
ग्राउंड रिपोर्ट: Dr.Ravindra Rana/ Rajesh Sharma साथ में Vaibhav Tripathi
ये सिर्फ एक गाँव नहीं है…
ये है उत्तर प्रदेश का भविष्य।
नाम है — नंगला गौसाई, जिला मेरठ। गंगा के किनारे बसा, सात मजरों में फैला, करीब साढ़े चार हजार की आबादी वाला ये गांव अब पहचान बन गया है। पहचान सिर्फ खेतों, खलिहानों या पंचायत भवनों की नहीं, बल्कि सपनों को जमीन पर उतारने की। ये सिर्फ एक गाँव नहीं है… ये है उत्तर प्रदेश का भविष्य। एक ऐसा गाँव, जहाँ बदलाव की बयार बह रही है। ये गांव कैसे यूपी के दूसरे गांवों से अलग है कैसे देश भर में सुर्खियों में है ये दिलचस्प कहानी हम बताएंगे यहां आपको।
गांव की प्रधान हैं सरिता सिंह — जिन्होंने वो कर दिखाया, जो बड़े-बड़े शहरों की पंचायतें भी नहीं कर पाईं।
ना कोई राजनीतिक लोभ , ना कोई पद का लालच। एक घरेलू महिला, जो कभी गृहस्थी संभालती थी, आज गांव को संभाल रही है।

चुनाव लड़ा तो शर्त सिर्फ एक — “अगर पति घर से पैसा लगाने को तैयार हों तो मैदान में उतरूंगी।”
पति अरुण सिंह तैयार हुए। सरिता ने कमाल कर दिया।
मुख्यमंत्री पुरस्कार मिला। 15 अगस्त को दिल्ली बुलाया गया, राष्ट्रीय सम्मान मिला।
और हां, जो बात सबसे अनोखी है — यूपी की पहली पंचायत-नियंत्रित शूटिंग रेंज, इसी गांव में खुली।
अब गांव की बेटियाँ सपनों पर नहीं, सीधे निशाने पर गोली मार रही हैं।
उत्तर प्रदेश की पहली ग्राम पंचायत द्वारा संचालित शूटिंग रेंज भी यहीं है। यहाँ की बेटियाँ अब लक्ष्य केवल सपनों में नहीं, निशाने पर भी साध रही हैं। ग्रामीण खेलों को मिला है एक नया मंच — वो भी पंचायत की पहल से! और ये देखिए — स्मार्ट क्लास! हाँ, आप सही देख रहे हैं।जहाँ कभी तख्ती और टाट की पटटी पर बैठकर पढ़ाई होती थी, आज वहां LED स्क्रीन, प्रोजेक्टर और डिजिटल शिक्षा चल रही है। गाँव अब केवल गाँव नहीं रहा, ये बन रहा है एक स्मार्ट मॉडल विलेज।” नंगला गौसाई ने दिखा दिया कि बदलाव केवल बजट या सुविधाओं से नहीं आता —बदलाव आता है दृष्टि, नेतृत्व और नीयत से। और आज ये गाँव बन चुका है ग्रामीण भारत की प्रेरणा।” क्या आपके गाँव में भी कुछ ऐसा हो रहा है?अगर हाँ, तो हमें बताइए — और अगर नहीं, तो आइए नंगला गौसाई से कुछ सीखते हैं।ये है नया भारत, गाँव से उठती उम्मीदों की आवाज़।”

