कोटद्वार, उत्तराखंड – उत्तराखंड के कोटद्वार से लगभग 15 किलोमीटर दूर और हरिद्वार से 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित महर्षि कण्व की तपोस्थली का ऐतिहासिक महत्व भारत की आध्यात्मिक धरोहर में विशेष स्थान रखता है। यही वह स्थान है, जहां हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत और शकुंतला के मिलन से भरत का जन्म हुआ था। महाकवि कालिदास ने अपनी प्रसिद्ध रचना “अभिज्ञान शाकुन्तलम्” में इस स्थान का उल्लेख किया है।
1955 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू सोवियत रूस की यात्रा पर गए, तब रूस के प्रधानमंत्री ने उनसे इस ऐतिहासिक स्थान के बारे में जानकारी मांगी। इसके बाद पंडित नेहरू ने स्वदेश लौटकर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. सम्पूर्णानंद को निर्देश दिया कि इस गौरवशाली स्थल पर एक स्मारक का निर्माण किया जाए। 23 जून 1955 को इस स्मारक की आधारशिला रखी गई, लेकिन इसके बाद वर्षों तक किसी सरकार ने इस स्थल के संरक्षण की ओर ध्यान नहीं दिया।
इसी स्थान पर 2 जुलाई 1972 को योगाचार्य स्वामी विश्वपाल जयन्त ने गुरुकुल कण्वाश्रम की स्थापना की। उनका उद्देश्य वैदिक परंपराओं को पुनर्जीवित करना और योग-साधना का प्रचार-प्रसार करना था।

आधुनिक भीम विश्वपाल जयंत के साथ लेखक डॉ यशपाल सिंह
सोरम में जन्मे
स्वामी विश्वपाल जयन्त का जन्म 15 अगस्त 1947 को मुजफ्फरनगर के ऐतिहासिक गांव शौरों (सोरम) में हुआ। बाल्यकाल से ही वे शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यंत मजबूत थे। मात्र 16 वर्ष की उम्र में वे लोहे की जंजीर तोड़ने, छाती पर ट्रैक्टर चलवाने और सरिया मोड़ने जैसे अद्भुत करतब दिखाने लगे। 1968 में तत्कालीन राष्ट्रपति वी. वी. गिरी ने उन्हें “आधुनिक भीम” की उपाधि से विभूषित किया।
योग और ब्रह्मचर्य के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें एक साधक बना दिया। गुरुकुल महाविद्यालय ज्वालापुर, हरिद्वार से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने योग-साधना को अपने जीवन का ध्येय बना लिया। वे भारत के विभिन्न गुरुकुलों में रहे और आयुर्वेद, योग और भारतीय संस्कृति का गहन अध्ययन किया।
कण्वाश्रम में एक नई क्रांति
1972 में स्वामी विश्वपाल जयन्त अपने शिष्यों के साथ कण्वाश्रम पहुंचे। यह क्षेत्र उस समय घने जंगलों और हिंसक जंगली जानवरों से भरा हुआ था। उन्होंने कठिन संघर्ष कर यहां एक वैदिक गुरुकुल की स्थापना की, जहां आज भी योग, संस्कृत, आयुर्वेद, विज्ञान और आधुनिक शिक्षा का समावेश कर विद्यार्थियों को संस्कारित किया जाता है।
इस गुरुकुल में विद्यार्थियों को भारतीय संस्कृति और योग की शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, इतिहास और कंप्यूटर की भी शिक्षा दी जाती है। संस्था का उद्देश्य अथर्ववेद के मंत्र “उपहरे गिरीणां संगमे च नदीनाम्, धिया विप्रो अजायत” को साकार करना है।
योग और अध्यात्म की अनूठी यात्रा
स्वामी विश्वपाल जयन्त का जीवन संघर्षों से भरा रहा। एक समय नेपाल के काठमांडू में आयोजित एक योग कार्यक्रम में उनके खिलाफ साजिश रचकर उन्हें धीमा जहर दिया गया, जिससे उनका वजन 140 किग्रा से घटकर मात्र 70 किग्रा रह गया। लेकिन उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति और योग-साधना के बल पर वे पुनः स्वस्थ हुए।
एक और घटना में, वे छह महीने तक एकांतवास में चले गए, जिससे अफवाह फैल गई कि उन्हें शेर ने मार दिया। लेकिन कुछ समय बाद जब वे वापस लौटे, तो उन्होंने स्वयं को और अधिक शक्तिशाली और आत्मनिर्भर पाया।
योग-साधना का दिव्य प्रभाव
स्वामी जी ने योग और साधना के माध्यम से मानसिक और शारीरिक ऊर्जा को जागृत किया। उन्होंने कहा कि एक बार जब वे मालिनी नदी के किनारे अपने शिष्यों के साथ थे, तो उन्हें एक विशेष ऊर्जा का अनुभव हुआ। यह स्थान प्राकृतिक औषधीय पौधों और आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण था।
गुरुकुल कण्वाश्रम – शिक्षा और साधना का केंद्र
गुरुकुल कण्वाश्रम में आज भी सैकड़ों विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यहां आधुनिक विषयों के साथ-साथ योग, प्राणायाम और आत्मसंयम पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
स्वामी विश्वपाल जयन्त की तपस्या और सेवा के कारण यह स्थान आज आध्यात्मिक साधकों और योग प्रेमियों के लिए एक तीर्थस्थल बन चुका है। वे भारत की वैदिक संस्कृति और गुरुकुल परंपरा के पुनर्जागरण के प्रतीक हैं।
निष्कर्ष
स्वामी विश्वपाल जयन्त न केवल एक योगी हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति के संरक्षक भी हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि कठिनाइयों के बावजूद, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और संकल्प अडिग हो, तो किसी भी असंभव कार्य को संभव किया जा सकता है।
कण्वाश्रम, जहां कभी महर्षि कण्व की तपस्या गूंजती थी, आज पुनः वैदिक परंपरा के नवजागरण का केंद्र बन चुका है। यह स्थान न केवल इतिहास का प्रतीक है, बल्कि आध्यात्मिक साधकों और योग प्रेमियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी है।
