3 घंटे की सोशल मीडिया दुनिया और 21 घंटे का असली जीवन
पत्रकारिता से सोशल मीडिया तक: दो सदियों की यात्रा और तीन घंटे का धोखा
पत्रकार, संपादक और अब यूपी के राज्य सूचना आयुक्त राजेन्द्र सिंह का वक्तव्य
प्रस्तुति: Dr. Ravindra Rana /Rajesh Sharma
हिंदी पत्रकारिता 30 मई से अपने 200वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। इसी अवसर पर राज्य सूचना आयुक्त राजेन्द्र सिंह ने मेरठ के अलेक्जेंडर क्लब में 25 मई को हुए एक कार्यक्रम में विचारोत्तेजक वक्तव्य देते हुए कहा कि आज पत्रकारिता की दुनिया ‘मीडिया’ में बदल चुकी है, और सोशल मीडिया ने जीवन की दिशा ही बदल दी है।
उन्होंने कहा कि “सोशल मीडिया एक हथियार की तरह है – इसका इस्तेमाल UPSC जैसी परीक्षाएं पास करने में भी हो सकता है और समय नष्ट करने में भी। यह पूरी तरह आपकी ‘चॉइस’ पर निर्भर है।” “अब पत्रकार नहीं, प्लेटफॉर्म हैं। सोचिए कि इंटरनेट ने आपको बदला है या आपने इंटरनेट को इस्तेमाल किया? सोशल मीडिया ज्ञान का हथियार भी है और समय का कचरा भी, ये आपकी ‘चॉइस’ तय करती है कि आप क्या बनेंगे।‘

पेश है राज्य सूचना आयुक्त राजेन्द्र सिंह का भाषण उन्हीं के मूल शब्दों में। आशा है ये आपको पत्रकारिता से सोशल मीडिया तक के सफर पर एक विजन देगा….
हिंदी पत्रकारिता का 200वां साल 30 मई से शुरू हो जाएगा। इन 200 वर्षों की यात्रा को अगर देखें तो इसमें कई महत्वपूर्ण दौर आए। आज़ादी के आंदोलन में इसकी सबसे सशक्त भूमिका रही। गांधी जी भी जब आए तो उन्होंने यंग इंडिया शुरू किया, जो 12,000 प्रतियों में छपता था। फिर उन्होंने गुजराती में नवजीवन शुरू किया और उसे बाद में हिंदी में भी प्रकाशित किया। इसके बाद यह देश के कई हिस्सों से निकला। उन्होंने हरिजन नामक अखबार भी शुरू किया, जो एक बड़ा सर्कुलेशन वाला अखबार था।
1900 से 1920 तक, यानी 1924 तक, हिंदी के 324 अखबार प्रकाशित हो रहे थे। बड़ी संख्या में हिंदी समाचार पत्र छपते थे। उस दौर में कोलकाता, दिल्ली, बनारस जैसे शहरों के साथ-साथ मेरठ भी छपाई का बड़ा केंद्र था। कहा जाता है कि 1857 के आसपास जब अंग्रेजों का दमन चल रहा था, तब मेरठ में कई अखबार छपते थे। तब यहां कई प्रेस थीं। एक प्रेस में तो लगभग 200 कर्मचारी काम करते थे। 1945-48 के बीच यहां किताबों के साथ-साथ अखबार भी छपते थे।
मेरठ की भी अपनी एक भूमिका रही है — यहां से छपकर अखबार पूरे देश में सर्कुलेट होते थे — पंजाब, लाहौर, कोलकाता, देश के पूर्वी से लेकर पश्चिमी हिस्से तक। यह पत्रकारिता का एक स्वर्णिम दौर था। देश की आज़ादी के बाद भी पत्रकारिता ने विकास में अहम भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ भूमिकाएं बदलती गईं।
बदलाव तो जीवन का नियम है — जो बदलता है, वही जीवित रहता है। नदी हर क्षण बदलती है, इसलिए बहती रहती है। जो ठहर जाए, वह तालाब बन जाता है और तालाब मर जाते हैं। हमारे शरीर में भी हर क्षण बदलाव होता है — हर सेकंड कोशिकाएं मरती हैं, नई बनती हैं। बदलाव रुक गया तो मृत्यु निश्चित है।
हम मां के गर्भ से निकलकर 57 वर्ष की उम्र तक पहुंच गए — जीवन निरंतर बदलता रहता है। लेकिन पत्रकारिता का जो बदलाव हुआ, वह सिर्फ माध्यम नहीं था — पत्रकार की जगह “मीडिया” आ गया और पत्रकारिता हो गई “मीडिया”।
