
सिवालखास में राष्ट्रीय लोकदल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष और पूर्व सांसद के.सी. त्यागी के.सी. त्यागी का भाषण …..
आज के कार्यक्रम के अध्यक्ष महोदय, मंच पर उपस्थित सभी सम्मानित अतिथिगण, मेरे किसान भाई, मेहनतकश साथी और यहां मौजूद सभी सम्मानित लोगों को मेरा नमस्कार।
सबसे पहले मैं रणवीर दहिया जी का विशेष रूप से आभार व्यक्त करना चाहता हूं। मुझे उनका अलग से परिचय कराने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यदि उनके प्रयास नहीं होते तो हम सभी आज यहां एक साथ एकत्र नहीं हो पाते। उन्होंने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाने का जो प्रयास किया है, वह वास्तव में सराहनीय है।
मैं सिवालखास के विधायक हाजी गुलाम मोहम्मद जी सहित मंच पर उपस्थित सभी वरिष्ठ नेताओं, कार्यकर्ताओं और समाज के सम्मानित लोगों का अभिनंदन करता हूं। जिन साथियों के नाम लेने से रह गए हैं, वे भी मेरे लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। कई बार जिनके नाम छूट जाते हैं, उनका योगदान भी उतना ही बड़ा होता है।

आज मुझे एक महत्वपूर्ण तारीख याद आ रही है… 28 जुलाई। मेरे लिए यह केवल एक तारीख नहीं है। गांव, किसान, मजदूर और अपने पसीने से देश का निर्माण करने वाले लोगों के लिए यह किसी धार्मिक पर्व से कम नहीं है। यह हमारे लिए ईद भी है, दिवाली भी है और होली भी। इसी दिन भारत माता के सपूत चौधरी चरण सिंह ने देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। यह भारतीय लोकतंत्र और किसान समाज के इतिहास का एक स्वर्णिम दिन है।
कुछ दिन पहले मेरा एक साक्षात्कार हुआ था, जिसमें मुझसे पूछा गया कि उस ऐतिहासिक दिन का अनुभव कैसा था। मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में हूं जिन्होंने उस घटना को बहुत करीब से देखा।
चौधरी चरण सिंह जी का जीवन अत्यंत अनुशासित था। दोपहर का भोजन करने के बाद वे विश्राम करते थे और उस समय उन्हें कोई भी बिना आवश्यकता के परेशान नहीं कर सकता था। उन दिनों हम सभी उनके निवास पर मौजूद थे। कई दिनों से हम इस प्रतीक्षा में थे कि मोरारजी देसाई के इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करेंगे।

उस समय संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार पहले विपक्ष के नेता वाई.बी. चव्हाण को बुलाया जाना था। लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनके पास बहुमत नहीं है। दूसरी ओर कांग्रेस ने भी अपनी स्थिति साफ कर दी। इसके बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि राष्ट्रपति भवन से चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनने का निमंत्रण भेजने का निर्णय लिया गया।
करीब तीन बजे राष्ट्रपति भवन से फोन आया। यह समाचार कुछ ही देर में पूरे दिल्ली के मीडिया में फैल गया और चौधरी साहब के निवास पर पत्रकारों की भीड़ लग गई।
उस समय चौधरी साहब विश्राम कर रहे थे। वहां मौजूद लोगों में केवल दो-तीन व्यक्ति ऐसे थे जो उन्हें जगा सकते थे। मैं भी उनमें शामिल था। मेरे और एक अन्य साथी के बीच यह चर्चा हुई कि पहले कौन उन्हें जगाएगा। आखिर हम दोनों उनके कमरे में गए, उनके चरण स्पर्श किए और उन्हें धीरे-धीरे जगाया।
चौधरी साहब ने आंखें खोलते ही पूछा, “क्या बात है? क्यों जगा रहे हो?”
