चुनाव की सरगर्मियों के बीच जब सत्ता की चालें तेज़ होती हैं और नारे हवा में तैरते हैं, तभी बागपत की शांत रातों में कुछ किसानों की नींद में एक पुराना साया उतर आता है — धोती-कुर्ता पहने, गंभीर आँखों वाला एक नेता। चौधरी चरण सिंह। सपनों में आते हैं, चुपचाप कंधे पर हाथ रखते हैं और धीमे से कान में कहते हैं: “ज़मीर मत खोना।” ये कोई कल्पना नहीं, बल्कि उस सच्चाई की स्मृति है जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मिट्टी में अब भी सांस लेती है। यहाँ चौधरी साहब महज़ एक नाम नहीं, एक भरोसे की तरह आज भी खेतों की मेड़ पर टहलते हैं — किसान के आत्मसम्मान और अधिकार के सबसे पुराने और सच्चे प्रहरी की तरह।

बागपत की मिट्टी आज भी चौधरी साहब के कदमों की आहट को पहचानती है। हर घर, हर चौपाल, हर खेत और हर किसान की यादों में एक नाम गूंजता है—चौधरी चरण सिंह। यह सिर्फ एक नेता का नाम नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की उम्मीद, उनका स्वाभिमान और उनका संघर्ष है। जब हमने बागपत के गांव-गांव घूमकर तस्वीरों की शक्ल में यादें समेटीं, तो ऐसा लगा जैसे वक्त ठहर गया हो, चौधरी साहब का साया आज भी उन गलियों में सांस ले रहा हो।

यह कोलाज सिर्फ तस्वीरों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक युग की झलक है—एक ऐसे युग की, जिसमें सत्ता में आकर भी एक इंसान ज़मीन से जुड़ा रहा। जब-जब उन्हें सत्ता मिली, उन्होंने उसे जनता की आवाज़ में बदल दिया। ज़मींदारी के खात्मे से लेकर मंडल कमीशन तक, चौधरी साहब ने हर फैसला गांव, गरीब और किसान के पक्ष में लिया।

उन्होंने सहकारिता खेती पर सवाल उठाकर नेहरू जैसे दिग्गज से टक्कर ली, और जब इंदिरा गांधी के दबाव में संविधान की आत्मा कुचली जाने लगी, तो कुर्सी छोड़ दी लेकिन आत्मसम्मान नहीं। वो चले भी गए तो पीछे छोड़ गए एक ऐसी विरासत, जो किसी दस्तावेज़ में नहीं, बल्कि किसानों की आंखों की चमक और दिल की धड़कनों में बसी है।






और आज भी… जब चुनाव आते हैं, तो बागपत के लोग कहते हैं—“चौधरी साहब फिर से सपना बनकर आते हैं।” कोई दरवाज़ा खटखटाता है मन के भीतर। लोग आज भी वोट डालते हैं, तो उस आहट को सुनकर, उस भरोसे के नाम पर जो चौधरी साहब ने अपने पसीने और संघर्ष से कमाया था।


