जुदा सियासत, फक्कड़ मिजाज, किसानों संग घंटों बतियाते थे छोटे चौधरी

Politics वेस्ट यूपी

Dr. Ravindra Rana @Politicaladda.com

बागपत की गलियों में मशूहर हैं चौधरी अजित सिंह के दिलचस्प किस्से

राजनीति में बड़ा कद होने के बावजूद कभी मीडिया की टीआरपी के खेल में नहीं फंसे

किसानों के हक के लिए गांवों से संसद तक, आखिरी सांस तक लड़े

चौधरी अजित सिंह की पुण्य तिथि 6 मई पर विशेष                                      

आंखों पर चश्मा, दिसंबर की सर्दी में भी कोई गरम जैकेट या शॉल नहीं । गंभीर और कड़वी बात को भी  ठहाकों में उड़ा देना। वेस्ट यूपी के किसान छोटे चौधरी यानि अजित सिंह की इस जिंदादिली के दीवाने थे। अमेरिका में कंप्यूटर इंजीनियर का प्रोफेशन छोड़ चौधरी साहब करीब 45 साल तक किसानों के हक के लिए गांवों की गलियों से संसद तक लड़ते रहे। किसानों की ताकत के बूते वह सियासत के सिरमौर रहे ।

साल 2009 के लोकसभा  चुनाव में  चौधरी साहब से बतौर पत्रकार मेरा पहला  परिचय हुआ। मेरठ कॉलेज की प्रोफेसर्स कॉलोनी में पूर्व विधायक रविंद्र पुंडीर के आवास पर हुई प्रेस वार्ता में मैंने चौधरी साहब पर तीखे सवालों की बौछार कर दी। चौधरी साहब ने कई सवालों को अपने ही अंदाज में ठहाकों में उड़ा दिया पर पर मैंने मोर्चा संभाले रखा। वार्ता खत्म होने के बाद  चौधरी साहब सर्किट हाउस चले गए। तत्कालीन जिलाध्यक्ष ने मुझे फोन करके बताया कि चौधरी साहब आपसे सर्किट हाउस में अलग से मिलना चाहते हैं। मैं पांच मिनट में ही सर्किट हाउस पहुंच गया तो चौधरी साहब एनेक्सी से बाहर आए और मेरे कंधे पर  हाथ रखकर बोले सवाल बहुत तीखे करते हो। मैं सिर्फ मुस्कुरा दिया। दो तीन मिनट की गपशप के बाद चौधरी साहब चले गए।

हिंदी और अंग्रेजी पर जबरदस्त पकड़ रखने वाले चौधरी अजित सिंह लुटियन जोन में भी खासे मशहूर थे। देश के विभिन्न राज्यों के बड़े नेताओं को वह बागपत और मेरठ की  रैलियों  में अपने मंचों पर  बुलाकर जनता की दीवानगी का नजारा दिखा देते थे। कर्नाटक में देवगौड़ा, बिहार में लालू , शरद यादव और नीतीश, उड़ीसा में बीजू पटनायक, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, तेलंगाना में चंद्रशेखर राव, जम्मू कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला से उनके रिश्ते बेहद मधुर थे। दिल्ली की हुकूमत को वे ताकत का एहसास कराते रहते थे।  ट्रैक्टर लेकर दिल्ली में घुसते किसानों को लगता कि यहां उनका ही राज है।

मैं मेरठ में हिंदुस्तान के लिए रालोद बीट कवर करता था। इसलिए चौधरी साहब से करीबी हो गई। प्रतिदिन सुबह सात बजे वह जनता के फोन अटैंड करने के लिए बैठ जाते। अक्सर सुबह आठ बजे मेरी उनसे बात होती। “हां भाई रविंदर क्या हाल है”,  से बात शुरू होती और फिर बात सियासी समीकरणों, सत्ता के दांवपेच पर चर्चा होती । चौधरी साहब कभी कोई सुरक्षाकर्मी लेकर नहीं  चले।  वो वीआईपी कल्चर के सख्त खिलाफ थे। सुबह जिन लोगों को फोन पर उपलब्ध नहीं हो पाए शाम को आठ बजे उन सबके फोन मिलवाकर बात करते।

