Dr. Ravindra Rana
यह लेख मैंने वर्ष 2015 में लिखा था। तब भी किसान आत्महत्याएँ कर रहे थे, तब भी गाँव टूट रहे थे, और तब भी सत्ता मौन थी। आज जब यह लेख दोबारा पढ़ता हूँ, तो पाता हूँ कि इसके आँकड़े बदल चुके हैं—स्थिति और भी भयावह हो चुकी है। किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ा है, आत्महत्याओं की संख्या बढ़ी है, और गाँवों में जीवन और भी संकट में है। परंतु यह लेख अब भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 2015 में था।
खासतौर पर बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि के अवसर पर यह लेख एक प्रश्न बनकर खड़ा होता है—क्या आज का किसान वह जज्बा, वह एकजुटता, वह नेतृत्व दोबारा हासिल कर सकता है जो टिकैत के समय में था?
टिकैत सिर्फ एक किसान नेता नहीं थे, वह उन आवाज़ों में से एक थे जो हुकूमत की नींद तोड़ सकती थीं। उन्होंने गांव, ज़मीन और ज़िंदगी को समझा था, और उनके लिए दिल्ली और लखनऊ की सत्ता से टकराने में संकोच नहीं किया।
आज जबकि किसान आंदोलनों की ताकत बिखर चुकी है, गांवों में सामाजिक ताने-बाने में दरारें आ चुकी हैं, और किसान नेतृत्व सत्ता की दलाली में उलझ चुका है—टिकैत की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक महसूस होती है।
यह लेख एक किसान की आत्महत्या से शुरू होता है, पर यह केवल एक किसान की कहानी नहीं है। यह एक संघर्षशील स्मृति है, एक सवालों से भरा आईना है, जिसमें हम सबको झाँकना चाहिए—खासकर उस समय जब टिकैत जैसे नेता अब हमारे बीच नहीं हैं।
किसान नेता चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के जन्म दिवस के दो दिन पहले यानी चार अक्तूबर को खबर आई कि सहारनपुर जिले के बडगांव थाना क्षेत्र के मजबता गांव में कर्ज के बोझ तले तबे पचास वर्षीय किसान सतेन्द्र ने आत्महत्या कर ली। सतेन्द्र पर भूमि विकास बैंक का लाखों रुपये का कर्ज था। इस संबंध में भूमि विकास बैंक ने सतेन्द्र से तकादा किया था जिससे वह मानसिक दबाव में आ गया और मौत को गले लगा लिया।

इसके पहले छह जनवरी 2017 को मुजफ्फरनगर के मथेड़ी गांव के गन्ना किसान जयवीर ने अपनी दो बेटियों और पत्नी को गोली मारी और फिर खुदकुशी कर ली। जयवीर पर बैंकों का चार लाख और साहूकारों का पांच-छह लाख का कर्ज था। कोई रास्ता नहीं सूझा तो उसने यह कदम उठा लिया।
सतेन्द्र और जयवीर अकेले नहीं है जो इस तरह जिंदगी से हारे हों। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में ढाई लाख से ज्यादा किसान इस तरह मौत को गले लगा चुके हैं। आत्महत्या करने वाले यह किसान कर्नाटक, तमिलनाड़, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना के ही नहीं हैं बल्कि हरित क्रांति के अगुआ माने जाने वाले पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी हैं।
वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के इस दौर में गांवों में भी चल रही जल,जमीन और जंगल की लूट के चलते कंक्रीट के जंगलों की तरह अलगाव और स्वार्थ हावी हो गया है। मिलजुलकर लडने का जज्बा खत्म हुआ है। इसलिए लोग लडने के बजाय समपर्ण की मुद्रा में हैं। जो किसान कभी एक हुंकार पर दिल्ली लखनऊ तक की सत्ता को हिला देता था वह अब सदमे से मर रहा है। आत्महत्या कर रहा है।
पंद्रह मई 2011 को किसान नेता बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत ने जब इस दुनिया को अलविदा कहा तो सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि किसान आंदोलन की दिशा क्या होगी? किसानों का सबसे बड़ा लड़ाका उनके लिए महाभारत रचने का अरमान लिए चला गया तो अब उनके दुख-दर्द को कौन समझेगा। आज 6 साल बाद भी किसान इसी सवाल का जवाब तलाश रहा है।
छह अक्तूबर1935 में मुजफ्फरनगर के सिसौली गांव में जन्मे चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत ने बिजली के दाम बढ़ने के खिलाफ 27 जनवरी 1987 को करमूखेड़ा बिजलीघर से आंदोलन का बिगुल फूंका तो 1987-88 में मेरठ के 24 दिनी ऐतिहासिक कमिश्नरी घेराव से वह बड़े किसान नेता के तौर पर उभरे। इसके बाद तो टिकैत और सत्ता की मानो जंग ही छिड़ गई। 110 दिनी रजबपुर सत्याग्रह हो या फिर दिल्ली में वोट क्लब पर महापंचायत हर बार उनके आंदोलनों की ताकत बढ़ती ही गई। करीब तीन दशक तक अपने किसान आंदोलनों के बूते टिकैत दिल्ली-लखनऊ की हुकुमतों को किसानों के लिए झुकाते रहे।
सीधे तौर पर भले ही टिकैत के आंदोलनों से किसानों की जिंदगी में भले ही बड़ा बदलाव दिखाई न देता हो पर उन्होंने किसानों में हक के लिए लामबंद होने और लड़ने का जज्बा जरूर भरा। मेरठ कमिश्नरी पर उनका आंदोलन 1987 के भीषण दंगे के ठीक बाद शुरू हुआ था। इस किसान आंदोलन ने ही मेरठ की फिजा में घुले सांप्रदायिकता के जहर को कम करने में अहम भूमिका निभाई थी। हिन्दू-मुसलमान किसान एक साथ लाखों की तादाद में जुटे थे। धरना स्थल पर नमाज भी होती थी और टिकैत बार-बार आगाह करते थे हुकूमत से चौकस रहना। कभी भी दंगा कराकर आंदोलन को तोड़ सकती है।

टिकैत चले गए पर उनके जाने के बाद मुजफ्फरनगर में ही यह किसान एकता बिखर गई। मुजफ्फरनगर दंगे ने किसानों की इस ताकत को तोड़ डाला। साल 2017 तक आते-आते तो किसान आंदोलनों की साझा स्मृतियां इस कदर कमजोर पड़ गईं कि सहारनपुर के शब्बीरपुर कांड के बाद तो मानो गांव में सामाजिक ताना-बाना पूरी तरह बिखर गया। संप्रदाय अहम हो गए और जगह-जगह जातीय संघर्ष आम हो गए। जातीयता और संप्रदायवाद के इस शोर के पीछे ऐसा बहुत कुछ हो रहा है जिसने गांव, किसान, खेत और मजदूर को बड़े संकट में डाल दिया है। इसे नजरअंदाज करना भारी भूल होगी।
क्या गांव, गरीब, किसान एकजुट होकर कोई बडा आंदोलन खडा नहीं कर सकते हैं। नेताओं और दलों के पिछलग्गू बनने के बजाय संघर्ष की राह नहीं चुन सकते? बीते कुछ महीनों के अंदर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश,राजस्थान और झारखंड के किसानों ने अपने हक के लिए बड़े आंदोलन किए। देश में पहली बार किसानों ने हड़ताल की। मंडियों को खाने-पीने की चीजों की सप्लाई बंद कर दी। बुलेट और बूट के दम पर किसान आंदोलनों को रौंदा गया। मंदसौर में छह किसानों की मौत हो गई। पर पूरे देश में तमाम विपक्षी दलों से किसान संगठन तक आंदोलन की इस शानदार जमीन में किसानों के हक के लिए कोई फसल नहीं बो सके। यह आंदोलन की ऐसी जानदार जमीन तैयार हुई थी जिसमें अगर बीज डाला जाता तो यह गांव,गरीब और किसान के हक में दिल्ली को झुका सकता था।

पर ऐसा नहीं हुआ। दरअसल दिल्ली तब तक नहीं जागती जब तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान की तरफ से किसानों का दबाव नहीं बनता। इस मायने में चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के आंदोलन की एक बड़ी भूमिका थी। उन्होंने जब-जब किसानों के साथ दिल्ली की तरफ कूच किया तो हुकूमतों तक आवाज गई। अब जिस वक्त महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड का किसान सड़कों पर था तब वेस्ट यूपी चुप था।
दूसरी तरफ हुकूमत हाथ में झाडू थामे साफ सड़कों पर तस्वीरें खिंचाने में मशगूल रही और जहां सोच वहां शौचालय का नारा ही गूंजता रहा। जिन्हें बुरे वक्त में किसान के साथ आकर आंदोलन को ताकत देनी चाहिए थी वह बिखरे रहे और किसान को उसके हाल पर छोड़ दिया गया।
दरअसल बीते बीस साल के अंदर गांवों में परिवार टूट गए। दुनिया की चिंता छोड बस अपनी ही सोचने की टेंडेंसी आखिरी गांव तक चली गई। किसानों की नेतागिरी करने वाले सारे प्रेशर ग्रुप सत्ता के गलियारों में टुकडे तलाशने लगे। प्रापर्टी डीलिंग के धंधों में उतर गए। एकाएक इनके पास करोडों के एसेट आ गए।
प्रशासन सदमे से हो रही तमाम मौतों को स्वभाविक मौत करार देता आया है। आत्महत्या से मरने वालों को घरेलू कलह की वजह से मरना साबित करता रहा है। लेकिन क्या असलियत बस इतनी है। क्या कोई आत्महत्या या हत्या किसी भी सभ्य समाज पर कलंक नहीं है। अगर एक भी हत्या या आत्महत्या होती है तो क्या यह राजसत्ता की विफलता नहीं है।

मीडिया बर्बाद होते गांवों की सारी कहानी पर पर्दा डालते हुए किसान आत्महत्याओं को कभी कुदरत का कहर साबित करता है तो कभी इसका पूरा ठीकरा मरने वाले पर ही थोप देता है। आसमान से ओले और बारिश पडी तो किसान बर्बाद हो गया। मीडिया ने राजसत्ता में बैठे लोगों को इस पूरे संकट के लिए मानो क्लीन चिट दे दी हो। क्योंकि जो फैसला कुदरत का है उसमें कोई सरकार या नेता क्या करे। क्या वाकई यह कुदरत का कहर है या बीते दो दशक के अंदर गांव गरीब किसान मजदूर को लूटने वाले गिरोहों का इसके पीछे कोई हाथ है। इसकी पडताल करना जरूरी हो गया है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जो इलाका सम्पन्न माना जाता है आत्महत्यां वहां हो रही हैं। सवाल खडा हो गया है कि क्या यहां वाकई कोई संम्पन्नता आई भी है या नहीं।
बुलंदशहर जिले के सांवली गांव में फसल बर्बाद होने के सदमे में एक किसान की सदमे से मौत हो गई। मैं वहां गया तो एक मित्र ने कहा कि नोएडा से सटा बडा सम्पन्न इलाका है। एक’एक किसान को सौ’सौ करोड तक मुआवजा मिल गया है वहां के गांवों में। पर मैं सांवली गांव में गया तो ऐसा कुछ नहीं दिखा। सिकंदराबाद कस्बे से महज चार किलोमीटर दूर स्थित इस गांव को सरकारों ने मार डाला है। यहां से निकल हाईवे के एक बाईपास ने इस गांव को अपने खेतों से भी काट डाला है। गांव हाईवे के इस पार और आधे खेत उस पार। 150 की स्पीड से दौडते वाहनों के बीच से उस पार जाना मौत हर रोज मौत से खेलने जैसा है। यहां कोई अंडरपास या ओवरब्रिज नहीं।
गांव के अंदर प्रवेश करने वाली मुख्य सडक में जगह जगह गड़ढे हैं। हम अंदर गए तो आम गांवों की तरह ही यहां कौतूहल पैदा हो गया। गांव के प्रधान पुष्पेन्द्र सिंह के साथ हम किसान लेखराज के घर गए जिसकी फसल बर्बाद होने के सदमे में मौत हो गई है। लेखराज का घर व्हील डिटरजेंट पाउडर की विशालकाय फैक्टी से बस चंद कदम दूर है। थोडी दूरी पर ही एशियन पेंट एवं कई अन्य विशालकाय कंपनियों की फैक्टियां खडी हो गई हैं। लेखराज के घर में रुदन था। बाहर कुछ बुजुर्ग बैठे अफसोस जाहिर कर रहे थे। अंदर महिलाएं दहाडे मार मारकर रो रहीं थीं। लेखराज का करीब 15 साल का बेटा निखिल पानी लेकर आया। पर इस पानी की घूंट ऐसी थी माना डिटरजेंट पाउडर घुला हो। दरअसल मेरठ-सहारनपुर मंडल के जिलों के गांवों में कैंसर तेजी से बढ़ा है। यहां कई गांव ऐसे हैं जिनमें कैंसर से लगातार मौतें हो रही हैं। काली, हिंडन, कृष्णी, कृष्णा जैसी छोटी नदियों के किनारे वाले गांवों में कैंसर तेजी से बढ़ा है। इन नदियों के पानी में फैक्ट्रियों ने जहर घोलदिया है जिसकी वजह से भूगर्भ जल तेजी से प्रदूषित हुआ है। यानी जमीनें मल्टीनेशनल्स ने छीन लीं और फैक्ट्रियों ने पानी में जहर घोल दिया।

लेखराज के घेर में पास ही चारपाई के सिरहाने लगभग उखडू बैठे करीब 70 साल के बुजुर्ग किसान से मैंने नाम पूछा तो वह डर गया। बोला मेरा नाम न लिखना मैं कोर्ट कचहरी में नहीं जा सकता। मैने बताया कि बस ऐसे ही पूछ रहां हूं तो बजुर्ग ने अपना नाम कोफी बताया। आसपास बैठे दूसरे लोग कोफी नाम बताते ही बुजुर्ग की तरफ ऐसे देखने लगे मानो उसने बडा झूठ बोल दिया हो। यानी गांव में दहशत इस कदर है कि लोग अपना असली नाम बताने से भी डर रहे हैं। बताया गया कि लेखराज की मौत के बाद गांव के लोग इकटठा हो हाइवे पर चले गए थे तो एडीएम प्रशासन ने लेखराज के परिजनों से बंद कमरे में कुछ बात की जिसके बाद लेखराज का पंद्रह साल का बेटा और पत्नी टूट गए। उन्होंने गांव वालों से कह दिया कि कोई मुआवजा नहीं चाहिए। गांव में चर्चा है कि हाकिम ने लेखराज के परिजनों को कोई धमकी दी।
बात आगे बढी तो पता चला कि लेखराज तीन भाईयों में बीच के थे। नौ बीघा जमीन थी। सबसे बडे भाई की शादी नहीं हुई। छोटा भाई धर्मवीर बरसों पहले ही गांव छोड कर खजूरी चला गया। धर्मवीर वहां एक निजी स्कूल की बस चलाकर परिवार पाल रहा है। अपने हिस्से की तीन बीघा जमीन उसने लेखराज को ही लगान पर दे रखी थी। सबसे बडे भाई की पिछले दिनों मौत हो गई। लेखराज की पांच बेटियां हैं। जैसे तैसे उसने सबके हाथ पीले किए। बेटा महज पंद्रह साल का है जिसने छठी तक पढने के बाद स्कूल जाना बंद कर खेत के काम में हाथ बटाना शुरू कर दिया था। लेखराज के पास खेती के लिए ट्रेक्टर नहीं। घर में कोई बैल नहीं। खेती की कोई मशीन नहीं। भाडे पर वह खेती कर रहा था। लागत आसमान छू रही थी। अब फसल बर्बाद हुई तो वह कई दिन से गहरे सदमे में था। शरीर के अंदर क्या हो रहा है इसकी वह कोई जांच किसी डाक्टर से नहीं करा पाया क्योंकि घर में पैसे नहीं थे। एक दिन खेत से लौटा तो घर आने के बाद रात में सोया सुबह उठा नहीं।
लेखराज की जिंदगी खत्म हो गई पर वह बडे सवाल छोड गया। गांव वालों से हाईवे में जमीन के बदले मुआवजे पर बात की तो बताया कि जिन मुटठी भर लोगों को करोडों मुआवजा मिला वह तो गांव छोड बरसों पहले ही नोएडा, दिल्ली में जाकर बस गए। गांव में अभी भी करीब ढाई हजार लोग रहते हैं। आसपास लहलाते खेतों के बजाय उग आई हैं फैक्टियां जो दिन रात हवा और पानी में जहर भर रही हैं। प्रधान पुष्पेन्द्र बताते हैं कि रात में न जाने इन फैक्टियों से कैसी गैस निकलती है कि सांस लेना दूभर हो जाता है। गांव का पानी ऐसा हो गया है मानो डिटरजेंट घोल दिया हो। इसलिए पीने के लिए लगभग हर आदमी को बिसलेरी की बोतलें खरीदकर लाना मजबूरी हो गया है।
पास ही बैठे लेखराज के भाई धरमवीर कहते हैं कि गांव को न जाने किसकी नजर लग गई। जमीन छीन ली, पीने तक का पानी छीन लिया। हवा में जहर घोल दिया। अब न जाने और क्या होगा।
अब पता चला कि कि हवा, पानी और जमीन छिनने के बाद 70 साल का बुजर्ग अपना नाम बताते हुए क्यों डर रहा है। यह एक सांवली गांव की कहानी नहीं। यह अंतहीन सिलसिला है।
हर गांव में धरमवीर जैसे सैंकडों लोग हैं जो गांव छोडकर शहरों में की झुग्गी, कच्ची अवैध कालानियों में एक दो कमरों के दडबेनुमा घरों में जाने को मजबूर कर दिए गए हैं। धरमवीर कहते हैं गांव में अब बचा क्या है। नौ बीघा जमीन पर तीनों भाईयों का पंद्रह सदस्यों का पूरा परिवार रहता तो दो वक्त की रोटी के लाले पड जाते। मजबूरी में गांव छोड गए।
हर गांव में पंद्रह साल के निखिल जैसे किशोरों नौजवानों की लंबी चौडी फेहरिस्त है जिसके सपने ही छीन लिए गए हैं। गांव के नुक्कड पर ताश खेलते और गॉसिप करते जिनका पूरा दिन बीत जाता है। हर गांव में बडे पैमाने पर नौजवान शराब और भांग के नशे की गिरफत में जकडे जा रहे हैं। इनकी सुविधा के लिए अब यहां लगभग हर गांव में शराब की वैध’ अवैध दुकान खोल दी गई हैं। इनके मनोरंजन के लिए गांव में अब स्मार्टफोन भी हैं जिनमें पोर्न साइट भी हैं और सोशल साइट पर लडके लडकियों के रियल और फेक एकाउंट भी। इन पर चैटिंग का मौका भी है पोर्न तस्वीरें और वीडियो देखने का अवसर भी।
हर गांव में पुलिस और फौज की नौकरी के लिए सुबह शाम पगडंडियों पर दौड लगाते नौजवानों की फौज दिखती है। एक आम बात उभर रही है कि अब खेती में गुजारा नहीं। इसलिए दो बीघा जमीन बेचकर कही रिश्वत देकर सरकारी नौकरी मिल जाए तो जिंदगी चल सकती है। इसलिए चपरासी और क्लर्क की रिश्वत का रेट भी अब दस लाख के पार चला गया है। क्योंकि सरकारी नौकरी के मामले में अब बात एक अनार सौ बीमार वाली है।
इन सबके बीच कर्ज ने किसान की धमनियों को जकड लिया है। किसान क्रेडिट कार्ड पर दो प्रतिशत सस्ती दर के चक्कर में अब हर किसान फंस चुका है। लीड बैंकों की रिपोर्ट इस बात की गवाह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में अब 90 फीसदी से ज्यादा किसानों पर कर्ज है। सरकार ने कर्ज माफी की जो पॉलिसी बनाई उसमें बहुसंख्यक किसान इसके लाभ से ही वंचित हो गए हैं। अब यही कर्ज जिंदगी छीन रहा है। नहरें मर रही हैं। नदियों में पानी नहीं। भूजल स्तर सौ डेढ सौ फुट तक नीचे चला गया है। टयूबवैल लगाने मे डेढ से तीन लाख तक खर्च हो रहे हैं। बिजली कनेक्शन के लिए सालों दर दर की ठोकरें खानी पडती हैं। सब्जियो के बीज की कीमत दो से पांच हजार रुपये किलो तक पहुंच गई है। उर्वरकों की कालाबाजारी और अब सब्सिडी खत्म करने की तैयारी ने किसानों को तोडकर रख दिया है। डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। पानी, बीज और उर्वरक ऐसी चीजें हैं जिनके बिना खेती संभव नहीं। फसल बेचने के बाद सालों तक पैसा नहीं मिल रहा। गन्ने का पैसा पिछले साल का भी अब तक बाकी है। जोत का आकार इतना सिमट गया है कि अब वैसे भी बाजार के लिए पैदा करने के बजाय यहां अधिकांश किसान अपने उपभोग के लिए ही अनाज उगा रहे हैं। अब यहां शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां पशुओं के दूध की हर बूंद बाजार तक न पहुंच रही हो। अब खेती के लिए जरूरी इनपुट जुटाने के लिए कर्ज लेना मजबूरी है।

हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि अब किसान अपने बेटों को खेती और गांव से हर हाल में निकालना चाहता है। वह चाहे जो करें बस खेती न करें। नई पीढी के सामने भी कोई सपना नहीं। वह ऐसे दौर में पैदा हुई है जहां एक तरफ गांव गांव तक कुछ चमचमाती लग्जरी कारें और ए सी आ गए हैं। गांव से कस्बों और शहरों तक ठेकेदारी, गन्ने और मिलों की दलाली, प्रापर्टी डीलिंग, निजी शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों की दलाली और सूदखोरी के जरिए लूट का बडा कारोबार उपजा है। रातों रात नबर दो के धंधों से करोडों की संपत्तियां जुटाने वाले यह लोग ही गांव देहात के नौजवानों के सामने अब आदर्श बन रहे हैं।
दूसरी तरफ दंगों और रंजिशों ने वेस्ट यूपी के गांवों को तबाही के कगार पर ला दिया है। मुजफ्फरनगर दंगे ने यहां सामाजिक ताने-बाने को ही हिलाकर रख दिया। मेरठ में 1987 में भीषण दंगे हुए। गांवों में मामूली मसलों पर हत्याएं हो जाती हैं। मेरठ-सहारनपुर मंडल के ही 30 से ज्यादा गांव सीरियल खूनी रंजिश की गिरफ्त में हैं।

आज इन हालात के बीच वेस्ट यूपी में किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। अब नौजवानों के पास भी कोई रास्ता नहीं। गांव की गलियों में बेकार घूम रही नौजवानों की फौज को ही मुजफ़फरनगर दंगे में धकेल दिया गया। किसान, गांव गरीब और नौजवानों की इन समस्याओं का हल किसी सियासी दल के एजेंडे में नहीं है। जाति और धर्म सियासत के बडे मुद़दे हैं। खेती में बैलों का कोई इस्तेमाल नहीं। किसान अपने लिए दाल रोटी नहीं जुटा पा रहा। ऐसे में एक भी फालतू पशु को चारा तक खिलाना किसी के लिए संभव नहीं। वेस्ट यूपी के सारे शहरों में हजारों गोवंश सडकों पर आवारा घूम रहा हे। आए दिन इनकी वजह से दुर्घटनाएं हो रही हैं। इन बेजुबानों पर सियासत करने वालों के पास ऐसा कोई एजेंडा नहीं जिसके चलते इनकी कोई उपयोगिता हो सके।
जिंदा इंसानों का दुख दर्द, छिनती हवा, पानी और जमीन। बेकारी और पैसे के अभाव में, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में रोजाना मरते हजारों लोग यहां सियासत का मुद़दा नहीं है। सियासत का मुद़दा है पशुओं का कटान। सियासत का मुद़दा है लव जेहाद। सियासत का मुद़दा है धर्म। सियासत का मुद़दा है जाति। इन मुद़दों पर सियासत आसान भी है। एक जाति में दूसरी के प्रति नफरत, एक धर्म में दूसरे धर्म के प्रति नफरत फैलाकर असुरक्षा की भावना पैदा करना चुटकियां का काम है। एक बार समाज में असुरक्षा की भावना घर कर जाए तो यही सबसे बडा सवाल हो जाता है। किसानों,मजदूरों को अपने खिलाफ चल रही इन साजिशों को समझना होगा। समाज में ऐसे सभी लोग जो जरा भी इन साजिशों को पकडने की ताकत रखते हैं उन्हें लामबंद होना होगा। हर मोर्च पर एक जंग की तैयारी करनी होगा। नहीं तो आने वाली पीढियां हमें माफ नहीं करेंगी। हम धीरे’धीरे एक ऐसा बीमार समाज बना डालेंगे जो सपने खो चुका होगा। जहां मत्यु को ही सब दुखों का अंत समझा जाएगा और जीवन को कष्टों की वजह। तब हम समाधान के लिए लडने, एकजुट होने और संघर्ष कर नया और बेहतर समाज बनाने के बजाय सब दुखों के अंत की तरफ ही बढेंगे। तब हम ऐसे कामों के लिए भी भगवान को दोष देंगे जिनके लिए इसी लोक के तथाकथित रहनुमा जिम्मेदार हैं। क्या हमें मंजूर है ऐसा समाज।

आत्महत्या करने वाले 80 फीसदी किसान बैंकों के कर्जदार
एनसीआरबी की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज न चुकाने के चलते जिन किसानों ने खुदकुशी की उनमें 80 फीसदी ने बैंकों से कर्ज लिया था। यह आंकड़े 2015 के हैं। 2015 में देश में जिन 3000 किसानों ने आत्महत्या की उनमें से 2,474 ने बैंकों या किसी माइक्रो फाइनैन्स कंपनी से कर्ज लिया था। पहली बार एनसीआरबी ने डेटा का इस तरह से विभाजन किया है।
वेस्ट यूपी में 95 फीसदी किसान कर्जदार
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के सर्वे के अनुसार, 46 फीसदी किसान परिवार ऋण के बोझ से दबे हुए हैं और ये ऋण विभिन्न संस्थाओं और गैर संस्थानों से लिए गए हैं। वेस्ट यूपी में कर्ज की स्थिति और भयावह है। यहां किसान क्रेडिट कार्ड पर 95 फीसदी से ज्यादा किसान कर्ज दार हैं।

कर्ज़ माफी है हवा-हवाई समाधान
अब भी देश में सरकार के साढ़े आठ लाख करोड़ रुपए के कृषि कर्ज़ के बजटीय लक्ष्य के बावजूद आधे से ज्यादा किसान साहूकारों और आढ़तियों से कर्ज़ लेने को मजबूर हैं। ये किसानों के लिए घातक साबित होता है। किसानों के लिए काम करने वाली रिसर्च एंड रिलीफ सोसायटी के नवीन प्रधान कहते हैं कि किसानों के बढ़ते संकट का एक कारण किसानों को ज़्यादा कर्ज़ की वकालत के साथ कर्जमाफी की बात भी उठती है। वह कहते हैं कि यह दोनों ही कोई स्थायी उपाय नहीं हैं। अगर ऐसा होता तो 2008 की साठ हजार करोड़ रुपए से ज़्यादा की कर्ज़ माफ़ी के बाद किसान आत्महत्याएं बंद हो जातीं। इसका उपाय किसान की आय बढ़ाने में है न कि कर्ज देना और या कर्जमाफी करना।

2015 में ताबड़तोड़ किसान आत्महत्याएं
कर्ज के कारण किसानों की आत्महत्या के मामले 2015 में लगभग तीन गुणा बढ़ी थी। यह वह साल था जब गेंहू की फसल को ओलावृष्टि ने तबाह कर दिया था। 2014 में जहां 1,163 किसानों ने आत्महत्या की थी वहीं 2015 में 3,097 किसानों ने आत्महत्या की। इसके अलावा 2014 में जहां 969 किसानों ने आत्महत्या फसल के बर्बाद होने की वजह से की थी। सूदखोरों से कर्ज लेने में किसानों को आसानी होती और एक तरह से यह लोन बैंकों के मुकाबले आसानी से मिल जाते हैं। उल्लेखनीय है कि किसानों की आत्महत्या 2014 के मुकाबले 2015 में 41.7 फीसद तक बढ़ी है। 2014 में आंकड़ा 5,650 और जो 2015 में बढ़कर 8,007 तक पहुंच गया।