हमारी पीढ़ी और उससे पिछली पीढ़ी ने यह परिवर्तन बहुत करीब से देखा है। हम सौभाग्यशाली हैं — हमने रेडियो का युग देखा, ब्लैक एंड व्हाइट टीवी देखा। 1980 के बाद टीवी का चलन शुरू हुआ और 1990 के बाद टीवी की क्रांति आई। रामायण और महाभारत जैसे सीरियल आए, जिससे हर घर में टीवी आ गया।
रेडियो का भी अपना दौर था, जब लोग समाचार सुनते थे। हमने वीसीआर भी देखा — फिल्मों का दौर भी देखा। फिर इंटरनेट आया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की एक क्रांति आई, जिसने पूरी दुनिया को बदल दिया।
जब हम इंटर तक पढ़ते थे और गांव जाते थे, तो पिताजी जो किसान थे, पढ़ने के शौकीन भी थे। वे हमें दोपहर में किताबें पढ़ने को कहते — कभी महाभारत पढ़ने को देते। वो कहते, “पढ़ो और सुनाते रहो।” उन्हें कई बार नींद भी आ जाती थी।
यह 1980-90 की बात है — हम पढ़ते थे कि संजय कह रहा है कि कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएं खड़ी हैं। हमें लगता था कि मेरठ से कुरुक्षेत्र लगभग 130 किमी दूर है, वहां से एक अंधा व्यक्ति युद्ध का आँखों देखा हाल कैसे बता सकता है?
फिर 1983 में जब वर्ल्ड कप हुआ, तो उसकी कमेंट्री सुनी — बाद में लाइव टेलीकास्ट हुआ, और हमें समझ में आया कि टेक्नोलॉजी यह सब संभव बना रही है। आज अगर पाकिस्तान के साथ ऑपरेशन चल रहा है तो उसकी गतिविधियां कुछ ही मिनटों में सामने आ जाती हैं — ड्रोन गिर रहे हैं, लाइव दृश्य दिख रहे हैं।
अगर रूस ने यूक्रेन पर मिसाइल दागी, तो ग्रीन मिसाइल की लाइव तस्वीरें आ रही हैं। आज की दुनिया में सब कुछ तुरंत उपलब्ध हो जाता है।
पहले जब हम पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र लिखते थे, मनीऑर्डर भेजते थे, ड्राफ्ट के लिए पत्र लिखते थे — तब जीवन धीमा था। अब एक क्लिक पर पैसे भेजे जा सकते हैं, स्क्रीनशॉट साझा किया जा सकता है। यह सूचना का विस्फोट है — सूचना क्रांति का युग है।
अब कोई चीज किसी एक व्यक्ति या स्थान तक सीमित नहीं रही। पहले सूचना का एकमात्र माध्यम अखबार था — 24 घंटे में एक बार आता था। कोई विशेष घटना हो तो स्पेशल लंच एडिशन निकलता था। वरना अगले दिन की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।
अब जिसके पास स्मार्टफोन है, वो हर पल जानता है कि दिल्ली, कोलकाता, नोएडा, चांदनी चौक में क्या हो रहा है।
सोशल मीडिया ने एक बड़ी क्रांति लाई। लेकिन हर चीज का उपयोग कैसे हो, यह व्यक्ति पर निर्भर करता है। एक सर्जन के हाथ में छुरी होती है तो वह जीवन बचाता है, लेकिन वही छुरी अगर अपराधी के हाथ में हो तो जान लेती है।
सोशल मीडिया भी ऐसा ही औज़ार है — आप इसकी मदद से UPSC पास कर सकते हैं, स्टडी मटेरियल पढ़ सकते हैं। चाहें तो मनोरंजन, सस्ता कंटेंट, रिसर्च या ज्ञान — सबकुछ उपलब्ध है। यह आपकी चॉइस पर निर्भर करता है।
लेकिन चिंता की बात यह है कि दुनिया में 500 करोड़ लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव यूज़र हैं और औसतन पौने तीन घंटे रोजाना सोशल मीडिया पर बिताते हैं। मतलब, हमारा 24 घंटों का दिन अब 21 घंटे का सा लगता है — और यह समय अक्सर अनुपयोगी चीज़ों में जाता है।
