रिढाऊ से दिल्ली तक: चौधरी रतन सिंह की स्मृतियों में बचा हुआ एक दौर

Culture


लेखक: चौधरी वीरेंद्र सिंह, दिल्ली

मेरे ननिहाल पक्ष के दादा, चौधरी रतन सिंह मुण्टोड़/गहलौत, हरियाणा के रोहतक ज़िले के गाँव रिढाऊ (पोस्ट ऑफिस फारमाणा) के निवासी थे। उनके पूर्वजों द्वारा बनाई गई हवेलियाँ और इमारतें आज भी गाँव की विरासत की तरह खड़ी हैं। उनके पिता, चौधरी गुगन सिंह, एक जागरूक और समृद्ध ज़मींदार थे। वे जाट स्कूल, रोहतक की प्रबंधन समिति के सदस्य थे और उन्होंने उस स्कूल में एक कमरा बनवाया था। रोहतक की जिला अदालतों में उनके वकील स्वयं चौधरी छोटू राम हुआ करते थे।

मेरे पास सौभाग्य से ननिहाल पक्ष के कई ऐतिहासिक दस्तावेज़ आज भी सुरक्षित हैं। इनमें 1924 की गांधरा पंचायत का पर्चा, चौधरी छोटूराम की बड़ी बेटी के विवाह का उर्दू में छपा निमंत्रण-पत्र, और 1898 से आगे की कई चिट्ठियाँ और दस्तावेज़ शामिल हैं — जो न केवल पारिवारिक इतिहास हैं, बल्कि उस दौर की सामाजिक-सांस्कृतिक झलकियाँ भी प्रस्तुत करते हैं।

1905 में जन्मे रतन सिंह ने फारमाणा स्कूल से प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की और फिर जाट एंग्लो संस्कृत हाई स्कूल, रोहतक में दाख़िला लिया। गांधी जी के असहयोग आंदोलन के समय चौधरी मतू राम सांगही, चौधरी देवी सिंह बोहर और हेडमास्टर बलदेव सिंह के नेतृत्व में स्कूल की समिति ने भी आंदोलन में भाग लिया, जिससे स्कूल की मान्यता पंजाब विश्वविद्यालय लाहौर द्वारा समाप्त कर दी गई। इसके चलते रतन सिंह को मजबूरी में सरकारी हाई स्कूल, रोहतक में पढ़ाई करनी पड़ी।

रोहतक के अशांत शैक्षणिक माहौल से वे दिल्ली आ गए और आनंद पर्वत (जिसे पहले ‘काला पहाड़’ कहा जाता था) स्थित रामजस स्कूल नंबर 2 में दाख़िला लिया। वहीं से 1923 में उन्होंने मैट्रिकुलेशन परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्हें नायब तहसीलदार की नौकरी का प्रस्ताव मिला, जिसे उन्होंने अस्वीकार करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश लिया।

दुर्भाग्यवश, प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूरोप से लौटे भारतीय सैनिकों के साथ ‘स्पैनिश फ्लू’ नामक महामारी हरियाणा के गाँवों में फैली, जिसे स्थानीय भाषा में ‘कातक की बीमारी’ कहा गया। इस भयावह महामारी ने रतन सिंह के माता-पिता दोनों को छीन लिया। वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे, अतः इस हादसे से उनकी पढ़ाई बाधित हो गई और उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा।

गिन्दोड़ा बाँटने की परंपरा: एक स्मृति जो फिर से जीवित हुई
करीब 15–16 साल पहले मैं श्री रणबीर सिंह मंडोला (पूर्व विधायक, बाढ़ड़ा) के घर दादरी गया था। वहाँ गाँव माजरा फारमाणा से पधारे चौधरी सुल्तान सिंह जी से भेंट हुई। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं चौधरी रतन सिंह रिढाऊ का नाती हूँ, तो उन्होंने तुरंत मुस्कराते हुए कहा, “बेटा, रतन सिंह की शादी में तो गहलौत के अठगाम्मे में चुच्ची बच्चा गिन्दोड़ा बंटा था।”

यह सुनकर मैं चौंक गया, क्योंकि यही बात मेरी माँ भी बताया करती थीं, लेकिन तब उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया था। मैंने गिन्दोड़े के बारे में जानना चाहा। उन्होंने बताया — गिन्दोड़ा एक सेर खांड का बड़ा लड्डू होता था, जो हरियाणा में किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के बेटे की शादी पर गाँव के हर घर में बाँटा जाता था। लेकिन चौधरी गुगन सिंह ने अपने बेटे की बारात चढ़ाने से पहले गहलौत गोत्र के आठों गाँवों में — चाहे वह कोई छोटा हो या बड़ा — सभी को गिन्दोड़ा बाँटा था। माँ यह भी कहती थीं कि उस समय जो महिलाएँ गर्भवती थीं, उन्होंने भी अपने गर्भस्थ शिशु के नाम का गिन्दोड़ा लिया था।

यह परंपरा, यह भाव, और यह सामाजिक जुड़ाव — आज के समय में शायद दुर्लभ हो गया है। लेकिन इन स्मृतियों के माध्यम से वह पूरा कालखंड हमारे सामने जीवंत हो उठता है।

अंत में…
यह लेख उस दौर की सामाजिक गरिमा, शिक्षा, जागरूकता और परंपरा की गवाही है, जिसे हमारे पूर्वजों ने जिया और निभाया। मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मेरे पास वह सब कुछ है जो न केवल मेरे ननिहाल का इतिहास है, बल्कि हरियाणा की सामाजिक विरासत का भी सजीव दस्तावेज़ है।

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