चौधरी  साहब सियासत में धनबल और बाहुबल के सख्त खिलाफ थे। आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों  को वह नापसंद करते थे। जेल में बंद एक कुख्यात ने 2009 के लोकसभा चुनाव के दौरान चौधरी साहब के लिए जीत की अपील करते हुए एक प्रमुख समाचार पत्र में फुल पेज का विज्ञापन प्रकाशित करा दिया। हिन्दुस्तान अखबार ने  इस पर खबर प्रकाशित करते हुए सवाल उठाया कि चौधरी साहब जीत के लिए बदमाशों का सहारा ले रहे हैं। शाम को आईबीएन7 ने आधे घंटे का एक स्पेशल एपिसोड भी बना डाला। माहौल गरम हो गया। चौधरी साहब के समर्थकों और कार्यकर्ताओं में अखबार के प्रति नाराजगी बढ़ गई। अखबार की प्रतियां फूंकने और अखबार का बहिष्कार करने की धमकियां आने लगीं।

 ये सूचना चौधरी साहब तक  पहुंच गईं। तभी एक शाम 12 तुगलक रोड स्थित चौधरी साहब की कोठी से फोन की घंटी बजी। उधर  से आवाज आई, “चौधरी साहब बात करेंगे।”  चौधरी साहब लाइन पर आते ही बोले, हां भाई (रविंद्र नहीं )रविंदर क्या हाल है। मैंने कहा ठीक नहीं है। आपके कार्यकर्ता और समर्थक अखबार के लोगों को धमकियां दे रहे हैं। क्या अब अखबार खबर भी नहीं छाप सकते। क्या एक कुख्यात ने आपका विज्ञापन छपवाया है। चौधरी साहब विनम्रता से मेरी बात सुनते रहे। बोले कौन हैं ये नासमझ। मैं इनसे  बात करता हूं, तुम चिंता न करो। मीडिया को अपना काम करना ही चाहिए। पर ये भी जान लेना चाहिए था कि विज्ञापन हमने नहीं छपवाया। तुम ही बताओ क्या मैं बदमाशों को पसंद करता हूं। अखबार को मुझसे भी तो इस बारे में बात कर लेनी चाहिए थी।

बात  खत्म  हुई और चौधरी साहब ने पार्टी नेताओं व कार्यकर्ताओं की जमकर क्लास लगाई। कहीं कोई अखबार नहीं  फूंका गया। कहीं कोई विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। आज के वक्त में जब पत्रकारों की हत्याएं हो रही हैं, उन्हें जेल डाला जा रहा है तब मीडिया की स्वतंत्रता के प्रति  चौधरी साहब की ऐसी सोच समाज के लिए आदर्श है। आज के  नेताओं के लिए सीख है।

भारतीय राजनीति में बड़ा कद होने के बावजूद चौधरी साहब कभी मीडिया के टीआरपी के खेल में नहीं फंसे। कभी उनकी जुबान नहीं  फिसली, कभी बोल  नहीं बिगड़े। पश्चिमी यूपी में उनका बेस वोटर आक्रामक तेवर वाला है। वह चाहता था कि चौधरी साहब भी आक्रामक  हों पर वह अपने भाषणों में हमेशा ही शालीन बने रहे। रैलियों में जनता सिर्फ उन्हें ही सुनने आती। जैसे ही चौधरी साहब बोलना शुरू करते तो लोग खड़े हो जाते। कई बार वह लंबा भाषण देते तो कई बार “आप लोग मुझे चुनाव लड़ाना जानते ही हो” ये कहकर कम शब्दों में ही बात खत्म कर चौंका देते। बड़ौत में तो कार्यकर्ता उन्हें कंधे पर बिठाकर मंच तक ले जाते। गांवों में जाते तो घोड़ी और ढोल नगाड़े तैयार रहते। बड़ी रैलियों के मंचों पर अक्सर किसान उनके लिए गन्ना लेकर आते। रैली के दौरान ही चौधरी साहब गन्ना चूसकर किसानों का मान रखते। उनका भरोसा पब्लिसिटी स्टंट के बजाय जमीनी काम में था। यही खूबी उन्हें सफल राजनेता और शानदार शख्सियत बनाती थी। उनकी सियासत जुदा थी। बदलती राजनीति को वो वक्त से पहले ही भांप लेते थे। पर उसूलों से समझौता नहीं करते थे।

