ज़हर के बीच ज़िंदगी: खतौली की चीनी मिल और शेखपुरा गांव की कहानी

Interview


Dr. Ravindra Rana / Rajesh Sharma

माता भूमि पुत्रोहम्यः” से “मौत की धार” तक – पर्यावरण दिवस की कड़वी सच्चाई

5 जून 2025 | वर्ल्ड एनवायरनमेंट डे पर विशेष ग्राउंड रिपोर्ट

मुजफ्फरनगर / खतौली / शेखपुरा

5 जून को जब देशभर में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया जा रहा था—बड़ी-बड़ी सभाएं, सेमिनार, पोस्टर और पर्यावरण बचाने की शपथें ली जा रही थीं—उसके ठीक एक दिन पहले हम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में खतौली चीनी मिल के पीछे बसे गांव शेखपुरा  में खड़े थे।

यहाँ पर्यावरण ‘बचाया’ नहीं जा रहा, यहाँ पर्यावरण ‘बिलख’ रहा है।

 “माता भूमि पुत्रोहम्या! ये धरती हमारी माता है और हम सब इसके पुत्र हैं आज विश्व पर्यावरण दिवस है प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण करके ही हम ना केवल जीव सृष्टि की रक्षा कर पाएंगे पितों एक सुखद और आनंददायक जीवन प्रत्येक जीव जंतु को देने में सफल हो पाएंगे!’’

पांच जून 2025 की सुबह वर्ल्ड एनवायरमेंट डे पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो वीडियो जारी किया उसकी शुरूआत इन्हीं शब्दों से की।

— वेदों की इस पंक्ति में गर्व छिपा है, आस्था है, और एक जिम्मेदारी भी कि धरती हमारी माता है और हम उसके पुत्र हैं। लेकिन क्या वाकई हम उस मां का सम्मान कर रहे हैं? क्या हम धरती को जीने लायक छोड़ रहे हैं?

हर साल 5 जून को पर्यावरण दिवस आता है, नारे आते हैं, थीम बदलती हैं, भाषण होते हैं — लेकिन सच्चाई नहीं बदलती। इस साल की थीम है: बीटिंग प्लास्टिक पॉल्यूशन’ — यानी प्लास्टिक से मुक्ति। पर बाजार में बिसलरी की बोतलें, चिप्स के पैकेट और सिंगल यूज़ प्लास्टिक की भरमार देखकर यही लगता है कि यह सिर्फ एक दिखावा है।

सरकारें साल में एक दिन सफाई अभियान चलाकर फोटो खिंचवा लेती हैं, प्लास्टिक बैन की घोषणाएं कर देती हैं, लेकिन असल जिम्मेदारी कौन लेगा? न नीति सख्त है, न निगरानी है और न ही निष्पादन। और नतीजा हमारे सामने है — ज़हर बन चुकीं नदियां, बीमार कर रहा पानी, दमघोंटू हवा और मरी हुई संवेदनाएं।

काली नदी का भयानक सच

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर ज़िले में काली नदी कभी जीवनदायिनी थी, आज ‘मौत की धार’ बन चुकी है। खतौली की चीनी मिल ने इसमें रसायनों का ज़हर उड़ेल दिया है। नदी की हत्या कर दी गई है। कैंसर, लीवर फेलियर, त्वचा रोग — यह सब अब आम हो चुका है।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट चौंकाने वाली है — खतौली चीनी मिल का ट्रीटमेंट प्लांट बंद था, और जहरीला पानी सीधे नदी में छोड़ा जा रहा था। कोई कार्रवाई नहीं, कोई सज़ा नहीं — सिर्फ घोषणाएं, सिर्फ नोटिस, सिर्फ अफसोस!

पानी अब धर्म नहीं, हथियार है!

पर्यावरणविद और एनजीटी के जज डॉ. अफरोज अहमद की बात सुनिए —
“नदी का संहार किसी हत्या से भी बड़ा अपराध है। यह एक जीनोसाइड है, एक सभ्यता का सुनियोजित विनाश।”
उन्होंने चेताया कि अगर समंदर और नदियां मरीं, तो अगला युद्ध पानी का होगा — और यह भविष्य नहीं, वर्तमान की दस्तक है।’’

झुग्गियों को नहीं, कारखानों को रोको

प्लास्टिक से मुक्ति सिर्फ पॉलिथीन जलाकर या पेड़ लगाकर नहीं मिलेगी। सवाल यह है — क्या आप फैक्ट्रियों से निकलने वाला कचरा रोक पाए? क्या आपने रसायन बहाने वाली इकाइयों पर ताले लगाए? क्या आपने उत्पादन रोका या सिर्फ उपयोग?

