किरठल: एक गांव जहां इतिहास बोलता है

Culture
  • किरठल: इतिहास, संस्कृति और विरासत का अनमोल धरोहर किरठल
  • कीर्तिस्थल से किरठल तक: हाथियों की धरती का गौरवशाली सफर
  • किरठल की गौरवगाथा: संतों, योद्धाओं और विद्वानों की भूमि

उत्तर भारत की समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए किरठल गाँव, बागपत से 35 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। पूरब में रमाला, पश्चिम में लूम्ब, उत्तर में नाला और दक्षिण में सोंटी से घिरा यह गाँव, अपने पड़ोसी गाँव ककड़ीपुर, घसौली, हेवा, मुकुंदपुर और सूप के साथ एक ऐतिहासिक विरासत साझा करता है। किरठल की स्थानीय बोली कौरवी है, जिसे खड़ी बोली भी कहा जाता है, लेकिन यहाँ के शिक्षित लोग हिंदी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और हरियाणवी भी सहजता से समझते हैं।

आर्य महाविद्यालय किरठल में बच्चों को पढ़ाते आचार्य।

इतिहास और नामकरण की कहानी

प्राचीन काल में किरठल को ‘कीर्तिस्थल’ और ‘करिस्थल’ कहा जाता था, जिसका अर्थ है ‘हाथियों का स्थल’। समय के साथ इसका अपभ्रंश होकर वर्तमान नाम ‘किरठल’ बन गया। यह गाँव करीब 1100 वर्ष पूर्व बसा था और इसके बसने से जुड़ी कई दिलचस्प कहानियाँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान के ताऊ विग्रहराज ने साम्राज्य विस्तार के उद्देश्य से यहाँ एक चौकी स्थापित की और झोटड़ा तथा लाकड़ा गोत्र के दो अधिकारियों को यहाँ तैनात किया। समय के साथ वे यहाँ बस गए और उनके वंशजों के नाम पर अलग-अलग बस्तियाँ बस गईं।

कीर्ति नामक व्यक्ति द्वारा बसाई गई बस्ती ही ‘कीर्तिस्थल’ बनी, जो आगे चलकर किरठल कहलाने लगी। यहाँ की छह प्रमुख पट्टियाँ – अमराण, बीजलाण, आजलाण, मेघाण, सूंडा और बागडाण – कीर्ति के छह पुत्रों के नाम पर बसाई गईं। कालांतर में ढींगराण, मूलेजाट और मोहल्ला शीतराल भी अस्तित्व में आए।

विविधता में एकता का प्रतीक

किरठल गाँव विभिन्न जातियों और धर्मों का एक संगम है। यहाँ जाट, मूलेजाट, बनिया (जैन), ब्राह्मण, मुस्लिम और अन्य हिन्दू समुदाय आपसी भाईचारे के साथ रहते हैं। गाँव का खाप और गौत्र मुख्यालय रमाला में स्थित है, जहाँ सभी जातियों और धर्मों के मुखिया एकता और समानता के सिद्धांतों के तहत कार्य करते हैं।

गौरवशाली व्यक्तित्व और उपलब्धियाँ

किरठल के होनहार बेटों और बेटियों ने विभिन्न क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियाँ हासिल की हैं।

  • चौधरी नरेंद्र सिंह पाँच बार छपरौली के विधायक रहे।
  • पंडित जगदेव सिंह सिद्धान्ती हरियाणा के झज्जर निवासी थे और आर्य महाविद्यालय किरठल में प्रधानाचार्य रहे। वह 1962 में झज्जर से लोकसभा सदस्य भी बने।
  • बागपत से सांसद रहे रघुवीर शास्त्री भी आर्य महाविद्यालय किरठल में प्राचार्य रहे। हालांकि वे ककौर गांव के निवासी थे।
  • कामरेड महेंद्र जैन ने बागपत विधानसभा में और गजेंद्र कुमार मुन्ना ने छपरौली विधानसभा में विजय प्राप्त की।
  • सत्येंद्र कुमार जैन दिल्ली सरकार में तीन बार विधायक और मंत्री रहे।
  • भुल्लण सिंह दरोगा गाँव के पहले हाईस्कूल पास व्यक्ति थे।
  • डॉ. राजपाल सिंह, इंजीनियर सुखबीर सिंह, श्रीप्रकाश शर्मा, अपूर्व कुमार और तेजपाल सिंह जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने गाँव का नाम रोशन किया।
  • अपूर्व कुमार आईएएस अधिकारी बने।
  • चौधरी मामराज सिंह मुंसिफ मजिस्ट्रेट थे।
  • विनीत चौहान और उनके पिता बलबीर सिंह करुण ख्यातिप्राप्त कवि हैं।