चौधरी साहब ने जब सियासत में कदम रखा तो उस वक्त मेरठ में भीषण दंगे  हुए थे। उन्होंने भाईचारा कायम  करने के लिए मेरठ से लखनऊ तक पैदल यात्रा की। मुजफ्फरनगर दंगे में भाईचारा टूटा तो वे आहत हो गए। बस एक ही बात ठान ली कितनी भी कीमत चुकानी पड़े भाईचारा कायम करके रहेंगे। इसलिए 2019 में चुनाव लड़ने मुजफ्फरनगर पहुंच गए। चुनाव के दौरान जब भी उनसे बात हुई बस एक ही बात कहते थे, हार जीत के मायने नहीं।  भाईचारा जोड़ना है। उन्होंने साफ कर दिया था कि ये उनका आखिरी चुनाव  होगा। इसके बाद वह चुनाव नहीं लड़ेंगे। हार के बाद जब वह मुजफ्फरनगर पहुंचे तो बोले,  “जब कोई समस्या ही नहीं तो राजनीति क्या करेंगे। मैं राजनीति नहीं करने आया हूं। एक तो आपको धन्यवाद देने आया हूं, चुनाव में आप लोगों ने मेहनत की। फिर बैठकर गपशप लड़ाएंगे,  भई जान पहचान तो रहेगी ही, राजनीति हो न हो। मुझे आप लोगो के बीच आकर अच्छा लगता है, और कोई कारण नहीं है। कोई जरूरत नहीं है मुझे अब।” मुजफ्फरनगर का दंगा उनके दिल में नासूर की तरह था। वो जब भी बात करते भाईचारा जोड़ने का ही जिक्र करते।

मुजफ्फरनगर के बाद चौधरी साहब मेरठ सर्किट हाउस में आए। बोले आज का दिन सिर्फ पत्रकारों के लिए। हम प्रिंट मीडिया के पत्रकार डेढ़ घंटे उनसे गपशप करते रहे। चौधरी साहब सियासत में धनबल के दखल को लेकर चिंतित थे। वो तेलंगाना में केसीआर के लिए चुनाव प्रचार करके लौटे थे।  बोले हर बार आप लोग सवाल करते हैं आज मैं करूंगा। ठहाके  गूंज उठे। चौधरी साहब बोले, अंदाजा लगाकर बताओ तेलंगाना में एक विधानसभा  सीट पर औसत चुनाव खर्च क्या रहा होगा। हममें से किसी ने दो, पांच सात और दस करोड़ का आंकड़ा बताया। चौधरी साहब ने कहा औसत खर्च 100 करोड़ के पार है। चौधरी साहब यहीं नहीं रुके। बोले जिस तरह से सियासत में धनबल, बाहुबल और तकनीक का इस्तेमाल हो रहा  है वो जनता के लिए,  लोकतंत्र  के लिए खतरनाक है।  बात 2012 के विधानसभा चुनाव की है। बरनावा  से विधायक रहे कटार सिंह के बेटे जयवीर सिंह उन दिनों दैनिक जागरण बागपत में ब्यूरो चीफ थे। वो छपरौली से चुनाव लड़ना चाहते थे। मैं 12 तुगलक रोड पर चौधरी साहब से मिलने गया। जयवीर सिंह का नाम सुझाया तो  चौधरी साहब ने चाय मंगा ली। बोले नाम तो सही है। मैं विचार करता हूं। जयवीर अस्वस्थ हो गए और उन्होंने खुद ही लड़ने के लिए इनकार कर दिया। चौधरी साहब ने एक मामूली कार्यकर्ता को घर से बुलाकर छपरौली का टिकट पकड़ा दिया। 