बोलते हैं पेड़, चीखते हैं जंगल, मरती हैं नदियां

आज अगर जंगल कट रहे हैं, जीव-जंतु लुप्त हो रहे हैं और पशु-पक्षी बेमौत मर रहे हैं, तो दोष सिर्फ आम जनता का नहीं — यह व्यवस्था की उदासीनता का परिणाम है। अब वक्त आ गया है कि नारे नहीं, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संकल्प लिए जाएं।

क्योंकि अगर नदियां मरेंगी — तो सभ्यता भी मरेगी।
अगर पानी जहरीला होगा — तो लोकतंत्र भी बीमार होगा।
और अगर हम आज चुप रहे — तो कल हमारी आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी —
आपने पेड़ तो लगाए, पर जंगल क्यों कटने दिए?”
आपने प्लास्टिक छोड़ा, पर कंपनियों को क्यों नहीं रोका?”

क्या तब भी हम चुप रहेंगे?
या आज ही आवाज़ उठाएंगे?

इस बार सिर्फ पेड़ मत लगाइए, जिम्मेदारी उठाइए!वरना अगला पर्यावरण दिवस, मातम का दिन होगा…

5 जून—जब पूरा देश विश्व पर्यावरण दिवस मना रहा है, हम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में एक ऐसी जगह पहुंच गए जहां सांस लेना भी कठिन है। खतौली कस्बे से महज एक किलोमीटर दूर एक नाला काली नदी में मिल रहा है, लेकिन यह नाला नहीं, जहरीली मौत की एक धारा है। यह वही काली नदी है जो अंततः गंगा में मिलती है।

हमारे सामने जो दृश्य है, वह किसी सरकारी स्लोगन या “नमामि गंगे” अभियान की बुलेटिन से मेल नहीं खाता। यहाँ पानी काला है, हवा दमघोंटू है और ज़मीन पर ज़हर फैला है।

चीनी मिल का काला सच

खतौली की 1933 में स्थापित शुगर मिल आज एक प्रदूषण का केंद्र बन चुकी है। इस मिल से निकलने वाला कचरा और अपशिष्ट सीधे काली नदी में गिर रहा है। इस फैक्ट्री में ईटीपी (Effluent Treatment Plant) होने की बात की जाती है, लेकिन ज़मीनी हालात बता रहे हैं कि वह या तो है ही नहीं, या कागजों पर है।

स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस क्षेत्र के गांवों में कैंसर, त्वचा रोग और श्वसन संबंधी बीमारियों में तेज़ बढ़ोतरी हुई है। ग्रामीणों के नल के पानी के सैंपल लगातार फेल हो रहे हैं।

नमामि गंगे की विफलता का नमूना

काली नदी को ‘नमामि गंगे’ योजना में शामिल किया गया है। केंद्र सरकार ने इसके लिए ₹100 करोड़ स्वीकृत किए हैं और आठ जगहों पर वेटलैंड्स (Wetlands) बनाने की योजना चलाई जा रही है। लेकिन हमारे निरीक्षण में मिला कि ये वेटलैंड्स भी महज़ कागजों पर बेहतर हैं — ज़मीन पर इनका असर ना के बराबर है।

नाले में ट्रीटमेंट के लिए जो संरचनाएं बनाई गई हैं, वे जगह-जगह टूटी हुई हैं या निष्क्रिय पड़ी हैं। करोड़ों रुपये बहा दिए गए, लेकिन जहरीला पानी अब भी उसी तरह बह रहा है।

सरकारी चुप्पी और खानापूर्ति

पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने हाल ही में फैक्ट्री का निरीक्षण कर एक नोटिस जारी किया — एक औपचारिकता भर। सवाल ये है कि क्या नोटिस से नदी का पानी साफ हो जाएगा? क्या चेतावनियों से कैंसर रुक जाएगा?

