ये कोई कहानी नहीं है। ये आपके मोहल्ले की, आपके गांव की, आपके घर की बात है। अस्पताल के बाहर भीड़ है, लेकिन भीतर न डॉक्टर है, न दवा, न मशीन। मां का ऑपरेशन टल गया क्योंकि जनरेटर में डीज़ल नहीं था। बेटे का एक्सरे ज़मीन पर लेटाकर हुआ, क्योंकि टेबल नहीं थी। और कोई बुजुर्ग इस इंतज़ार में चला गया कि कोई इलाज शुरू करेगा… शायद कभी।
मेरठ से खबर आई …NCR मेडिकल कॉलेज में CBI का छापा पड़ा।
क्यों पड़ा?
क्योंकि 50 MBBS सीटें बढ़ाने के नाम पर करोड़ों के खेल कि खबर आई .मेडिकल एजुकेशन अब सेवा नहीं, सौदा बन चुकी है। कॉलेज खोलने का मतलब अब मशीन नहीं, मंत्री चाहिए।
बिजनौर से तस्वीर आई — मरीज को ज़मीन पर लिटाकर एक्सरे किया जा रहा था।
बिजली चली गई थी।
जनरेटर में तेल नहीं था।
और एक मरीज जो वेंटिलेटर पर था… उसकी मौत हो गई।
उसकी साँसें सिस्टम के भरोसे नहीं चल सकीं।
बागपत के बूढ़पुर गांव में एक के बाद एक लाशें उठीं।
सीएमओ बोले ,
“मेरे पास न हार्ट का डॉक्टर है, न कैंसर का, न हड्डियों का। मैं क्या करूं?”
अब सुनिए वो आंकड़े जो शायद आपको नींद नहीं लेने देंगे।
इस देश में 22 लाख बच्चे NEET की परीक्षा देते हैं।
12 लाख पास करते हैं।
लेकिन MBBS की सीटें हैं सिर्फ 1 लाख 18 हज़ार।
यानी हर नौ में से आठ बच्चों का सपना कुचल दिया जाता है।
क्यों?
क्योंकि सरकारी सीटें हैं ही नहीं।
और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में फीस है 20 लाख रुपये सालाना।
डोनेशन मांगा जाता है 50 लाख से डेढ़ करोड़ तक।
डॉक्टर बनने के लिए अब योग्यता नहीं, जेब चाहिए।
जो बन गए डॉक्टर, वो कहां हैं?
भारत में कुल 17 लाख डॉक्टर हैं।
पर इनमें से ज़्यादातर शहरों में हैं।
देश की 64 फीसदी आबादी गांवों में है। लेकिन वहां सिर्फ 26 फीसदी डॉक्टर हैं।
शहरों में एक डॉक्टर 440 लोगों के लिए है।
गांवों में एक डॉक्टर को 2,100 से ज़्यादा लोगों का इलाज करना होता है।
अब आप ही बताइए – बागपत, बिजनौर, बुंदेलखंड, बलिया… इन जगहों पर अगर हार्ट अटैक हो जाए तो किसके पास जाया जाए?
अब बात बीमारियों की जो घर-घर में घुस चुकी हैं।
शुगर – साढ़े सात करोड़ लोग
दिल की बीमारी – साढ़े पांच करोड़
हर साल कैंसर के – 15 लाख नए मरीज
किडनी की बीमारी – लाखों मरीज डायलिसिस पर
लेकिन इलाज?
सरकारी अस्पताल में लाइन, प्राइवेट में लूट।
हमारे देश में हेल्थ पर खर्च कितना है?
