Dr.Ravindra Rana/ Rajesh Sharma
14 June 2025 / बूढ़पुर बागपत
“जब हम रात को सोते हैं, पता नहीं होता सुबह उठेंगे या नहीं” — बूढ़पुर गांव का यह कथन केवल एक वाक्य नहीं, एक समूची त्रासदी की चीख है। बागपत जनपद के इस गांव में न तो पीने लायक पानी है, न सांस लेने लायक हवा।
बूढ़पुर गांव दिल्ली से महज 60-70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इतनी निकटता के बावजूद यह गांव देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक अधिकारों और विकास के दावों से उतना ही दूर है जितना कोई पिछड़ा इलाका।

1. जल और वायु, दोनों विषाक्त
गांव में मिल से बहकर आ रहा गंदा पानी, जो सीधे पीने के पानी में मिल रहा है, ग्रामीणों को कैंसर, हृदय रोग, और सांस की गंभीर बीमारियों की ओर धकेल रहा है। हर घर में कोई न कोई बीमार है। कहीं घुटनों का दर्द है, कहीं ऑक्सीजन सिलेंडर के भरोसे जिंदगी।
2. बूढ़पुर बना बीमारियों का अड्डा
यहां की स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि पिछले कुछ वर्षों में 200 से अधिक मौतें हृदयाघात, सांस की दिक्कतों और कैंसर के कारण हो चुकी हैं। किसी घर में पत्नी को हर घंटे ऑक्सीजन सिलेंडर की जरूरत है, तो किसी घर का बुजुर्ग बिना सहायता चलने में असमर्थ।
3. स्वास्थ्य सुविधाएं – नाम की भी नहीं
गांव में पानी की टंकी तो है, पर वह कभी काम नहीं करती। अस्पताल है, पर डॉक्टर नहीं। पशु चिकित्सालय है, पर दवाएं नहीं। साफ कहें तो तंत्र है, लेकिन वह मृतप्राय है।
4. ट्रेनें थीं, अब नहीं हैं
गांव के पास से दो ट्रेनें गुजरती थीं, जो कोरोना काल से पहले यहां रुकती थीं। वे अब नहीं रुकतीं। 11 गांवों के लोग जो उन ट्रेनों से दिल्ली, शामली, बड़ौत आते-जाते थे, अब उन्हें खेतों के रास्ते 1–1.5 किमी चलकर बस पकड़नी पड़ती है। इससे खासकर छात्राओं और महिलाओं को भारी परेशानी हो रही है।

5. आवागमन की दुर्गति
गांव को रामाला बस स्टैंड से जोड़ने वाला मार्ग इतना तंग है कि यदि बुग्गी आ जाए तो दूसरा वाहन रुके बिना नहीं निकल सकता। आपात स्थिति में यह रास्ता मृत्यु का कारण बन सकता है।
6. ऑक्सीजन सिलेंडर बन गया जीवन का हिस्सा
कालूराम शर्मा, जो एक सेवानिवृत्त अध्यापक हैं, बताते हैं कि पिछले 10 सालों से घर में ऑक्सीजन सिलेंडर रखना उनकी मजबूरी बन गई है। उनकी पत्नी की हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि बिना ऑक्सीजन के उनका जीना मुश्किल हो चुका है। हर महीने हजारों रुपये केवल इलाज और सिलेंडर पर खर्च हो जाते हैं।
7. पेड़ केवल कागज़ों पर लगाए जाते हैं
सरकारी योजनाओं के अंतर्गत वृक्षारोपण तो होता है, लेकिन उनका संरक्षण कोई नहीं करता। परिणामस्वरूप खाली पड़ी जमीनें बंजर ही रह जाती हैं।
8. दहशत का गांव
यहां रात को लोग सोते हुए डरते हैं कि वे सुबह ज़िंदा उठेंगे भी या नहीं। बीमारियों की संख्या इतनी अधिक है कि हर दूसरा व्यक्ति या तो इलाज करवा रहा है, या डॉक्टर के भरोसे जिंदा है।
9. सरकारी तंत्र की विफलता
यह गांव संविधान द्वारा दिए गए स्वस्थ जीवन के अधिकार का खुला उल्लंघन है। यहां के लोग न साफ पानी पी पा रहे हैं, न साफ हवा में सांस ले पा रहे हैं। और सबसे बड़ी बात—उनकी सुनवाई कहीं नहीं हो रही।
10. प्रश्न उठते हैं, समाधान नहीं
लोगों ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर सांसद तक शिकायत की, पत्र लिखे, मांगें रखीं, लेकिन मिला सिर्फ आश्वासन। जब राजधानी से महज कुछ किलोमीटर दूर गांव का ये हाल है, तो देश के दूरदराज गांवों की कल्पना ही डरावनी है।
बूढ़पुर एक गांव नहीं, एक आईना है — जो हमें दिखाता है कि हमारे सिस्टम की “विकास” की परिभाषा कितनी खोखली है। यहां लोग लोकतंत्र में जीते हुए भी दहशत में जी रहे हैं। यह लेख केवल एक गांव की आवाज़ नहीं है, बल्कि देश के हर उस कोने की पुकार है जो आज भी बुनियादी जरूरतों से वंचित है।

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