काली नदी खतौली मिल के जहर में डूबी, मौत के कगार पर शेखपुरा — प्रदूषण बोर्ड की खामोश मंजूरी

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Dr. Ravindra Rana / Rajesh Sharma

तीन पेज का नोटिस जारी कर नौकरशाहों ने अपनी गर्दन बचाई, पूरे गांव और नदी को मौत के मुंह में धकेला

शुरुआत एक अपराध से — और खामोशी एक साज़िश की तरह

15 मई 2025 को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम जब यूपी में मुज़फ़्फरनगर के खतौली में त्रिवेणी शुगर मिल पर औचक निरीक्षण के लिए पहुँची, तो जो देखा, वह किसी दुर्घटना की नहीं, एक सुनियोजित औद्योगिक अपराध की तस्वीर थी। खतौली तहसील के शेखपुरा गांव के समीप स्थित इस मिल से निकलता रासायनिक कचरा खेतों, नालों, और नदियों के रास्ते अब इंसानी जीवन में उतर चुका है। सवाल यह नहीं कि प्रदूषण हो रहा है — सवाल यह है कि इतना स्पष्ट अपराध सामने आने के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

ETP सिर्फ दिखावा, गंदा पानी बेहिसाब

फैक्टरी के भीतर लगा Effluent Treatment Plant (ETP) सिर्फ कागज़ों की शोभा है। ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि ज़हरीला पानी बिना किसी शुद्धिकरण के खेतों और सार्वजनिक जलधाराओं में छोड़ा जा रहा है। यह पानी सिर्फ ज़मीन नहीं, जीवन को भी बीमार बना रहा है।

जाँच रिपोर्ट ने यह स्पष्ट रूप से कहा —

“फैक्ट्री से बहता अपशिष्ट बिना ट्रीटमेंट के छोड़ा जा रहा है, जो सीधे काली नदी और फिर गंगा नदी तक पहुँच रहा है।”

क्या मिला निरीक्षण में?

15 मई 2025 को बोर्ड की टीम ने फैक्टरी का औचक निरीक्षण किया। जो सामने आया, वो किसी औद्योगिक हत्या से कम नहीं था:

फैक्टरी का ईटीपी (Effluent Treatment Plant) सिर्फ दिखावे का है, ज़हरीला पानी बिना ट्रीटमेंट के बाहर फेंका जा रहा है। यह दूषित जल स्थानीय आबादी और कृषि क्षेत्र के लिए सीधा ख़तरा है।

गंदा पानी नालों से होता हुआ काली नदी में मिल जाता है और फिर अंत में गंगा में पहुंच जाता — यह केवल एक गांव का मामला नहीं, पूरे क्षेत्र की आस्थाओं और जीवन का प्रश्न है।

पर कार्रवाई? सिर्फ एक नोटिस!

इतनी बड़ी लापरवाही के बाद भी बोर्ड ने सिर्फ़ एक नोटिस जारी किया है, जिसमें “कारण बताओ” पूछा गया है।

क्या ये माफ़ी योग्य है?

क्या एक औद्योगिक घराना आम जनता की जान के साथ यूँ खेल सकता है और सिस्टम केवल नोटिस थमाकर बैठ जाए?

रेड कैटेगरीकी मिल, लेकिन ब्लाइंड आईप्रशासन

त्रिवेणी मिल को “रेड कैटेगरी” — यानी सर्वाधिक प्रदूषण फैलाने वाला उद्योग — घोषित किया गया है। इसके बावजूद न बिजली कटी, न जल आपूर्ति रोकी गई, न एफआईआर दर्ज हुई और न ही मिल को सील किया गया।


बोर्ड की कार्रवाई?
सिर्फ़ एक कारण बताओ नोटिस — एक औपचारिकता, जैसे किसी स्कूल छात्र को अनुशासनहीनता पर समझाया गया हो।

शेखपुरा गाँव: ज़हर की लहरों में डूबती ज़िंदगी

ग्राउंड रिपोर्ट से पता चलता है कि त्रिवेणी मिल के जहरीले कचरे ने शेखपुरा की हवा, पानी और ज़मीन — तीनों को दूषित कर दिया है।

