बूढ़पुर में मौत की फसल: रमाला मिल के ज़हर में डूबता बागपत का एक गांव

वेस्ट यूपी

Ground Report: Dr.Ravindra Rana / Rajesh Sharma
स्थान: बूढ़पुर, बागपत (उत्तर प्रदेश)
! Note…इस रिपोर्ट के अंत में विडियो रिपोर्ट देखें….

गांव चीख रहा है – हम मर रहे हैं!लेकिन सिस्टम बहस कर रहा है – मौतें 15 दिन में नहीं, 3 महीने में हुई हैं‘”

ये कोई फिल्मी डॉयलाग या नेता का भाषण नहीं नहीं , उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बूढ़पुर गांव की हकीकत है। यह गांव पिछले कुछ महीनों से ऐसी मौतें देख रहा है जो न तो पूरी तरह से समझ में आती हैं, और न ही प्रशासन को झकझोर पाती हैं। 12 मौतें हुई हैं — कुछ खेत में, कुछ घर में, कुछ नींद में और कुछ चलती साँसों के बीच। मगर इन मौतों को रोकने के बजाय सिस्टम आंकड़ों की बाजीगरी में उलझ गया है।

राजनीतिक चुप्पी: नेताओं के दौरे नदारद

आइए पहले बात करते हैं सियासत की। बागपत वो जिला है जिसने देश को भारत रत्न दिया। जिसने भारत को प्रधानमंत्री दिया। इसमें बूढपुर गांव की भी अपनी एक बड़ी भूमिका रही। पर अफसोस अब इस गांव की तरफ कोई बड़ा नेता जाना नहीं चाहता।

बागपत का बूढपुर गांव पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का प्रिय गांव था। ये छपरौली विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है जो आज तक किसी दूसरे के लिए अजेय है। चौधरी चरण सिंह 1955 में गांव में आए तो लोगों ने हाथी पर बैठाकर बैंडबाजे के साथ उनका स्वागत जुलूस निकाला था। उनके नाम की यहां के लोगों में गजब की दीवानगी है।

जब भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जब 1955 में बूढपुर गांव में आए तो गांव वालों ने उन्हें हाथी पर बैठाया, बैंडबाजे लेकर उनके सम्मान में नारे लगाते हुए जूलूस निकाला।

बागपत के सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान, केंद्रीय मंत्री चौधरी जयंत सिंह, राज्य मंत्री केपी मलिक, छपरौली विधायक डॉ अजय कुमार, यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, और स्वास्थ्य विभाग — इनमें से किसी ने गांव का दौरा नहीं किया। और तो और सीएमओ ने भी खुद यहां जाना जरूरी नहीं समझा।

क्यों?

क्या इसलिए कि रमाला मिल किसी राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में आती है? या इसलिए कि ग्रामीणों की चीखें चुनावी रैलियों की शोर में दबा दी गई हैं?

पहला सच: ये मौतें अचानक नहीं आईं, ये पनपीं — ज़हर से

बूढ़पुर गांव की ज़मीन पर जो गन्ना लहलहाता है, वही अब वहां की सबसे बड़ी त्रासदी बन गया है। गांव से कुछ ही दूरी पर स्थित रमाला चीनी मिल से निकलने वाला अपशिष्ट जल (effluent) एक काले ज़हरीले नाले के रूप में गांव के आसपास बहता है।

मौत का नाला जिसमें रमाला चीनी मिल का जहर बहता नहीं है बल्कि बूढपुर गांव की जमीन में रिसता है। हवा में घुलता है।

गांव वालों का दावा है कि ये नाला सीधे उनके खेतों तक आता है और ज़मीन के नीचे जाकर हैंडपंप और नलकूपों के पानी को प्रदूषित कर रहा है। यही पानी वे पीते हैं, खेतों को सींचते हैं और दैनिक उपयोग में लाते हैं। इस पानी की बदबू इतनी तेज है कि नजदीक जाकर सांस लेना मुश्किल हो जाता है।

यह गांव भारत के हर उस गांव का चेहरा है, जहाँ ज़हर बह रहा है, लेकिन जवाबदेही नहीं।

बूढ़पुर में ज़हर बहा, 12 लाशें उठीं — क्या रमाला मिल के लिए मरा ये गांव?”

