तान जाएंगे.

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची भी भारत आए थे. ईरानी विदेश मंत्री इससे पहले पाकिस्तान गए थे. अराग़ची का दौरा पहले से ही तय था.

अदेल अल-जुबैर का अचानक भारत आना और पीएम मोदी तक से मिलना असामान्य माना जा रहा है. पीएम मोदी जब सऊदी अरब के दौरे पर थे, तभी पहलगाम में 22 अप्रैल को हमला हुआ था और 26 पर्यटक मारे गए थे. इस हमले के बाद पीएम मोदी ने बीच में ही दौरा छोड़ दिया था.

पाकिस्तान से तनातनी के बीच सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री अदेल अल-जुबैर भारत के दौरे पर
अदेल अल-जुबैर से मुलाक़ात के बाद भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक्स पर लिखा, ”सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री अदेल अल-जुबैर से बातचीत अच्छी रही. आतंकवाद का दृढ़तापूर्वक मुक़ाबला करने पर भारत की समझ को साझा किया.”

सऊदी अरब ने 30 अप्रैल को एक बयान जारी कर दोनों देशों से शांति की अपील की थी और सभी विवादों को बातचीत से सुलझाने का सुझाव दिया था. सऊदी अरब के बयान से ऐसा कहीं नहीं लगा कि वह किसी एक के साथ खड़ा है.

अब जब भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ रहा है, तब सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री गुरुवार को भारत पहुँचे थे. पाकिस्तान के लिए हर मुश्किल वक़्त में सऊदी अरब खड़ा रहा है.

वो चाहे 1971 की जंग हो या 1965 की. मई 1998 में पाकिस्तान जब यह तय कर रहा था कि भारत के पाँच परमाणु परीक्षणों का जवाब देना है या नहीं, तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को हर दिन 50 हज़ार बैरल तेल मुफ़्त में देने का वादा किया था.

सऊदी अरब भी शीत युद्ध में पश्चिमी खेमे में ही था और ऐसे में पाकिस्तान के साथ उसकी क़रीबी में कोई असहजता नहीं थी. लेकिन अब दुनिया बदल चुकी है. पाकिस्तान को लेकर पश्चिम का रुख़ भी बदल गया है. भारत पश्चिम के क़रीब हुआ है और पाकिस्तान को लेकर अविश्वास बढ़ा है. ऐसे में पाकिस्तान और सऊदी अरब संबंध भी प्रभावित हुए हैं.

कश्मीर पर सऊदी अरब का रुख़ पाकिस्तान के साथ रहता था लेकिन अगस्त 2019 में भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया था तो सऊदी अरब का रुख़ बिल्कुल तटस्थ था. तब पाकिस्तान में इमरान ख़ान की सरकार में विदेश मंत्री रहे शाह महमूद क़ुरैशी ने सऊदी की आलोचना भी की थी.

किसके साथ है ईरान?

ईरान भी कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की लाइन का समर्थन करता रहा है. यहां तक कि ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई भारत के मुसलमानों को लेकर भी मुखर रहे हैं. लेकिन पहलगाम हमले के बाद भारत और पाकिस्तान में बढ़े तनाव को कम करने के लिए ईरान मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है. ईरान पहलगाम हमले के बाद भारत और पाकिस्तान में उपजे तनाव के बीच किसी भी देश का पक्ष नहीं ले रहा है.

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची ने अपने दौरे में विदेश मंत्री एस जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाक़ात की है.

इन मुलाक़ातों के बाद जारी बयान में ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा, ”भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. दोनों देशों के जॉइंट कमिशन की 20वीं बैठक हुई. दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी बढ़ाने का सुनहरा मौक़ा है. चाबहार पोर्ट को लेकर भी कई स्तरों पर बात हुई. इसके अलावा दक्षिण एशिया में स्थिरता और सुरक्षा की अहमियत पर भी ज़ोर दिया गया. भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव को संवाद के ज़रिए कम करना चाहिए.”

ईरान के विदेश मंत्री ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा, जिससे एक संदेश गया हो कि ईरान पाकिस्तान या भारत के साथ है. पूरे मामले में ईरान ने अपनी तटस्थता दिखाई है.

ईरान का यह रुख़ तब है, जब इसराइल खुलकर भारत का समर्थन कर रहा है. इसराइल और ईरान की दुश्मनी तो किसी से छिपी नहीं है. भारत में इसराइल के राजदूत कई बार कह चुके हैं कि भारत के पास आत्मरक्षा का अधिकार है.

उधर, फ्रांस ने भी कहा है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में वह भारत के साथ है. चीन ने पाकिस्तान के भीतर भारत की सैन्य कार्रवाई को लेकर खेद जताया था लेकिन आतंकवाद की भी निंदा की थी. रूस ने भी कहा है कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में वह भारत के साथ है.

अमेरिका ने भी खुलकर आतंकवाद की निंदा की है और दोनों देशों से वार्ता की अपील की है. दूसरी तरफ़ निकी हेली जैसी नेता खुलकर भारत का समर्थन कर रही हैं. ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने भारत की सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया है.

