जाट आरक्षण से 2027 की सियासत तक: यशपाल मलिक ने खोले आंदोलन के कई राज
“मांगना हमारा अधिकार है, देना सरकार का” जाट आरक्षण पर यशपाल मलिक का बड़ा बयान
यशपाल मलिक बोले: केंद्र में जाट आरक्षण की मांग को लेकर 4 अक्टूबर से बड़ा जनजागरण अभियान जाट आरक्षण और पश्चिमी
यूपी की राजनीति: यशपाल मलिक ने बताई आगे की रणनीति26 साल की आरक्षण लड़ाई पर यशपाल मलिक की बेबाक बातचीत, 2027 से पहले क्या है अगला कदम?
राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति
मैं हूं डॉ. रवींद्र राणा। आज हमारे साथ इस खास बातचीत में मौजूद हैं चौधरी यशपाल मलिक। मलिक अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्ट्रीय संयोजक हैं। दरअसल उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव करीब है और चुनाव करीब आने के साथ ही जितने भी प्रेशर ग्रुप्स हैं वो बहुत एक्टिव हो गए हैं। इस वक्त कल मेरठ में वकीलों का एक बड़ा डेमोंस्ट्रेशन था और उनकी प्लानिंग है कि वो एक रथ यात्रा निकालेंगे हाई कोर्ट बेंच के लिए। ठीक इसी तरह से अलग-अलग प्रेशर ग्रुप्स अपनी डिमांड्स को लेकर के इस समय एक्टिव हो गए हैं और रणनीति बना रहे हैं।
प्रश्न 1: चौधरी साहब क्या आप भी इस मौके की तलाश में हैं कि यूपी का चुनाव करीब है तो क्यों ना इस समय एक प्रेशर बिल्ड अप किया जाए?
यशपाल मलिक: की तलाश में हैं कि यूपी का चुनाव करीब है तो क्यों ना इस समय एक प्रेशर बिल्ड अप किया जाए? रविंद्र जी हमने तो लगातार 26 साल से लोग इस मांग को मांग रहे हैं। मंडल कमीशन लागू होने के बाद ज्यादातर जाट इससे बाहर था। राजस्थान के जाट को 98 में मिल गया। सन 2000 में हमें मिल गया और आठ राज्यों के जाटों को 2000 आते-आते आरक्षण मिल गया। और 2000 से ही तमाम जाट समाज इस काम पे लग गया। मैंने तो इस पर विधिवत काम 2006 से करना शुरू किया। हमारे हजार साथियों ने मिलकर यह कहा भाई इसको आंदोलन की शक्ल में लाना पड़ेगा।
प्रश्न 2: थोड़ा बैकग्राउंड बताइए कि ये मसला क्या है? फिर हम आपकी जो जर्नी है मूवमेंट की उस पे बात करेंगे।
यशपाल मलिक: कि ये मसला क्या है? फिर हम आपकी जो जर्नी है मूवमेंट की उस पे बात करेंगे। यह मसला यह है कि देश में आर्टिकल 340 41 42 के तहत पिछड़ा वर्ग का आरक्षण और एससी का आरक्षण और एसटी के आरक्षण पर संविधान में लिखा गया और लिखने के बाद काका कलकर कालेलकर आयोग बना जिसने सब जातियों को चिन्नीकृत किया कौन एससी में कौन एसटी में कौन ओबीसी में और जब यह एससी एसटी का आरक्षण लागू हुआ ओबीसी को छोड़ दिया गया क्योंकि उसकी जनसंख्या 50% से ज्यादा थी। उनको जनसंख्या के अनुसार जो है आरक्षण दे दिया गया 22.5% सेंटर पे और राज्यों में जहां जितनी जनसंख्या है उसके हिसाब से जैसे उत्तर प्रदेश में एसटी कम है तो यहां 22% एससी को आरक्षण है। तो इसी तरह से पूरे देश में जहां एसटी ज्यादा है वहां एसटी को ज्यादा आरक्षण है। लेकिन ओबीसी को इसलिए छोड़ा कि इसकी जनसंख्या बहुत ज्यादा थी। अगर इस पे जनसंख्या के