बागपत का बूढ़पुर गांव अचानक देश के नक्शे पर नहीं आया —
यहां 12 लोग एक-एक कर यूं मरे जैसे किसी अदृश्य यंत्रणा से।
कोई खेत में गिर पड़ा, कोई नींद में सोते हुए चला गया।
लेकिन गांववाले कहते हैं — ये मौतें अचानक नहीं थीं।
ये मौतें “रमाला मिल” के बहाए ज़हर से थीं।

बागपत के बूढपुर गांव का तालाब जो रमाला मिल के जहर वाले नाले के पास ही है। इस तालाब में भी काला पानी है।

सुबह का सूरज निकला था, लोग खेतों की ओर निकलने लगे थे। गांव की गलियों में रोज़ की तरह चहल-पहल थी। लेकिन उसी सुबह खेत में काम करते हुए चरण सिंह बिल्लू अचानक सीने पर हाथ रखकर गिर पड़े। परिवार वाले दौड़े, मगर उनके चेहरे पर पसरा सन्नाटा बता रहा था – अब कुछ नहीं बचा।

गांव वालों ने इसे एक इत्तफाक माना, पर यहीं से शुरू हुआ मौत का वो सिलसिला जिसने अगले 15 दिनों में 12 घरों के चूल्हे बुझा दिए

जब हम 13 जून को बूढपुर गांव में पहुंचे तो लोग इस तरह दुख दर्द बांटने के लिए जमा थे। इस घर के मुखिया की भी महज 54 की आयु में मौत हो गई।

नरेंद्र सुबह चाय पीकर खड़े ही हुए थे, अचानक ज़मीन पर गिर पड़े। गांव का माहौल अभी पिछले ग़म से उबरा नहीं था कि ये दूसरी मौत फिर से हिला गई। लोग अब डरने लगे थे – “ये क्या हो रहा है?”

रामकुमार सुबह टहलने निकले थे। गांव के बाहर सड़क किनारे बेसुध पड़े मिले। अस्पताल तक ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने सिर हिलाकर कह दिया – “अब कुछ नहीं किया जा सकता।”

ओमवीर सोए हुए थे। सुबह काफी देर तक नहीं उठे तो परिवार ने दरवाज़ा खोला। बिस्तर पर उनका शांत शरीर पड़ा था, जैसे नींद से नहीं, ज़िंदगी से विदा ले चुके हों।

अब मौत की गिनती गांव के लोगों ने शुरू कर दी थी, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के आंकड़ों में अभी तक यह ‘गंभीर’ नहीं था।

शिवकुमार खेत से लौटे ही थे कि चक्कर खाकर गिर पड़े। परिवार ने एंबुलेंस बुलाई, लेकिन रास्ते में ही उनकी सांसें खत्म हो गईं।

राकेश, राजबीर, बीरपाल, रिंकू, विनोद, वीरेंद्र, और रामप्रसाद—हर एक की मौत अचानक हुई। कोई खेत में, कोई गली में, कोई बिस्तर पर, कोई चाय की प्याली छोड़कर…

गांव की हवा में अब केवल मातम है। हर गली में एक घर ऐसा है जहां किसी की चारपाई अब हमेशा के लिए खाली हो गई है।

लोग अब कह रहे हैं – “ये हार्ट अटैक नहीं, ये ज़हर है।”
ये वो ज़हर है जो शायद रमाला मिल के नाले से बहकर घरों तक पहुंचा है।
वो बदबूदार पानी जो खेतों को सींचता है, वो हवा जिसमें सांस लेना भारी हो गया है – क्या वही इन मौतों की असली वजह है?