इस कोलाज के ज़रिए हम उस अमर आवाज़ को महसूस करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसने गांव-गांव जाकर न केवल वोट मांगे बल्कि लोगों से एक-एक “नोट” भी मांगा—जनता के भरोसे से राजनीति को सींचा। चौधरी साहब का यह “पीपल कनेक्ट” आज भी बेमिसाल है।
बागपत के खेड़ा हटाना गांव निवासी देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट बताते हैं कि, “मेरे पूज्य पिता, स्व. महाशय श्रीपाल आर्योपदेशक, पूर्व सरपंच, खेड़ा हटाना (बागपत), किसान मसीहा चौधरी चरणसिंह जी के परम भक्त थे। उन्होंने चौधरी साहब की सैकड़ों सभाओं में अपने स्वरचित स्वागत-गान और भजनों की प्रस्तुति दी। उनके भजनों की सादगी, गहराई और किसान जीवन के प्रति समर्पण ने चौधरी साहब को भी प्रभावित किया। वे स्वयं कहते थे—“महाशय जी के भजन आत्मा को छू जाते हैं।”
महाशय जी ने अपने भजनों का एक संग्रह प्रकाशित कराया था, जिसका शीर्षक था — “सच्चा हीरा: चौधरी चरणसिंह”।
इस पुस्तक का विमोचन स्वयं चौधरी साहब ने मुख्यमंत्री के रूप में बिजरौल गांव की एक सभा में किया था। वह क्षण न केवल हमारे परिवार के लिए, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए गौरव का विषय था।
मुझे स्वयं भी सौभाग्य प्राप्त हुआ कि भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चौधरी चरणसिंह के सान्निध्य में समय बिता पाया।
उनके आंचल की छांव में बैठना मेरे लिए अकल्पनीय और अविस्मरणीय अनुभव रहा।
एक और भावुक स्मृति मुझे आज भी स्पष्ट याद है—
जब मेरे पुत्र वेदव्रत आर्य ने अपनी छोटी सी गुल्लक चौधरी साहब को भेंट की थी, वह भी राष्ट्रीय रक्षा कोष में योगदान के उद्देश्य से।
चौधरी साहब ने उस बालक को दुलारते हुए आशीर्वाद दिया, और यह दृश्य आज भी मेरी आंखों के सामने जीवंत है।
ऐसे क्षण ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।




“किसानों का चौधरी” सिर्फ एक उपाधि नहीं, बल्कि एक यथार्थ है—एक ऐसा यथार्थ, जिसे इस कोलाज में आप तस्वीरों के ज़रिए महसूस करेंगे, और शायद कुछ लम्हों के लिए आप भी बागपत की किसी मिट्टी की खुशबू में खो जाएंगे।



भारत रत्न के असली हकदार को, बागपत की श्रद्धांजलि।

चौधरी चरण सिंह से हमारी पहली मुलाकात का किस्सा:
बागपत के दोघट गांव निवासी एडवोकेट सुनील पंवार और उनकी बहन अनिता सिंह बताती हैं कि सन तो ठीक-ठीक तो याद नहीं, लेकिन वह दौर वही था जब चौधरी चरण सिंह की राजनीति का उदय हो रहा था।
बात बनवाना विधानसभा क्षेत्र की है—शायद वही इलाका रहा होगा।
बाबा अक्सर उस समय की बात सुनाते थे।
उन दिनों हमारे क्षेत्र से फतेहसिंह राणा चुनाव लड़ रहे थे, और उनका दौरा हमारे गांव में भी होना था।
गांव में उनके खिलाफ माहौल था।
दाहा गांव में जब राणा जी प्रचार के लिए आए तो वहां भी लोगों ने उनका विरोध किया।
वे उर दावा से होकर कान्हड़ गांव के रास्ते दोघट की ओर जा रहे थे, क्योंकि तब पुसार रोड नहीं बनी थी।
दाहा में जब विरोध हुआ तो राणा जी अपनी कार में बैठे और वहां से सीधे कान्हड़ होते हुए दोघट पहुंच गए।
लेकिन यहां दोघट में भी लोगों ने विरोध किया।
आप जानते ही हैं उस समय विरोध किस अंदाज़ में होता था — नारे, घेराव, और तीखे शब्द।

