बागपत के बूढ़पुर गांव की कहानी: ज़िंदगी में ज़हर, नाले में मौत, और टंकी में उम्मीद की लाश

वेस्ट यूपी

Dr. Ravindra Rana/ Rajesh Sharma

15 जून 2025। अंत में संबंधित वीडियो देखें

बूढ़पुर गाँव। बागपत ज़िला। उत्तर प्रदेश।
यह कहानी एक ऐसे गांव की है, जहां टंकी है पर पानी नहीं, अस्पताल है पर इलाज नहीं, खेल का मैदान है लेकिन बच्चों की हंसी नहीं। यहां सिस्टम ने वादे किए, बोर्ड लगाए, करोड़ों फूंके — और बदले में गांव को दी सिर्फ मायूसी।

“30 साल से टंकी है… पर पानी नहीं!”

सोचिए, कितना बड़ा मज़ाक हुआ है इस गांव के साथ। गांव के बीचोबीच 30 साल पहले बनी एक विशाल ओवरहेड टंकी खड़ी है। उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है – स्वच्छ पेयजल, स्वस्थ जीवन । । सुबह 8 से 9 और शाम 4 से 5 तक पानी सप्लाई का समय भी लिखा है, साथ ही अफसरों के नाम और मोबाइल नंबर भी। लेकिन हकीकत

एक भी बूंद पानी नहीं टपकी आज तक!
गांव के ही चौधरी सुधीर कुमार ने बताया कि यह टंकी बनी थी जब सुरेंद्र पाल प्रधान थे। मास्टर मनोज जोड़ते हैं, उसके बाद दो बार पाइप बिछे। पैसे लगे, फाइलें चलीं, फोटो छपी… पर पानी? वो अब भी सपनों में ही आता है।

यह गलती उस संस्था की नहीं है जिसने टंकी बनवाई थी, यह प्रशासन की गलती है जिसे सप्लाई सुनिश्चित करनी थी। सोचिए, 30 साल पहले टंकी बनी, जब NCR में लोग सपने में भी नहीं सोचते थे कि गांव में टंकी लगेगी। और अब, 30 साल बाद भी गांव में पानी नहीं!

टंकी पर घास उगी है, अस्पताल में उपले पड़े हैं

30 साल पहले बनी इस टंकी से गांव को पानी की सप्लाई आज भी नहीं हो पा रही है।

पशु चिकित्सालय बना, स्वास्थ्य विभाग का भवन बना। लेकिन बेशर्मी देखिए — पशु चिकित्सालय में जहां डॉक्टर को बैठना चाहिए, वहां उपले और गोबर के बिटोड़े रखे हुए हैं।

पशु अस्पताल की इमारत ऐसी है कि देखकर कोई भी कहेगा — ये अस्पताल है या गोदाम?”
डॉक्टर नहीं, दवाई नहीं, इलाज नहीं। चारों तरफ उपले, गोबर, बटोड़े। एक बुजुर्ग व्यंग्य में कहते हैं – यहां उपले पशुओं का उलाज करते हैं। “
स्वास्थ्य केंद्र की हालत और भी बदतर। सूचना बोर्ड तो लगा है, लेकिन वहां एक चिड़िया भी पर नहीं मारती।

मौत का नाला

गांव वाले दर्द भरी आवाज में कहते हैं गांव का पानी प्रदूषित हो चुका है। सामने बहता यह नाला पूरे गांव की बीमारी की जड़ है। इसमें जहर बह रहा है, जिससे हवा भी जहरीली हो गई है। लगातार लोगों की मौतें हो रही हैं। कैंसर, हार्ट अटैक जैसे मामले तेजी से बढ़े हैं।

लोग डर के साए में जी रहे हैं। रात में सोते हैं तो यह डर लगा रहता है कि सुबह किसकी मृत्यु की सूचना मिलेगी। श्मशान घाट लगातार जल रहे हैं। प्रशासनिक लापरवाही की हद हो गई है। यहां तक कि लोग चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि यह नाला जहर का पिटारा है, लेकिन इसकी सफाई तक नहीं हो रही।