GDP का सिर्फ 2.1 फीसदी।
अमेरिका 17 फीसदी खर्च करता है।
फ्रांस 12.5 फीसदी।
चीन 5.3 फीसदी।
हम 140 करोड़ लोगों के इलाज में वो खर्च नहीं करते जितना एक एक्सप्रेसवे बनाने में करते हैं।
अब सुनिए उस भ्रष्टाचार की कहानी जो सड़ी हुई जड़ है इस सिस्टम की।
मेडिकल कॉलेज खोलना मतलब अब शिक्षा नहीं, सत्ता का सौदा है।
दवा कंपनियां डॉक्टर को कमीशन देती हैं – 100 की दवा को 500 में बेचो।
जांच (टेस्ट) के नाम पर निजी लैब से 30-50% का कमीशन लिया जाता है।
कई बार बेवजह ICU में भर्ती कर लेते हैं ताकि बिल बढ़ सके।
हॉस्पिटल अब मंदिर नहीं रहे। अब वहां कमाई की आरती होती है।
भारत में इलाज अब सेवा नहीं, संघर्ष है।
गरीब आदमी अपने घर की छत गिरने पर बच जाता है,
पर अगर बच्चा बीमार हो जाए तो कर्ज लेकर भी इलाज नहीं करा पाता।
एक महिला कैंसर से जूझ रही है, पर अस्पताल 300 किमी दूर है।
एक किसान का ऑपरेशन रुक जाता है क्योंकि अस्पताल में बेहोशी की दवा खत्म है।
फर्क देखिए…
फ्रांस में औसतन लोग 82 साल जीते हैं।
अमेरिका में 79 साल।
चीन में 77 साल।
भारत में 70 साल।
क्यों?
क्योंकि वहां डॉक्टर इलाज करता है।
यहां डॉक्टर पहले पूछता है – “कार्ड है? पैसे हैं? सिफारिश है?”
समाधान क्या है?
सरकारी मेडिकल कॉलेज बढ़ाइए।
गांव में काम करने वाले डॉक्टर को सम्मान और वेतन दीजिए।
जन औषधि की दुकानों को हर पंचायत तक ले जाइए।
नीट की सीटें बढ़ाइए और प्राइवेट मेडिकल एजुकेशन पर लगाम लगाइए।
और सबसे जरूरी – इस सिस्टम को इंसानियत दीजिए।
जब मां की मौत सिर्फ इसलिए हो जाए कि अस्पताल में जनरेटर में डीजल नहीं था,
जब बच्चा सिर्फ इसलिए मर जाए कि एक्सरे मशीन नहीं चली,
जब कैंसर का इलाज सिर्फ अमीरों के लिए हो जाए –
तो ये देश सिर्फ बीमार नहीं है, मृत्युशैया पर है।
कौन बचाएगा शिक्षा को?
NEET, NMC, NAAC और अब CBI – हर दरवाज़े के पीछे सौदेबाज़ी
एक चिट्ठी से शुरुआत हुई थी, जिसमें लिखा था कि “कॉलेजों को ग्रेड ऐसे नहीं, सौदे में मिल रहे हैं।” और चिट्ठी लिखने वाला कोई मामूली आदमी नहीं था — डॉ. भुवन पटवर्धन, देश की शीर्ष संस्था NAAC के कार्यकारी अध्यक्ष। उन्होंने खुद बताया कि किस तरह कुछ विश्वविद्यालय और कॉलेज ICT, DVV और पीयर टीम विज़िट जैसी प्रक्रियाओं में हेरफेर कर रहे हैं।
उन्होंने मांग की कि इस पूरे सिस्टम की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। लेकिन हुआ उल्टा। यूजीसी ने उनकी मंशा को इस्तीफा मान लिया, और कुछ ही दिनों में उन्हें हटा दिया गया।
इससे बड़ा सबूत क्या चाहिए कि कुछ न कुछ गंभीर रूप से गड़बड़ है?
