
वारिस से बाग़ी तक — चौधरी चरण सिंह के ‘बेटे’ की दास्तान
सत्ता की सीढ़ियाँ, टूटी रिश्तों की डोर — सत्यपाल मलिक का सफ़र
हुकूमत को ललकारने वाला अकेला सियासतदान — सत्यपाल मलिक

बागपत के हिसावदा गांव से निकला एक लड़का, जिसने पिता को दो साल की उम्र में खो दिया और मां की गोद में पलकर बड़ा हुआ। बचपन से ही अकेलेपन की परछाई उसके साथ रही।
मां ने पाल-पोसकर पढ़ाया, घर की तीस बीघा जमीन और पुश्तैनी हवेली के चार कमरे उसके हिस्से में आए। पर जिंदगी के बड़े हिस्से में उसके पास रिश्तों की गर्माहट कम और संघर्षों की ठंडक ज्यादा रही।

गांव के स्कूल से पढ़ाई शुरू हुई, मेरठ कॉलेज तक पहुंचा। वहीं से डिबेट का शौक और फिर छात्र राजनीति का जुनून।
1968-69 में मेरठ कॉलेज का पहला सीधा चुनाव जीतकर छात्रसंघ अध्यक्ष बने। 28 साल की उम्र में बागपत से विधायक — यह कोई साधारण बात नहीं थी।

चौधरी चरण सिंह ने उन्हें अपना वारिस कहा, “बेटा” कहा। लेकिन यहीं से शुरू हुई वह कहानी जिसमें महत्वाकांक्षा के लिए रिश्ते पीछे छूटते गए।
सत्ता की सीढ़ियां और रिश्तों की गिरहें

चौधरी साहब ने विधानसभा भेजा, फिर राज्यसभा।
पर इंदिरा गांधी के नजदीक होते गए तो वही चौधरी साहब जिन्होंने बेटा कहा था, उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निकालना पड़ा।

कांग्रेस ने राज्यसभा भेजा, पर बोफोर्स घोटाले में राजीव गांधी के खिलाफ वीपी सिंह के साथ हो लिए।
जनता दल आया, तो अलीगढ़ से सांसद बने और केंद्र में मंत्री भी। फिर समाजवादी पार्टी, फिर भाजपा।

हर मोड़ पर पार्टी बदली, रिश्ते बदले। नेताओं से बगावत की।
चौधरी चरण सिंह, राजीव गांधी, वीपी सिंह या नरेंद्र मोदी — किसी से भी स्थायी मेल नहीं रहा।
सत्ता की सीढ़ियां जरूर चढ़ीं, पर हर पायदान पर एक अपनों को खोते गए।

घर में भी अकेलापन
सिर्फ राजनीति ही नहीं, निजी जीवन में भी यही अकेलापन रहा।
मेरठ कॉलेज में प्रेम विवाह किया। प्रोफेसर इकबाल कौर से शादी हुई। एक बेटा देव कबीर हुआ।

लेकिन तीन दशक से पत्नी और बेटा उनसे अलग गुरुग्राम में रहे। संवाद खत्म। क्यों खटास आई, कोई नहीं जानता। न मलिक बोले, न इकबाल।
गांव हिसावदा में भी वे केवल औपचारिक रूप से जाते।
बीते तीस साल में गवर्नर बनने के बाद एक बार गांव पहुंचे। उनका सामाजिक नेटवर्क सिमटता गया।

गवर्नर बने तो सुर्खियां मिलीं
2017 से 2022 तक बिहार, ओडिशा (अतिरिक्त प्रभार), जम्मू-कश्मीर, गोवा और मेघालय — चार राज्यों के राज्यपाल रहे।
जम्मू-कश्मीर के आखिरी गवर्नर बने। उनके कार्यकाल में 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाया गया। यह ऐतिहासिक फैसला उनके नाम से जुड़ गया।

लेकिन सवाल भी उठे। पुलवामा हमले पर चुप्पी क्यों साधे रहे जब गवर्नर थे? बाद में क्यों बोले?
किसान आंदोलन में किसानों के हक में खुलकर बोले, लेकिन मोदी सरकार के खिलाफ खड़े होने के कारण भी आलोचना झेली।

अंत का अकेलापन
11 मई 2025 को दिल्ली के आरएमएल अस्पताल में भर्ती हुए।
किडनी की समस्या और अन्य बीमारियों से जूझते रहे।
5 अगस्त 2025 को वो पंचतत्व में विलीन हो जाएँगे।

पत्नी-बेटा दूर, पुराने दोस्त दूर।
सोशल मीडिया पर जरूर उनके समर्थक थे, पर असल जिंदगी में गिने-चुने लोग ही साथ बचे थे।
एक नेता, जो भीड़ में भी अकेला रहा

सत्यपाल मलिक की कहानी केवल राजनीति की ऊंचाइयों और गिरावटों की कहानी नहीं है। यह उस अकेलेपन की दास्तान है, जो बचपन से उनके साथ था और आखिरी सांस तक साथ रहा।

28 साल की उम्र में विधायक, राज्यसभा, लोकसभा, एक वक्त चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक वारिस का तमग़ा , चार राज्यों के गवर्नर, अनुच्छेद 370 का ख़ात्मा — सब उपलब्धियां उनके खाते में रहीं।
लेकिन रिश्तों की परिभाषा में वे खाली रह गए।

सत्ता की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते उन्होंने अपने नेताओं से बगावत की। हर बार।
नतीजा यह हुआ कि अंतिम समय तक उनके पास सत्ता का ताज तो था, पर अपनेपन की छांव नहीं।

सत्यपाल मलिक की जिंदगी हमें यह सिखाती है कि राजनीति की ऊंचाई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर रिश्ते टूट जाएं, तो इंसान भीड़ में भी अकेला रह जाता है।

हालांकि इन सबके बावजूद सत्यपाल मलिक हमेशा याद किए जाएंगे अपनी बेबाकी के लिए।
अपने नेताओं के खिलाफ बगावत के लिए।
उनका रिकॉर्ड यही रहा कि उन्होंने ताकतवर नेताओं की सत्ता को खुलकर चुनौती दी।
वे याद किए जाएंगे अपने धारदार भाषणों के लिए, छात्र आंदोलनों के लिए, करन थापर और राहुल गांधी को दिए इंटरव्यू के लिए।

जब-जब चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक वारिसों का नाम लिया जाएगा, तो सत्यपाल मलिक को भी उसके साथ जोड़ा जाएगा।
उनकी सक्सेस स्टोरी भी लोगों के जेहन में रहेगी — जमींदारों के गांव हिसावदा में एक मामूली किसान परिवार से निकला एक बालक कैसे सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा और वहां से हुकूमत को ललकारने का साहस दिखाया, इसके लिए भी वे अमर रहेंगे।

वो याद किए जाएंगे इस बात के लिए भी कि जब पूरी हुकूमत किसान आंदोलन को बदनाम करने में लगी थी, तब वे किसानों के साथ खड़े थे—खुलकर, बेझिझक।

अपनी ही पार्टी, अपनी ही सरकार और उसी पद की गरिमा के खिलाफ बोलते हुए भी उन्होंने किसानों का पक्ष लिया।

यह बताता है कि महत्वाकांक्षाओं की दौड़ में भले उनके रिश्तों की डोर कमजोर पड़ गई हो, लेकिन गांव और किसान से उनका सरोकार उनकी अंतरआत्मा में हमेशा जिंदा रहा।
आख़िरी वक्त में तो यह नाता और भी मज़बूत होकर सामने आया।
सत्यपाल मलिक साहब को विनम्र श्रद्धांजलि!