अनुसार आरक्षण दे देते तो सन 55 से ही यह 50% की श्रेणी में आ जाते। तो जो सत्तारूढ़ दल था वो नहीं चाहते थे कि ये ओबीसी को इतना बड़ा फायदा मिले और वो इसको लिंगरून करते रहे। लेकिन जो लोग किसान जातियों से गए थे पिछड़े वर्ग के जो लोग थे जिनको ओबीसी मानते थे जो अपने आप को कि इसका ओबीसी का मतलब है सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा होना और गांव और देहात में जो किसान जातियां थी ये सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई थी तो इस तरह से हुआ क्या कि वो नेता अंदर ही अंदर आवाज उठाते रहे और लेकिन कांग्रेस ने माना नहीं उसके बाद सबसे पहले अलग-अलग जातियों में चिन्हितकरण होता चला गया अलग अलग-अलग राज्यों में रिजर्वेशन भी की भी अवधारणा चली।
लेकिन मैं उत्तर प्रदेश के बारे में चर्चा करना चाहूंगा। 1975 में छेदी लाल आयोग बना और जाट जो है उस टाइम हरित क्रांति के पर लगा हुआ था। तो जाट ने अपने आप का नाम लिखवाना उचित नहीं समझा। और छेदीलाल आयोग की रिपोर्ट आई बाद में हेमती नंदन बहुगुणा के समय में वो बना था। और जैसे ही जनता पार्टी की सरकार का गठन हुआ यहां पर जो है रामनरेश यादव जी मुख्यमंत्री बने और उन्होंने 15% आरक्षण छेदीलाल की आयोग के आधार पे दे दिया। लेकिन जाट समाज को उसका पता ही नहीं था। आज भी आप कहीं चर्चा करें भाई 77 में आरक्षण था तो कहेंगे। लेकिन उसके बाद क्योंकि जनता पार्टी के मेनिफेस्टो में था कि काका कालेरकर की आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाएगा सिफ़ारिशों को। तो चौधरी साहब सरकार में थे और मंडल कमीशन का गठन हो गया। तमाम किसान नेता उनके साथ थे देश भर के और जो काका कालकर आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना चाहते थे। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि जाट समाज उस टाइम हर हरित क्रांति की दौड़ में था। क्योंकि हमारे यहां जो पश्चिम उत्तर प्रदेश हरियाणा और पंजाब का एरिया है यह इरीगेटेड भी था और हरित क्रांति में अग्रणी भी था। तो इसका सेटिस्फेक्शन यही था। सीधी कौम होने के कारण छोटे में सेटिस्फेक्शन कर लेती है और बंटवारे भी तब तक नहीं हुए थे। तो घर में जमीन जायदादें भी ठीक थी और तब तक खेती के इक्विपमेंट भी आ चुके थे। तो जब यह लागू होने का नंबर आया मंडल कमीशन का 81 में उसकी रिपोर्ट आई। फिर कांग्रेस आ चुकी थी। कांग्रेस इसको करना नहीं चाह रही थी। तो 89 में जब वीपी सिंह की सरकार बनी केवल उसमें इतना चेंज हुआ। लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह और नीतीश कुमार, कर्पूरी ठाकुर यह तमाम नेता तो जो चौधरी साहब के सहपाठी थे और चौधरी साहब की क्योंकि वो हमारे बीच में 87 में नहीं रहे तो 89 में उनकी जगह चौधरी अजीत सिंह थे। तो ये दबाव पड़ा और मंडल कमीशन भी लागू हो गया। वीपी सिंह जी ने मंडल कमीशन लागू कर दिया। उस टाइम पे भी हमारे नेताओं ने बहुत साहस और हिम्मत दिखाया। चौधरी अजीत सिंह ने 100 सांसदों के साइन करा