मेरठ में मिहिर भोज की मूर्ति को लेकर गरमाई सियासत, मुखिया गुर्जर ने थामा मोर्चा
मेरठ, 24 अप्रैल 2025 – पथिक सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुखिया गुर्जर ने आज मेरठ के जिलाधिकारी वी.के. सिंह से भेंट की और एक ज्ञापन सौंपते हुए गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज जी की मूर्ति मेरठ में स्थापित करने की मांग की।
मुखिया गुर्जर ने पत्र में लिखा कि गुर्जर समाज हर वर्ष मिहिर भोज जी की जयंती को भव्य रूप से मनाता है, जिसमें शोभा यात्राएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस वर्ष समाज की भावनाएं हैं कि मेरठ शहर के किसी प्रमुख चौराहे या सार्वजनिक स्थान पर सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति स्थापित की जाए। उन्होंने जिलाधिकारी से आग्रह किया कि प्रशासन मूर्ति स्थापना के लिए उपयुक्त स्थान आवंटित करे।
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि सम्राट मिहिर भोज ने 836 ईस्वी से 885 ईस्वी तक अखंड भारत पर शासन किया, जिसकी राजधानी कन्नौज थी। उनके शासनकाल को सामाजिक समरसता और सौहार्द का प्रतीक बताया गया है। गुर्जर समाज आज भी उन्हें अपना आदर्श मानता है और उनके योगदान को स्मरण करते हुए सार्वजनिक स्थान पर उनकी प्रतिमा स्थापित करना समाज की भावनात्मक और सांस्कृतिक आवश्यकता है।

इस अवसर पर मुखिया गुर्जर के साथ डॉ. संदीप गुर्जर, गुरमीत साहनी, निखिल त्यागी, विक्टर राघव, और फिरोज चौहान भी उपस्थित रहे।
विशेष रिपोर्ट
सम्राट मिहिर भोज: इतिहास के गौरव पर जातीय टकराव क्यों?
राजनीति, इतिहास और समाज की त्रिकोणीय खींचतान में फंसे सम्राट मिहिर भोज आज उत्तर भारत के दो प्रमुख समाजों – गुर्जर और राजपूत – के बीच एक प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गए हैं।
इतिहास की पृष्ठभूमि
9वीं शताब्दी के महान शासक सम्राट मिहिर भोज ने उत्तर भारत में गुर्जर प्रतिहार वंश के अधीन एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उनका शासनकाल 836 से 885 ईस्वी तक रहा, और उनकी राजधानी कन्नौज थी।
वे अरब आक्रमणों को रोकने में सक्षम रहे। उनके शासन को भारत के सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वर्ण युग के रूप में देखा जाता है। उन्हें “आदि हिन्दू सम्राट” और “धर्मरक्षक” जैसी उपाधियाँ भी दी गईं।
विवाद की जड़: पहचान की लड़ाई
गुर्जर समाज का दावा
गुर्जर समाज का मानना है कि मिहिर भोज गुर्जर प्रतिहार वंश से थे और “गुर्जर” शब्द उनके नाम और इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है। वे यह मांग कर रहे हैं कि जब भी मूर्ति या स्मारक बने, उस पर “गुर्जर सम्राट मिहिर भोज” लिखा जाए।
राजपूत समाज का तर्क
राजपूत समाज का दावा है कि मिहिर भोज प्रतिहार राजपूत थे। उनका कहना है कि “गुर्जर” शब्द केवल एक भौगोलिक या सामाजिक संदर्भ में था, न कि वंशगत। वे मूर्तियों पर “राजा मिहिर भोज” या केवल “सम्राट मिहिर भोज” लिखे जाने की मांग करते हैं।
सामाजिक तनाव और टकराव
विवाद तब बढ़ा जब 2021 में गाजियाबाद के दादरी में सम्राट मिहिर भोज की मूर्ति का अनावरण होना था। मूर्ति पर “गुर्जर सम्राट मिहिर भोज” लिखा गया, जिस पर राजपूत समाज ने आपत्ति जताई। विरोध प्रदर्शन हुए, पुलिस की तैनाती हुई, और कार्यक्रम में तनाव उत्पन्न हो गया।
इसके बाद मेरठ, नोएडा, मथुरा सहित कई शहरों में भी इसी मुद्दे पर विरोध और मांगें उठीं।
राजनीतिक आयाम
यह मुद्दा सामाजिक और ऐतिहासिक होने के साथ-साथ राजनीतिक भी बन चुका है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में दोनों ही समुदायों का वोटबैंक काफी मजबूत है। इसलिए राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश की है — कभी समर्थन देकर, तो कभी चुप रहकर।
समाधान की जरूरत: साझा विरासत को अपनाएं
इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि सम्राट मिहिर भोज को जातीय चश्मे से देखने के बजाय उन्हें पूरे भारतवर्ष की सांझी विरासत के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
उनका शासन समरसता, शक्ति और धर्म की रक्षा का प्रतीक था। ऐसे में समाज को भी उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर एकता और भाईचारे की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
निष्कर्ष
सम्राट मिहिर भोज जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व को लेकर विवाद करना उस विरासत का अपमान है, जिसे उन्होंने अपने शासनकाल में स्थापित किया था। आज की आवश्यकता यह है कि इतिहास से प्रेरणा लेकर समाज को जोड़ने की पहल हो, न कि जातियों में बांटने की।