नंगला गौसाई ग्राम पंचायत मेरठ मंडल में है। यहां से कुछ ही दूरी पर मुरादाबाद मंडल के अमरोहा जिले की सीमा शुरू हो जाती है। उससे कुछ आगे निकलें तो सहारनपुर मंडल के मुजफ्फरनगर जिले के गांव शुरू हो जाते हैं। मवाना तहसील से ये गांव 13 किलोमीटर और मेरठ जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर है। परीक्षितगढ भी करीब 11 किलोमीटर है।
गंगा के किनारे बसे नंगला गौसाई गांव के सात मजरे हैं जो नौ किलोमीटर में फैले हैं। गांव की आबादी करीब 4500 है। जाट, गुर्जर, त्यागी, सिख, कलंदर, जोगी, सपेरे, दलित समेत इसमें भिन्न भिन्न जातियों के लोग रहते हैं। अमरगढ़, गांवडी, वीरनगर, टांडा, मिर्जापुर, डेरे। खादर के ये मजरे आजादी के बाद ही बसे हैं।
हम ग्राउंड रिपोर्ट के लिए गांव की गलियों में घूमते हुए सरिता सिंह के घर पहुंचे तो लगा जैसे किसी कहानी में दाखिल हो गए हों। सरला सिंह गांव की प्रधान हैं, लेकिन उनमें किसी तरह का औपचारिक ठसक नहीं, बल्कि एक आत्मीय गर्मजोशी थी जो सीधे दिल में उतरती है। उनके बड़े से खुले आँगन में घुसते ही सबसे पहले उनकी सहज मेहमाननवाजी ने हमें ठिठका दिया। सरला का परिवार बड़े किसान परिवारों में गिना जाता है — घर का घेर खुला, हवा खाती ऊँची छतें और हर कोने में एक ठेठ देहाती आत्मा सांस लेती हुई दिखी।

करीब पचास बीघे का लीची का बाग है उनके पास, और सच कहें तो उनके पूरे परिवार के व्यवहार में भी वैसी ही मिठास घुली थी जैसी लीची में होती है। गढ़मुक्तेश्वर से बनकर आए बांस के मूढ़े और हुक्का गैलरी की शान थे। दिलचस्प ये कि उनके घर में आमतौर पर कोई हुक्का पीता नहीं, लेकिन आने-जाने वालों के लिए खासतौर पर इसे भरा जाता है — यही तो होती है असली मेहमाननवाजी।
हमें जैसे ही आँगन में बैठाया गया, पानी का गिलास सामने था। सरला सिंह के पति अरुण सिंह जी मुख्य दरवाजे पर खड़े मिले — उम्र में बड़े लेकिन बातों में एकदम विनम्र और अपनत्व भरा लहजा। बोले, “चाय पिएंगे या सीधे नाश्ता करेंगे?” हमने नाश्ते की इच्छा जताई। पंद्रह मिनट में घर की पहली मंजिल की डाइनिंग टेबल पर ऐसा नाश्ता सजा कि मानो गांव की आत्मा थाली में उतर आई हो।
गांव की प्रधान सरिता सिंह ने खुद नाश्ता तैयार कराया था — मक्खन में तरबतर मिस्सी रोटियां, घर का बना मट्ठा, मोटे गुड़ की डली, कटोरी में सफेद मक्खन, जीरा-प्याज में छौंकी हरी मिर्च, धनिया, आम, पुदीना और हरी मिर्च की ताज़ी चटनी, और साथ में सादा लेकिन स्वाद से भरा आलू जीरा। ये वही स्वाद था जो पश्चिमी यूपी के जाट किसानों के घरों में पीढ़ियों से थाली में उतरता रहा है — सादा, पर आत्मा तक जा पहुंचने वाला।

नाश्ते के दौरान सरला की नन्हीं पोती समृद्धि सिंह भी पास आ गई — मेरठ से तीन दिन की छुट्टियों में गांव आई हुई थी। छठी क्लास की छात्रा, पर उसमें भी वही अपनापन और खरेपन की मिठास जो उसके परिवार में पीढ़ियों से बहती आई है। उसी ने हमें नाश्ता परोसा, और जब उसने मुस्कुरा कर कहा, “ एक रोटी और लीजिए न,” तो उसकी उस भोली जिद में ऐसा असर था कि हम सच में एक-एक रोटी ज़्यादा खा गए।