हमारा घर गांव के दूसरी ओर पड़ता है।
राणा जी विरोध से बचते हुए गांव की पिछली दिशा से हमारे घर की ओर आ निकले।
उस समय मेरे दादाजी चौधरी जयसिंह जी गांव के चबूतरे पर हुक्का पीते बैठे थे।
दादाजी अतिथि सत्कार और मेहमाननवाज़ी के लिए पूरे इलाके में जाने जाते थे।
जैसे ही उन्होंने राणा जी की कार को आते देखा, वे उठे और सम्मानपूर्वक उनका स्वागत किया।
उन्हें घर के अंदर बैठक में ले जाकर बिठाया।
इतने में गांव की भीड़ भी हमारे घर के सामने एकत्र हो गई, लेकिन दादाजी ने उन्हें समझाया और विरोध कर रहे लोगों को शांतिपूर्वक लौटा दिया।
राणा जी सुरक्षित गांव से निकल पाए।
बाद में उन्होंने यह पूरा वाकया चौधरी चरण सिंह जी को सुनाया।
इस घटना से प्रभावित होकर चौधरी साहब ने मेरे बाबा से मिलने की इच्छा जताई।
उस समय हमारा घर बन तो गया था, लेकिन प्लास्टर नहीं हो पाया था।
बाबा बताते थे कि उस समय प्लास्टर के लिए परमिट की ज़रूरत होती थी।
गांव का इंटर कॉलेज भी बन गया था, लेकिन वहां भी प्लास्टर नहीं हुआ था।
जब फतेहसिंह राणा जी ने बाबा से कहा कि “चौधरी साहब आपसे मिलना चाहते हैं, बताएं कब लेकर आऊं”,
तब बाबा ने जवाब दिया,
“जब तक मेरे घर का प्लास्टर नहीं होता, मैं किसी को अपने घर नहीं बुलाऊंगा।”
उसी समय गांव के वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी पृथ्वी सिंह प्रेमी जी भी बाबा के पास बैठे थे।
कॉलेज और गांव के हालात की बातें भी हुईं।
यह बात चौधरी साहब तक पहुंची।
और उन्होंने तुरंत सीमेंट का परमिट पास करवाया।
घर पर प्लास्टर हुआ।
चौधरी साहब को औपचारिक निमंत्रण भेजा गया।
जब चौधरी साहब घर पधारे, उन्होंने भोजन किया।
उन्हें दोपहर में सोने की आदत थी, यह बात राणा जी ने पहले ही बाबा को बता दी थी।
इसलिए बैठक में कपड़े का खींचने वाला पंखा लगाया गया था।
चौधरी साहब भोजन के बाद विश्राम करने के लिए बैठक में गए।
बाबा ने दो लड़कों को पंखा झलने के लिए बैठक में बिठा दिया और खुद बैठक के बाहर गैलरी में बैठ गए।
इसी दौरान गांव में यह खबर फैल गई कि चौधरी चरण सिंह हमारे गांव आए हैं।
लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया, लेकिन बाबा ने सबको कहा:
“जब तक चौधरी साहब खुद न उठें, कोई उन्हें परेशान नहीं करेगा।”
पिताजी मास्टर रणसिंह पंवार ने उनके आगमन को ध्यान में रखते हुए पहले से एक फोटो फ्रेम तैयार करवाया था,
जो उन दिनों बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।
चौधरी साहब ने वह फोटो देखी और उस पर हस्ताक्षर करते हुए कहा:
“इसे तुम अपने घर में मेरी यादगार के रूप में रखना।”

बाद में जब चौधरी जयंत सिंह ने वह फोटो देखा, तो उसे लेने की इच्छा जताई,
लेकिन भाई सुनील पंवार ने मुस्कुराते हुए वह बात हंसी में टाल दी।
अनिता सिंह बताती हैं कि जब भी चौधरी चरण सिंह मेरठ आते थे,
उन्हें मेरठ शहर की खलीफा की जलेबियां बहुत पसंद थीं।
यह स्वाद उन्हें बार-बार खींच लाता था।

वो याद करते हुए कहती हैं,
“जब मेरे ससुरजी दिल्ली जाते थे, तो लौटते समय अक्सर कहा करते थे—
‘चौधरण के हाथ के पूड़े नहीं लाए शेरसिंह? खाली हाथ मत आया करो!’”
इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि
चौधरी साहब और उनके परिवार के साथ रिश्ते कितने आत्मीय और घरेलू थे।
वे आगे बताती हैं,
“रक्षापुरम में हमारा एक बाग हुआ करता था।
चौधरी साहब अक्सर उस बाग में आते थे।
हमारे घर से उनके लिए खाना जाता था, और वे वहीं बाग में बैठकर सादगी से भोजन करते थे।
कई बार दोपहर का आराम भी वहीं किया करते थे।”
यह संस्मरण चौधरी साहब की उस छवि को सामने लाता है
जो सत्ता में रहकर भी धरती से जुड़ी,
रिश्तों को निभाने वाली,
और साधारण जीवन जीने वाली थी।