  • गाँव की नालियाँ अब काले झाग और तेज़ रासायनिक गंध से भरी हैं।
  • खेतों की उपज लगातार घट रही है।
  • हैंडपंप का पानी पीला और बदबूदार हो गया है।
  • बच्चों में त्वचा रोग, पेट की बीमारियाँ और एलर्जी आम हो गई हैं।
  • लोग आरओ और मिनरल वॉटर के डिब्बों पर निर्भर हैं — जो गाँव के हर घर के बस की बात नहीं।

शेखपुरा की महिलाओं का दर्द:


“हमें अब यह भी नहीं पता कौन सा पानी पीने लायक है। स्नान का पानी, दूध में मिलाने वाला पानी, या पीने वाला — सबमें कुछ न कुछ गड़बड़ है।”

काली नदी: आस्था से शव तक का सफर

कभी जीवनदायिनी मानी जाने वाली काली नदी, अब ज़हर का बहाव बन चुकी है। त्रिवेणी मिल से निकला रासायनिक अपशिष्ट, जो खेतों और गाँवों से होता हुआ इस नदी में पहुँचता है, अब इसे एक ज़हरीले नाले में तब्दील कर चुका है।

खेड़ी कुरैश गांव के बुजुर्ग रघुवीर पाल कहते हैं:
पहले इस नदी में नहाते थे, अब तो देखना भी गुनाह लगता है। मछलियाँ मर चुकीं, अब आस-पास के पेड़ भी सूखने लगे हैं।”

प्रशासनिक निष्क्रियता या मिल लॉबी का दबाव?

जब ज़हर कैमरे में कैद है, जब पानी के वैज्ञानिक नमूने दोष सिद्ध कर चुके हैं, जब जाँच रिपोर्ट भी कह रही है कि ईटीपी फेल है — तब भी कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं?

क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सिर्फ़ कागज़ी संस्था बन चुका है?
क्या निजी उद्योगपतियों का प्रभाव सरकारी तंत्र पर इतना गहरा है कि वे ज़िंदगियाँ भी दांव पर लगा दें?

यह सिर्फ एक पर्यावरणीय संकट नहीं — यह एक सामाजिक जनसंहार है

जब एक फैक्टरी की लापरवाही पूरे जल तंत्र को ज़हर में बदल दे, जब लोग अपने ही गाँव में पीने के पानी के लिए पैसे खर्चने को मजबूर हों, जब बच्चे स्कूल जाने से डरें क्योंकि रास्ते में उन्हें उल्टी आने लगती है — तब यह सिर्फ़ प्रदूषण नहीं, एक सामूहिक हत्या का दस्तावेज़ है।

जनता की माँग: सिर्फ नोटिस नहीं, निर्णायक कार्रवाई

  1. त्रिवेणी मिल को तत्काल बंद किया जाए जब तक प्रदूषण नियंत्रित न हो।
  2. स्वतंत्र वैज्ञानिक समिति से पानी व मिट्टी की जाँच कराई जाए।
  3. प्रत्येक घर को स्वच्छ पानी की गारंटी दी जाए — फिल्टर या टैंकर से।
  4. फैक्टरी मालिकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
  5. काली नदी के पुनर्जीवन के लिए विशेष राज्य स्तरीय टास्क फोर्स गठित हो।

यह रिपोर्ट नहीं, एक दस्तक है —

अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई —
तो अगली बार काली नदी नहीं, हमारे खेत और हमारे बच्चे इस ज़हर का शिकार होंगे।

त्रिवेणी मिल से बहता हर बूँद सिर्फ़ पानी नहीं — एक भविष्य की हत्या है।
और सिस्टम की खामोशी इस हत्या की सह-आरोपी है।

यह ग्राउंड रिपोर्ट क्षेत्रीय लोगों की आपबीती, सरकारी दस्तावेज़, जाँच रिपोर्ट और मौके की वीडियोग्राफी पर आधारित है।

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