भारत-पाक संघर्ष: बदली दुनिया और बदलते समीकरण

भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 और 1971 में हुए युद्ध उस दौर में लड़े गए जब वैश्विक राजनीति शीत युद्ध की छाया में थी। उस समय पाकिस्तान अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी गुट का हिस्सा था जबकि भारत ने अपेक्षाकृत स्वतंत्र और गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई थी। शीत युद्ध की स्थिति ने भारत-पाक संघर्षों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-अलग समर्थन दिलाया।

1979 में जब सोवियत संघ ने अफ़ग़ानिस्तान में हस्तक्षेप किया, तब अमेरिका ने इस क्षेत्र में साम्यवाद को रोकने के लिए पाकिस्तान को एक प्रमुख रणनीतिक सहयोगी बनाया। बदले में पाकिस्तान को भारी मात्रा में सैन्य और आर्थिक मदद मिली। लेकिन इस रणनीतिक निकटता की अवधि सीमित थी। अमेरिका और पाकिस्तान ने अफ़ग़ान जिहादियों को समर्थन दिया, जो आगे चलकर स्वयं दोनों के लिए समस्या बन गए।

भारत पर चीन के 1962 के हमले के बाद, पाकिस्तान ने 1965 में भारत पर हमला किया, यह सोचकर कि भारत युद्ध के लिए तैयार नहीं होगा। लेकिन उसका आकलन गलत साबित हुआ और पाकिस्तान को कोई खास सफलता नहीं मिली। अमेरिका ने उस समय पाकिस्तान को सैन्य मदद नहीं दी, पर भारत को भी कोई विशेष समर्थन नहीं मिला।

1971 की जंग में भारत को सोवियत संघ का समर्थन प्राप्त था, जिसने अमेरिका के USS Enterprise जैसे युद्धपोत के बंगाल की खाड़ी तक पहुँचने के बावजूद भारत के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने दी। इस युद्ध के नतीजे में बांग्लादेश का उदय हुआ और पाकिस्तान दो हिस्सों में बँट गया।

उस दौर में पाकिस्तान को पश्चिमी देशों और खाड़ी के मुस्लिम देशों का समर्थन प्राप्त था, लेकिन हर युद्ध में उसे हार का सामना करना पड़ा। शीत युद्ध समाप्त होने के वर्षों बाद, 1999 में करगिल युद्ध हुआ, जहाँ पाकिस्तान को एक बार फिर पीछे हटना पड़ा।

अब वैश्विक परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। सोवियत संघ बिखर चुका है और रूस उसकी विरासत संभाल रहा है। अमेरिका एकमात्र महाशक्ति रहा, लेकिन अब चीन वैश्विक संतुलन को चुनौती दे रहा है। भारत meanwhile, दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और वैश्विक मंच पर उसका वजन बढ़ा है।

पाकिस्तान आज भी चीन, सऊदी अरब और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर आर्थिक रूप से निर्भर है। वहीं भारत अमेरिका, चीन, रूस और खाड़ी देशों के साथ अरबों डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार करता है। अमेरिका अब अफगानिस्तान की स्थिति को लेकर निष्क्रिय है और पाकिस्तान की जरूरतें भी खत्म हो चुकी हैं। अब देश वही रिश्ते कायम रखते हैं जिनसे आर्थिक लाभ हो।

भारत का अमेरिका और चीन दोनों के साथ व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक है, जबकि यूएई और सऊदी अरब से भी व्यापारिक संबंध बेहद मजबूत हैं। वहीं पाकिस्तान के साथ इन देशों का व्यापार न के बराबर है। इसीलिए जब भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया तो खाड़ी देशों ने इसका विरोध नहीं किया। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने प्रधानमंत्री मोदी को “बड़ा भाई” तक कह दिया।

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन की हालिया टिप्पणी पाकिस्तान के पक्ष में मानी गई। उन्होंने पहलगाम हमले की जांच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कराने की मांग की और केवल पाकिस्तान के नागरिकों के प्रति सहानुभूति जताई। तुर्की और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग गहराया है, जबकि भारत से उनके संबंध सीमित हैं। फिर भी भारत-तुर्की व्यापार 10 अरब डॉलर से अधिक है, जबकि पाकिस्तान से तुर्की का व्यापार मुश्किल से 1 अरब डॉलर तक ही पहुँच पाया है।

भारत के साथ बातचीत के लिए सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री अदेल अल-जुबैर का अचानक दौरा यह दिखाता है कि भारत की रणनीतिक और आर्थिक अहमियत लगातार बढ़ रही है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराग़ची का दौरा भी इसी पृष्ठभूमि में हुआ, जिसमें उन्होंने भारत-पाक के तनाव को संवाद से सुलझाने पर बल दिया।

ईरान ने अब तक कोई पक्ष नहीं लिया, जबकि अतीत में वह पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है। वहीं फ्रांस, अमेरिका, रूस और इसराइल ने भारत के साथ एकजुटता दिखाई है। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक और अमेरिकी नेता निकी हेली जैसे लोग भारत की सैन्य कार्रवाई के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं।

आज जब भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न हैं, तो वैश्विक समुदाय का उद्देश्य तनाव को नियंत्रित रखना है। पर इन अपीलों के पीछे भी यह साफ नजर आता है कि अब विश्व भारत को एक महत्वपूर्ण साझेदार मानता है जबकि पाकिस्तान की विश्वसनीयता और अहमियत क्षीण हो रही है।

Please follow and like us:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *