बेलौस अंदाज, साफगोई और ईमानदारी बनी रही ताकत
मेरठ कमिश्नरी से दिल्ली में बोट क्लब तक चलाए ऐतिहासिक आंदोलन
चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्य तिथि पर विशेष
डॉ. रविंद्र प्रताप राणा
बाबा महेंद्र सिंह टिकैत। आठ साल के महेंद्र से चौधरी टिकैत, बाबा टिकैत और फिर महात्मा टिकैत बनने का सफर संघर्षों भरा रहा। एक ठेठ किसान जो अंतिम सांस तक खांटीपन, ईमानदारी और बेबाकी के लिए मशहूर रहा। परंपरागत सियासत के दांवपेच से दूर। अहिंसा के अस्त्र से हुकूमतों को हिलाने वाला किसानों का यह महानायक 15 मई 2011 को दुनिया को अलविदा कह गया पर उनके आंदोलन और उनकी बातें किसानों के जेहन में आज भी ताजा हैं।

साल 1935 में जन्मे और पिता की असामयिक मौत के बाद महज आठ साल की उम्र में बालियान खाप के मुखिया का जिम्मा संभालने वाले चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत यूं ही किसानों के दिलों पर राज नहीं करने लगे थे। बालियान खाप के चौधरी को आनुवांशिक तौर पर टिकैत की पदवी मिलती है। शुरू से ही बेबाकी, सादगी और ईमानदारी के साथ जीने वाले टिकैत ने 52 वर्ष की उम्र में मुजफ्फरनगर के शामली क्षेत्र के करमूखेडी बिजलीघर पर पहली बार किसी बडे किसान आंदोलन का नेतृत्व किया तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और साल 1988 में मेरठ के ऐतिहासिक धरने के बाद तो वह किसानों के सिरमौर बन गए। उन्होंने किसानों के लिए हमेशा सरकारों को झुकाया। उनकी एक आवाज पर स्थानीय प्रशासनिक तंत्र तो क्या सरकारें हिल जाती थीं।

बाबा महेन्द्र सिंह टिकैत ने साल 1986 में भारतीय किसान यूनियन बनाई। टिकैत हुंकार से हुकूमतें कांप उठती थीं। वह सीधे दिल्ली और लखनऊ की हॉटलाइन पर आ जाते थे। उनकी एक आवाज पर किसान पशुओं को साथ लेकर जेलें भरने में जुट जाते थे। मिलें घेर लेते थे। मेरठ, दिल्ली और लखनऊ कूच का ऐलान करते ही गांव-गांव से किसान निकलने लगते थे। टिकैत ने 52 वर्ष की उम्र में मुजफ्फरनगर के शामली क्षेत्र के करमूखेडी बिजलीघर से पहला किसान आंदोलन किया था। पूर्व पीएम डा. मनमोहन सिंह, इंद्र कुमार गुजराल, चंद्रशेखर, पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल से टिकैत की सीधी बातचीत होती रही। यूपी के मुख्यमंत्री रहे वीरबहादुर सिंह, मुलायम सिंह यादव भी सिसौली में हाजिरी लगाने पहुंचते थे। पूर्व मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्त, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह सीधे बाबा टिकैत के संपर्क में रहते थे। आंदोलनों के चलते उन्हें बाबा टिकैत और महात्मा टिकैत भी कहा गया।

भाषण न रणनीति पर ताकत अपार
टिकैत के आंदोलनों पर अपनी एक पुस्तक में एमएस राणा लिखते हैं कि महेन्द्र सिंह टिकैत के व्यवहार में कोई बडी विशेषता नहीं थी। उन्हें न भाषण देना आता था और न ही रणनीति बनाना। नेताओं जैसी शालीनता और चाल-ढाल भी टिकैत के भीतर नहीं था फिर लाखों किसानों का सैलाब कौरवी में बातचीत की शैली वाले उनके भाषण गंभीरता से सुनता था। वह अपने भाषण में महाभारत के प्रसंगों का जिक्र करते थे और बार-बार दोहराते थे कि परमात्मा है और सच्चाई की जीत होती है इसलिए किसानों की लड़ाई जरूर कामयाब होगी।
न दांव पेच न तोड़फोड़
टिकैत ने कभी दांव-पेच वाली लडाई नहीं लडी और न ही उन्होंने कभी हिंसा और तोडफोड में विश्वास किया। मेरठ के ऐतिहासिक और विशाल धरने में हर समय 50 हजार से ज्यादा किसानों की 110 दिन तक हर वक्त मौजूदगी रही। इस दौरान भीड़ में भी यह पहचानना मुश्किल होता था कि इन किसानों का नेता कौन है। मीडिया वाले भी टिकैत से मिलने जाते थे तो वह कहीं किसी ट्रेक्टर ट्राली के नीचे हुक्का गुडगुडाते हुए किसानों से बातचीत करते हुए दिखाई देते थे। वही सामान्य किसान चेहरा, धूल भरा धोती कुर्ता और सिर पर टोपी।

