Published By Dr.Ravindra Rana
स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक वीरों ने अपने संघर्ष और बलिदान से अमिट छाप छोड़ी है। उन्हीं में से एक नाम स्वामी पूर्ण चंद्र आर्य का है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। उनका जन्म 13 मार्च 1900 को उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बूढ़पुर गाँव में हुआ। उनके पिता चौधरी लज्जाराम एक प्रतिष्ठित किसान थे। उनका सन्यास पूर्व नाम पूर्ण चंद्र आर्य था।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
स्वामी जी बचपन से ही प्रतिभाशाली और राष्ट्रप्रेमी थे। उन्होंने 1920 में मेरठ से एसएलसी परीक्षा उत्तीर्ण की और पुलिस विभाग में सब-इंस्पेक्टर के रूप में चयनित हुए। लेकिन 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने ब्रिटिश नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।
असहयोग आंदोलन और जेल यात्रा
- 1921 में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।
- आंदोलन के दौरान तीन महीने की जेल की सजा हुई।
- जेल में रहते हुए राष्ट्रवादी विचारधारा और मजबूत हुई।

विद्यालय स्थापना और समाज सेवा
- जेल से रिहा होने के बाद, रोहतक जिले के खरेंटी गाँव में एक विद्यालय की स्थापना की।
- इस विद्यालय का उद्देश्य समाज में शिक्षा का प्रसार और युवाओं में देशभक्ति की भावना विकसित करना था।
नमक सत्याग्रह और पुनः गिरफ्तारी
- 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चलाए गए नमक सत्याग्रह में सक्रिय रूप से भाग लिया।
- सत्याग्रह के दौरान उनके पूरे परिवार को गिरफ्तार कर लिया गया।
- स्वामी जी को मेरठ जेल भेजा गया, जहाँ उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को सलाम करने से इनकार कर दिया।
- विरोधस्वरूप उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की, जिससे मेरठ में विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो गई।
- इसके बाद उन्हें मैनपुरी जेल भेज दिया गया, जहाँ गांधी-इरविन समझौते के तहत 10 माह बाद रिहाई मिली।
महिला सत्याग्रह का नेतृत्व
स्वामी जी की गिरफ्तारी के बाद उनकी वृद्ध माता, धर्मपत्नी और अन्य महिलाओं ने सत्याग्रह किया। वे छोटे बच्चों को गोद में लेकर आंदोलन में कूद पड़ीं। यह इस क्षेत्र में महिला सत्याग्रह की पहली घटना थी।
व्यापक स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
- मेरठ, बागपत, हरियाणा, पंजाब, कश्मीर और हैदराबाद तक स्वतंत्रता आंदोलन को तेज किया।
- आर्य प्रतिनिधि सभा, पंजाब (लाहौर) में महोपदेशक के रूप में कार्य किया।
- वहाँ से उन्होंने क्रांतिकारियों से संपर्क बनाए रखा और स्वतंत्रता संग्राम में योगदान दिया।
- 1939 में आर्य प्रतिनिधि सभा के आह्वान पर कई राष्ट्रवादी आंदोलनों में नेतृत्व किया।
परिवार और सामाजिक जीवन
स्वामी पूर्ण चंद्र आर्य का विवाह 1925 में यशोदा देवी से हुआ। उनके तीन पुत्र यशोवर्धन शास्त्री, वेद प्रकाश तोमर और डॉ. शिवराज तथा एक पुत्री शकुंतला थीं।

स्वामी जी की शिक्षाएँ और विरासत
स्वामी पूर्ण चंद्र आर्य का जीवन त्याग, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की मिसाल है। उनके योगदान को संजोने और नई पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए डॉ. वीरोत्तम तोमर और डॉ. रविंद्र राणा जैसे इतिहासकारों ने उनके कार्यों पर गहन शोध किया है।
स्वामी जी के प्रमुख विचार:
- राष्ट्रसेवा ही सर्वोपरि है।
- शिक्षा और सामाजिक जागरूकता से ही सच्ची स्वतंत्रता संभव है।
- सत्य और अहिंसा का पालन करें।
स्वामी पूर्ण चंद्र आर्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान नायकों में से एक थे। उनके बलिदान और आदर्श सदैव हमारे लिए प्रेरणास्रोत रहेंगे।
स्वामी पूर्ण चंद्र आर्य की पांचवी पीढ़ी के वंशज डॉ वीरोत्तम तोमर द्वारा इस महान क्रांतिकारी के जीवन पर तैयार कराई गई ये डॉक्यूमेंटरी देखना न भूलें।