अस्सी साल के इस बुजुर्ग की आंखों में मोतियाबिंद है। दिल में छल्ला पड़ा है। गांव का दर्द बयां करते हुए ये रो पड़े।

गांव के बुज़ुर्ग कांपती आवाज़ में कहते हैं – “ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। ये अचानक नहीं है, कुछ तो गड़बड़ है।”

लेकिन प्रशासन अब भी खामोश है।
डॉक्टर नहीं आए,
पानी की जांच नहीं हुई,
कोई अधिकारी गांव तक नहीं पहुंचा।

एक नहीं, दो नहीं, पूरे बारह लोग चले गए,
लेकिन शासन को अब तक यक़ीन नहीं कि यहां कुछ गड़बड़ है।

अब सवाल सिर्फ मौतों का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो तब तक जागती नहीं जब तक अगला जनाजा न उठ जाए।

क्या मौत का आंकड़ा 20 होगा तब आएगा प्रशासन?
क्या तब विशेषज्ञ भेजे जाएंगे जब पूरा गांव उजड़ जाएगा?

बूढ़पुर अब आंसुओं से जवाब नहीं चाहता। वह पूछ रहा है—कब तक हम मरते रहेंगे और आप चुप रहेंगे?

यह गांव इंसाफ मांग रहा है,
और वो भीख नहीं चाहता –
जवाब चाहता है।

बूढपुर गांव के पास बहता है एक बदबूदार नाला —जिसकी शुरुआत रमाला मिल के वेस्ट वॉटर आउटलेट से होती है। यही नाला खेतों तक पहुंचता है, नलकूपों में घुलता है, और…
धीरे-धीरे गांव की सांसें छीनता है। मौतों के बाद प्रशासन नहीं जागा —जागा तब, जब कैमरे आए।CMO बोले — “15 दिन में नहीं, 3 महीने में मरे हैं।” यानी अब मौत की गिनती बचाव बन गई।

गांव में कैंप लगाने की औपचारिकता पूरी की गई। बीएएमएस डॉक्टर को यहां भेजा गया। न खून की जांच की सुविधा, न एक्सरे, न कोई अन्य जांच। न विशेषज्ञ डॉक्टर।

न दिल का डॉक्टर, न हड्डियों का…
BAMS डॉक्टर भेजा गया, सिर्फ इसलिए कि मीडिया के सवालों का जवाब दिखाया जा सके।

रमाला मिल से जुड़े रसूखदार कौन हैं?
क्‍या गांव की मौतों पर मंत्री केपी मलिक , सांसद डॉ. राजकुमार सांगवान, या केंद्रीय नेतृत्‍व से किसी ने कोई कार्रवाई की?
या यह गांव ‘गन्ने की राजनीति’ में केवल शिफ्ट प्रायोरिटी के लायक रह गया?

 “हमें डॉक्टर नहीं चाहिए था, हमें मौत का कारण बंद चाहिए था।”
“मरने वालों को सम्मान नहीं, गन्ने की प्राथमिकता मिली है।”

बूढ़पुर अब आंकड़े नहीं चाहता,
उसे जवाब, ज़िम्मेदार और कार्रवाई चाहिए।

क्या कोई जांच होगी?
क्या रमाला मिल पर केस दर्ज होगा?
क्या कोई मंत्री गांव आएगा या एक और मौत की प्रतीक्षा होगी?

बागपत के बूढपुर गांव में इस तरह से कैंपर में पानी सप्लाई हो रहा है। गांव का पानी पीने लायक नहीं बचा।

बूढ़पुर गांव: एक गांव की चीख जो एनजीटी तक नहीं पहुंची, क्योंकि गांववालों को उम्मीद थी नेताओं से

बूढ़पुर गांव (जनपद बागपत) में जहर धीरे-धीरे नहीं, तेजी से फैल रहा है। हर गली, हर घर में बीमारी है। कोई चल नहीं सकता, कोई सांस नहीं ले सकता। कोई खेत में गिर गया, कोई बैंक से लौटते हुए।

लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह है – गांव ने अभी तक राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT), प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या किसी कोर्ट में औपचारिक शिकायत नहीं की।

क्यों?