साल 2012  में जयंत चौधरी मथुरा के मांट से चुनाव लड़ रहे थे।  हिन्दुस्तान अखबार के लिए जयंत चौधरी के एक साक्षात्कार की जरूरत थी। संपादक ने रात में 11 बजे मुझसे इसके लिए कहा और अगले दिन 12 बजे तक इंटरव्यू फाइल  करने की डेडलाइन दी। तब जयंत चौधरी से  न मेरी कोई मुलाकात थी और न बातचीत। रात में फोन पर चौधरी साहब से भी बात न हो सकी। मैं सुबह पांच बजे मेरठ से निकला और सात बजे 12 तुगलक रोड पहुंच गया। वहां टिकटार्थियों और उनके समर्थकों की हजारों की भीड़ कोठी के अंदर जमा थी। मैंने चौधरी साहब के निजी सचिव को परिचय देते हुए मुलाकात कराने को कहा। निजी सचिव  ने पूर्व में समय  लेकर  न आने  के चलते मुलाकात कराने से इनकार कर दिया। तभी मैंने तल्ख  तेवर में कहा कि आप चौधरी साहब को बता दीजिए कि मेरठ से मैं आया हूं। वो मिलने से इनकार कर देंगे तो मैं वापस जाउंगा और फिर कभी आउंगा भी नहीं। निजी सचिव  ने चौधरी  साहब को इंटरकॉम पर सूचना दी तो वो तुरंत  ही आवास से बाहर परिसर में ही बने कार्यालय में आ गए। भीड़ जिंदाबाद के नारे लगाने लगी। लोग मिलने की कोशिश करने लगे। चौधरी साहब ने सबको रोक  दिया और ऑफिस में कुर्सी पर बैठते हुए कहा आज अचानक कैसे।

मैंने बताया  कि जयंत चौधरी का इंटरव्यू चाहिए। संपर्क नहीं हो पा रहा था इसलिए आना ही पड़ा। जयंत तब तक बागपत निकल चुके थे। चौधरी साहब ने फोन पर उनसे बातचीत कराई। साक्षात्कार हुआ और मैं मेरठ के लिए  दौड़ पड़ा। तय समय पर मैंने अखबार में इंटरव्यू प्रकाशित  करा दिया। आम आदमी के लिए चौधरी साहब से मिलना, अपनी बात कहना जितना सहज था शायद उतना उनके कद के किसी अन्य नेता से मिलना रहा हो। बागपत के लोग तो उनकी दिल्ली कोठी पर बेरोकटोक आते जाते रहते थे। जब भी मन किया आठ दस लोग एकत्र हुए, गुड़ और गन्ना लेकर12 तुगलक रोड पर पहुंच गए। चौधरी साहब से गपशप की और लौट गए।

चौधरी साहब हमेशा आम आदमी, गांव, गरीब के दुख दर्द के विषय में चिंतित रहते थे। मेरे साथ जब भी बात होती वे किसानों की बढ़ती समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा करते। किसानों के हक में केंद्र सरकार पर दबाव बनाने की कला उन्हें बखूबी आती थी। यूपीए की केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों का गन्ने का राज्य समर्थित मूल्य बढ़ाने का अधिकार छीनकर उचित लाभकारी मूल्य की नीति घोषित की तो उन्होंने इसके खिलाफ किसानों को लामबंद किया। उन्होंने मेरठ में किसानों की विशाल महापंचायत की। इसमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से लाखों किसानों का हुजूम मेरठ पहुंच गया। सरकार पर दबाव बनाने के लिए चौधरी साहब ने दिल्ली कूच का ऐलान कर दिया। लाखों किसान गन्ना लेकर दिल्ली में घुस गए। केंद्र सरकार दबाव में आ गई और यूपी सरकार का गन्ने का  राज्य समर्थित मूल्य घोषित करने का अधिकार बहाल हो गया। इसी वजह से यूपी सरकार केंद्र सरकार द्वारा घोषित गन्ने के उचित लाभकारी मूल्य पर बढ़ोतरी करके राज्य समर्थित मूल्य घोषित करती है।

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली में 13 महीने तक चले किसान आंदोलन में चौधरी साहब ने ही जान फूंकी थी। 26 जनवरी को लाल किले पर हुई घटना के बाद किसान संगठन नैतिक दबाव में थे। पुलिस प्रशासन ने गाजीपुर बार्डर से राकेश टिकैत को जेल भेजने की पूरी तैयारी कर ली थी। मैं उस वक्त गाजीपुर बार्डर पर ही था। किसान नेताओं में भयंकर निराशा थी। किसान टूट चुके थे। फोर्स ने किसानों को चारों तरफ से घेर लिया था। कुछ अराजक तत्व भी किसानों पर हमले की नीयत से वहां जमा हो गए थे। तभी चौधरी अजित सिंह ने राकेश टिकैत को फोन करके कहा, खुद को अकेला मत समझना, धरने पर डटे रहना।  किसानों के लिए जीवन मरण का प्रश्न है, सबको एक होना है, साथ रहना है। चौधरी साहब के इस संदेश ने राकेश टिकैत को हौसला दिया। जैसे ही ये सूचना गांवों तक पहुंची तो बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, मेरठ समेत वेस्ट यूपी के आसपास के जिलों से लाखों किसानों ने गाजीपुर बॉर्डर के लिए  कूच कर दिया। सरकार सहम गई और आंदोलन में फिर से जान आ गई।

