CCSU में 2017, गोरखपुर विश्वविद्यालय में 2016 के बाद नहीं हुआ चुनाव, AMU में भूख हड़ताल से बढ़ा दबाव
उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लंबे समय से बंद छात्रसंघ चुनावों की बहाली का मुद्दा एक बार फिर कैंपस राजनीति के केंद्र में आ गया है। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (DUSU) चुनाव 2026 के बाद उत्तर प्रदेश में भी विभिन्न छात्र संगठनों ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव दोबारा कराने की मांग तेज कर दी है।
सितंबर में DUSU चुनाव परिणाम आने के बाद समाजवादी छात्रसभा और NSUI ने उत्तर प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग उठाई। छात्र संगठनों का तर्क है कि विश्वविद्यालयों में निर्वाचित छात्र प्रतिनिधित्व से फीस, छात्रावास, शैक्षणिक सुविधाओं, छात्र हितों और अन्य कैंपस मुद्दों को संस्थागत मंच मिलता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव अभी भी नियमित लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं। विश्वविद्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक DUSU के चुनाव प्रत्यक्ष मतदान से होते हैं और आमतौर पर हर वर्ष अगस्त-सितंबर में आयोजित किए जाते हैं। 2026 में भी DUSU और कॉलेज स्तर पर छात्रसंघ चुनाव कराए गए।

यूपी में छात्रसंघ चुनावों का इतिहास क्या रहा है?
उत्तर प्रदेश में छात्रसंघ चुनावों का इतिहास उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। छात्रसंघ चुनावों पर पहले भी अलग-अलग समय पर रोक लगती रही है। इसका संबंध केवल किसी एक सरकार या एक आदेश से जोड़ना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
लखनऊ विश्वविद्यालय के आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज है कि 2007 में राज्य सरकार ने राज्य विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इसके बाद 2012 में तत्कालीन सरकार ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए और चुनाव कराने की प्रक्रिया शुरू हुई।
इसके बाद भी कई विश्वविद्यालयों में चुनाव नियमित रूप से नहीं हो सके। यानी मौजूदा स्थिति को केवल 2018 से लागू एक समान प्रदेशव्यापी प्रतिबंध के रूप में देखना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। अलग-अलग विश्वविद्यालयों में चुनाव बंद होने की वजह और समय अलग रहा है।
CCSU में 2017 में हुआ था आखिरी चुनाव
मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (CCSU) में छात्रसंघ चुनाव का आखिरी चुनाव दिसंबर 2017 में हुआ था। उस चुनाव में अध्यक्ष पद पर NSUI-RLD गठबंधन के विजय कुमार ने जीत दर्ज की थी, जबकि अन्य प्रमुख पदों पर अलग-अलग छात्र संगठनों के उम्मीदवार विजयी हुए थे। चुनाव कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कराया गया था।
2017 में ही CCSU से संबद्ध राजकीय और एडेड कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव की प्रक्रिया को लेकर भी रोक और असमंजस की स्थिति बनी थी। राज्य निर्वाचन आयोग के फैसले के आधार पर विश्वविद्यालय ने कई कॉलेजों में चुनाव प्रक्रिया स्थगित करने के निर्देश दिए थे।
इस वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में छात्र राजनीति का एक महत्वपूर्ण चुनावी मंच लंबे समय से निष्क्रिय है।

गोरखपुर विश्वविद्यालय में 2016 के बाद नहीं हुआ चुनाव
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में अंतिम छात्रसंघ चुनाव सितंबर 2016 में हुआ था। उस चुनाव में अरविंद कुमार यादव उर्फ अमन अध्यक्ष, अखिलदेव त्रिपाठी उपाध्यक्ष और ऋचा चौधरी महामंत्री चुनी गई थीं। चुनाव में करीब 52 प्रतिशत पंजीकृत मतदाताओं ने मतदान किया था।
