बाबा टिकैत… किसान की वो आवाज, जिसके सामने सरकारों को भी सुनना पड़ता था

वेस्ट यूपी Politics

6 अक्टूबर 1935 को जन्मे चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की आज 91वीं जयंती है।

मुजफ्फरनगर के सिसौली से उठी एक ठेठ किसान की आवाज ने देखते ही देखते पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली और लखनऊ तक अपनी गूंज पैदा कर दी।

न कोई बड़ा राजनीतिक पद…

न करोड़ों का प्रचार तंत्र…

न सत्ता का सहारा…

सिर्फ किसान, पंचायत, हुक्का और बेबाक आवाज।

यही थे बाबा टिकैत।

आठ साल की उम्र में मिली बड़ी जिम्मेदारी

पिता के निधन के बाद महेंद्र सिंह टिकैत को कम उम्र में ही बालियान खाप की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। गांव, खेती और किसानों के बीच पले बढ़े टिकैत ने किसान की परेशानी को सिर्फ देखा नहीं, बल्कि उसे अपनी लड़ाई बना लिया।

1980 के दशक में जब किसानों के बिजली, गन्ना, फसल मूल्य और सिंचाई जैसे सवालों को लेकर आंदोलन तेज हुए, तब टिकैत किसानों की सबसे बड़ी आवाज बनकर सामने आए।

भाकियू और किसान आंदोलन की नई पहचान

1986 में भारतीय किसान यूनियन के गठन के बाद टिकैत ने किसान आंदोलन को गांव की चौपाल से निकालकर सड़कों और सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया।

उनकी एक आवाज पर गांवों से किसान निकल पड़ते थे।

ट्रैक्टर ट्रॉलियां चल पड़ती थीं।

बैलगाड़ियां निकलती थीं।

और रणसिंघा बजते ही गांवों को पता चल जाता था कि किसान पंचायत का बुलावा आ गया है।

मेरठ से दिल्ली तक किसान सैलाब

1988 का मेरठ किसान आंदोलन बाबा टिकैत के जीवन का ऐतिहासिक पड़ाव बना।

मेरठ कमिश्नरी पर किसानों का विशाल धरना हुआ। इसके बाद दिल्ली कूच का ऐलान हुआ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के गांवों से किसान दिल्ली की तरफ बढ़ने लगे।

हरी और सफेद टोपियों से सड़कें पट गईं।

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31 अक्टूबर 1988 को दिल्ली के बोट क्लब पर किसानों का विशाल जमावड़ा हुआ।

किसानों की इस ताकत ने देश की राजनीति को हिला दिया।

टिकैत की पहचान थी उनका खांटी देसी अंदाज

बाबा टिकैत बड़े नेताओं की तरह भाषण देने वाले नेता नहीं थे।

उनकी भाषा थी कौरवी।

उनका मंच था किसान की चौपाल।

उनकी पहचान थी धोती कुर्ता, टोपी और हुक्का।

आंदोलन के बीच भी वह किसानों के बीच ही नजर आते थे।

कभी ट्रैक्टर ट्रॉली के नीचे बैठकर हुक्का गुड़गुड़ाते हुए किसानों से बात करते, तो कभी खुले मैदान में किसान पंचायत करते।

यही सादगी उन्हें लाखों किसानों से जोड़ती थी।

न हिंसा, न तोड़फोड़

बाबा टिकैत की आंदोलन शैली की सबसे बड़ी खासियत थी अहिंसा।

उन्होंने किसानों की ताकत दिखाई, लेकिन हिंसा और तोड़फोड़ को आंदोलन का रास्ता नहीं बनाया।

उनका विश्वास था कि अगर किसान एकजुट है तो उसकी आवाज सरकार तक जरूर पहुंचेगी।

किसान पहले, राजनीति बाद में

बाबा टिकैत ने किसान यूनियन को किसी एक राजनीतिक दल की राजनीति का हिस्सा नहीं बनने दिया।

सत्ता में कोई भी हो, टिकैत किसानों के सवाल पर सरकार से सीधे बात करते थे।

देश के कई बड़े नेता और प्रधानमंत्री उनसे संवाद करते रहे।

लेकिन टिकैत खुद सत्ता की राजनीति से दूर रहे।

यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

सांप्रदायिक तनाव के बीच भी किसानों को जोड़ा

1987 के मेरठ दंगों के बाद शुरू हुए किसान आंदोलन में हिंदू और मुस्लिम किसान बड़ी संख्या में एक साथ जुटे।

धरना स्थल पर नमाज भी होती थी और किसान पंचायत भी।

टिकैत किसानों को आगाह करते थे कि सांप्रदायिक तनाव पैदा करके किसान आंदोलन को तोड़ा जा सकता है।

उनका संदेश साफ था—

किसान अगर बंट गया तो उसकी आवाज कमजोर हो जाएगी।

बाबा टिकैत की सबसे बड़ी विरासत क्या है?

शायद उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई एक आंदोलन या कोई एक मांग नहीं है।

उन्होंने किसान को यह भरोसा दिया कि

अपनी बात कहने के लिए किसी नेता के दरवाजे पर खड़े होने की जरूरत नहीं।

किसान खुद पंचायत कर सकता है।

खुद अपनी आवाज उठा सकता है।

और सरकार के सामने शांतिपूर्ण तरीके से अपने अधिकारों की मांग कर सकता है।

15 मई 2011 को बाबा टिकैत दुनिया से चले गए।

लेकिन सिसौली की चौपाल से निकली उनकी आवाज आज भी किसान आंदोलनों में सुनाई देती है।

आज उनकी 91वीं जयंती पर सवाल सिर्फ यह नहीं कि बाबा टिकैत कौन थे?

सवाल यह है—

क्या आज का किसान बाबा टिकैत की तरह अपनी ताकत को एकजुट कर सकता है?

क्या आज भी किसान की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकता, पंचायत और बेबाक आवाज हो सकती है?

बाबा टिकैत की 91वीं जयंती पर उन्हें शत शत नमन।

बाबा टिकैत अमर रहें।

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