मेरठ और बागपत जिला तब एक ही हुआ करता था। मवाना निवासी चौधरी अचल सिंह वर्मा चौधरी साहब के बेहद करीबी थे। उनके पुत्र अतुल वर्मा बताते हैं कि पिताजी ने भी चौधरी चरण सिंह की अनेक तस्वीरें घर में सहेजकर रखीं थीं। जब चौधरी साहब मेरठ आते तो वर्मा जी उनके साथ साथ होते।











इस गैलरी की सभी तस्वीरों में चौधरी चरण सिंह के साथ चौधरी अचल सिंह वर्मा भी दिखाई दे रहे हैं।
आरएलडी प्रोफेशनल मंच बागपत के जिलाध्यक्ष अश्वनी तोमर बताते हैं, ”सन् 1980–81 की बात है। मेरे पिताजी सूबेदार अनंगपाल सिंह जी के साथ हमारे निवास स्थान बागपत में किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह जी पधारे। वो हमारे घर पूरे प्रेम से आए। घर का कोना-कोना देखा, यहाँ तक कि पशुओं के छप्पर तक का निरीक्षण किया।
मैं आज भी नहीं भूलता कि करीब डेढ़ सौ मीटर लंबी उस गली में चौधरी साहब पैदल चलकर आए थे। पुलिस प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा कारणों से मना किया था, लेकिन उन्होंने साफ कहा—
“ये मेरा कार्यकर्ता है, मैं ज़रूर जाऊंगा।”
चौधरी साहब का हमारे घर आना हमारे पूरे परिवार के लिए सौभाग्य की बात थी। वो सिर्फ नेता नहीं थे, वो कार्यकर्ताओं के मन में बसने वाले नेता थे। उनका आना, घर में घूमना, छप्पर तक जाना—यह सब आज भी आंखों के सामने ताजा है।
ऐसी महान आत्मा का हमारे जैसे छोटे कार्यकर्ता के घर पधारना, वह भी दो बार—ये पल हमारे परिवार के लिए हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे।”





मेरठ के अब्दुल्लापुर गांव निवासी सिब्ते अब्बास कहते हैं, ”कुछ रिश्ते वक्त से नहीं, संवेदनाओं और सरोकारों से बनते हैं।
ऐसा ही एक रिश्ता चौधरी चरण सिंह जी के परिवार और मेरठ के अब्दुल्लापुर गांव के बीच वर्षों से बना हुआ है — एक रिश्ता, जो केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक, भावनात्मक और ऐतिहासिक है।
साल 1950…देश आज़ादी के बाद अपने पहले दशक में था। गांव-गरीब, किसान-मज़दूर के पक्ष में अपनी सशक्त आवाज़ उठाने वाले भारत रत्न स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह जी अब्दुल्लापुर गांव में तशरीफ लाए। उनका स्वागत केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि अपनेपन से किया गया। गांव के हर बुजुर्ग और नौजवान ने उन्हें अपना माना। यह दौरा केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं, एक रिश्ते की शुरुआत थी।


फिर 1993 में, उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उनके सुपुत्र स्वर्गीय चौधरी अजित सिंह अब्दुल्लापुर आए। उस समय देश बदल रहा था, पर अब्दुल्लापुर की आत्मीयता वही थी। चौधरी अजित सिंह को भी गांव ने उसी आत्मीयता से अपनाया, जैसे उनके पिता को अपनाया था। घरों के दरवाज़े खुले थे, दिलों के रास्ते पहले से ही तैयार थे।
फिर आई 2012 की सुबह, जब तीसरी पीढ़ी के प्रतिनिधि आदरणीय चौधरी जयंत सिंह जी अब्दुल्लापुर पहुंचे। यह केवल एक दौरा नहीं था, बल्कि एक परंपरा की निरंतरता थी। गांव के लोगों ने उन्हें भावनाओं से भरे मन से देखा — एक बेटा, जो अपने दादा और पिता की परंपरा को निभाने आया था।
आज अब्दुल्लापुर के निवासी सिब्ते अब्बास जब यह कहते हैं कि “हमारा चौधरी साहब के परिवार से चार पीढ़ियों का संबंध है”, तो यह कोई अलंकार नहीं, बल्कि इतिहास की एक जीवित परंपरा है — जो जुड़ी है किसान चेतना, सामाजिक न्याय और आपसी विश्वास की डोर से।
यह संस्मरण इस बात की गवाही है कि सच्चे नेता केवल चुनावी वादों से नहीं, लोगों के दिलों में बसे रिश्तों से पहचाने जाते हैं। और चौधरी साहब का परिवार अब्दुल्लापुर के लोगों के दिलों में आज भी उसी श्रद्धा से बसा हुआ है।