वक्त के साथ बदली भाकियू, पर बढ़ती गई चुनौती
बाबा टिकैत ने दिखाया कि कैसे पूंजी की मदद के बिना केवल जनशक्ति के बल पर आंदोलन चलाए जा सकते हैं। एक ठेढ अनपढ खांटी देहाती महेन्द्र सिंह टिकैत की एक आवाज पर एक लाख से ज्यादा किसान अपने घर-परिवार की फिक्र छोडकर हाड कंपा देने वाली सर्दी में भी धूल भरे सीडीए मैदान में खुले आकाश के तले आ जमे थे। टिकैत के पास कोई प्रचार तंत्र नहीं था। बस रणसिंघा गूंजता था और किसान हुक्का लिए निकल पड़ते थे। उन्होंने कभी न पोस्टर छपवाए और न लाडस्पीकरों से प्रचार कराया। आंदोलन के दौरान किसानों को डराने के लिए वेस्ट के गांवों में फ्लैग मार्च भी हुए पर किसान इससे एक होते गए। टिकैत के बाद भाकियू में लगातार टूट होती गई और 35 से ज्यादा किसान संगठन प्रदेश भर में बन गए।

जब प्रधानमंत्री को बदलना पड़ा टिकैत के आंदोलन की वजह से अपना रैली स्थल
31 अक्तूबर 1988 को वोट क्लब पर कांग्रेस की रैली प्रस्तावित थी जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाना था, लेकिन वोट क्लब पर किसानों ने कब्जा कर लिया। इसके बाद कांग्रेस का रैली स्थल बदला गया और किसान वोट क्लब पर ही जमे रहे।
साल 1988 में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत के पीछे लाखों किसानों का सैलाब था। मेरठ कमिश्नरी पर ऐतिहासिक पड़ाव के बाद टिकैत ने दिल्ली कूच का ऐलान किया। तब वेस्ट यूपी और हरियाणा के गांव-गांव से लाखों किसान दिल्ली की ओर चल पड़े। हर हाईवे और सड़क हरी-सफेद टोपियां लगाए किसानों से पट गईं। वोट क्लब तक पहुंचते-पहुंचते किसानों का यह रैला सुनामी में बदल गया। साल 1988 की महेंद्र सिंह टिकैत की रैली के बारे में दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त नीरज कुमार ने कहा था कि तब बोट क्लब पर किसानों की सुनामी सी आ गई थी। तब भाकियू के मेरठ जिलाध्यक्ष रहे नरेन्द्र सिंह राणा बताते हैं कि किसानों की भीड़ की वजह से पूरी दिल्ली ठप सी हो गई थी। तब इंडिया गेट, विजय चौक और बोट क्लब पर किसान ही किसान नजर आ रहे थे। जगह-जगह बसें, बैल गाड़ियां और ट्रेक्टरों की कतारें थीं। इस विशाल आंदोलन के बाद ही सरकार यहां विरोध प्रदर्शन पर रोक लगाने पर विचार करने लगी थी।