क्योंकि गांव वालों का जवाब साफ है –

हम गरीब आदमी हैं, किसान हैं। हम अपने खेत देखें या कागजों में दौड़ें? हम इलाज कराएं या एनजीटी जाएं?”

सबको बताया – पर मिला सिर्फ “हां कराएंगे…”

बागपत के बूढपुर गांव का दर्द सुना और देखा नहीं जाता। हम गांव की गलियों में गए तो लोग इस तरह अपना दुख बताए निकल पड़े।

गांववालों का कहना है:

 “हमने अफसरों और नेताओं को सब बता दिया है। जो ज़िम्मेदार हैं, उन्हें बता दिया। अब हम और क्या करें? हर बार लॉलीपॉप मिलती है – हां हां हो जाएगा।”

 NGT में क्यों नहीं गए?

गांव के चौधरी सुधीर, जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं, साफ कहते हैं:

“हमें अपने बच्चे पालने हैं, खेत देखने हैं, मवेशियों को संभालना है। हम दिल्ली-दफ़्तर जाकर वकील पकड़ें, ये हमारे बस की बात नहीं। सरकार को सब पता है, फिर भी अनदेखी कर रही है – इससे बड़ा अपराध क्या होगा?”

गांव की बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि:

  • हाथ-पैर काम नहीं कर रहे
  • गठिया, बीपी, सूजन सब बढ़ गया है
  • “पानी पीके जी नहीं पा रहे, लेकिन सरकार पूछती नहीं”

गांववालों का आरोप:

“ऐसे विकास की क्या जरूरत जो ज़िंदगी तबाह कर दे?”

 मवेशियों को भी हार्ट अटैक!

गांव की एक गाय की मौत की कहानी सुनिए:

“गर्मी का जहरीला पानी पीकर हमारी गाय की मौत हो गई। दूध बेचकर ही घर चलता था। अब कहां से चलाएं?”

नाले के जहर का असर पशुओं पर भी हो रहा है। पशु भी असमय मौत का शिकार हो रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया एक गाय भी हाल में मर गई।

गांव की हालत इतनी खराब कि अब डर सता रहा है

  • “सुबह उठते ही सबसे पहले पूछते हैं – सब ठीक तो है?”
  • “खाने की थाली लेकर खेत गया आदमी वहीं गिर गया”
  • “बैंक गया पैसा निकालने, वहीं गिर पड़ा – हार्ट अटैक से मौत”

 60 की उम्र में लाचार जिंदगी

गांव की कई महिलाएं कहती हैं –

“हम कहीं जा नहीं सकते। चलने-फिरने की ताकत नहीं बची। हाथ-पैर सूज गए हैं। डॉक्टर ने कहा – पानी की वजह से है।”

गांव की इन बुजुर्ग महिला चल फिर नहीं पातीं। बताया, इस वजह से बीते कई साल से मेरठ जिले में अपने मायके नंगला कस्तला भी नहीं जा पाईं।

एक बुजुर्ग किसान की कहानी:

  • पिछले 6 साल पहले दिल में शरीर में छल्ला डला है। ₹52,000 इलाज में खर्च हुआ – बीपीएल कार्ड और कर्ज दोनों का सहारा लेना पड़ा। अब भी चलने में दिक्कत है।

महज 25 साल की उम्र में अनाथ

गांव के युवा आकाश बताते हैं:

“मेरे पापा रोज़ टहलने जाते थे। अचानक हार्ट अटैक से गिर गए। डॉक्टर तक लाए, लेकिन नहीं बच सके। 13वीं भी हो चुकी है।”

 प्रशासन की प्रतिक्रिया – “हमारे पास दिल का डॉक्टर ही नहीं है”

बागपत के CMO साहब खुद कहते हैं:

“हमारे पास कार्डियक स्पेशलिस्ट नहीं है। ना हड्डी के डॉक्टर हैं। कैंप लगाने के लिए टीम मेरठ से मंगानी पड़ेगी।”

गांव के प्रधान सचिन तोमर, सामाजिक कार्यकर्ता डॉ सुधीर चौधरी, पूर्व मंत्री डॉ कुलदीप उज्जवल, मास्टर मनोज तोमर ने गांव में आई स्वास्थ्य विभाग की टीम से जानकारी ली और लोगों का दुख दर्द साझा किया।

बूढ़पुर गांव अब शिकायत नहीं, समाधान चाहता है।
यह गांव एनजीटी नहीं गया, अदालत नहीं गया – वो सीधे सरकार और प्रशासन के दरवाजे पर गया
अब सवाल सरकार से है:

“क्या सिर्फ लिखित शिकायत से ही आपको जनता की चीख सुनाई देगी? क्या एक गांव की सामूहिक बीमारी और मौतें भी कम पड़ेंगी चेतावनी देने के लिए?”

 अगला कदम क्या होना चाहिए?

  • जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की स्पेशल मेडिकल टीम गांव में तत्काल भेजी जाए
  • रमाला शुगर मिल के नाले का परीक्षण और ट्रीटमेंट प्लांट की जांच हो
  • NGT को अब स्वतः संज्ञान लेना चाहिए
  • पीड़ित परिवारों को मुआवजा और मेडिकल सहायता दी जाए


ज़हर उगलता नाला, बीमार होता गांव – न इंसाफ मिला, न इलाज

बागपत के बूढ़पुर गांव में ज़हर अब ज़मीन से नहीं, नल से निकलता है। सांस लेना तक मुहाल है। 45 साल के विनय तोमर के दोनों कूल्हे (hip) रिप्लेस हो चुके हैं। वे कहते हैं – “अब गांव नहीं बचेगा। आधा गांव लंगड़ा है, बाकी कैंसर या दिल के दौरे से मर रहा है। जमीन बेचनी पड़ेगी इलाज के लिए। सरकार ने कुछ न किया तो लोग गांव छोड़ देंगे।

भीषण गर्मी के बीच हमने ये ग्राउंड रिपोर्ट की। गांव की हवा में नाले की बदबू, पानी खतरनाक। भीषण गर्मी में हम पसीने से लथपथ हो गए। मास्क लगाकर बैठे अमित तोमर ने बताया कि उन्हें कैंसर हो गया था।

यह महज एक शिकायत नहीं, बल्कि एक गांव की सामूहिक चीख है।

 मौतों की बाढ़: चंद दिन, 12 की गई जान

पिछले पंद्रह दिनों में 12 लोगों की हार्ट अटैक से मौत हो गई। उम्र 40 से 55 के बीच। सतीश (उम्र 50), बैंक से लौटते हुए दुकान पर खड़े थे, अख़बार मांग रहे थे, अचानक गिर पड़े – मौके पर मौत। ऐसे ही हर गली में कोई न कोई किस्सा है।

नरेंद्र (53), रामकुमार (54): ओमवीर (55), शिवकुमार (56),राकेश (50), राजबीर (62), बीरपाल (55),रिंकू (52)विनोद (55),वीरेंद्र (55), रामप्रसाद (62) जैसे लोग असमय मौत के शिकंजे में फंस गए।

54 साल के विनोद असमय और अचानक चले गए। उनके घर के बाहर जमा लोगों ने ये दुख भरी कहानी बताई।

दूसरा सच: प्रशासन की संवेदनहीनता

गांव में जब लगातार मौतें होने लगीं, तब भी CMO (मुख्य चिकित्सा अधिकारी) कार्यालय से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। मीडिया में जब यह खबरें सामने आईं, तो स्वास्थ्य विभाग की ओर से सिर्फ एक BAMS डॉक्टर भेजा गया, वो भी सिर्फ इसलिए कि ‘सरकारी उपस्थिति’ कैमरे में दर्ज हो सके।