ये सिर्फ एक सुबह का नाश्ता नहीं था, ये गांव की मिट्टी से उठी उस जीवनशैली की झलक थी, जहाँ हर आगंतुक अतिथि नहीं, परिवार का हिस्सा होता है।
गांव के पूर्व प्रधान चौधरी अरुण सिंह पहल बताते हैं, पहले ये गांव लावड के किसी सैयद ने खरीदा था बाद में ये किसी गौंसाई ने ले लिया था। यहां जाट किसान समुदाय के कुछ लोग करीब 200 साल पहले जानी, बदनौली आदि गांवों से आकर बसे हैं। तब इन लोगों ने आपस में पैसा एकत्र करके गुजर बसर के लिए जमीन खरीदी। यहां पहल गोत्र के जाट हैं जिनका एक गांव हापुड में है लुकधाडा। बाकी हरियाणा में रहते हैं।
गांव की प्रधान सरिता सिंह कहती हैं जब ग्राम पंचायत चुनाव आए तो मुझे लोगों ने लडने के लिए कहा। मैंने मना कर दिया। मेरे पास ऐसा कोई अनुभव नहीं था। मैं तो हाउसवाइफ थी। बच्चों को पालपोसकर बडा किया, घर संभाला। लोगों ने चुनाव लडने के लिए कहा तो मैंने अपने पति अरुण सिंह जी से कहा कि प्रधान बनने के बाद अगर आप घर से पैसा लगाने को तैयार हों तो चुनाव लडा जाए। उन्होंने सहमति दी। मुझे तो राजनीति का कोई शौक नहीं था। मुझे गांव वालों ने चुनाव लडाया जिताया। फिर गांव के लिए कुछ नया करने की बात सोची।

सरिता बताती हैं, मन में आया कि गांव में नाली खडंजे तो सब बनाते हैं, मैं इसके साथ कुछ अलग करुंगी। मेरा बेटा अंकुर, बेटियां और बहू सब निशानेबाज हैं। सब शूटर हैं। मुझे याद आया कि क्यों न मैं इस खेल को अपने गांव में ले आऊं क्यों न यहां के बच्चे भी शूटर बन इंटरनेशनल लेवल पर छा जाएं। अभी करीब 50 बच्चे यहां प्रैक्टिस करते हैं।
जब मैं स्कूल का दौरा करने गई तो बच्चों को हाय हैलो करना नहीं आता था। मुझे लगा कि बच्चों को अंग्रेजी में सामान्य बातचीत तो सिखाई जाए। माना कि अंग्रेजी सब कुछ नहीं है पर गांव का बच्चा इसकी वजह से प्रस्तिस्पर्धा में पिछड जाता है।

मैंने गांव में क्या काम कराए ये तो मेरे गांव के लोग मुझसे बेहतर बताएंगे। आप उनसे बात कीजिए। अपनी तारीफ तो कोई भी कर सकता है।
मिशन न्यू इंडिया के तहत स्मार्ट क्लास चला रहे शिक्षक सौरभ सिंह पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से शिक्षण करते हैं। ग्राम पंचायत से उन्हें सिर्फ पांच हजार मानदेय मिलता है। वे एक इंटर कॉलेज में भी पढ़ाते हैं। वह कहते हैं कि जो आत्मसंतुष्टि स्मर्ट क्लास में गरीब परिवारों के छोटे बच्चें को पढाने में मिलती है वो दूसरी जगह नहीं।

सरिता के पति अरुण सिंह कहते हैं कि मैंनें पत्नी को स्वंय काम करने और आगे आने का मौका दिया। उनके किसी काम का क्रेडिट खुद लेने की कोशिश नहीं की। उनकी जगह किसी बैठक में शामिल नहीं हुआ। वो ग्रहस्तथी के कामों से समय निकालकर गांव के कामों में व्यस्त रहती हैं। फैसले खुद लेती हैं। हम उन्हें राय देते हैं।
यह गांव हस्तिनापुर सेंचुरी एरिया में है। हस्तिनापुर, उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित, प्राचीन भारत का एक ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी है, जिसे महाभारत का केंद्र माना जाता है। यह कुरु वंश की राजधानी थी, जहाँ पांडव और कौरव पले-बढ़े और महाभारत की अधिकांश घटनाएँ यहीं से प्रारंभ हुईं। हस्तिनापुर का उल्लेख वेदों, पुराणों और महाभारत में बार-बार आता है, जिससे इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता सिद्ध होती है।

