नई दिल्ली | देश की राजधानी में आज एक ऐतिहासिक राजनीतिक दृश्य तब बना जब खाप पंचायतों, जाट किसान संगठनों और उत्तर प्रदेश के ज़मीनी प्रतिनिधियों ने कांग्रेस नेतृत्व से मुलाक़ात कर किसानों के मुद्दों को लेकर अपनी गूंज दर्ज कराई। AICC मुख्यालय में आयोजित इस विशेष बैठक में गन्ना किसानों के बकाया भुगतान, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), सिंचाई के लिए बिजली की नियमित आपूर्ति और नकली खाद-कीटनाशकों से हो रहे नुकसान जैसे मुद्दों पर गम्भीर चिंता व्यक्त की गई।

बैठक को किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओमवीर सिंह तोमर और अखिलेश शुक्ला ने संयोजित किया। कांग्रेस नेता राहुल गांधी के किसान मुद्दों पर मुखर रवैये की सराहना करते हुए खाप प्रतिनिधियों और जाट समाज के नेताओं ने कहा कि यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी जमीनी स्तर पर किसानों के साथ मिलकर संघर्ष करेगी, तो वे इस लड़ाई में पूर्ण समर्थन देंगे।
कांग्रेस नेतृत्व की मज़बूत मौजूदगी

इस अवसर पर कांग्रेस के शीर्ष नेता भी मौजूद रहे:
- गुरदीप सप्पल (राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर)
- सुखपाल खैरा (राष्ट्रीय अध्यक्ष, किसान कांग्रेस)
- अजय राय (प्रदेश अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश कांग्रेस)
- अविनाश पांडेय (राष्ट्रीय महासचिव व यूपी प्रभारी)
- प्रणव झा (राष्ट्रीय कोऑर्डिनेटर, मीडिया)
- कार्यालय प्रतिनिधि, अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे
इन नेताओं ने किसानों की समस्याओं को गम्भीरता से सुना और हर स्तर पर साथ खड़े रहने का आश्वासन दिया।
बागपत-बड़ौत से भी भागीदारी
कार्यक्रम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत और बड़ौत क्षेत्रों से सैकड़ों प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जिनमें कई प्रमुख नाम शामिल रहे:
खाप और समाज प्रतिनिधि:
- रोहित जाखड़ (प्रधान)
- विक्रम सिंह आर्य, डॉ. कृपाल सिंह, सतिंदर सिंह चौहान, कदम सिंह सरोहा, टिंकू सहरावत, बिल्लू मान
- विशाल तोमर, किशोर तोमर, पुनीत खोकर
- सुभाष चौधरी, सुधीर तालियान, महिपाल (पूर्व प्रधान, बरवाला)
- जय भगवान मलिक, चैन सिंह नंबरदार, सुदेश प्रधान (बाछोड़)
- आदित्य चौहान, ब्रजपाल राणा, यशपाल राणा, वीरेंद्र सिंह, महिपाल
- राणा बृजपाल (थांंबेदार ), ओमबीर सिरसली, प्रमोद शोराण
किसान राजनीति में नई हलचल ?
किसान कांग्रेस की इस पहल को जमीनी किसान संगठनों और खापों के साथ एक नये गठबंधन के तौर पर देखा जा रहा है। जानकार मानते हैं कि अगर कांग्रेस इसी तरह जाट बहुल क्षेत्रों में सक्रियता दिखाती रही, तो उसका खोया जनाधार वापसी की ओर जा सकता है। साथ ही, इससे किसान मुद्दों पर राष्ट्रीय बहस को भी मजबूती मिल सकती है।