स्वास्थ्य विभाग जिसे टीम कह रहा है वो इसकी कार में बूढपुर पहुंची। इस टीम को एक बीएएमएस डॉक्टर लीड कर रहे थे।

CMO कार्यालय से साफ कहा गया कि — “हमारे पास न कार्डियोलॉजिस्ट (दिल का डॉक्टर) है, न ऑर्थोपेडिक (हड्डी रोग विशेषज्ञ)।”

लेकिन सवाल यह है कि जब मौतें इतनी रहस्यमय और लगातार हो रही हैं, तो सिर्फ ‘पद और पोस्टिंग’ की बात करके जिम्मेदारी से कैसे भागा जा सकता है?

तीसरा सच: सरकार का आंकड़ों में छिपा पलायन

हम बूढ़पुर गांव में गए। ग्राउंड पर रिपोर्टिंग की, गांव की आवाजें उठीं, तब तंत्र हरकत में आया — लेकिन समस्या सुलझाने के लिए नहीं, तारीख और आंकड़ों का हिसाब लगाने के लिए।

जैसे किसी की मृत्यु कब हुई, किस दिन, कितने दिन के अंतराल पर — यही मुख्य एजेंडा बन गया। मानो किसी के मरने का दर्द उतना नहीं, जितना यह साबित करने की जल्दी कि ये मौतें 15 दिन में नहीं, 3 महीने में हुई हैं।”

यह विश्लेषण इस बात से ध्यान हटाने की कोशिश थी कि — मरे तो 12 लोग, और उनका कारण कोई ‘कॉमन फैक्टर’ है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

चौथा सच: रमाला मिल पर चुप्पी क्यों?

जब गांववालों ने ज़हर का स्रोत बताया — रमाला मिल से निकलता प्रदूषित पानी — तब न कोई एफआईआर, न कोई नोटिस, न कोई जांच समिति।

बूढपुर गांव के शर्मा जी रिटायर्ड शिक्षक हैं। उनकी पत्नी कई साल से ऑक्सीजन सिलिंडर के सहारे हैं। फेफडे जवाब दे चुके हैं।

बल्कि मिल प्रबंधन ने गांववालों को चुप कराने के लिए “सुबह की शिफ्ट में गन्ना पहले लिया जाएगा” जैसी राहत की घोषणा कर दी।

यह राहत नहीं, तिरस्कार था।

गांववालों का कहना है — “हमारी मौतों का मुआवज़ा क्या ये है कि अब हमारा गन्ना जल्दी मिल में लगेगा?”

बूढ़पुर की मांगें क्या हैं?

  1. तुरंत और स्वतंत्र जांच कमेटी बनाई जाए जो रमाला मिल और गांव के पानी/मिट्टी की लैब रिपोर्ट सार्वजनिक करे।
  2. नाले के बहाव को तुरंत रोका जाए और रमाला मिल से ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था जांची जाए।
  3. मौतों के जिम्मेदारों पर केस दर्ज किया जाए, यदि ज़हर से संबंध साबित हो।
  4. गांव को मेडिकल राहत कैंप, पानी की वैकल्पिक व्यवस्था और स्वास्थ्य जांच की सुविधा दी जाए।
  5. राजनीतिक प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाया जाए।

अगली मौत अगर हुई…

तो उसका गुनहगार कोई बीमारी नहीं होगी — बल्कि वो सिस्टम होगा जो आंकड़ों की बहस में डूबा रहा, जब गांव मर रहा था।

बूढ़पुर अब रिपोर्ट नहीं चाहता, उसे जवाब चाहिए। उसे प्रशासन की लीपापोती नहीं, समाधान चाहिए। उसे गन्ने की शिफ्ट नहीं, जीवन की सुरक्षा चाहिए।

