बागपत की राजनीति में हलचल: योगेश धामा की अखिलेश यादव को बधाई से उठे बड़े सियासी सवाल

Politics वेस्ट यूपी

उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले की राजनीति में एक फेसबुक पोस्ट ने भारी सियासी हलचल पैदा कर दी है। भाजपा विधायक योगेश धामा ने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जन्मदिन की बधाई दी है—वो भी भगवान श्रीकृष्ण से दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए। साधारण दिखने वाली इस पोस्ट के पीछे गहरी राजनीतिक रणनीति की संभावनाएं देखी जा रही हैं।

बधाई के शब्द नहीं, सियासत की पटकथा:
योगेश धामा की बधाई सिर्फ औपचारिक शिष्टाचार नहीं मानी जा रही। उन्होंने लिखा:

“लोकसभा सांसद, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से आपके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु जीवन की कामना करता हूं।”
ध्यान देने वाली बात यह है कि भाजपा की विचारधारा का केंद्र भगवान श्रीराम रहे हैं, लेकिन धामा ने श्रीकृष्ण का उल्लेख किया—यह अखिलेश यादव की यादव पहचान और सपा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को स्वीकार करने जैसा है। इसे सपा के प्रति सधी हुई ‘नरम भाषा’ के रूप में भी देखा जा रहा है।

कौन हैं योगेश धामा?
योगेश धामा जाट समुदाय से आते हैं, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।

उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया और छात्र राजनीति में एबीवीपी के ज़रिए एंट्री ली।
शुरुआत रालोद (राष्ट्रीय लोकदल) से की, जहां वह और उनकी पत्नी दोनों ज़िला पंचायत अध्यक्ष रहे।
2016 में भाजपा में शामिल हुए और 2017 व 2022 में बागपत से विधायक चुने गए। 2024 के लोकसभा चुनाव में योगेश धामा ने बागपत सीट से भाजपा का टिकट जोरशोर से मांगा था।
उन्होंने डॉ. सत्यपाल सिंह की जगह खुद को जाट नेता और स्थानीय चेहरा बताते हुए प्रबल दावेदार के रूप में प्रस्तुत किया।
हालांकि अंततः पार्टी नेतृत्व ने टिकट रालोद प्रमुख जयंत चौधरी के लिए छोड़ दिया, जिससे धामा को न तो टिकट मिला और न ही खुलकर विरोध की गुंजाइश बची।
उनकी पत्नी रेणु धामा का भी पंचायत राजनीति में गहरा दखल है।
बागपत में वह न सिर्फ भाजपा का चेहरा हैं, बल्कि ज़मीनी राजनीति में काफी स्वतंत्र सोच वाले नेता भी माने जाते हैं।

पोस्ट का राजनीतिक अर्थ क्या है?

  1. भाजपा पर दबाव बनाने की कोशिश?

भाजपा और रालोद (जयंत चौधरी) के 2027 में भी संभावित गठबंधन की चर्चाओं के बीच योगेश धामा यह संदेश दे सकते हैं कि अगर बागपत सीट भविष्य में भाजपा के बजाय रालोद के खाते में जाती है, तो वह ‘सांकेतिक असहमति’ जता रहे हैं।
अखिलेश को बधाई देकर वे यह बता रहे हैं कि उनके पास ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ के विकल्प खुले हैं—सपा से सामंजस्य एक ऐसा ही विकल्प हो सकता है।

  1. क्या ज़िला पंचायत की राजनीति में बड़ा दांव?

धामा का बागपत ज़िले की पंचायत राजनीति में लम्बा अनुभव है। उनकी पत्नी भी इसमें सक्रिय रही हैं। यह भी संभव है कि धामा विधानसभा राजनीति के साथ ज़िला पंचायत अध्यक्ष पद या जिला सत्ता में भी दबदबा बनाए रखना चाहते हों। ऐसे में विपक्षी नेताओं से अच्छे रिश्ते रखना ज़रूरी है।

  1. 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति या भविष्य की ‘पार्टी शिफ्ट’?

अगर भाजपा और रालोद का गठबंधन बरकरार रहता और बागपत सीट रालोद के पास जाती है, तो धामा के लिए भाजपा में टिके रहना मुश्किल होगा। वह सपा के लिए ‘उपयुक्त उम्मीदवार’ बन सकते हैं। यह पोस्ट सपा के प्रति संवाद खोलने का संकेत भी हो सकता है।

क्या बागपत सीट भाजपा के हाथ से जा सकती है?
यह बहुत संभव है।
2024 लोकसभा चुनाव में बागपत सीट रालोद ने जीती है। यदि 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा—रालोद गठबंधन रहता है, तो रालोद बागपत विधानसभा सीट की मांग करेगा, जो उसकी पारंपरिक ज़मीन है।
ऐसे में भाजपा को यदि समझौता करना पड़ा, तो योगेश धामा को टिकट से वंचित होना पड़ सकता है।

बागपत में भविष्य की राजनीति
बागपत ज़िले की सियासत हमेशा जातीय संतुलन और पंचायत पकड़ पर आधारित रही है।
जाट वोट बैंक के बीच योगेश धामा मजबूत हैं, लेकिन अगर भाजपा ने रालोद को सीट दी, तो वे विरोध की राह या दल-बदल की दिशा चुन सकते हैं।
अखिलेश को दी गई बधाई भविष्य की उस राजनीतिक संभावना का संकेत हो सकती है, जिसमें धामा भाजपा के भीतर न रहकर अपनी राजनीतिक जगह कहीं और तलाशें—सपा में, या फिर पंचायत की सत्ता में।

योगेश धामा की एक फेसबुक पोस्ट ने बागपत की राजनीति में आगामी संघर्ष की पटकथा लिखनी शुरू कर दी है।
यह बधाई एक सरल शिष्टाचार नहीं, बल्कि भाजपा नेतृत्व के लिए चेतावनी है—कि यदि टिकट की राजनीति में उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया, तो वे चुप नहीं बैठेंगे।
सियासत में संकेत भी बयान होते हैं, और धामा का ये संकेत काफी मुखर है।

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