डीएन कॉलेज मेरठ के छात्र संघ अध्यक्ष रहे भानुप्रताप बताते हैं, ”कि मेरे ताऊजी मदन चौधरी उन दिनों छात्र राजनीति के एक तेजस्वी और लोकप्रिय चेहरा थे। साल था 1974 और मंच था डीएवी कॉलेज मुज़फ्फरनगर, जहां उन्हें छात्र संघ अध्यक्ष चुना गया। उस समय यह पद केवल एक प्रतिष्ठा नहीं था, बल्कि ज़िम्मेदारी और जनसरोकारों से जुड़ी हुई भूमिका थी।
मदन ताऊजी की जड़ें एक ऐसे परिवार से थीं जिसने समाज सेवा को अपना धर्म बनाया। उनके पिता चौधरी दिलावर सिंह, जो ताजपुर सिंभालका (जिला शामली) से लगातार 25 वर्षों तक निर्विरोध प्रमुख रहे, अपने समय में लोगों के हितों के लिए प्रतिबद्ध और स्वाभिमानी नेतृत्व के प्रतीक माने जाते थे। इसी परंपरा को ताऊजी ने युवावस्था में ही आत्मसात कर लिया।
मुझे याद है जब ताऊजी ने बताया था कि चौधरी चरण सिंह जी कॉलेज में पधारे थे। वह केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि किसानों, ग्रामीण भारत और छात्र चेतना के प्रतीक बन चुके थे। उस दिन कॉलेज में अलग ही माहौल था — गेट से लेकर सभागार तक छात्रों की भीड़, उत्साह और गर्व का वातावरण।
ताऊजी को उस कार्यक्रम में चौधरी साहब का स्वागत करने का अवसर मिला। उन्होंने जिस गरिमा और आत्मविश्वास से मंच पर उनका अभिनंदन किया, वह क्षण कॉलेज के इतिहास में दर्ज हो गया। यह कोई साधारण औपचारिकता नहीं थी — यह दो विचारधाराओं, दो पीढ़ियों और दो संघर्षशील व्यक्तित्वों का मिलन था। एक ओर थे आज़ादी के बाद भारत को गांवों की ताकत से जोड़ने वाले राष्ट्रनायक, दूसरी ओर थे गांव से निकले एक युवा छात्र नेता, जो उन्हीं मूल्यों को लेकर आगे बढ़ रहा था।
ताऊजी के लिए वह क्षण केवल एक मुलाकात नहीं था — वह प्रेरणा का संकल्प बन गया। उन्होंने जीवनभर उस आत्मीयता और दायित्व को महसूस किया, जो उस दिन उन्हें चौधरी साहब की उपस्थिति में मिला।
आज जब मैं अपने छात्र जीवन को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो यह सोचकर गर्व होता है कि मैं उस विरासत का हिस्सा हूँ, जिसमें नेतृत्व का अर्थ केवल पद नहीं, बल्कि जनभावना की सेवा और विचारों की ईमानदारी होता है।
1974 की वह मुलाकात, मेरे ताऊजी मदन चौधरी और चौधरी चरण सिंह के बीच, आज भी हमारे परिवार और क्षेत्र की स्मृतियों में एक दीपशिखा की तरह जल रही है — जो आने वाली पीढ़ियों को दिशा देती रहेगी।”
