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मैं नास्तिक क्यों हूं: शहीद भगत सिंह

Culture Politics वेस्ट यूपी

आज शहीद भगत सिंह का शहादत दिवस है। भगत सिंह केवल बम पिस्तौल वाले क्रांतिकारी नहीं थे।भगत सिंह का लेख “मैं नास्तिक हूँ” उनकी विचारधारा और संघर्ष का प्रतीक है। इस लेख में भगत सिंह ने अपने नास्तिकता के दृष्टिकोण को विस्तार से प्रस्तुत किया था, और उन्होंने धार्मिक विश्वासों के बारे में अपने विचार साझा किए थे।

यह लेख 1930 में लिखा गया था, जब भगत सिंह और उनके साथी स्वतंत्रता संग्राम के रास्ते पर चल रहे थे। इस लेख में भगत सिंह ने धर्म और ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाए और कहा कि धर्म केवल एक उपकरण था जिसे शोषण और अत्याचार के लिए इस्तेमाल किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका नास्तिकता का विचार न केवल धार्मिक विश्वासों के विरोध में था, बल्कि उन्होंने इसे समाज और राजनीति में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से अपनाया था।

भगत सिंह का मानना था कि धर्म की स्थिति समाज में असमानता और उत्पीड़न को मजबूत करती है। वह यह चाहते थे कि लोग अपने विवेक का उपयोग करें और अपने सोचने की क्षमता को विकसित करें, बजाय इसके कि वे अंधविश्वास और पाखंड का पालन करें।

यह लेख भगत सिंह की राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा का भी प्रतिबिंब था, जिसमें उन्होंने यह कहा कि केवल धर्म के आधार पर किसी भी समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार, समाज को प्रगति की ओर ले जाने के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कसंगत सोच की आवश्यकता है।

इस लेख के माध्यम से भगत सिंह ने यह संदेश दिया कि अगर हमें समाज में बदलाव लाना है, तो हमें अपने विश्वासों और आदर्शों की जांच करनी होगी और अंधविश्वास और धार्मिक रूढ़ियों से मुक्त होना होगा। उनका यह विचार आज भी हमारे लिए एक प्रेरणा का स्रोत है।

भगत सिंह की यह दृष्टि उनकी शहादत और उनकी विचारधारा का जीवंत उदाहरण है, जो आज भी हमारे समाज में प्रासंगिक है।

यहां हम भगत सिंह के मूल लेख का अंश दे रहे हैं….

मैं नास्तिक क्यों हूं…

प्यारे भाई,

आपने मुझसे पूछा है कि मैं ईश्वर पर विश्वास क्यों नहीं करता। मैं आपके प्रश्न का उत्तर देना चाहता हूँ, लेकिन इस बात को स्पष्ट कर दूं कि मेरी कोई भी व्यक्तिगत भावना या विचार इस उत्तर में नहीं है। मैं यह केवल उस विचारधारा के दृष्टिकोण से कह रहा हूँ, जो मेरे विचार से इस समय समाज और राजनीति के लिए आवश्यक है।

मेरे लिए ईश्वर का अस्तित्व केवल एक भ्रम है। न जाने कितनी बार मैं यह सोचता हूँ कि लोग क्यों अंधविश्वास और पाखंड में विश्वास करते हैं। यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसके तहत धर्म का विकास हुआ और इसके माध्यम से शोषक वर्ग ने समाज के गरीब और असहाय लोगों को दीन-हीन बना दिया।

धर्म के नाम पर जिस प्रकार से लोगों का शोषण किया जाता है, वह मुझे बिल्कुल भी सहन नहीं होता। धर्म ने हमेशा उन्हीं वर्गों को लाभ पहुंचाया है, जो समाज में प्रभुता रखते थे। शोषक वर्ग ने धर्म का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए किया है, ताकि वह लोगों को अपने ऊपर विश्वास दिला सके, ताकि उनके शोषण का कोई विरोध न हो।

ईश्वर का अस्तित्व केवल एक कल्पना है। एक ऐसे व्यक्ति का जो कुछ नहीं करता, लेकिन हर चीज़ का श्रेय उसे दिया जाता है। जब हम ईश्वर के बारे में सोचते हैं, तो हमें यह सोचना चाहिए कि वह हमारी कल्पना का परिणाम है, न कि कोई वास्तविक अस्तित्व।

जो लोग धार्मिक विश्वासों के आधार पर अपना जीवन जीते हैं, उनका जीवन केवल बर्बादी की ओर अग्रसर होता है। मैं मानता हूं कि समाज में प्रगति तभी संभव है जब हम अपने विश्वासों और आदर्शों की सच्चाई को तर्कपूर्ण ढंग से जांचें। हमें इस बात का एहसास करना चाहिए कि धर्म के बिना भी एक इंसान अच्छे तरीके से जी सकता है, और हमें अपने जीवन के उद्देश्य के लिए केवल अच्छे कार्यों की आवश्यकता है।

समाज को प्रगति के रास्ते पर ले जाने के लिए यह जरूरी है कि हम अंधविश्वास से मुक्त हों और तर्कसंगत सोच अपनाएं। नास्तिकता हमें यही सिखाती है कि हमें अपने विवेक का उपयोग करना चाहिए और हमें किसी भी प्रकार के पाखंड या धार्मिक कुरीतियों से बचना चाहिए।

ईश्वर के अस्तित्व को लेकर मेरे विचार केवल व्यक्तिगत नहीं हैं, बल्कि यह समाज के व्यापक संदर्भ में हैं। धर्म ने कभी भी समाज के शोषण और अत्याचार को रोकने में कोई मदद नहीं की। धर्म के नाम पर हमेशा लोगों के अधिकारों का हनन हुआ है।

मैं इस विचार से बिल्कुल सहमत नहीं हूं कि धर्म के बिना एक समाज का अस्तित्व नहीं हो सकता। इसका स्पष्ट उदाहरण है कि हमारे समाज में कई ऐसे लोग हैं जो नास्तिक होते हुए भी अच्छाई की ओर अग्रसर हैं। हमें अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में किसी भी प्रकार के पाखंड और धार्मिक भ्रांतियों से मुक्त होना चाहिए।

इस प्रकार मैं ईश्वर के अस्तित्व को नकारता हूं और यही मेरी विचारधारा है। यह न केवल मेरी व्यक्तिगत राय है, बल्कि एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है, जो मुझे अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है।

आपका भाई,

भगत सिंह

यह लेख भगत सिंह के विचारों का प्रतीक है और यह दर्शाता है कि उन्होंने अपने समय में धार्मिक विश्वासों और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई थी। उनके विचार आज भी हमारे समाज में प्रासंगिक हैं।

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