हमने कहा, “राष्ट्रपति भवन से फोन आया है। आपको भारत का प्रधानमंत्री बनने के लिए आमंत्रित किया गया है।”
मुझे गर्व है कि मैं उन दो लोगों में शामिल था जिन्होंने चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री बनने का यह ऐतिहासिक संदेश सबसे पहले सुनाया। उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास का हिस्सा बन गया।
मैं यह प्रसंग केवल इसलिए नहीं सुना रहा कि वह एक ऐतिहासिक घटना थी, बल्कि इसलिए कि हम चाहते हैं कि एक बार फिर इस देश का किसान, मजदूर और मेहनतकश समाज उसी सम्मान के साथ राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भागीदारी दर्ज कराए। हम चाहते हैं कि भारत माता की धरती पर मेहनत करने वाले किसानों का बेटा फिर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे।
यदि हम स्वतंत्रता के बाद के भारत को देखें तो उस समय देश भुखमरी की स्थिति से जूझ रहा था। गेहूं, चावल और चीनी जैसी आवश्यक वस्तुएं विदेशों से आती थीं। ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा जैसे देशों पर हमारी निर्भरता थी। यदि जहाज दो-चार दिन भी देर से पहुंचते, तो देश में खाद्यान्न संकट पैदा होने का खतरा बन जाता था।

बाद में जब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री बने, तब उन्होंने मुझे उस संस्था का अध्यक्ष बनने का अवसर दिया, जहां पूरे देश का खाद्यान्न भंडारित किया जाता है। इस जिम्मेदारी के कारण मुझे देश के अनेक राज्यों में जाने और किसानों की मेहनत को करीब से देखने का अवसर मिला।
मैं पूरे सम्मान के साथ देश के किसानों को प्रणाम करता हूं। आज यदि लगातार दो वर्ष सूखा पड़ जाए या दो वर्ष अत्यधिक वर्षा हो जाए, तब भी हमारे पास इतना अनाज है कि पूरे देश की जनता का पेट भरा जा सकता है। यह किसी सरकार की नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत का परिणाम है।
कोरोना काल में देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया गया। यह भी किसानों की अथक मेहनत की बदौलत संभव हो सका। आज भारत गेहूं, चावल और चीनी के उत्पादन में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है और अनेक देशों को खाद्यान्न निर्यात कर रहा है।

लेकिन मैं यह भी कहना चाहता हूं कि इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद किसानों के साथ पूरा न्याय नहीं हुआ।
मैं आप सबसे एक बात बड़े दुख के साथ कहना चाहता हूं कि देश को आत्मनिर्भर बनाने वाले किसान के साथ आजादी के बाद भी पूरा न्याय नहीं हुआ।
आज के युवा शायद यह नहीं जानते होंगे कि 1967 तक किसानों की फसल का कोई निश्चित मूल्य नहीं होता था। गेहूं, धान और गन्ने का दाम मंडियों में व्यापारी तय करते थे। मैं अपने पिता जी के साथ मुरादनगर की मंडी और मोदीनगर की चीनी मिल जाया करता था। वहां किसान अपनी मेहनत की फसल लेकर पहुंचता था, लेकिन उसकी कीमत व्यापारी अपनी मर्जी से तय कर देता था। किसान के पास कोई विकल्प नहीं होता था। चाहे वह दाम स्वीकार करे या अपनी उपज वापस लेकर चला जाए।
मैंने वह दौर अपनी आंखों से देखा है। किसान की मेहनत का सम्मान नहीं था। उसकी फसल का मूल्य उसके पसीने से नहीं, बल्कि व्यापारी की इच्छा से तय होता था।
इसी मिट्टी से एक किसान नेता निकला—चौधरी चरण सिंह। उन्होंने कहा कि किसान की उपज का एक न्यूनतम मूल्य तय होना चाहिए, ताकि कोई भी व्यापारी उससे कम कीमत पर खरीद न सके। बाद में कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने भी इस सोच को आगे बढ़ाया। आज जिसे हम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कहते हैं, उसकी वैचारिक नींव चौधरी चरण सिंह ने रखी थी। इसलिए जब भी किसान के अधिकारों की बात होगी, चौधरी साहब का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।