राज्य और केंद्र सरकार दोनों ने “नदी बचाओ” के नारे लगाए, लेकिन जब बात चीनी मिलों और उद्योगपतियों की आती है, तो तंत्र मौन हो जाता है। ये वही यूपी है जहाँ लगभग 60 चीनी मिलें गंगा और यमुना में सीधा या अप्रत्यक्ष रूप से अपशिष्ट बहा रही हैं।

गंगा में जहर घोल रही खतौली चीनी मिल

काली नदी मुजफ्फरनगर के अंतवाड़ा गांव से निकलती है और कन्नौज के पास गंगा में मिल जाती है। इसका मतलब है कि खतौली की चीनी मिल का यह जहरीला पानी सिर्फ एक नदी को नहीं, बल्कि गंगा को भी प्रदूषित कर रहा है।

नदी अब कोई ‘जल स्रोत’ नहीं, बल्कि बीमारी और बदहाली की गाथा बन चुकी है।

आगे क्या?

इस रिपोर्ट का उद्देश्य सिर्फ आलोचना नहीं, चेतावनी है। अगर सरकार चाहे तो 24 घंटे के भीतर इस जहरीले बहाव को रोक सकती है। लेकिन क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक ईमानदारी बची है?

क्या गंगा सिर्फ चुनावी नारा है या वाकई राष्ट्रीय धरोहर?

क्या नमामि गंगे सिर्फ एक शोपीस योजना है या ज़मीनी परिवर्तन की कोशिश?

इस ग्राउंड रिपोर्ट से साफ है कि खतौली से कन्नौज तक, गंगा के साथ छल और देश की जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

“ये पानी फसल को सड़ा देता है, सांस लेना मुश्किल है, जानवर तक नहीं नहा सकते…”


ये बातें किसी गुस्साए एक्टिविस्ट की नहीं, बल्कि उस बुज़ुर्ग किसान की हैं, जिसने पिछले 70 साल में इस नदी का रंग सफेद से काला होते देखा है। खतौली की काली नदी अब सिर्फ एक पानी की धारा नहीं, बल्कि विकास के नाम पर हुए प्रदूषण की गवाही बन चुकी है।

चीनी मिल की सफेदी के नीचे काली सच्चाई

1933 में स्थापित खतौली की शुगर मिल अब आसपास के किसानों के लिए ज़हर का स्रोत बन गई है। इस मिल से निकलने वाला कचरा सीधे काली नदी में गिरता है। परिणाम ये कि हर बरसात में ये ज़हर किसानों के खेतों में घुस आता है।

खेड़ी कुरैश गांव के रघुवीर पाल बताते हैं:

“हमारे खेत नदी किनारे हैं। ये पानी जब खेतों में भरता है तो गेहूं गल जाता है। ट्रैक्टर से खोद दिया, पर पानी नहीं निकला। अब तो जानवर भी नहीं नहा सकते इसमें।”

उनकी तरह गांव के ही किसान बिन्नू कहते हैं:

“अब तो सांस भी नहीं ली जाती। बदबू इतनी है कि खुली जगहों पर भी बैठना मुश्किल है। गांवों में कैंसर के मरीज बढ़ गए हैं। ये सब इसी जहरीले पानी की वजह से है।”

नमामि गंगे’ की नाकामी और किसानों का दर्द

सरकार की ‘नमामि गंगे’ परियोजना में काली नदी भी शामिल है, लेकिन हकीकत ये है कि इस नदी में फैक्ट्री का गंदा पानी बेरोकटोक गिर रहा है। किसानों की शिकायतों के बावजूद प्रशासन की नींद नहीं टूटती।

एक स्थानीय किसान बताते हैं:

“हमने कई बार शिकायत की। आसपास के गांव रसूलपुर ने भी दी। अब कहते हैं फ़िल्टर लग रहे हैं, पर गंदा पानी तो आज भी आ रहा है।”

बीमारियां, गंध और नफरत—यहां का जल संकट

डॉ. मोहम्मद अतीफ, जो पास के एक हॉस्पिटल में काम करते हैं, बताते हैं:

“इस क्षेत्र में किडनी और लीवर के मरीज बढ़े हैं। ज़्यादातर संक्रमण इसी पानी के कारण हैं। खेतों में सब्जियां उगती हैं, लेकिन वही सब्जी जब लोग खाते हैं तो बीमार हो जाते हैं।”

स्कूल और विवाह स्थल भी संकट में हैं।
स्थानीय लोग बताते हैं कि खतौली के बैंक्वेट हॉल, स्कूल और बस्तियों में इतनी बदबू रहती है कि बच्चों की पढ़ाई और शादियों का आयोजन भी मुश्किल हो गया है।

नदी नहीं, गटर है अब यह

किसानों की ज़ुबानी—

  • “हमने पीया है इस पानी को 30-35 साल पहले, अब जानवर भी नहीं पी सकते।”
  • “खेतों में गेहूं गल गया, गन्ने सूख गए।”
  • “जो चीनी बन रही है, उसमें भी इस पानी का असर तो होगा।”

सरकार कब जागेगी?