चौधरी सुधीर कहते हैं र्मैं आपका धन्यवाद करता हूँ कि आपने हमारी इन गंभीर समस्याओं को समझा, संज्ञान लिया और गांव में आकर खुद देखा। आपके माध्यम से शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को यह पता लगना चाहिए कि यह गांव किस वेदना से गुजर रहा है।

जिन रिपोर्टों में इंडस्ट्रीज के प्रदूषण स्तर की बात होती है, उनमें पेपर मिल्स सबसे ऊपर और शुगर मिल्स तीसरे नंबर पर आती हैं। हमने खतौली की रिपोर्ट की — हालात खतरनाक थे। अभी हम रमाला मिल के पास के बूढ़पुर गांव में हैं — यहां हालात और भी खतरनाक हैं। हवा सांस लेने लायक नहीं रही, लोग ऑक्सीजन सिलिंडर लगाकर जी रहे हैं।

इस गांव के बगल से निकलता यह नाला पानी को प्रदूषित कर चुका है। लोग गांव छोड़ने को मजबूर हैं। कुछ ही दिन में 12 मौतें हो चुकी हैं — यह मामूली बात नहीं है।

12 मौतें हुई हैं
कैंसर, हार्ट अटैक, फेफड़ों की बीमारियां… जैसे ये गांव किसी महामारी की गिरफ्त में हो।

खेल का मैदान – घोटालों का घासगढ़

गांव का खेल मैदान एक और मिसाल है। चारदीवारी है, बोर्ड लगे हैं – लेकिन अंदर सिर्फ घास, झाड़ियां, सांप-बिच्छू और कुछ बंधे हुए पशु।
पांच साल पहले एक स्थानीय युवक ने खुद इसे साफ कराया था और कुश्ती कराई थी। अब? कोई झांकने तक नहीं आता।

गांव के पास प्रतिभा है, पर सरकारों ने उसे दुत्कार दिया

बूढ़पुर गांव के सुबोध कुमार तोमर 1999 में कारगिल युद्ध में शहीद हुए। कई लोग सेना, पुलिस, प्रशासन में ऊंचे पदों पर हैं। लेकिन उनका गांव आज भी सुविधाओं के लिए तरस रहा है।
क्या यह विडंबना नहीं कि जो देश की रक्षा कर रहे हैं, उनका अपना गांव बदहाली से जूझ रहा है?

नेता वोट लेते हैं, पर जवाबदेही नहीं निभाते

गांव वालों का सीधा आरोप है –
वोट लेते हैं, वादे करते हैं, फिर भूल जाते हैं।”
पटवारी फोन नहीं उठाता, सचिव आता नहीं। योजनाएं सिर्फ बोर्डों और फ़ाइलों में हैं। असल में तो गांव अपने ही हाल पर रो रहा है।

यह चेतावनी है, सिर्फ शिकायत नहीं

गांव वाले कहते हैं –
“अगर केजरीवाल यमुना की सफाई के मुद्दे पर राजनीति में अर्श तक जा सकते हैं,
तो बूढ़पुर का ये ‘मौत का नाला’ किसी को फर्श पर भी ला सकता है।”

“मौत का नाला सिर्फ बीमारियाँ नहीं लाता — ये राजनीति की दिशा भी बदल सकता है।”


यह गांव सिर्फ समस्याएं नहीं गिना रहा, यह सिस्टम को आईना दिखा रहा है। अगर अब भी सरकारें नहीं जागीं, तो यह गांव सिर्फ एक खबर नहीं, एक आंदोलन बन जाएगा।

बूढ़पुर सिर्फ एक गांव नहीं, भारत के ग्रामीण विकास की असल तस्वीर है।
टंकी है, पर पानी नहीं
अस्पताल है, पर इलाज नहीं
मैदान है, पर खेल नहीं
और सिस्टम है, पर संवेदनशीलता नहीं।

अब फैसला सरकारों को करना है –
विकास करना है, या सिर्फ दीवारों पर नारे लिखते रहना है?

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