मैंने गांवों की ताकत भी देखी है। गांव और किसान कभी इतने शक्तिशाली थे कि देश की राजनीति की दिशा तय करते थे। वर्ष 1977 में जब मैं जेल से बाहर आया तो चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार थे। उस समय उनके साथ 102 सांसद थे। हरिद्वार, सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, बुलंदशहर, हाथरस, मुरादाबाद, संभल, रामपुर—पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्रों की अधिकांश लोकसभा सीटों पर चौधरी चरण सिंह का प्रभाव था।
मैं यहां बैठे अपने मुस्लिम भाइयों से भी कहना चाहता हूं कि उस समय आपकी भागीदारी भी बहुत मजबूत थी। चौधरी चरण सिंह ने अल्पसंख्यक समाज के अनेक नेताओं को संसद तक पहुंचाया। लेकिन जैसे-जैसे हमारी एकता कमजोर हुई, वैसे-वैसे किसान भी कमजोर हुआ और अल्पसंख्यक समाज भी राजनीतिक रूप से कमजोर होता चला गया।
मैं हमेशा कहता हूं कि जब किसान समाज संगठित था, तब वही तय करता था कि देश का प्रधानमंत्री कौन बनेगा। उस दौर में चौधरी चरण सिंह के 102 सांसद थे, जबकि दूसरे बड़े नेताओं के पास उनसे काफी कम सांसद थे। इसके बावजूद उन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक परंपराओं का सम्मान किया और देशहित में निर्णय लिए।
इसके बाद वर्ष 1989 का दौर आया। मैं भी उस राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा था। चौधरी अजीत सिंह, चौधरी देवीलाल और अन्य किसान नेता राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में थे। उस समय भी किसान नेतृत्व के पास इतनी ताकत थी कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा, यह तय करने में उसकी निर्णायक भूमिका थी।
मैं आप सबसे पूछना चाहता हूं कि आखिर वह ताकत कहां चली गई? एक समय था जब किसान समाज मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनाने की स्थिति में था, लेकिन आज वही समाज जिला पंचायत और छोटी-छोटी राजनीतिक हिस्सेदारियों के लिए संघर्ष कर रहा है। हमें आत्ममंथन करना होगा कि हमारी राजनीतिक शक्ति क्यों कमजोर हुई।
मुझे याद है कि चौधरी चरण सिंह जिस व्यक्ति को टिकट दे देते थे, पूरा संगठन उसके पीछे खड़ा हो जाता था। कार्यकर्ता यह नहीं देखते थे कि उम्मीदवार किस गांव का है या किस बिरादरी का है। वे केवल पार्टी और विचारधारा को देखते थे। यही कारण था कि लोकदल का प्रत्याशी विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनावों में मजबूती से जीतकर आता था।
मैं आज भी यही कहना चाहता हूं कि यदि हमें अपनी पुरानी राजनीतिक ताकत वापस लानी है, तो हमें व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठना होगा। जयंत चौधरी जिस उम्मीदवार को टिकट दें, हमें पूरी एकजुटता के साथ उसका समर्थन करना चाहिए। संगठन की मजबूती ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।

आज मैं पूरे उत्तर भारत की राजनीति को देखता हूं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यदि किसी युवा नेता के पास विरासत, शिक्षा, राजनीतिक अनुभव और किसानों के बीच स्वीकार्यता का सबसे बड़ा आधार है, तो वह जयंत चौधरी हैं। हमें उनके नेतृत्व को मजबूत करना चाहिए।
हरियाणा में मैंने लंबे समय तक चौधरी देवीलाल जी के साथ काम किया। उनके बाद वहां भी राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं। राजस्थान में भी एक समय लोकदल की मजबूत उपस्थिति थी। लेकिन समय के साथ संगठन कमजोर होता गया। यदि आज कहीं उम्मीद दिखाई देती है कि किसान राजनीति फिर से सम्मान के साथ खड़ी हो सकती है, तो उसकी निगाहें भी जयंत चौधरी के नेतृत्व की ओर हैं।