यह रिपोर्ट सवाल उठाती है कि:

  • क्या सिर्फ गंगा आरती और वेटलैंड्स से नदियां साफ हो सकती हैं?
  • क्या किसानों की ज़िंदगी से ज़्यादा अहम फैक्ट्री मालिकों का मुनाफा है?
  • क्या ‘विकास’ का मतलब ज़मीन, जल और जन को तबाह करना है?

समाधान क्या है?

किसानों की साफ मांग है:

  • फैक्ट्री का गंदा पानी बंद किया जाए।
  • नदी की सफाई हो और जल निकासी की व्यवस्था बने।
  • अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।

खतौली में काली नदी अब एक ‘नदी’ नहीं, एक रासायनिक आपदा’ है, जो हज़ारों किसानों की आजीविका, स्वास्थ्य और जीवनशैली को निगल रही है। पर्यावरण दिवस पर यह सवाल उठाना जरूरी है कि क्या हम सिर्फ पोस्टर लगाकर नदी बचा लेंगे या असली गंदगी हटाने की भी कोई योजना है?

5 जून 2025… वर्ल्ड एनवायरमेंट डे! चला गया पर सवाल वहीं रह जाता है . क्या यह दिन सिर्फ आम जनता को दोष देने का मंच बनकर रह गया है? इस साल की थीम है ‘बीटिंग प्लास्टिक पोल्यूशन.’ यानी प्लास्टिक से मुक्ति. लेकिन क्या सच में हम प्लास्टिक से मुक्त हो रहे हैं! प्लास्टिक का निर्माण रुका नहीं है, कारखाने टनों प्लास्टिक बना रहे हैं बाजार में बिसलरी की बोतल, चिप्स के रंगीन पैकेट, सिंगल यूज सामान, हर तरफ वही जहर और सबसे बड़ा सवाल इन कंपनियों को छूट कौन दे रहा है! सरकारें साल में एक दिन सफाई अभियान चलाकर प्लास्टिक बैन की अधूरी घोषणाएं कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती हैं. लेकिन असली जिम्मेदारी कहां है? नीति निर्माण, निगरानी, निष्पादन, इन तीनों से सरकारें आंखें चुरा रही हैं.

 यह तस्वीर है उत्तर प्रदेश के मुजफफरनगर जिले में काली नदी की जिसे मार दिया गया है. खतौली चीनी मिल ने इसमें बहाया है जहरीला रासायनिक पानी. कभी जीवनदादायनी नदी आज बन चुकी है. मौत की धार इस जहरीले पानी से कैंसर लीवर रोग और न जाने कितनी बीमारियां फैल रही हैं. गरीब सबसे पहले और सबसे ज्यादा शिकार बन रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी कह रहे हैं नदियां हमारी प्राथमिकता हैं पर जमीनी सच्चाई कुछ और ही है. पीने का पानी पीला और जहरीला है. फसलें बर्बाद हो रही हैं, पशु बीमार हो रहे हैं! क्या यही है स्वच्छता अभियान का सच!

 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने पाया खतौली शुगर मिल के ट्रीटमेंट प्लांट बंद थे. जहरीला पानी सीधे नदी में छोड़ा गया. जवाबदेही का नामोनिशान नहीं. पर्यावरण की रक्षा सिर्फ पेड़ लगाने से नहीं होगी. जंगल बचाने से होगी प्लास्टिक छोड़ने से नहीं उसका उत्पादन रोकने से होगी. नदी में कूड़ा फेंकने से रोकना है तो झुग्गियों को नहीं फैक्ट्रियों के नालों को रोकना होगा. आज जरूरत है नारे नहीं नीति बदलने की. पर्यावरण के साथ वन्य जीवों के साथ अन्य जीव जंतुओं के साथ पशु पक्षियों के साथ अगर हमारा व्यवहार अच्छा है संवेदनशील है अगर हम पर्यावरण के अनुकूल है तो पर्यावरण हमें जीने के लिए उत्तम वातावरण देता है. आज हमें चाहिए एक राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक संकल्प. क्योंकि अगर नदियां मरी तो सभ्यता भी मरेगी.

