हमारी धरती, हमारा भविष्य — हमारी साझा ज़िम्मेदारी

Culture विकास

विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष

मेहर-ए-आलमख़ान

सलाहकार, सिनेइंक पॉडकास्ट्स, लंदन (यू.के.)

प्रधान संपादक, नर्सरी टुडे, नई दिल्ली

जलवायु परिवर्तन, घटते जंगल, ज़हरीली हवा और गहराता जल संकट अब भविष्य की दूर की आशंकाएँ नहीं रहीं। ये आज की कठोर सच्चाइयाँ हैं, जिनका असर भारत और पूरे दक्षिण एशिया में रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर साफ़ दिखाई दे रहा है। शहरों में सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है, गांवों में खेती अनिश्चित हो रही है, और परिवार अपने बच्चों के सुरक्षित भविष्य को लेकर पहले से ज़्यादा चिंतित हैं।

आज मानवता पृथ्वी के साथ अपने रिश्ते के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दशकों तक हमने धरती को संसाधनों का असीम भंडार मानकर उसका दोहन किया। विकास की अंधी दौड़ में यह मान लिया गया कि प्रकृति हर दबाव सह लेगी। अब वही धरती थकान, असंतुलन और चेतावनी के स्पष्ट संकेत दे रही है। बढ़ता तापमान, चरम मौसम की घटनाएँ, सूखते जलस्रोत, घटते जंगल और तेज़ी से लुप्त होती जैव-प्रजातियाँ एक ही सच्चाई की ओर इशारा करती हैं—मानव अस्तित्व और पृथ्वी का स्वास्थ्य एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। पर्यावरण संरक्षण अब किसी विचारधारा या आंदोलन का विषय नहीं रहा। यह जीवन, स्थिरता और सुरक्षा की बुनियादी शर्त बन चुका है।

इसी सच्चाई की याद दिलाता है हर साल 22 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व पृथ्वी दिवस। 1970 में शुरू हुआ यह दिवस आज दुनिया का सबसे बड़ा पर्यावरणीय जन-आंदोलन बन चुका है। इसका उद्देश्य केवल प्रतीकात्मक आयोजन करना नहीं है, बल्कि यह चेतावनी देना है कि यदि हमने अब भी अपनी दिशा नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए नुक़सान की भरपाई संभव नहीं होगी।

भारत के संदर्भ में यह संदेश और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। एक ओर देश तेज़ आर्थिक विकास की राह पर आगे बढ़ रहा है, दूसरी ओर पर्यावरणीय दबाव ख़तरनाक स्तर तक पहुँच चुका है। कई भारतीय शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिने जाते हैं। गर्मियों में हीटवेव अब अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य घटना बनती जा रही हैं। मानसून का मिज़ाज बिगड़ चुका है—कहीं लंबे सूखे पड़ रहे हैं, तो कहीं अचानक आई बाढ़ तबाही मचा रही है। हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं, जबकि तटीय इलाकों में समुद्र का स्तर धीरे-धीरे ज़मीन निगल रहा है।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर पर्यावरणीय संकट की क़ीमत सबसे भारी पड़ रही है। प्रदूषित हवा से जुड़ी बीमारियाँ हर साल लाखों लोगों की जान ले रही हैं। असुरक्षित पानी, रासायनिक प्रदूषण और गंदगी से ग्रामीण और शहरी—दोनों क्षेत्रों में बीमारी का बोझ बढ़ रहा है। यह अब केवल पर्यावरणविदों की चेतावनी नहीं रही, बल्कि डॉक्टरों, अस्पतालों और आम परिवारों की रोज़मर्रा की हक़ीक़त बन चुकी है।

जलवायु विज्ञान बताता है कि पृथ्वी पहले ही औद्योगिक युग से पहले की तुलना में लगभग 1.1 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है। यह आंकड़ा सुनने में छोटा लग सकता है, लेकिन इसके प्रभाव बेहद बड़े हैं। भारत में इसका अर्थ है—लंबी और जानलेवा गर्मी, अनियमित बारिश, फ़सलों पर बढ़ता जोखिम और जल संकट। यदि तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करता है, तो खाद्य सुरक्षा और जल उपलब्धता पर गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा, जिसका सबसे ज़्यादा असर ग़रीब और कमज़ोर वर्गों पर पड़ेगा।

इस संकट की जड़ें हमारे विकास मॉडल में छिपी हैं। दशकों तक आर्थिक वृद्धि जीवाश्म ईंधनों, बड़े पैमाने पर वनों की कटाई और संसाधनों के अंधाधुंध उपयोग पर आधारित रही। भारत भी इससे अलग नहीं रहा। ऊर्जा उत्पादन, परिवहन और उद्योग आज उत्सर्जन के बड़े स्रोत बन चुके हैं। अब यह स्पष्ट है कि पुराने रास्ते पर चलते रहना न तो सुरक्षित है और न ही टिकाऊ।