मैं यह नहीं कहता कि कोई भी नेता चौधरी चरण सिंह जैसा हो सकता है। न चौधरी अजीत सिंह वैसा स्थान ले सके और न ही कोई दूसरा नेता उनकी बराबरी कर सकता है। लेकिन हम सब मिलकर उनके विचारों को आगे बढ़ा सकते हैं। यदि हम उनकी विचारधारा पर चलें, तो किसान समाज फिर से वही सम्मान और राजनीतिक ताकत हासिल कर सकता है, जो कभी चौधरी चरण सिंह के समय हुआ करती थी।
मैं यह स्पष्ट कहना चाहता हूं कि चौधरी चरण सिंह की राजनीति केवल एक बिरादरी की राजनीति नहीं थी। उन्होंने हमेशा समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने का काम किया। यही कारण था कि उनके नेतृत्व में किसान, मजदूर, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक सभी अपने आपको सम्मानित महसूस करते थे।
राजस्थान का उदाहरण हमारे सामने है। वर्ष 1977 में वहां लोकदल की मजबूत स्थिति थी। चौधरी चरण सिंह चाहते तो केवल अपनी बिरादरी के व्यक्ति को आगे बढ़ाते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने भैरों सिंह शेखावत जैसे नेता को आगे बढ़ाया और मुख्यमंत्री बनने का अवसर दिया। यह चौधरी साहब की उदार सोच और समावेशी राजनीति का प्रमाण था।
मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि चौधरी चरण सिंह जैसा व्यक्तित्व दोबारा पैदा होना आसान नहीं है। न चौधरी अजीत सिंह उनके समान बन पाए और न ही जयंत चौधरी उनके जैसे हो सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम उनके विचारों को आगे नहीं बढ़ा सकते। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम उनके सिद्धांतों, उनकी सोच और उनकी राजनीति को जीवित रखें।
यदि हम ऐसा कर पाए, तो उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान का किसान समाज एक बार फिर उसी सम्मान और प्रभाव के साथ राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बना सकता है, जैसा चौधरी चरण सिंह के समय था।
मुझे वह दौर भी याद है जब चौधरी साहब का नाम सुनते ही लोग सम्मान से भर जाते थे। लखनऊ में रिक्शा चालक किराया कम कर देता था, जूते पॉलिश करने वाला भी पैसे कम लेता था, क्योंकि उसे पता होता था कि सामने वाला व्यक्ति चौधरी चरण सिंह के घर जा रहा है। यह सम्मान किसी पद का नहीं था, बल्कि उनके व्यक्तित्व और किसानों के प्रति समर्पण का था।
अभी किसी साथी ने कहा कि जयंत चौधरी ने दलित प्रकोष्ठ बनाया है। मैं कहना चाहता हूं कि सामाजिक न्याय की शुरुआत तो चौधरी चरण सिंह ने बहुत पहले कर दी थी।

वर्ष 1935 में, जब वे उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में थे, तब उन्होंने प्रस्ताव रखा था कि खेती करने वाले परिवारों के बच्चों के लिए शिक्षा और नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए। उनका मानना था कि जो समाज खेती करके देश का पेट भरता है, उसे अवसरों में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लेकिन उस समय उनके इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया।
इसके बाद जब सवाल उठा कि दलित समाज का क्या होगा, तब चौधरी चरण सिंह ने स्वयं कहा कि दलित समाज को 25 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। वे किसी भी वर्ग के साथ अन्याय के पक्षधर नहीं थे। उनकी राजनीति का आधार सामाजिक न्याय था, न कि सामाजिक विभाजन।
मैं आज भी यही कहना चाहता हूं कि यदि किसान समाज को दिल्ली और लखनऊ की सत्ता में सम्मानजनक भागीदारी चाहिए, तो उसे दलितों और अल्पसंख्यक समाज को साथ लेकर चलना होगा। केवल किसान जातियों की एकता पर्याप्त नहीं होगी। सामाजिक समरसता ही राजनीतिक सफलता की सबसे बड़ी शर्त है।