चौधरी साहब सामाजिक न्याय की लड़ाई के पक्षधर थे। इसके लिए अपने राजनीतिक करियर को भी दांव पर लगाने से पीछे नहीं हटे। यूपी समेत कई राज्यों में जाट ओबीसी में हैं जबकि केंद्र सरकार की नौकरियों में उन्हें सामान्य श्रेणी में माना जाता है। चौधरी साहब ने यूपी सरकार में नागरिक उडउयन मंत्री रहते जाटों को केंद्र में आरक्षण दिलाया। हालांकि 2014 में बीजेपी की लीडरशिप वाले एनडीए की सरकार बन गई और जाटों का ये आरक्षण सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो गया। हिन्दुस्तान अखबार के लिए मैंने उनका साक्षात्कार किया तो वह जाट आरक्षण के समर्थन में खुलकर बोले। 2014 के लोकसभा चुनाव में जाने से पहले भाजपा ने उन्हें एनडीए में लाने की पुरजोर कोशिश की पर चौधरी साहब ने सामाजिक न्याय की लड़ाई को तरजीह दी और यूपीए में ही बने रहे।

व्यक्तिगत स्तर पर लोगों की मदद से भी वह कभी पीछे नहीं हटते थे। पत्रकार साथी अरविंद शुक्ला के भाई आनंद को अध्ययन के लिए दक्षिण अफ्रीका जाना था। अरविंद ने मुझसे कहा कि अगर चौधरी साहब चाहें तो आनंद निशुल्क हवाई यात्रा कर अध्ययन के लिए जा सकता है। मैंने चौधरी साहब से फोन पर बात की तो उन्हें पल भर में यह व्यवस्था करा दी। एक बार लंदन एयरपोर्ट पर अखबार के प्रबंधन की शीर्ष शख्सियत को किसी वजह से रोक लिया गया। अखबार के ग्रुप एडिटर की तरफ से मेरठ संपादक के पास सूचना आई तो मैंने चौधरी साहब से फोन पर संपर्क किया। चौधरी साहब ने पलभर में समस्या का समाधान करा दिया। इस बड़े समाचार पत्र के प्रधान संपादक ने चौधरी साहब का धन्यवाद अदा करने के लिए समय लेने को कहा। मैंने चौधरी साहब से समय  मांगा तो वह बोले देखो भाई रविंदर मैं तो तुम्हें जानता हूं, प्रधान संपादक को नहीं। तुम मुझे धन्यवाद कहोगे नहीं और प्रधान संपादक के धन्यवाद की कोई जरूरत नहीं। इतना कहकर वह  ठहाका मार हंस पड़े। मैंने निवेदन किया कि आप प्रधान संपादक से मुलाकात कर लेंगे तो अच्छा रहेगा। चौधरी साहब ने प्रधान संपादक को सम्मान के साथ मिलने का समय दिया।  

बात 2010 की है, चौधरी साहब मेरठ के चैंबर ऑफ कामर्स में प्रेस वार्ता कर रहे थे। मैं लेट हो गया। चौधरी साहब ने कहा हिन्दुस्तान वालों को भी आने दो तब तक गपशप करते हैं।  मैं  करीब करीब बीस मिनट लेट पहुंचा तो वार्ता शुरू हुई। मेरठ में चचा के नाम से मशहूर अमर उजाला से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार गर्ग  ने एक सवाल रिपीट  कर दिया । चौधरी साहब नाराज हो गए और  उठकर चल दिए। बोले जब मैं इस सवाल का जवाब दे रहा था तब आप कहां थे। पत्रकारों को खुश करने के लिए वो न कुछ कहते थे और न करते थे। खुद को कैमरे के फोकस  में लाने के लिए या अखबारों और टीवी कह हेडलाइन में लाने के  लिए उन्होंने कभी न खोखले  वादे  किए और न ही झूठे सपने दिखाए। वो हमेशा जमीनी हकीकत की बात करते थे।  चुनाव के वक्त किससे गठबंधन होगा,  कहां से किसको टिकट मिले इस पर पत्रकार कयास लगाते हुए पत्रकार सवाल करते तो चौधरी साहब ठहाका लगाते हुए कहते अब तुमने टिकट दे ही दिया है तो मैं क्या कर सकता हूं।