पर्यावरणविद डॉक्टर अफरोज अहमद ने कहा नदी का संहार किसी हत्या से भी भयावह है. यह एक जीनोसाइड है सभ्यता का सुनियोजित. अगर समंदर खत्म हो जाएगा तो ये दुनिया खत्म हो जाएगी. प्रलय हो जाएगा. नदी को ऐसा बना दिया है कि वो किसी कत्ल से भी ज्यादा है दुनिया भर में पानी अब धर्म नहीं युद्ध और सत्ता का केंद्र बन चुका है नदियों पर कब्जे के लिए अब सेनाएं तैनात हैं पानी अब हथियार है और अगर हम नहीं चेते तो अगला युद्ध पानी का होगा कल की पीढ़ियां हमसे पूछेंग आपने पेड़ तो लगाए पर जंगल क्यों कटने दिया आपने प्लास्टिक छोड़ा लेकिन कंपनियों को क्यों नहीं रोका तो क्या आप जवाब दे पाएंगे या चुप रहेंगे जैसे आज है !

इन पर गौर करो सरकार !

खतौली की चीनी मिल द्वारा प्रदूषण: मिल ने जहरीला रासायनिक कचरा काली नदी में छोड़ा, जिससे नदी “जीवनदायिनी” से “मौत का संदेश” बन गई है।

  1. गांवों में बीमारियाँ फैल रहीं: आसपास के गांवों जैसे शेखपुरा, रसूलपुर में लीवर, किडनी व कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
  2. जल जीवन मिशन का विरोधाभास: केंद्र सरकार की योजनाओं (नमामि गंगे, जल जीवन मिशन) और जमीनी सच्चाई के बीच बड़ा अंतर दिखता है—नल से पीला और बदबूदार पानी निकल रहा है।
  3. खेती पर भी असर: गन्ना, भिंडी, खीरा जैसी फसलें प्रदूषित पानी के कारण नष्ट हो रही हैं। पशु भी इस पानी से बीमार हो रहे हैं।
  4. स्थानीय शिकायतों की अनदेखी: गांव वालों ने कई बार शिकायत की, लेकिन कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई। फिल्टर लगाने की बात हो रही है, पर स्थिति जस की तस है।
  5. पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट: 15 मई को जांच में पाया गया कि खतौली मिल का ETP (Effluent Treatment Plant) बंद था और केमिकल युक्त पानी सीधे नाले में बहाया जा रहा था।
  6. नियमों की धज्जियाँ: प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, मिल के बॉयलर, केमिकल प्रक्रिया, और भाप आपूर्ति उपकरण मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए।
  7. स्थानीय आबोहवा प्रदूषित: इलाके की हवा और पानी दोनों जहरीले हो गए हैं। स्कूलों, शादी-ब्याह के स्थानों तक पर असर दिख रहा है।
  8. गरीबों की अनसुनी पीड़ा: स्थानीय लोग बार-बार कह रहे हैं कि उन्हें सुनवाई नहीं मिलती क्योंकि वे गांव से हैं, गरीब हैं और असर शहरों तक नहीं पहुंचता।
  9. ग्राउंड रिपोर्ट का मूल संदेश: यह ग्राउंड रिपोर्ट सरकार ही नहीं, हम सब से सवाल पूछती है—क्या हम सिर्फ भाषणों से पर्यावरण बचा सकते हैं, या सच में कारवाई करेंगे?

नदी केवल पानी नहीं, हमारी संस्कृति और जीवन है। जब तक उसमें ज़हर बहता रहेगा, हमारी चेतना भी दूषित रहेगी।

यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, हमारे जीवन का संकट है। अगर हम अभी सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ नहीं करेंगी। हमारी नदियाँ, हमारी माताएँ, हमारे जीवन का आधार हैं। इनके संरक्षण के बिना कोई स्थायी विकास संभव नहीं।


इस विषय पर आपकी क्या राय है? आप इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठाएंगे? कृपया अपने विचार कमेंट में साझा करें। साथ ही, इस मुहिम को आगे बढ़ाने में सहयोग करें। मिलकर ही हम अपनी नदियों और जीवन को बचा सकते हैं।

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