लेकिन अब ज़रा मेरठ की तरफ आइए।
NCR मेडिकल कॉलेज का मामला, जिसने पूरी व्यवस्था की चूलें हिला दीं।
CBI ने छापा मारा — और वो भी कहीं और नहीं, NCR मेडिकल कॉलेज के संचालक के ठिकानों पर। और जो सामने आया, उसने सबको हैरान कर दिया।
CBI को शक है कि कॉलेज प्रबंधन 100 MBBS सीटों को 150 करवाने की जुगत में था। लेकिन ये काम सीधा नहीं था —
इसके लिए NMC, एक प्राइवेट मूल्यांकन एजेंसी और कॉलेज संचालक के बीच “गठजोड़” का शक जताया गया।
यानी, मेडिकल की सीटें सिर्फ मेहनत और बुनियादी ढांचे से नहीं, “सिस्टम मैनेज” करके बढ़ाई जा रही थीं।
CBI की जांच अभी जारी है, लेकिन इशारा साफ है—
NMC जैसी शीर्ष संस्था तक को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।
अब NEET की बात करें।
किसी गरीब के बच्चे के लिए NEET का मतलब होता है—सालों की मेहनत, कोचिंग का खर्च, उम्मीदों का बोझ।
लेकिन उसी NEET में अब पेपर लीक, रैकेट, धांधली — आम शब्द बन चुके हैं।
राजस्थान से बिहार, और अब गुवाहाटी से दिल्ली तक — हॉल से पहले ही पेपर बाहर। OMR शीट बदली जाती है, सेंटर से मिलीभगत होती है।
जो करोड़ों में खेलते हैं, वो रैंक भी खरीद लेते हैं — और सीट भी।
अब NAAC की तरफ लौटते हैं।
यही संस्था तय करती है कि कौन सा कॉलेज “A++” है, कौन “B”।
यहाँ भी वही कहानी—SSR रिपोर्ट में झूठ, फर्जी आंकड़े, और पीयर टीम को मैनेज करना।
डॉ. पटवर्धन ने इसी पर सवाल उठाया था।
उनके मुताबिक, कुछ संस्थानों को बार-बार टीम विज़िट का मौका मिलता है, जबकि कई योग्य संस्थानों को कभी नहीं।
और ये सब उस “गठजोड़” की देन है जिसमें पैसा, पहचान और पहुँच—सब कुछ बिकता है।
और जब हम सोचते हैं कि इससे ज़्यादा क्या हो सकता है, तो सामने आता है—हापुड़ की मोनाड यूनिवर्सिटी का मामला।
यहाँ तो सारी हदें पार हो गईं।
STF ने जब छापा मारा, तो पाया कि वहाँ तो डिग्री बिक रही थी —
ना दाख़िला, ना पढ़ाई, ना परीक्षा।
बस पैसे दो और डिग्री लो — वो भी फर्जी।
MBBS, B.Ed, BA, MBA — जो चाहिए।
कोई फॉर्म नहीं, कोई क्लास नहीं, कोई उपस्थिति नहीं।
बस रेट लिस्ट थी और एक नेटवर्क जो यूपी, बिहार, झारखंड, बंगाल तक फैला था।
तो क्या यही है ‘नया भारत’ की शिक्षा व्यवस्था?
आज के दौर में,
एक कॉलेज मालिक करोड़ों की गाड़ी में चलता है, नेताओं के साथ फोटो खिंचवाता है,
मंत्री तक को ‘भाई साहब’ कहकर बात करता है,
और जब सीटें बढ़वानी हों, तो मंत्रालय तक “संदेश” पहुँच जाता है।
कभी यह सब राजनीति के पीछे छिपा रहता था, अब खुलेआम है।
ये माफिया अब सिर्फ दलाल नहीं, नीति निर्धारक भी बन गए हैं।
वो तय करते हैं कि कौन पढ़ेगा, कौन डिग्री पाएगा, और कौन डॉक्टर या इंजीनियर बनेगा।
और आम आदमी?