मैंने महात्मा गांधी के विचारों का भी अध्ययन किया है। देश के विभाजन के समय लाखों मुसलमान असमंजस में थे कि उन्हें भारत में रहना चाहिए या पाकिस्तान जाना चाहिए। मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भी भारत में रहने का आह्वान किया। गांवों के लोगों ने भी अपने मुस्लिम भाइयों को रोकने का काम किया। जाट, गुर्जर, ठाकुर और अन्य किसान समाज ने उन्हें भरोसा दिलाया कि यह देश उनका भी उतना ही है।
महात्मा गांधी का संदेश स्पष्ट था कि आजाद भारत में हिंदू और मुसलमान दोनों समान सम्मान के साथ रहेंगे। मंदिरों से ‘हर-हर महादेव’ की आवाज गूंजेगी और मस्जिदों से ‘अल्लाहु अकबर’ की। किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा।
हरियाणा के मेवात क्षेत्र में काम करने का मुझे अवसर मिला। वहां मैंने देखा कि सदियों की साझी संस्कृति ने लोगों को इस तरह जोड़ा है कि कई बार यह पहचानना कठिन हो जाता है कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान। उनकी वेशभूषा, रीति-रिवाज और सामाजिक जीवन में गहरा सामंजस्य दिखाई देता है।

मैं पूरे विश्वास के साथ कहना चाहता हूं कि जब तक यह भाईचारा कायम नहीं होगा, तब तक हमारा संगठन भी मजबूत नहीं होगा।
आज चुनावी राजनीति का दौर है। ऐसे समय में समाज को बांटने की कोशिशें भी होंगी। लेकिन यदि हम चौधरी चरण सिंह के समय वाला सम्मान, राजनीतिक ताकत और सामाजिक एकता वापस चाहते हैं, तो हमें किसान, दलित और अल्पसंख्यक समाज को साथ लेकर चलना होगा।
मैं आप सबसे अपील करता हूं कि जयंत चौधरी के हाथ मजबूत कीजिए। यदि किसान समाज संगठित होकर उनके साथ खड़ा होगा, तो मैं विश्वास दिलाता हूं कि उसी सम्मान के साथ दलित और अल्पसंख्यक समाज भी आगे बढ़ेगा। किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होगा।
आज का दिन मेरा नहीं है। यह दिन रणवीर दहिया का है। उन्होंने इतने प्रतिष्ठित लोगों को एक मंच पर एकत्र किया और मुझे आप सभी के बीच अपने विचार रखने का अवसर दिया। मैं उनका हृदय से आभारी हूं।
नई पीढ़ी के सामने आज नए माध्यम हैं—सोशल मीडिया है, डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं, नई तकनीक है। हमारे समय में न रेडियो सबके पास था, न टेलीविजन। लेकिन समय चाहे जैसा भी बदल जाए, रास्ता वही सही होगा जो भारत रत्न चौधरी चरण सिंह ने हमें दिखाया था।
मैंने अपने राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। हरियाणा, राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश—इन सभी राज्यों में काम करने का अवसर मिला। मैंने बहुत करीब से देखा है कि देश की अनेक राजनीतिक धाराओं की जड़ें कहीं न कहीं चौधरी चरण सिंह और लोकदल की विचारधारा से जुड़ी रही हैं। आज अलग-अलग दलों में काम कर रहे अनेक नेता कभी न कभी लोकदल की राजनीतिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं।
मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा राजनीतिक जीवन किसानों, गांवों और मेहनतकश समाज के बीच बिताया। मैं आज भी मानता हूं कि भारत की सबसे बड़ी ताकत गांव और किसान हैं। जब तक किसान मजबूत रहेगा, तब तक देश मजबूत रहेगा।

मैं एक बात बड़े दुख के साथ कहना चाहता हूं। मुजफ्फरनगर के दंगों ने केवल दो समुदायों के बीच दूरी नहीं बढ़ाई, बल्कि किसानों की राजनीतिक ताकत को भी कमजोर किया। वर्षों से जो भाईचारा गांवों में बना हुआ था, उसे गहरी चोट पहुंची। इसका नुकसान केवल एक समाज को नहीं, बल्कि पूरे किसान आंदोलन और राष्ट्रीय लोकदल की राजनीति को हुआ।
आज हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि उस विश्वास और भाईचारे को फिर से स्थापित किया जाए। चौधरी चरण सिंह की राजनीति कभी नफरत की राजनीति नहीं थी। उन्होंने हमेशा गांव, किसान और समाज को जोड़ने का काम किया। यदि हम वास्तव में उनकी विरासत को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो हमें भी समाज को जोड़ना होगा, तोड़ना नहीं।