इसके बाद 2017-18 में चुनाव कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन चुनाव से पहले छात्रों के दो गुटों के बीच विवाद और मारपीट के बाद प्रक्रिया स्थगित कर दी गई। इसके बाद से विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव नहीं हो सके।
यह उदाहरण बताता है कि चुनाव बंद होने के पीछे केवल सरकारी नीति ही नहीं, बल्कि कैंपस में कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवाद भी महत्वपूर्ण रहे हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय की कहानी अलग है
लखनऊ विश्वविद्यालय का मामला कुछ अलग है। यहां आखिरी छात्रसंघ चुनाव 2005 में हुआ था। 2012 में विश्वविद्यालय ने चुनाव कराने की तैयारी की और अक्टूबर में मतदान की तारीख भी तय की गई थी, लेकिन एक याचिका के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 3 अक्टूबर 2012 को चुनाव पर अंतरिम रोक लगा दी।
बाद में 2019 में हाईकोर्ट ने उस रोक को हटाते हुए छात्रसंघ चुनाव का रास्ता साफ किया था, लेकिन इसके बावजूद लखनऊ विश्वविद्यालय में नियमित छात्रसंघ चुनाव बहाल नहीं हो सके।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि लखनऊ विश्वविद्यालय में 2012 के बाद चुनाव नहीं हुए, लेकिन इसका पूरा कारण केवल 2018 की प्रदेशव्यापी रोक नहीं था।
अब लखनऊ विश्वविद्यालय में फिर उठ रही आवाज
छात्रसंघ चुनाव बहाली की मांग अब लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में भी दिखाई दे रही है। सितंबर में छात्रों ने चुनाव कराने की मांग को लेकर कुलपति कार्यालय में ज्ञापन देने का प्रयास किया और प्रदर्शन किया। समाजवादी छात्रसभा की विश्वविद्यालय इकाई ने भी भगत सिंह की जयंती के अवसर पर छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग उठाई।
छात्र संगठनों का कहना है कि लंबे समय तक चुनाव नहीं होने से विश्वविद्यालयों में छात्रों का निर्वाचित प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया है। उनका तर्क है कि छात्रसंघ केवल राजनीतिक गतिविधियों का मंच नहीं, बल्कि छात्रों की समस्याओं को विश्वविद्यालय प्रशासन तक पहुंचाने का संस्थागत माध्यम भी हो सकता है।
AMU में आंदोलन ने बढ़ाई चर्चा
छात्रसंघ चुनाव बहाली को लेकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) में चल रहा आंदोलन इस समय सबसे प्रमुख उदाहरणों में शामिल है।
AMU में छात्रसंघ चुनाव की मांग को लेकर छात्र सितंबर से भूख हड़ताल और प्रदर्शन कर रहे हैं। 7 अक्टूबर को आंदोलन के दौरान तनाव की स्थिति भी सामने आई। एक छात्र की तबीयत बिगड़ने पर विश्वविद्यालय प्रशासन उसे अस्पताल ले जाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन प्रदर्शनकारी छात्रों ने उसे वहां से ले जाने का विरोध किया। विश्वविद्यालय अधिकारियों के अनुसार छात्र करीब 15 दिनों से भूख हड़ताल पर था।
इससे पहले छात्रों ने विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वारों और रास्तों पर प्रदर्शन करते हुए अपनी मांग को लेकर दबाव बनाया था। विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों से रास्ते अवरुद्ध न करने की अपील की थी, क्योंकि इन रास्तों का इस्तेमाल एंबुलेंस और अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए भी होता है।
छात्रों की मुख्य मांग है कि छात्रसंघ चुनाव की तारीख घोषित की जाए।
छात्रसंघ चुनाव पर रोक की वजह क्या रही?