वो NEET की कोचिंग में घर बेचकर बच्चा पढ़ा रहा है,
वो सोच रहा है कि 650 नंबर लाने पर भी सीट क्यों नहीं मिली,
उसे नहीं पता कि सीट पहले ही बेच दी गई थी।
यह अब शिक्षा का संकट नहीं, देश के भविष्य का संकट है।
अगर ये सिलसिला नहीं रुका,
तो देश में डिग्रीधारी तो होंगे, लेकिन योग्य नहीं,
डॉक्टर होंगे, लेकिन जानलेवा,
और कॉलेज होंगे, लेकिन ज्ञानशून्य।
अब सवाल ये नहीं कि सिस्टम में गड़बड़ी है या नहीं —
सवाल ये है कि क्या कोई बचाने वाला है भी या सबने चुप्पी खरीद ली है ।
शिक्षा में दलाली का ‘इंस्पेक्शन मॉडल’: होटलों में ठहरते हैं एक्सपर्ट, पैकेज में बिकता है नैतिकता का शव
जिसे सभ्य समाज ‘कंसल्टेंसी’ कहता है, वो असल में शिक्षाक्षेत्र की सबसे व्यवस्थित दलाली है। सरकारी सेवाओं से रिटायर हुए कुछ प्रोफेसर अब “एजुकेशन ब्रोकिंग सिस्टम” के मुख्य धुरी बन चुके हैं। पेंशन अलग, परामर्श शुल्क अलग—और जब मुनाफा तिजोरी से छलकने लगे, तो सत्य, नीति और मूल्य जैसे शब्द शब्दकोश में ही अच्छे लगते हैं।
ये ‘कंसल्टेंसी एजेंसियां’ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए वह ठेका उठाती हैं जो सीधे-सीधे किसी इंस्पेक्शन या मान्यता का नहीं, बल्कि “सेटिंग” और “मैनेजमेंट” का होता है। वे न सिर्फ तारीख तय करती हैं, बल्कि निरीक्षण पैनल तक अपनी पसंद से बनवाती हैं—जैसे कोई ईवेंट कंपनी हो जो VIP मेहमान तय कर रही हो।
डॉ. शिवानी का मामला कोई अपवाद नहीं, चलन का हिस्सा है
डॉ. शिवानी की व्हाट्सएप चैट जब CBI को मिली, तो साफ हो गया कि कॉलेज के निरीक्षण की तारीख पहले ही सेट कर दी गई थी। स्टाफ को छुट्टियों से बुला लिया गया था—यानि ये पूरा मामला ‘प्लांड ड्रामा’ था। सीबीआई को यह भी संदेह है कि शिवानी ही कॉलेज और कंसल्टेंसी के बीच पुल का काम कर रही थीं।
शानदार होटलों में ठहरते हैं ‘शिक्षा विशेषज्ञ’, पैकेज में होता है सबकुछ
ये तथाकथित विशेषज्ञ जिनका काम कॉलेजों की गुणवत्ता जांचना होता है, उन्हें सरकारी एजेंसी से पैसा मिलता है, और कंसल्टेंसी एजेंसी से भी। दोनों ओर से मलाई। ऊपर से होटलों में शानदार ठहराव, महंगे खाने, उपहारों और कुछ विशेष ‘सुविधाओं’ तक की व्यवस्था—सब कुछ पैकेज में शामिल होता है। जिसे देख कर लगता है कि ये निरीक्षण नहीं, किसी सेमिनार टूरिज्म का हिस्सा है।
रिपोर्टें भी तैयार मिलती हैं, सवाल कोई नहीं करता
कई बार तो ‘इंस्पेक्टर’ साहब कॉलेज के कैंपस में पैर रखे बिना रिपोर्ट जमा कर देते हैं। क्योंकि पैकेज का हिस्सा है—”कोई सवाल नहीं, कोई संदेह नहीं”। सबकुछ तय है, सबकुछ मैनेज है।
अब इस पूरे खेल में कॉलेज मालिक खुश, अफसर संतुष्ट, और रिटायर्ड प्रोफेसर फिर से युवा—मात्र छात्रों और अभिभावकों को नहीं पता कि उनका भविष्य किस लुका-छिपी के खेल में दांव पर लगा है।
शिक्षा अब मंदिर नहीं, दलाली की मंडी है। यहाँ नैतिकता सिर्फ शो-पीस है और इंस्पेक्शन ‘पेड हॉलीडे पैकेज’।
