स्वस्थ लोग, स्वस्थ समाज, मज़बूत राष्ट्र

वेस्ट यूपी विकास

विश्व स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

मेहर ए आलम ख़ान

सलाहकार, सिनेइंक पॉडकास्ट्स,

लंदन (यू.के.)

मुख्य संपादक, (मासिक अंग्रेज़ी पत्रिका) “नर्सरी टुडे”, नई दिल्ली, भारत

तंदुरुस्ती यानी स्वास्थ्य की महत्ता के बारे में उर्दू के एक शायर क़ुर्बान अली बेग ‘सालिक’ ने एक बहुत उम्दा शेर कहा है। (जी हाँ वही क़ुर्बान अली ‘सालिक’ जो पहले मोमिन ख़ान ‘मोमिन’ के और उनके इंतिक़ाल के बाद मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ान ‘ग़ालिब’ के शागिर्द थे।)

तंगदस्ती* अगर न हो ‘सालिक’,

तंदुरुस्ती हज़ार नेमत है।    (*ग़रीबी)

यह शेर स्वास्थ्य की उस बुनियादी सच्चाई को आसान शब्दों में बयान करता है जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। स्वस्थ लोग ही मज़बूत समाज की बुनियाद होते हैं। और स्वस्थ समाज के बिना कोई राष्ट्र मज़बूत नहीं बन सकता। इस तरह लोगों का स्वास्थ्य राष्ट्रीय विकास के लिए ज़रूरी शर्त हो जाता है। जहाँ लोग अस्वस्थ होते हैं, वहाँ उत्पादकता घटती है, असमानताएँ बढ़ती हैं और विकास की गति थम जाती है। इसके विपरीत, स्वस्थ नागरिक अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, लोकतंत्र को मज़बूत करते हैं, और सामाजिक स्थिरता का आधार बनते हैं।

हर साल 7 अप्रैल को दुनिया विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाती है। यह दिन वर्ष 1948 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्थापना की याद दिलाता है और हमारे समय की सबसे गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करता है। इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम  है — “स्वास्थ्य के लिए एकजुट हों। विज्ञान के साथ खड़े रहें।” इस थीम का साफ़ संदेश यह है की स्वास्थ्य नीतियाँ प्रमाणों पर आधारित हों। समाज विज्ञान पर भरोसा करे। और देश के सब लोग मिलकर काम करें।

आज दुनिया में स्वास्थ्य की स्थिति मिली-जुली है। बीते दशकों में इस स्थिति में लगातार सुधार देखने में आया था। कोविड-19 की महामारी से पहले कई क्षेत्रों में लोगों की औसत आयु में वृद्धि हुई। टीकाकरण, बेहतर पोषण और स्वच्छता से बच्चों की मौतों में कमी आई। कई संक्रामक रोग काबू में आए। ये उपलब्धियाँ दिखाती हैं कि विज्ञान और सार्वजनिक निवेश क्या कर सकते हैं।

फिर भी दुनिया के अलग अलग हिस्सों में लोगों के स्वास्थ्य से संबंधित बड़ी खाइयाँ नज़र आती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया की आधी से अधिक आबादी को अब भी जरूरी स्वास्थ्य सेवाएँ पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं। करोड़ों लोग बुनियादी इलाज का खर्च नहीं उठा पाते। रोकी जा सकने वाली बीमारियाँ आज भी जान लेती हैं, खासकर कम और मध्यम आय वाले देशों में। महामारी ने यह भी दिखा दिया कि दुनिया भर की स्वास्थ्य प्रणालियाँ कितनी नाज़ुक हैं।

गैर-संचारी रोग आज वैश्विक स्तर पर मौत का सबसे बड़ा कारण बन चुके हैं। हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और पुरानी श्वसन बीमारियाँ दुनिया में लगभग तीन-चौथाई मौतों के लिए ज़िम्मेदार हैं। ये रोग धीरे-धीरे बढ़ते हैं, लेकिन लंबे इलाज की माँग करते हैं। इनका बोझ परिवारों और स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी पड़ता है। साथ ही, तपेदिक और मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारियाँ ग़रीब क्षेत्रों में अब भी बड़ी चुनौती हैं।

भारत में वैश्विक प्रगति भी दिखाई देती है और वैश्विक समस्याऐं भी । पिछले दो दशकों में देश ने स्वास्थ्य के कई सूचकों पर उल्लेखनीय सुधार किया है। मातृ मृत्यु दर में तेज़ गिरावट आई है। शिशु और बाल मृत्यु दर घटी है। टीकाकरण का दायरा बढ़ा है। भारत जैसे बड़े और विविध देश के लिए ये महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं। लेकिन भारत की स्वास्थ्य चुनौतियाँ अब भी गहरी और जटिल हैं। देश में औसत आयु अभी वैश्विक औसत से कम है। राज्यों के बीच, शहरों और गाँवों के बीच, और अमीर-ग़रीब परिवारों के बीच बड़े अंतर हैं। किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य अक्सर इस पर निर्भर करता है कि वह कहाँ पैदा हुआ और उसकी आय कितनी है।

भारत में बीमारी का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है। अब कुल मौतों में 60 प्रतिशत से अधिक गैर-संचारी रोगों के कारण होती हैं। मधुमेह और हृदय रोग चिंताजनक गति से बढ़ रहे हैं। कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं। ये बीमारियाँ लोगों को उनके सबसे सक्रिय और उत्पादक वर्षों में प्रभावित करती हैं। इससे कामकाजी भागीदारी घटती है और लंबे समय का इलाज महँगा पड़ता है।इसी बीच संक्रामक रोग खत्म नहीं हुए हैं। तपेदिक आज भी लाखों लोगों को प्रभावित करता है। डेंगू और अन्य मच्छर-जनित रोगों के मौसमी प्रकोप सरकारी अस्पतालों पर दबाव डालते हैं। कुपोषण एक खामोश संकट बना हुआ है। बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है, सीखने की क्षमता घटती है और उत्पादकता में कमी आती है।

