Dr. Ravindra Rana/ Rajesh Sharma
2 जुलाई 2025 को जब सीबीआई की टीम ने मेरठ के NCR मेडिकल कॉलेज और उसके प्रबंधन से जुड़े परिसरों पर छापा मारा, तो यह सिर्फ एक संस्थान की फाइलों की तलाशी नहीं थी — यह एक सोच, एक परंपरा, और एक पूरी विरासत के सच की पड़ताल भी थी।

ये कॉलेज उस महिला के नाम से जुड़ा है जो मेरठ की सामाजिक और राजनीतिक यात्रा की एक प्रमुख किरदार रही हैं — डॉ. सरोजिनी अग्रवाल। और यह परिवार उस नाम से जुड़ा है, जिसे कभी ‘सेठ दयानंद गुप्ता’ कहकर सिर्फ संबोधित नहीं किया जाता था, बल्कि एक पीढ़ी की नुमाइंदगी के तौर पर देखा जाता था।
सेठ का मतलब …
खरखौदा के पीपलीखेड़ा गांव से निकलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीटेक करने वाले सेठ दयानंद गुप्ता ने इंजीनियर की नौकरी छोड़कर कारोबारी जीवन में कदम रखा। मोदीनगर और मुरादनगर में पेपर मिल लगाई, और फिर मेरठ को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। लेकिन व्यापार उनके लिए केवल मुनाफ़े का ज़रिया नहीं था — वह सामाजिक चेतना का माध्यम था।
उन्होंने पुरुषोत्तम दास टंडन हिंदी संस्थान, सनातन धर्म रक्षिणी सभा, नंदराम राजाराम ट्रस्ट, आदर्श कन्या इंटर कॉलेज, मोदीनगर में सक्रिय भूमिका निभाई।

मेरठ कॉलेज, डीएन डिग्री कॉलेज, इस्माइल गर्ल्स इंटर कॉलेज में वह वर्षों तक अवैतनिक मंत्री रहे।
उनके काम को राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया।
सिर्फ शिक्षा नहीं, उन्होंने राजनीति में भी प्रभावी हस्तक्षेप किया — 1990 से 1999 तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस के कोषाध्यक्ष रहे, AICC के सदस्य बने।
सन 2000–2005 में वे जिला पंचायत मेरठ के अध्यक्ष रहे।
यह वही शख्स हैं जिन्होंने 1995 में अपने भाई डॉ. ओपी अग्रवाल की पत्नी डॉ. सरोजिनी अग्रवाल को जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जितवाया।
इसके बाद 2006–11 में वे रालोद में भी रहे और विधायक का चुनाव भी लड़ा।
डॉ. सरोजिनी अग्रवाल…
डॉ. सरोजिनी अग्रवाल ने लेडी हार्डिंग और जेएन मेडिकल कॉलेज, अलीगढ़ से मेडिकल शिक्षा प्राप्त की। 1975 में मेरठ कैंट के जनरल हॉस्पिटल में लेडी मेडिकल ऑफिसर बनीं और बाद में दयानंद नर्सिंग होम की स्थापना की। उन्होंने गाइनी लैप्रोस्कोपी में किताब भी लिखी और इस क्षेत्र में उत्तर भारत में अग्रणी बनीं।

लेकिन चिकित्सा से आगे उनका रुझान शिक्षा और समाज सेवा की ओर गया। मेरठ में CVPS, MIET और ग्रेटर नोएडा में NIET जैसे संस्थानों की नींव उन्हीं ने रखी।
राजनीति में वह 1995 में जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं, समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय सचिव रहीं और फिर 2015 में सपा से एमएलसी चुनी गईं।
2017 में सत्ता बदलने के साथ उन्होंने पार्टी बदली और भाजपा में शामिल हो गईं, जहां से वह दोबारा विधान परिषद सदस्य बनीं।
बदलते बोर्ड, बदलते रिश्ते — लेकिन सवाल वहीं हैं
जिस मेडिकल कॉलेज को पहले मुलायम सिंह यादव मेडिकल कॉलेज के नाम से जाना जाता था, वह सत्ता परिवर्तन के बाद NCR मेडिकल कॉलेज हो गया।
नाम बदल गया, पर प्रबंधन वही रहा।
कुछ इसे राजनीतिक चतुराई कहते हैं, कुछ अवसरवाद।
लेकिन जो सबसे बड़ा संकट है, वह है सार्वजनिक विश्वास का संकट।