मैं आज यहां उपस्थित अपने सभी साथियों से कहना चाहता हूं कि संगठन किसी एक व्यक्ति से बड़ा होता है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं आती-जाती रहती हैं, लेकिन विचारधारा और संगठन हमेशा स्थायी रहते हैं। इसलिए हम सबकी जिम्मेदारी है कि राष्ट्रीय लोकदल को मजबूत करें और पार्टी के निर्णयों के साथ पूरी निष्ठा से खड़े रहें।
मैंने आज सिवालखास के विधायक हाजी गुलाम मोहम्मद जी की बात भी सुनी। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि मंच पर बैठे सभी लोग टिकट के दावेदार हो सकते हैं, लेकिन पार्टी जिस व्यक्ति को टिकट देगी, हम सब उसी को चुनाव लड़ाएंगे। मैं मानता हूं कि यही एक सच्चे कार्यकर्ता की पहचान है। संगठन की ताकत व्यक्तिगत दावेदारी से कहीं बड़ी होती है।
मैं सभी कार्यकर्ताओं से कहना चाहता हूं कि टिकट किसे मिलेगा, इसका निर्णय पार्टी नेतृत्व करेगा। हमारा दायित्व यह होना चाहिए कि जिस उम्मीदवार को पार्टी चुने, उसके साथ पूरी मजबूती से खड़े हों। यदि हम एकजुट रहेंगे तो कोई भी चुनाव कठिन नहीं रहेगा।
मुझे पूरा विश्वास है कि जयंत चौधरी के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकदल आने वाले समय में और अधिक मजबूत होगा। नई पीढ़ी के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। किसानों, युवाओं और गांवों की आवाज को वे राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठा रहे हैं। हमें उनके नेतृत्व पर भरोसा रखना चाहिए और संगठन को गांव-गांव तक मजबूत करना चाहिए।
मैं अपने जीवन के अनुभव के आधार पर एक बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं। मैंने वर्ष 1974 में चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में लोकदल जॉइन किया था। उस समय भी बहुत लोगों को लगता था कि चौधरी साहब का राजनीतिक भविष्य समाप्त हो गया है, क्योंकि वे चुनाव हार चुके थे। लेकिन इतिहास ने साबित किया कि संघर्ष करने वाला व्यक्ति कभी हारता नहीं। वही चौधरी चरण सिंह आगे चलकर भारत के प्रधानमंत्री बने।
आज भी मैं वही इतिहास दोहराता हुआ देख रहा हूं। कठिन समय हमेशा स्थायी नहीं होता। संघर्ष करने वाले लोग और मजबूत होकर निकलते हैं। मुझे विश्वास है कि राष्ट्रीय लोकदल भी उसी तरह फिर से मजबूत होगा और किसानों की आवाज पहले से अधिक ताकत के साथ देश की राजनीति में सुनाई देगी।

मैं और अधिक समय नहीं लेना चाहता।
एक बार फिर मैं रणवीर दहिया जी को हृदय से प्रणाम करता हूं। उन्होंने जिस आत्मीयता से मेरा सम्मान किया और इतने बड़े कार्यक्रम का आयोजन किया, उसके लिए मैं उनका आभारी हूं। उन्होंने मुझे आप सभी सम्मानित लोगों से मिलने का अवसर दिया।
मैं यहां उपस्थित सभी वरिष्ठ साथियों को वर्षों से जानता हूं। आपमें से कई लोगों को मैं 1974 से देख रहा हूं। हम सबने चौधरी चरण सिंह के संघर्ष को देखा है और उसी संघर्ष से प्रेरणा लेकर आगे बढ़े हैं।
मुझे पूरा विश्वास है कि जिस प्रकार चौधरी चरण सिंह चुनाव हारने के बाद भी संघर्ष करते हुए देश के प्रधानमंत्री बने, उसी प्रकार राष्ट्रीय लोकदल भी फिर से नई ऊर्जा और नई ताकत के साथ आगे बढ़ेगा। मुझे भरोसा है कि आने वाले समय में संगठन का विस्तार होगा, कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ेगा और जयंत चौधरी के नेतृत्व में पार्टी नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगी।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूं।
आप सभी का हृदय से धन्यवाद।
जय हिंद।
जय किसान।
चौधरी चरण सिंह अमर रहें।