हम जो कंटेंट अपने अंदर लेते हैं, वही बाहर निकलता है। अगर अंदर कचरा जाएगा, तो बाहर भी कचरा ही निकलेगा।
कुछ लोग अपवाद हैं — जैसे दो साल पहले एक आई एक लड़की जो बागपत के एक गांव से थी और सिविल सेवा में छठी या सातवीं रैंक लाई। वह एक सब-इंस्पेक्टर की बेटी थी। उसने कहा — “मैंने एक साल कोचिंग की और फिर YouTube से पढ़ाई की। फोन बंद रखा, सोशल मीडिया नहीं चलाया, सिर्फ YouTube इस्तेमाल किया।”
यह सब आपके उपयोग पर निर्भर करता है। आज हम एआई की चर्चा कर रहे हैं। एआई भी अब आपकी पसंद के हिसाब से कंटेंट पेश करता है — इतना आकर्षक और वैयक्तिकृत कि आपकी उंगली रात 10 बजे से कब एक बज गए, आपको पता ही नहीं चला। यही सोशल मीडिया की शक्ति है — समय भी कैसे बीत जाता है, पता नहीं चलता। जब हम आज पत्रकारिता दिवस पर यहां बैठे हैं, तो यह समझना ज़रूरी है कि पत्रकारिता अब सिर्फ ‘अखबार’ नहीं रह गई है। पत्रकारिता अब ‘मीडिया’ बन चुकी है — और वह भी बहुआयामी मीडिया। इन विभिन्न आयामों के अपने-अपने फायदे हैं, और नुकसान भी।
इसलिए मैं विशेष रूप से विद्यार्थियों से आग्रह करता हूँ — जितना हो सके, कचरे से बचिए। सिर्फ इसलिए नहीं कि आपने बेकार चीज़ देखी या सुनी, बल्कि इसलिए कि आप जब कोई चीज़ कंज्यूम करते हैं, तो वही आप दूसरों को भी देते हैं। अंततः इसका नुकसान व्यक्ति का नहीं, देश का होता है। देश के बौद्धिक संसाधनों का नुकसान होता है, समय का नुकसान होता है।
कल्पना कीजिए — अगर भारत में 70 करोड़ लोग प्रतिदिन औसतन 3 घंटे डिजिटल मीडिया पर बिता रहे हैं, और उसमें से 2 घंटे बेकार सामग्री देख रहे हैं, तो हम प्रतिदिन 140 करोड़ घंटे व्यर्थ कर रहे हैं। सोचिए, यह समय अगर उपयोगी कामों में लगे तो देश की दिशा ही बदल सकती है।
अतः यदि आप कुछ अच्छा देख रहे हैं — तो सदुपयोग है। और यदि कुछ खराब देख रहे हैं — तो दुरुपयोग है।
एक और बात — सोशल मीडिया आजकल वैचारिक वन वे ट्रैफिक बनाता जा रहा है। जैसे ही कोई एक विचारधारा की सामग्री आप देखते हैं, आपके पास उसी से जुड़ी नोटिफिकेशन की बाढ़ आ जाती है। फिर आपको दूसरे पक्ष के लोग देशद्रोही लगने लगते हैं। वहां भी वही सोच — कि ‘वे देश को बेच रहे हैं’, ‘वे खतरनाक हैं’। यह एकपक्षीय सोच जब हावी होती है तो गाड़ी पटरी से उतर जाती है।
भारत की खूबसूरती समावेशिता में रही है। और यही समावेशिता हमें बचाए रखेगी। इसलिए राजनीति में भी हमें ‘राजेन्द्र जी’ जैसा बनना चाहिए — जो सत्ता हो या विपक्ष, छोटा हो या बड़ा, सबसे समान भाव से मिलते हैं, मुस्कराते हैं।
जब राजनीति में कोई व्यक्ति यह सोचने लगे कि ‘मैं सही हूँ और दूसरा गलत’, तो टकराव की स्थिति आ जाती है। और आजकल आप देख ही रहे हैं — टकराव हर जगह है। यह टकराव केवल विचारों का नहीं, समाज का भी नुकसान करता है।
इसलिए मैं फिर कहूंगा — जब घोड़ा दौड़ता है, तो उसकी आंखों के दोनों ओर फ्लैप लगा दिए जाते हैं, ताकि वो दाएं-बाएं न देखे। पर कृपया, घोड़ा मत बनिए — इंसान बनिए। सब कुछ देखिए, गुण-दोष के आधार पर निर्णय लीजिए। दुनिया की कोई चीज़ पूरी तरह अच्छी या बुरी नहीं होती। सबकुछ मिला-जुला होता है। विवेकपूर्वक चुनाव करना ही बुद्धिमानी है।
एक शानदार चर्चा के लिए आप सबका आभार।
अगर आप ये भाषण सुनना चाहते हैं तो यू टयूब के इस लिंक पर क्लिक करें।