बीमारियां जो शहरों में होती हैं, गांव में महामारी बन चुकी हैं

  • कैंसर: गांव में हर गली में कोई कैंसर का मरीज़ है। अमित तोमर को गाल का कैंसर हुआ, ₹5.5 लाख इलाज में खर्च हो गए।
  • हड्डियों की बीमारी: 30–35 साल के युवाओं के घुटने रिप्लेस हो रहे हैं।
  • जन्मजात विकलांगता: नवजात बच्चे अपाहिज पैदा हो रहे हैं।
  • हाई बीपी और शुगर: यह बीमारी अब बच्चों तक पहुंच गई है।
  • सांस की बीमारी: ऑक्सीजन सिलेंडर घरों में रखा है।
बागपत के बूढ़पुर गांव की ये तस्वीर स्वच्छ भारत अभियान का महज एक नमूना नहीं है जमीनी हकीकत है।

ज़हर बन चुका है पानी

गांव से महज़ 700 मीटर की दूरी पर रमाला की शुगर मिल है। वहीं से एक नाला आता है – गांववालों के अनुसार यह नाला ज़हर उगलता है। यही नाला गांव की ज़मीन के नीचे रिसता है, भूजल को विषैला बना रहा है। हैंडपंप और नल से आने वाला पानी बदबूदार है और पीने लायक नहीं। लोगों का कहना है कि वही पानी पीकर उनकी संततियां तक बीमार पैदा हो रही हैं।

 इलाज नहीं, बर्बादी मिली

विनय तोमर कहते हैं, “मेरे ही घर में मेरी मां, पिता और मैं – तीनों के घुटने बदल चुके हैं। ₹15 लाख खर्च कर चुका हूं। 20 बीघा ज़मीन है, अब बेचनी पड़ेगी इलाज के लिए।”

जिन्हें कैंसर या अन्य गंभीर बीमारी है, वो दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारों में जगह पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। गांव में कोई इलाज की सुविधा नहीं है। बागपत के CMO ऑफिस से लेकर प्रशासन तक सबको शिकायतें दी जा चुकी हैं, मगर कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ।

राजनीतिक और प्रशासनिक उपेक्षा

छपरौली विधानसभा से यह गांव आता है – जहां से कभी चौधरी चरण सिंह चुनाव जीते थे। लेकिन आज, न कोई मंत्री आया, न कोई अफसर। गांव के लोग कहते हैं – वोट मांगने आते हैं, लेकिन जब गांव की सच्चाई जानने का वक्त आता है, कोई नहीं आता। बूढ़पुर गांव राजनीतिक रूप से अहम है, पर प्रशासनिक रूप से अनाथ।”

 सवाल जिनका जवाब सरकार को देना होगा

  1. रमाला चीनी मिल के नाले को पक्का करके भूमिगत क्यों नहीं किया गया?
  2. पूरे गांव में मेडिकल कैंप क्यों नहीं लगाए गए?
  3. पीने का साफ पानी क्यों नहीं उपलब्ध कराया गया?
  4. क्या बागपत प्रशासन को नहीं पता कि यह गांव एक हॉटस्पॉट बन चुका है?

 

दर्द बयां करते करते गांव के लोगों की आंखों में पानी आ जाता है।

अब भी समय है

बूढ़पुर एक केस स्टडी है, एक चेतावनी है – अगर ज़हर के नाले और दूषित पानी से गांवों को बचाया नहीं गया, तो एक पूरा हरा भरा इलाका उजड़ जाएगा। लोग अपनी ज़मीन, ज़िंदगी और उम्मीदें – तीनों गंवा रहे हैं।

अब सरकार को सोचना होगा – क्या बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी से पहले हर गांव को ज़िंदा रखने की ज़िम्मेदारी नहीं?

अंत में एक सवाल:
देश की राजधानी से 70 किलोमीटर दूर एक गांव मर रहा है – क्या आप तक उसकी चीख सुनाई दे रही है?

बागपत के बूढ़पुर गांव में प्राथमिक स्कूल के सामने कचरे के ढेर। यही है स्वच्छ भारत अभियान की जमीनी हकीकत।
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