सीबीआई की दस्तक और संस्थानों का मौन
2 जुलाई 2025 को सीबीआई ने कॉलेज में फर्जीवाड़े, रजिस्ट्रेशन की अनियमितताओं और दस्तावेज़ों के हेरफेर को लेकर छापा मारा।
कंप्यूटर, फाइलें, मोबाइल, रिकॉर्ड — सब कब्जे में लिए गए।
डॉ. सरोजिनी अग्रवाल का आवास और प्रबंधन कार्यालय भी जांच के दायरे में है।
उनकी बेटी डॉ. हिमानी अग्रवाल, जो इस समय उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग की सदस्य हैं, भी एक सार्वजनिक पद पर हैं। ऐसे में यह छाया सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, एक पूरे परिवार की सार्वजनिक छवि पर भी पड़ती है।
क्या सच में सत्ता सब साफ कर देती है?
क्या सत्ता का झंडा पकड़ लेने से कोई पवित्र हो जाता है?
क्या कॉलेज के बोर्ड से एक नाम हटाकर दूसरा चिपका देने से व्यवस्थाएँ बदल जाती हैं?
या फिर, ये सब सिर्फ ‘पैकेजिंग’ होती है — अंदर की चीज़ें जस की तस बनी रहती हैं?

यह सवाल मेरठ ही नहीं, पूरे प्रदेश के उन परिवारों को सोचने पर मजबूर करता है जो वर्षों से “सेठ”, “डॉक्टर”, “अध्यक्ष”, “माननीय” जैसे उपाधियों के साथ आगे बढ़े — और अब अचानक ‘संगठन’ के आगे असहाय खड़े हैं।
यह सिर्फ एक केस नहीं…
डॉ. सरोजिनी अग्रवाल की कहानी प्रेरणा है — लेकिन यह चेतावनी भी है कि
“सार्वजनिक जीवन में अर्जित सम्मान रजिस्ट्रेशन से नहीं, नीयत से चलता है।”
यह कहानी अब न्यायिक प्रक्रिया के हवाले है, पर यह समाज के लिए भी एक आत्ममंथन का अवसर है।
जो विरासत एक गांव से निकलकर अलीगढ़, मोदीनगर, मेरठ और लखनऊ तक पहुँची — वह अब सीबीआई की फाइलों के पन्नों में दर्ज हो रही है।
शब्द बदल सकते हैं, रंग बदल सकते हैं, पर सच के पास सिर्फ एक चेहरा होता है — क्या सत्ता में बदलाव के साथ संस्थाओं की पवित्रता अपने आप बदल जाती है? क्या झंडा थामने और नाम बदलने से वह मूल संरचना भी बदल जाती है जिसमें वर्षों से गड़बड़ी पल रही हो? ये प्रश्न सिर्फ एक व्यक्ति से नहीं, पूरी प्रणाली से जुड़े हैं।

डॉ. सरोजिनी अग्रवाल की कहानी प्रेरणा भी है और चेतावनी भी। प्रेरणा इसलिए कि उन्होंने डॉक्टर से शिक्षाविद और राजनेता तक का सफर खुद गढ़ा। और चेतावनी इसलिए कि सार्वजनिक जीवन में अर्जित भरोसा किसी एक दस्तक से डगमगा सकता है।
यह कहानी अभी चल रही है — इसका अंतिम वाक्य जांच एजेंसियाँ लिखेंगी। लेकिन यह इतना ज़रूर बता गई है कि सत्ता की छांव में खड़ा होना काफी नहीं होता, छांव की असलियत भी जांची जाती है। सत्ता से बड़ी चीज़ है — जवाबदेही। और उससे भी बड़ी है — भरोसा।