गाँव ने बड़ी संख्या में आचार्य, डॉक्टर, उद्योगपति, शिक्षाविद, ब्यूरोक्रेट, सैनिक, पुलिस अधिकारी, इंजीनियर और वकील दिए हैं, जो पूरे देश में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रहे हैं।

शिक्षा और आध्यात्मिक केंद्र

किरठल का आर्य महाविद्यालय उत्तर भारत का एक प्रमुख आर्य तीर्थ बन चुका है। यहाँ संन्यासी स्वतंत्रतानंद महाराज, धर्मानंद महाराज, ओमानंद महाराज और सम्पूर्णानंद महाराज जैसे महान संतों की उपस्थिति शिक्षा और अध्यात्म का संगम बनाती थी। इसके अलावा, राजा महेंद्र प्रताप, चौधरी कुम्भाराम आर्य और चौधरी चरण सिंह जैसी विभूतियाँ भी इस महाविद्यालय के वार्षिक समारोहों की शोभा बढ़ा चुकी हैं।

धार्मिक धरोहर

किरठल का जैन मंदिर अपनी ऐतिहासिकता और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ छठे तीर्थंकर श्री पद्म प्रभु, 20वें तीर्थंकर श्री मुनि सुव्रत नाथ, 22वें तीर्थंकर श्री अरिष्टनेमी और 23वें तीर्थंकर श्री पारस नाथ जी की प्राचीन प्रतिमाएँ स्थापित हैं। इनमें से तीन प्रतिमाएँ 12वीं शताब्दी की और पारस नाथ जी की प्रतिमा 5वीं शताब्दी की मानी जाती है। यहाँ का पुजारी परिवार बुद्ध माली के वंशजों से आता है, जो मंदिर की पूजा-पद्धति को परंपरागत रूप से निभाते आ रहे हैं।

कबीर पंथ गुरुगद्दी मठ

कबीर पंथ की आध्यात्मिक विरासत भी किरठल में बसी हुई है। कहा जाता है कि संत कबीरदास के परम शिष्य कमाल साहब को उत्तर भारत में सतनाम प्रचार का आदेश मिला था। भ्रमण करते हुए वे किरठल आए, जहाँ उन्होंने एक ऊँचे टीले पर स्थित कीरत माली की झोंपड़ी को अपना निवास बनाया और वहीं अपना झंडा गाड़ दिया। यही स्थान कालांतर में ‘कीर्तिस्थल’ और फिर किरठल के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

आदर्श गांव

किरठल न केवल एक गाँव है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर का प्रतीक है। यहाँ की विविधता में एकता, शिक्षा, राजनीति, कला और धर्म सभी क्षेत्रों में इसकी अनूठी पहचान बनाते हैं। यह गाँव अपनी गौरवशाली परंपराओं को संजोए हुए निरंतर प्रगति की राह पर अग्रसर है।

“मेरे गाँव किरठल (जिला बागपत) का संक्षिप्त इतिहास डॉ. यशपाल सिंह जी द्वारा बहुत ही सुंदर रूप से प्रस्तुत किया गया है। वे पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय (उत्तराखंड) के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं और किरठल के निवासी भी हैं। उन्होंने गाँव किरठल पर एक सुंदर पुस्तक “कीर्तिवंत किरठल” लिखी है, जिसमें गाँव के गौरवशाली इतिहास को समेटा गया है।

इसके अलावा, “मैं किरठल बोल रहा हूँ” नामक एक लघु डॉक्यूमेंट्री का निर्माण वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रविंद्र राणा जी के अथक परिश्रम का परिणाम है। हमारे साहित्य में गाँवों के इतिहास और संस्कृति को संजोने के ऐसे प्रयास बहुत कम देखने को मिलते हैं।

किरठल के सभी निवासी डॉ. यशपाल सिंह जी और डॉ. रविंद्र राणा जी के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। उन्होंने मिलकर इस प्राचीन गाँव किरठल को अमर बनाने का महान कार्य किया है।

आपको “कीर्तिवंत किरठल” पुस्तक और “मैं किरठल बोल रहा हूँ” डॉक्यूमेंट्री अवश्य पढ़नी और देखनी चाहिए। यह निश्चित रूप से आपको बेहद पसंद आएगी।”
नरेंद्र सिंह एडवोकेट, पूर्व विधायक
निवासी – गाँव किरठल (बागपत)

किरठल गांव के बारे में अधिक जानने के लिए हमारी ये दो डॉक्यूमेंटरी देखना न भूलें। ये दो पार्ट में है।

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