राजस्थान के शिव विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने हाल ही में विधानसभा के अंदर कहा कि विश्वविद्यालयों में कुलपति पद पर आसीन होने के लिए ‘सूटकेस’ लाने की प्रथा है। उनका यह बयान शिक्षा जगत में चर्चा का विषय बन गया है।
कौन हैं रविंद्र सिंह भाटी

रविंद्र सिंह भाटी का जन्म 3 दिसंबर 1997 को बाड़मेर जिले के दुधोड़ा गांव में हुआ था। छात्र राजनीति में सक्रिय रहते हुए, उन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष पद के लिए निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की, जो विश्वविद्यालय के 57 वर्षों के इतिहास में पहली बार हुआ। इसके बाद, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) जॉइन की, लेकिन शिव विधानसभा सीट से टिकट न मिलने पर पार्टी से बगावत कर दी और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। उन्होंने कांग्रेस के पूर्व मंत्री अमीन खान को हराकर विधानसभा में प्रवेश किया।
‘बड़ी अटैची लाने वाले बनते हैं कुलपति’- भाटी
निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने हाल ही में राजस्थान विधानसभा में एक विवादास्पद बयान दिया, जिसमें उन्होंने कुलपति नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। भाटी का कहना था कि राजस्थान के विश्वविद्यालयों की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है और योग्य शिक्षाविदों को कुलपति बनने का मौका नहीं मिल रहा। उनके मुताबिक, आजकल कुलपति बनाने का तरीका यह है कि जो व्यक्ति बड़ी अटैची लाता है, वही इस पद पर नियुक्त हो जाता है।
भाटी ने इस प्रथा की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे लोग इस महत्वपूर्ण पद के लायक नहीं होते। उनका मानना है कि कुलपति और रजिस्ट्रार का मुख्य उद्देश्य सिर्फ अपना कार्यकाल पूरा करना होता है, और वे तीन साल के अंदर अपनी जेब भरने के काम में जुटे रहते हैं। इससे शिक्षा प्रणाली को गहरा नुकसान हो रहा है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि मंत्री विश्वविद्यालयों का दौरा करें और सर्किट हाउस में रुकने के बजाय कुलपतियों और छात्रों के साथ बैठकर शैक्षिक सुधारों पर चर्चा करें। भाटी ने यह भी सवाल उठाया कि आखिर हमारे विश्वविद्यालयों को कौन बचाएगा? क्या सरकार सिर्फ नाम बदलने का ढोंग कर रही है, जबकि असल सुधारों की कोई योजना नहीं है? और अगर यह सिलसिला जारी रहा, तो आने वाली पीढ़ी का क्या होगा?
विधायक सुभाष गर्ग का सवाल: ‘कुलपति’ का नाम बदलने पर क्यों हो हंगामा?
इस बहस में विधायक डॉ. सुभाष गर्ग ने भी भाग लिया और उन्होंने ‘कुलपति’ का नाम बदलकर ‘कुलगुरु’ करने पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि सरकार केवल नाम बदलने की राजनीति कर रही है, जबकि असल में शिक्षा प्रणाली में कोई बदलाव नहीं हो रहा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कुलपति का नाम कुलगुरु किया जाता है, तो क्या फिर विश्वविद्यालयों के नाम भी बदलकर ‘गुरुकुल’ कर दिए जाएंगे? कुलपति की जगह कुलगुरु बनाने का क्या औचित्य है?

गर्ग ने यह भी सवाल उठाया कि राजस्थान के योग्य शिक्षाविदों को कुलपति बनने के अवसर क्यों नहीं मिलते? इसके साथ ही उन्होंने यह मांग की कि कुलगुरु की नियुक्तियों में पूरी पारदर्शिता लाई जाए और उनकी योग्यता को स्पष्ट किया जाए।
Politicaladda.com की राय इस बहस में दोनों नेताओं ने राजस्थान के विश्वविद्यालयों की स्थिति और शिक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। भाटी और गर्ग दोनों ही शिक्षा में असल सुधार की मांग कर रहे हैं, ताकि राज्य की शिक्षा प्रणाली को सही दिशा मिल सके। सरकार को इन आरोपों की गंभीरता से जांच कर कार्रवाई करनी चाहिए। रविंद्र सिंह भाटी का यह बयान राजस्थान में शिक्षा व्यवस्था और कुलपति नियुक्तियों की पारदर्शिता पर एक नई बहस को जन्म देता है। उनकी सक्रियता और बेबाक टिप्पणियां राज्य की राजनीति और समाज में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं।
राजस्थान विधानसभा में जोरदार भाषण
विधानसभा में अपने एक भाषण के दौरान, रविंद्र सिंह भाटी ने राजस्थानी भाषा को राज्य की राष्ट्रभाषा का दर्जा देने की मांग भी उठाई थी। उन्होंने कहा था कि राजस्थानी भाषा की समृद्ध विरासत को मान्यता मिलनी चाहिए, जिससे राज्य की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिले।
रविंद्र सिंह भाटी ने राजस्थान विधानसभा में जो सवाल उठाए उन्हें यहां पंजाब केसरी के एक्स पर जाकर सुनिए । इस लिंक को क्लिक कीजिए।
मेरठ के एडवोकेट कपिल मलिक ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा भाटी का बयान बिलकुल सही प्रतीत होता है। भाटी का वीडियो और एडवोकेट मलिक की टिप्पणी पढ़ने के लिए ये फेसबुक लिंक खोलें…https://www.facebook.com/share/v/16FNXerpXv/?mibextid=wwXIfr