रघसिंघा, हुक्का और रागिनी
रणसिंघा एक वाद्य यंत्र है जो आमतौर पर पुराने जमाने में युद्धों में बजाया जाता था। टिकैत के जमाने से ही भाकियू रणसिंघा बजाकर आंदोलन का ऐलान करती रही है। हुक्का टिकैत के आंदोलनों की खासियत रहा है।
बलजोरी भी देती थीं टिकैत का साथ
बाबा टिकैत की पत्नी बलजोरी भाकियू की महिला विंग की पहली अध्यक्ष रहीं। टिकैत जब आंदोलनों के सिलसिले में बाहर होते या जेल में होते तो बलजोरी घर सम्हालतीं। एक बार लखनऊ में पुलिस लाठीचार्ज में बलजोरी घायल भी हो गई थीं।
किसानों को टिकैत ने दिखाई लड़ने की राह
सीधे तौर पर भले ही टिकैत के आंदोलनों से किसानों की जिंदगी में भले ही बड़ा बदलाव दिखाई न देता हो पर उन्होंने किसानों में हक के लिए लामबंद होने और लड़ने का जज्बा जरूर भरा। मेरठ कमिश्नरी पर उनका आंदोलन 1987 के भीषण दंगे के ठीक बाद शुरू हुआ था। इस किसान आंदोलन ने ही मेरठ की फिजा में घुले सांप्रदायिकता के जहर को कम करने में अहम भूमिका निभाई थी। हिन्दू-मुसलमान किसान एक साथ लाखों की तादाद में जुटे थे। धरना स्थल पर नमाज भी होती थी और टिकैत बार-बार आगाह करते थे हुकूमत से चौकस रहना। कभी भी दंगा कराकर आंदोलन को तोड़ सकती है। इस आंदोलन के दौरान भाकियू के मेरठ जिलाध्यक्ष रहे बागपत के भड़ल गांव निवासी चौधरी नरेंद्र सिंह राणा कहते हैं कि टिकैत के आंदोलनों के पहले किसान अपनी बात सरकारी तंत्र तक पहुंचाने के लिए विधायकों, सांसदों एवं अन्य नेताओं की तरफ देखते थे। टिकैत ने किसानों को अपनी बात रखना और हक के लिए लड़ना सिखाया।

बाबा टिकैत के प्रमुख आंदोलन
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1. करमूखेड़ा पावर हाउस घेराव: जनवरी 1987 में 11 सूत्रीय मांगों को लेकर करमूखेड़ा पावर हाउस का घेराव
2 मेरठ मार्च: फरवरी 1988 में किसानों की समस्याओं से जुड़ी 35 मांगों को लेकर ऐतिहासिक मेरठ मार्च
3. रजबपुरा सत्याग्रह: मार्च-जून 1988 में रेल रोको-रास्ता रोकों आंदोलन के दौरान किसानों पर की गई फायरिंग के विरोध में 110 दिन तक रजबपुरा में सत्याग्रह
4-वोट क्लब रैली: 31 अक्तूबर 1988 को टिकैत ने दिल्ली में वोट क्लब पर बड़ी किसान रैली की थी।
5. नईमा लाओ आंदोलन: अगस्त-सितंबर 1989 में मुस्लिम युवती नईमा की मौत को लेकर भोपा थाने का घेराव
6. लखनऊ महापंचायत: जुलाई 1990 में तत्कालीन जनता दल सरकार की नीतियों के खिलाफ लखनऊ में महापंचायत
7. द्वितीय लखनऊ महापंचायत: जनवरी 1992 में खाद मूल्य में इजाफे और बिजली की दरों में बढोत्तरी के खिलाफ प्रदर्शन
8. दिल्ली पंचायत: दो अक्टूबर 1991 खाद पर सब्सिड़ी की मांग को कर दिल्ली में पंचायत
9. लखनऊ पंचायत तृतीय: जून 1992 में एक माह लंबी पंचायत का आयोजन। इसमें सात सूत्रीय मांगों के साथ ही किसानों के 10 हजार रुपये तक सभी कर्ज माफी की मांग की गई
10. गाजियाबाद भू-मुआवजा आंदोलन: जून-अगस्त 1992 में भूमि मुआवजे का आंदोलन उन किसानों के लिए था जिनकी जमीने सरकार ने 1962 में अधिग्रहित कर ली थी। इसमें किसानों के आश्रितों को नौकरी के साथ लंबित मुआवजे का जल्द से जल्द भुगतान की मांग प्रमुख थी।
11. चिन्हट कठुआ पंचायत: जून 1993 का यह आंदोलन चिन्हट के किसानों की अधिग्रहित भूमि के मुआवजे को लेकर रहा।
12. सत्याग्रह: सितंबर-अक्टूबर 1993 में सात सूत्रीय मांग, रामकोला के किसानों के गन्ना मूल्य के बकाया भुगतान और किसानों के 10 हजार रुपये तक लोन की माफी के लिए यह आंदोलन किया गया।
13. बीज सत्याग्रह: वर्ष 1993 में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कृषि क्षेत्र में प्रवेश पर रोक लगाने के लिए बीज सत्याग्रह
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