उत्तर प्रदेश और देश के दूसरे विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव को लेकर सबसे बड़ा सवाल हमेशा कैंपस की राजनीति, हिंसा, बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप और कानून-व्यवस्था का रहा है।
छात्रसंघ चुनावों के विरोध में विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकारों की ओर से समय-समय पर यह तर्क दिया जाता रहा है कि चुनाव के दौरान कैंपस में तनाव, हिंसा, धनबल, बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप और शैक्षणिक गतिविधियों पर असर जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
दूसरी ओर, छात्र संगठनों का कहना है कि इन समस्याओं का समाधान चुनाव समाप्त करना नहीं बल्कि नियमों को सख्ती से लागू करना होना चाहिए। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से स्वीकार की गई लिंगदोह समिति की सिफारिशों में उम्र, चुनाव खर्च, प्रचार और आचार-संहिता समेत कई मानक तय किए गए हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के दस्तावेजों में भी छात्रसंघ चुनावों के लिए लिंगदोह समिति की सिफारिशों को शामिल किए जाने का उल्लेख है।
क्या छात्रसंघ चुनाव राजनीति की पहली पाठशाला हैं?
छात्रसंघ चुनावों की बहाली का सवाल केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में छात्र राजनीति की ऐतिहासिक भूमिका रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े अनेक नेता छात्र राजनीति के रास्ते सार्वजनिक जीवन में आगे आए हैं।
छात्र संगठनों का कहना है कि चुनाव के माध्यम से छात्रों को बहस, संगठन, नेतृत्व, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव मिलता है। दूसरी ओर विश्वविद्यालयों के सामने यह चुनौती भी रहेगी कि यदि चुनाव बहाल होते हैं तो उन्हें हिंसा, बाहरी हस्तक्षेप, अत्यधिक खर्च और शैक्षणिक वातावरण प्रभावित होने से कैसे बचाया जाए।
यही वजह है कि छात्रसंघ चुनाव की बहाली के साथ-साथ चुनाव प्रक्रिया, आचार संहिता और विश्वविद्यालयों की निगरानी व्यवस्था भी महत्वपूर्ण मुद्दे बनेंगे।
DU चुनाव के बाद क्यों तेज हुआ मुद्दा?
दिल्ली विश्वविद्यालय में 2026 के छात्रसंघ चुनाव और उसके परिणामों के बाद उत्तर प्रदेश में चुनाव बहाली की मांग का तेज होना इसी तुलना से जुड़ा है। DU में छात्रसंघ और कॉलेज स्तर पर चुनाव की प्रक्रिया अभी भी जारी है, जबकि उत्तर प्रदेश के कई बड़े विश्वविद्यालयों में लंबे समय से निर्वाचित छात्रसंघ नहीं हैं।
इसी पृष्ठभूमि में समाजवादी छात्रसभा और NSUI ने सितंबर में उत्तर प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग उठाई। समाजवादी छात्रसभा के प्रदेश अध्यक्ष विनीत कुशवाहा ने सवाल उठाया कि यदि दिल्ली में छात्रसंघ चुनाव हो सकते हैं तो उत्तर प्रदेश में इन्हें क्यों रोका गया है। NSUI की ओर से भी चुनाव बहाली की मांग की गई।

अब सरकार और विश्वविद्यालयों के सामने सवाल
उत्तर प्रदेश में छात्रसंघ चुनाव की बहाली को लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन चुनाव कराने की दिशा में कोई ठोस पहल करेंगे?
साथ ही यह भी देखना होगा कि यदि चुनाव बहाल किए जाते हैं तो क्या सभी विश्वविद्यालयों के लिए एक समान नीति बनाई जाएगी या प्रत्येक विश्वविद्यालय अपनी परिस्थितियों के अनुसार चुनाव प्रक्रिया तय करेगा।
फिलहाल छात्र संगठनों का दबाव बढ़ रहा है। CCSU, गोरखपुर विश्वविद्यालय, लखनऊ विश्वविद्यालय और AMU जैसे परिसरों के उदाहरण बताते हैं कि छात्रसंघ चुनाव का मुद्दा अलग-अलग विश्वविद्यालयों में अलग-अलग परिस्थितियों के बावजूद फिर से सक्रिय हो रहा है।
आने वाले समय में यह मुद्दा केवल कैंपस की राजनीति तक सीमित रहता है या उत्तर प्रदेश की व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता है, इस पर नजर रहेगी।