जलवायु परिवर्तन का असर सभी पर समान नहीं पड़ता। भारत जैसे देशों में इसका सबसे बड़ा बोझ किसानों, मज़दूरों और ग़रीब समुदायों पर पड़ता है। छोटे किसान पूरी तरह मानसून पर निर्भर होते हैं। बारिश थोड़ी भी गड़बड़ाई, तो फ़सल और आय दोनों ख़तरे में पड़ जाती हैं। तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग समुद्र के बढ़ते स्तर और खारे पानी की घुसपैठ से जूझ रहे हैं। पिछले कुछ दशकों में प्राकृतिक आपदाएँ न केवल बढ़ी हैं, बल्कि कहीं ज़्यादा विनाशकारी भी साबित हुई हैं।

जलवायु संकट के साथ-साथ जैव-विविधता का नुक़सान भी एक गंभीर और अक्सर अनदेखी की जाने वाली चुनौती है। भारत जैव-विविधता से समृद्ध देशों में शामिल है, लेकिन जंगल, आर्द्रभूमियाँ और वन्यजीव तेज़ी से सिमट रहे हैं। ये प्राकृतिक तंत्र केवल सुंदर दृश्य नहीं हैं। ये पानी को साफ़ करते हैं, फ़सलों का परागण करते हैं, तापमान संतुलित रखते हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़े हैं। इनके नष्ट होने से प्रकृति की ख़ुद को संभालने की क्षमता कमज़ोर पड़ती जाती है।

यहीं से पेड़ों और हरित आवरण का महत्व समझ में आता है। जंगल प्राकृतिक कार्बन भंडार हैं। एक परिपक्व पेड़ हर साल बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोख सकता है। वह आसपास के क्षेत्र को ठंडा करता है, मिट्टी में नमी बनाए रखता है और जैव-विविधता को सहारा देता है। जब जंगल कटते हैं, तो केवल पेड़ नहीं गिरते—एक पूरा प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र ढह जाता है।

शहरों में हरियाली अब जीवनरेखा बन चुकी है। भारतीय शहर तेज़ी से गर्म हो रहे हैं। कंक्रीट, ट्रैफ़िक और प्रदूषण ने “हीट आइलैंड” प्रभाव को बढ़ा दिया है। शोध बताते हैं कि शहरी हरित क्षेत्र तापमान को कई डिग्री तक घटा सकते हैं और हवा की गुणवत्ता में सुधार ला सकते हैं। शहरों में पेड़ सजावट नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा हैं।

जल संकट भारत के लिए आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। देश की बड़ी आबादी पहले से ही जल-तनाव वाले क्षेत्रों में रहती है। नदी घाटियों में वनों की कटाई से भूजल का पुनर्भरण घटता है और बाढ़ व सूखे—दोनों की तीव्रता बढ़ती है। यदि हमें पानी सुरक्षित करना है, तो हरियाली और जंगलों की रक्षा अनिवार्य होगी।

पर्यावरणीय संकट से निपटने के लिए ऊर्जा संक्रमण अनिवार्य है। भारत ने सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। स्वच्छ ऊर्जा न केवल उत्सर्जन घटाती है, बल्कि रोज़गार, ऊर्जा सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य भी देती है। लेकिन तकनीक के साथ-साथ व्यवहार में बदलाव भी ज़रूरी है।

हमें अपने उपभोग के तरीक़ों पर संजीदगी  से नज़र डालनी होगी। भोजन की बर्बादी, पानी का दुरुपयोग और संसाधनों की फ़िज़ूलख़र्ची पर्यावरण पर अनावश्यक दबाव डालती है। व्यक्तिगत स्तर पर उठाए गए छोटे क़दम, जब सामूहिक बनते हैं, तो बाज़ार, नीति और राजनीति—तीनों को प्रभावित करते हैं।

सरकारों और संस्थानों की भूमिका निर्णायक है। पर्यावरण कानूनों को केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्हें ज़मीन पर सख़्ती से लागू करना होगा। अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय सहयोग भी ज़रूरी है, क्योंकि जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण सीमाएँ नहीं मानते।

अंततः यह संकट केवल पर्यावरणीय या आर्थिक नहीं, बल्कि नैतिक भी है। आने वाली पीढ़ियाँ आज लिए गए फ़ैसलों के साथ जीने को मजबूर होंगी। विश्व पृथ्वी दिवस हमें याद दिलाता है कि प्रकृति की रक्षा कोई उपकार नहीं, बल्कि मानवता के प्रति हमारी साझा ज़िम्मेदारी है।

उम्मीद अब भी बाक़ी है। वृक्षारोपण, नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार और बढ़ती जन-जागरूकता दिखाती है कि बदलाव संभव है। प्रकृति में ख़ुद को संभालने की अद्भुत क्षमता है—बस हमें उसे मौक़ा देना होगा।

संदेश साफ़ है। हमारा ग्रह हमसे अलग नहीं है। वही हमारी सेहत, भोजन, पानी और अर्थव्यवस्था की नींव है। उसकी रक्षा कोई पर्यावरणीय विलास नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व में सबसे समझदारी भरा निवेश है। हमारी धरती ही हमारा भविष्य है—और उसकी रक्षा हमारे समय की सबसे बड़ी साझा ज़िम्मेदारी।

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