यहाँ अनेक पुरातात्विक अवशेष मिले हैं जो इसे महाभारतकालीन नगर के रूप में प्रमाणित करते हैं। यह जैन धर्म के लिए भी महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है, क्योंकि कई तीर्थंकरों का जन्म या तप इसी भूमि पर हुआ था। आज भी यह स्थल इतिहास, श्रद्धा और संस्कृति का अद्भुत संगम माना जाता है। इस लिहाज से नंगला गौसाई का महत्व और बढ़ जाता है। यहां वेटलैंड भी है जहां हर साल सर्दियों में साइबेरियन पक्षी आते हैं।
इस गांव में सहकारी समिति है जहां किसानों को सस्ता खाद, बीज और कीटनाशक मिलता है। गांव में जिला सहकारी बैंक की शाखा है।
नगला गौसाई गांव के कृष्ण पहल हाईकोर्ट में जज हैं। ये गांव बहुत दिलचस्प है। आपसी विवाद या लडाई झगडे न के बराबर हैं। मनमुटाव होते हैं तो लोग आपस में मिल बैठकर सुलझा लेते हैं। थाने तहसील तक नहीं जाते। कोई विकास के कामों में अडचन डालता है तो लोग उसे समझाबुझाकर मना लेते हैं।

गांव के पूर्व प्रधान अरुण सिंह इसका श्रेय ग्राम प्रधान सरिता सिंह के साथ मुख्य विकास अधिकारी नुपूर गोयल, डीपीआरओ और एडीओ पंचायत को देते हैं। सिंह कहते हैं कि शूटिंग रेंज में ही कैरम बोर्ड, टेबिल टैनिस की सुविधा भी है। मुख्यमंत्री अवार्ड से जो 35 लाख रुपये मिले हैं उससे गांव में एकीकरत विकास भवन बनाया जाएगा।

इसी में सभी सुविधाएं मिलेंगी। गेस्ट हाउस और हॉस्टल भी बनेगा। सिलाई केंद्र, लाइब्रेरी भी बनाएंगे। कंप्यूटर रूम भी बनाएंगे। वह दावा करते हैं कि नंगला गौसाई में ग्राम पंचायत निधि से बनी शूटिंग रेंज रदेश की पहली है। स्मर्ट क्लास रूम और ऑनलाइन इंगलिश स्पीकिंग कोर्स से अब आसपास के 20 से ज्यादा स्कूलों के बच्चे जुड चुके हैं। पीएम के मन की बात भी यहीं स्मार्ट क्लास में सुनाई जाती है। गांव वाले यहां लगे एलईडी में भारत पाकिस्तान युदध पर निगाह बनाए हुए थे। अरुण सिंह कहते हैं कि उनके पाए एक और येाजना है जिसे वो जल्द खोलेंगे। अरुण सिंह खुद भी गांव के प्रधान रह चुके हैं। उन्होंने किठौर विधानसभा से 91 में चुनाव भी लडा था पर तब उस चुनाव का रिजल्ट घोषित नहीं हो पाया।
वह कहते हैं कि सही काम दूसरों तक जाता है तो उससे हौसला मिलता है। इससे दूसरों को प्रेरणा भी मिलती है। गांव बहुत भाग्यशाली है। कृष्ण पहल जो हाईकोर्ट में जज हैं वह गांव का गौरव हैं। करीब पचास साल पहले गांव के ही रकम सिंह हरियाणा में डिग्री कॉलेज में प्रोफेसर हुए थे।
चौधरी शौबीर सिंह ने 62 में कानपुर विवि से एमएसएसी की थी। शौराज सिंह ने करीब सत्तर साल पहले एमएससी एजी की थी। अब बच्चे सेना में और पुलिस में भी जा रहे हैं। अब खेल में जांएगे। प्रधान सरला सिंह के बेटे अंकुर सिंह निशानेबाज हैं और एयर इंडिया में सेवाएं दे चुके हैं। अंकुर ने निशानेबाजी में अंतरराष्टीय स्तर पर पुरस्कर जीते हैं। गांव में शूटिंग रेंज का उदघाटन करने के लिए खुद राष्टीय अनुसूचित जाति जनजाति आयोग के अध्यष्क्ष किशोर मकवाणा, एमएलसी वंदना वर्मा, जिला पंचायत अध्यक्ष गौरव चौधरी आए थे।
पढाई और खेल का जब सामंजस्य होगा तो गांव को आगे बढने से कोई नहीं रोक पाएगा।
एक वक्त जब गांव में कच्ची शराब का अवैध धंधा था। यहां हजारों लीटर कच्ची शराब बनती थी। गांव में बहुत सी जवान विधवाएं हैं। जिनके पति कच्ची शराब पीकर जान गंवा गए। आज प्रधान सरिता सिंह ने गांव में पूर्ण शराबबंदी करा दी है। कोई शराब नहीं बनाता। कहीं कोई भटठी नहीं है। सरला इसे अपनी बढी उपलब्धि मानती हैं।