तमाम झंझावतों के बावजूद चौधरी साहब की फिटनेस कमाल की थी। वह सुबह पांच बजे उठ जाते थे। कार उठाते और खुद ही ड्राइव करते हुए लोदी गार्डन पहुंच जाते।  मार्निंग वॉक के बाद नींबू पानी या शहद मिला पानी पीते। सात बजते ही फोन पर बात करने के लिए बैठ जाते।  रात में 11 बजे तक सो जाते। उन्हें गुस्सा बहुत आता था पर क्षणिक। पल भर में उनका दिल नरम हो जाता। कभी किसी से दुश्मनी नहीं पाली। वे किसी से डरते नहीं थे। कभी निजी सुरक्षाकर्मी  नहीं रखे। कभी बाउंसर लेकर नहीं चले। रैलिंयों में मंचों पर चढ़ने को बेताब युवाओं को कई बार वह चपत भी लगा देते पर कोई बुरा नहीं मानता था। तत्काल व्यवस्था बन जाती थी।  मेरठ आते तो अक्सर समोसा खाते।  गांवों में जाते तो उड़द की दाल और चपाती और गुड़ खाते।

किसानों के हक के लिए सियासत करने वाले नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को चौधरी साहब की कार्यशैली और उनके आचार व्यवहार से सीखने की जरूरत  है। आम आदमी से संवाद स्थापित  करने की इस कला को विकसित करने की आवश्यकता है। चौधरी साहब कभी  लग्जरी कारों का काफिला लेकर  गांवों में नहीं निकले।  किसान ट्रैक्टर में सवार होकर काफिले में जुड़ते चले जाते। युवाओं की टोलियां  कार लेकर आ जातीं और कारवां बन जाता। चौधरी साहब अक्सर कहते राजनीति में हार जीत लगी रहती है। जनता में उनकी दीवानगी पर चुनावी हार जीत का कोई असर भी नहीं पड़ा। गणेश परिक्रमा करने वालों के बजाय वह गांवों से आने वाले सीधे सादे किसानों से मिलकर खुश होते। उन्हें भरपूर सम्मान देते और उनकी बात गंभीरता से सुनते।

चौधरी साहब के न होने का दुख किसानों  को सालता है। उनके विचार और उनकी संघर्ष यात्रा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा पुंज हैं। आज जब गांवों से शहरों की ओर पलायन हो रहा है। बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही है। किसानों की जमीनें कौडियों के भाव बिक रही हैं। नदियां मर रहीं हैं। तालाबों का वजूद खत्म हो रहा है। गांव गांव कैंसर के मरीज बढ़ रहे हैं। खेती उत्पादन में ठहराव की शिकार है। फसलों की लागत बढ़ रही  है। किसानों के बेटे बेटियों का उच्च शिक्षा से मोहभंग हो रहा है। नौजवान नशे की जकड़ में हैं, तब चौधरी चरण सिंह और चौधरी अजित सिंह के विचार और प्रासंगिक  हो गए हैं। जरूरत है कि गांव,  गरीब, किसान मजदूर को उसके हक की लड़ाई के लिए लामबंद किया जाए। ये जिम्मेदारी उन सभी की है जो भाईचारे में विश्वास रखते हैं। जो लोकतंत्र में आस्था रखते हैं। जो इस समाज का ताना बनाए रखना चाहते हैं। जो बेरोजगारी और गरीबी का खात्मा चाहते हैं। जो गांव, गरीब, पिछड़ों, दलितों, वंचितों और अल्पसंख्यकों के लिए समानता की लड़ाई लड़ना चाहते हैं। सामाजिक न्याय की जंग को अंजाम तक पहुंचाना चाहते हैं, उन सबको चौधरी साहब की विचार यात्रा को आत्मसात कर आगे बढ़ना होगा। शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने कहा था क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है। इसलिए बदलावा लाना है तो विचारों की बुनियाद पर मजबूत सांगठनिक ढांचा खड़़ा कर उसे भाईचारे के सीमेंट से ताकत देनी होगी।

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