स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था में भी भारत को संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई ग्रामीण और दूरदराज़ इलाक़ों में सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा अपर्याप्त है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अक्सर डॉक्टर, नर्स, उपकरण और दवाओं की कमी रहती है। जाँच सुविधाएँ सीमित हैं। बुनियादी इलाज के लिए भी मरीज़ों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की कमी एक और गंभीर समस्या है। ग्रामीण इलाक़ों में इसका असर सबसे अधिक है। बेहतर सुविधाओं और काम की परिस्थितियों के कारण कई डॉक्टर शहरों में काम करना पसंद करते हैं। इससे आम लोगों की इलाज तक पहुँच में भारी असंतुलन पैदा होता है।इलाज पर अपनी जेब पर पड़ने वाला ख़र्च भी बड़ी चिंता है। भारत में स्वास्थ्य ख़र्च का बड़ा हिस्सा सीधे परिवारों को उठाना पड़ता है। गंभीर बीमारी परिवारों को क़र्ज़ और ग़रीबी  की ओर धकेल सकती है। सरकारी बीमा योजनाओं से कवरेज बढ़ी है, लेकिन बाह्य रोगी सेवाओं और पुरानी बीमारियों के इलाज में अब भी कमी है।

स्वास्थ्य आँकड़ों और रोग निगरानी को भी मज़बूत करने की जरूरत है। भरोसेमंद और समय पर मिलने वाला डेटा योजना बनाने, समय से चेतावनी देने और संकट से निपटने के लिए ज़रूरी है। मज़बूत डेटा प्रणाली के बिना नीतियाँ रोकथाम के बजाय केवल प्रतिक्रिया तक सीमित रह जाती हैं।

विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम भारत और अन्य विकासशील देशों के लिए ख़ास मायने रखती है। विज्ञान के साथ खड़े होने का अर्थ है कि स्वास्थ्य से जुड़े फैसले राय पर नहीं, प्रमाणों पर आधारित हों। इसका मतलब है शोध, सार्वजनिक स्वास्थ्य डेटा और प्रशिक्षित पेशेवरों में निवेश। इसका अर्थ ग़लत सूचनाओं से लड़ना भी है, क्योंकि वे टीकाकरण, पोषण और रोग नियंत्रण को कमज़ोर करती हैं।

साथ मिलकर स्वास्थ्य के लिए सहयोग की जरूरत को रेखांकित करता है। सरकारें, स्वास्थ्यकर्मी, शोधकर्ता, नागरिक समाज और समुदाय—सभी को मिलकर काम करना होगा। स्वास्थ्य समस्याएँ सीमाएँ नहीं मानतीं। रोग प्रकोप, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय क्षरण सभी देशों को प्रभावित करते हैं, लेकिन सबसे अधिक नुकसान गरीबों को होता है।

आगे का रास्ता साफ है। मज़बूत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। रोकथाम, शुरुआती जाँच और बुनियादी इलाज लोगों के घरों के पास उपलब्ध हों। स्वास्थ्य कर्मियों में निवेश जरूरी है। प्रशिक्षण, उचित वेतन और सुरक्षित कामकाजी हालात से पिछड़े क्षेत्रों में कर्मियों को रोका जा सकता है।स्वास्थ्य पर सार्वजनिक खर्च बढ़ाना होगा। बेहतर ढांचा, दवाओं की विश्वसनीय आपूर्ति और मज़बूत रेफ़रल व्यवस्था अस्पतालों पर दबाव कम कर सकती है। स्वास्थ्य बीमा योजनाएँ आर्थिक बोझ घटाएँ और पुरानी बीमारियों के लंबे इलाज को कवर करें। स्वास्थ्य के प्रति जन-जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। संतुलित आहार, शारीरिक गतिविधि, तंबाकू नियंत्रण और नियमित जाँच से कई बीमारियों को रोका जा सकता है। जागरूक नागरिक बेहतर विकल्प चुनते हैं और बेहतर सेवाओं की माँग करते हैं।

स्वास्थ्य कोई खर्च नहीं है। यह निवेश है। स्वस्थ आबादी अधिक उत्पादक होती है। बच्चे बेहतर सीखते हैं। कामगार बेहतर प्रदर्शन करते हैं। परिवार अधिक सुरक्षित होते हैं। अर्थव्यवस्था मजबूत होती है।भारत के लिए स्वास्थ्य विकास की धुरी है। अस्वस्थ जनसंख्या के साथ कोई देश टिकाऊ प्रगति नहीं कर सकता। इस विश्व स्वास्थ्य दिवस पर संदेश साफ़ है। जब देश विज्ञान के साथ खड़े होते हैं और मिलकर काम करते हैं, तो स्वास्थ्य बेहतर होता है। और जब स्वास्थ्य बेहतर होता है, तो समाज आगे बढ़ता है।विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 इसी सच्चाई की ओर ध्यान खींचता है। यह दिन याद दिलाता है कि लोगों का स्वास्थ्य और राष्ट्रों का भविष्य एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। मज़बूत स्वास्थ्य प्रणालियाँ, रोकथाम पर ज़ोर और सबके लिए सुलभ देखभाल—ये अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता हैं।

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