गांव में तालाब खुदवाए। तालाबों के चारों तरफ जाल लगाए गए ताकि इनमें कोई कूडा न डालने पाए। पहले एक तालाब की बाउंडी वाल कराई दीवार पर कांच लगवाया।

फिर भी बात न बनी तो उपर जाल लगा दिया। नंगला गौसाई के तालाब में बत्तखें विचरण करती हैं। सर्दियों में साइबेरिया से विदेशी पक्षी भी यहां आते हैं।गांव की सभी सडकें सीमेंटेड हैं। कुछ पर टाइल्स लगी हैं। नालियां पक्की हैं। एक रास्ते को चौडा करने के लिए किसान की जमीन के बदले दोगुनी जमीन खुद पूर्व प्रधान चौधरी अरुण सिंह ने दी।

हमने पूरे नौ किलोमीटर में घूमकर गांव के लोगों से भी बात की। हमें सड़क पर ही एक शख्स मिला जो गांव गांव घूमकर ढपली बजाकर गुजारा करता है। वह अक्सर नंगला गौसाई में आता है। उसने कहा कि नंगला गौसाई के लोग बेहद विनम्र और सरल हैं। उनका कोई जवाब नहीं।

गन्ने का जूस बेच रहे एक लडके से हमने पूछा कि नंगला गोसाई की एक अच्छी बात बताओ, वह तपाक से बोला नंगला गौसाई के लोगों की अच्छी बात ये है कि वे जूस पीने से पहले पैसे देते हैं।

आमतौर पर गांवों में वर्तमान और पूर्व प्रधान के बीच तनाव होता है पर यहां ऐसा कुछ नहीं है। गांव के पूर्व प्रधान अशोक ने कहा कि गांव तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन गांव में श्मशान घाट की स्थिति अच्छी नहीं है। इससे बरसात के दिनों में लोगों को दिक्कत होती है।

अशोक ने कहा कि मैंने काफी काम कराए पर मुझसे जो भी छूट गया वो सब सरिता सिंह कर रही हैं। दरअसल इसके लिए करीब 1700 मीटर जमीन की जरूरत है। ग्राम प्रधान सरिता सिंह ने बताया कि वह इसके लिए प्रयास में जुटी हैं।
गांव से कुछ दूरी पर स्थित मां भद्रकाली का यह प्रसिद्ध मंदिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र है। नंगला गोसाईं ही नहीं, बल्कि आस-पास के अनेक गांवों से श्रद्धालु यहाँ पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। विशेष रूप से दूध लेकर मंदिर में चढ़ाने की परंपरा बहुत प्रचलित है।

मान्यता है कि मां भद्रकाली को दूध अर्पित करने से पशु स्वस्थ रहते हैं, उनका दूध बढ़ता है और ब्यांत (प्रसव) भी समय पर होता है। ग्रामीण जीवन और पशुपालन से जुड़े लोगों के लिए यह मंदिर विशेष रूप से महत्व रखता है। प्रत्येक सोमवार को यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, लोग दूर-दराज़ से आकर माता के दर्शन करते हैं और अपनी मनोकामनाएँ लेकर दूध, नारियल व प्रसाद चढ़ाते हैं। मां भद्रकाली का यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक विश्वास का प्रतीक है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और परंपरा का जीवंत उदाहरण भी है।
नंगला गौसाई गांव से गढमुक्तेश्वर की दूरी महज 20 किलोमीटर है। गढ़मुक्तेश्वर की सबसे प्राचीन और प्रमुख मान्यता महाभारत काल से जुड़ी है, जब कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद पांडवों ने अपने परिजनों, गुरुओं और संबंधियों की मृत्यु का पापबोध महसूस किया। युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से इस मानसिक पीड़ा से मुक्ति का उपाय पूछा, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें गंगा तट पर स्थित इस मुक्तिक्षेत्र में आकर गंगा स्नान, पिंडदान और पितरों का तर्पण करने की सलाह दी। पांडवों ने इस स्थान पर आकर विधिपूर्वक तर्पण किया, जिससे उन्हें मानसिक शांति मिली और पितरों को मोक्ष प्राप्त हुआ। तभी से यह स्थान पूर्वजों के तर्पण और मोक्ष के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।








