साक्षात्कार- किसान के बेटे को कैसे मिली विधान परिषद की सीट
हरपाल सिंह सैनी, एक किसान परिवार में जन्मे, छात्र राजनीति से लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के मजबूत नेता बने। उन्होंने 1996 में सरधना विधानसभा से चुनाव लड़ा, जहां उनके मुकाबले कई कद्दावर और कुछ आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी थे। मात्र 256 वोटों से हारने के बावजूद उन्होंने राजनीतिक संघर्ष जारी रखा। 2002 में दोबारा चुनाव लड़ा और फिर भी हार का सामना किया। लेकिन उनके राजनीतिक कौशल और संघर्ष को देखते हुए 2006 में चौधरी अजीत सिंह ने उन्हें विधान परिषद भेज दिया। उनके जीवन में संघर्ष, सत्ता का खेल और राजनीतिक उलटफेर से भरे कई रोचक किस्से शामिल हैं।
सवाल-जवाब:
प्रश्न: आपका स्वागत है। आपका परिवार एक किसान परिवार था, बचपन और शुरुआती जीवन कैसा था?
उत्तर: जी धन्यवाद। मेरा जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ। मेरा गांव समसपुर, मेरठ जिले के दोराला के पास है। हम सब्जी की खेती करते थे। छात्र जीवन से ही राजनीति में रुचि थी। मेरठ के वैश्य इंटर कॉलेज में छात्र संघ का उपाध्यक्ष बना और तभी से राजनीति में सक्रिय रहा। अब तक करीब 50 साल हो गए राजनीति में।
प्रश्न: आप कांग्रेस से भी जुड़े रहे, फिर बसपा में कैसे आए?
उत्तर: कांग्रेस में जिला कांग्रेस कमेटी का सीनियर जनरल सेक्रेटरी था। पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ का प्रदेश सीनियर सेक्रेटरी भी रहा। उस समय कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन जब क्षेत्रीय पार्टियां बनीं, तो 1995 में मान्यवर कांशीराम जी और मायावती जी ने मुझे बसपा में शामिल किया।
प्रश्न: 1996 का विधानसभा चुनाव आपके लिए कैसा रहा?
उत्तर: 1996 में बसपा से सरधना विधानसभा से चुनाव लड़ा। उस समय बड़े और कई खतरनाक प्रत्याशी मैदान में थे। प्रमुख प्रतिद्वंद्वी थे:
- रविंद्र भूरा (चंद्रशेखर की पार्टी से) – जिन पर इनाम था।
- सुरेंद्र दौलिया (जननायक पार्टी से) – बाहुबली थे।
- रविंद्र पुंडीर (बीजेपी से) – अंततः विजेता रहे।
चुनाव कठिन था, लोग देखने आते थे कि कौन है ये हरपाल सैनी, जो इतने बड़े और खतरनाक लोगों के सामने चुनाव लड़ रहा है।
प्रश्न: चुनाव में कोई रोचक घटना हुई?
उत्तर: जी, बहुत हुईं। जब मैंने प्रचार शुरू किया, तो रविंद्र भूरा ने कहा कि मेरे गांव में वोट मांगने मत आना। मैंने चुनौती ली और उनके गांव गया, उनकी माँ और पिता से आशीर्वाद लिया। बाद में जब मेरे मित्रों को पता चला तो उन्होंने रविंद्र भूरा को फोन किया और मामला संभला।
प्रश्न: चुनाव में हार-जीत का गणित क्या रहा?
उत्तर: चुनाव में जब गिनती हुई, तो मैं 3200 वोटों से आगे था। लेकिन मेरे 3000 वोट कैंसिल कर दिए गए। एसडीएम और डीएम ने वोटों की गड़बड़ी करवाई और मैं मात्र 256 वोटों से हार गया।
प्रश्न: फिर 2002 में क्या हुआ?
उत्तर: 2002 में मैंने फिर चुनाव लड़ा, इस बार मुझे पहले से डेढ़ गुना ज्यादा वोट मिले, लेकिन फिर भी हार गया। मायावती जी चाहती थीं कि टिकट किसी और को दिया जाए, लेकिन मान्यवर कांशीराम जी ने कहा कि “हम सारी सीटें जीतने के लिए नहीं लड़ते, कुछ सीटें समाज को संदेश देने के लिए भी लड़ते हैं।”
प्रश्न: वो हवाई जहाज वाला किस्सा और विधान परिषद पहुंचने की कहानी क्या है ?
उत्तर: 2006 में लखनऊ से दिल्ली जाते समय हवाई जहाज में चौधरी अजित सिंह जी मिले। मैंने मजाक में कहा, “आपने तो मुझे हरवा दिया।” कुछ समय बाद अनुराधा चौधरी ने फोन किया कि चौधरी साहब आपको विधान परिषद भेजना चाहते हैं। उन्होंने मुलायम सिंह यादव जी से एक राज्यसभा और एक विधान परिषद की सीट मांगी। राज्यसभा में महमूद मदनी जी गए और मुझे विधान परिषद भेजा गया।
प्रश्न: उसके बाद आपका राजनीतिक सफर कैसा रहा?
उत्तर: विधान परिषद सदस्य बनने के बाद भी जनता के लिए काम करता रहा। बड़े-बड़े नेताओं से संबंध बने। 2009 में नरेंद्र मोदी जी भी एक रैली में आए थे, जब अनुराधा चौधरी मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ रही थीं।
प्रश्न: आपके जीवन का सबसे बड़ा सीख क्या है?
उत्तर: राजनीति में धैर्य, संघर्ष और ईमानदारी सबसे जरूरी है। मैंने हमेशा जनता की सेवा की और आगे भी करता रहूंगा।
सफर अनवरत जारी
हरपाल सिंह सैनी की कहानी संघर्ष, सत्ता की राजनीति और अदम्य साहस की मिसाल है। 1996 के चुनाव में खतरनाक उम्मीदवारों से भिड़ना, 2002 में हार के बावजूद कांशीराम जी का विश्वास जीतना, और आखिरकार 2006 में विधान परिषद पहुंचना—उनकी राजनीतिक यात्रा बेहद दिलचस्प है।