के दिए। भाई जाट को भी ऐड कर लो। लेकिन जो नीचे की मूवमेंट थी वह खड़ी नहीं हुई मांगने के लिए। बल्कि हमारे हां लोग खड़े नहीं हुए और बाकी हमारे नेताओं ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और कुछ किसान नेता जो उस टाइम पर बड़े किसान नेता थे उन्होंने इसका विरोध भी किया। वो लोग उस टाइम किसान आंदोलन में बहुत जुड़े हुए थे 86 के बाद। तो लोगों का ध्यान अलग जगह था। उनको अपना परिवर्तन भविष्य क्या था यह नहीं पता था और जो उनको किसान नेता बहका रहे थे वह दूसरी तरफ से बहका रहे थे कि नहीं किसान इससे ही तुम्हारी तरक्की होगी तो इसी टाइम पे सेम चौधरी देवीलाल जी की सरकार थी हरियाणा में हुकुम सिंह मुख्यमंत्री उन्होंने गुरनाम सिंह आयोग बना के और 10 जातियों को रिजर्वेशन दे दिया और वहां देखिए आप क्या मजे की बात है हरियाणे में मंडल कमीशन ने ना गुर्जर की रिकमेंडेशन की थी ना सैनी की रिकमेंडेशन की थी ना यादव और अहीर की रिकमेंडेशन की थी। उसको रिजर्वेशन देने वाले मंडल कमीशन के बाद गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट के आधार पे 91 में चौधरी हुकुम सिंह ने जो देवीलाल जी किस की पार्टी के मुख्यमंत्री उन्होंने लागू कर दिया और मंडल कमीशन 93 में लागू हुआ। लेकिन 94 में आए भजन लाल जी उन्होंने एक सुप्रीम कोर्ट में रिट डलवाई और रिट डलवा के कहा कि इस रिपोर्ट को हम लागू नहीं करेंगे और छह जाति उसमें से निकाल दी दूसरे आयोग बना के उसमें जाट भी निकाला बिश्नोई भी निकाला अपनी जाति का भी बैठक के रख दिया और साथ में मुस्लिम जाट सिख जाट रोड और बिश्नोई भी रोड और त्यागी भी हरियाणे की लिस्ट में शामिल थे। जबकि यहां त्यागी रिजर्वेशन की मांग ही नहीं कर रहा। तो मेरा यह कहने का मतलब है कि नेताओं ने काम किया। जैसे उसके बाद साहब सिंह जी चीफ मिनिस्टर बने। उन्होंने दिल्ली में लोडा कमीशन बना के सर्वे करा दिया कि नहीं जाट तो पिछड़ा ही है। हमारे नेता लगातार लगे हुए थे। लेकिन हमारी कौम केवल किसान आंदोलनों में लगी हुई थी। उसका कोई ध्यान ही नहीं था इधर। तो इसलिए क्या हुआ कि राजस्थान के लोगों का ध्यान इधर गया। तो इसका जो देश में श्रेय जाता है वो राजस्थान को जाता है कि उन्होंने देश में जन जागृति की। नेताओं ने तो मैंने बताया साहब सिंह वर्मा, चौधरी देवीलाल चौधरी अजीत सिंह इन्होंने अपने स्तर पे जो काम किया लेकिन जनता किसान के ट्रैक्टर के आंदोलन पर बैठी हुई थी। तो इसके बाद यह हुआ कि राजस्थान में डीजीपी ज्ञान प्रकाश पिलानिया थे। उन्होंने सब राजनीतिक दलों को इकट्ठा किया। सब जो सम्रांत पूंजीपति थे। विजय सिंह पूनिया जैसे राजा राम मील जैसे और डॉक्टर हरी सिंह थे सांसद रहे हैं। यह तमाम लोग हैं। मतलब गिनती सैकड़ों में है। मैं तीन चार नाम आपको बता रहा सबने इकट्ठा होके और राजस्थान के गांव-गांव दर मुहिम भेज दी और बड़े रैलियां होने लगी रैलियां रिजर्वेशन के ऊपर। और 98 का एक ऐसा समय आया कि जब वाजपेयी जी की सरकार एक वोट से गिर गई थी। उस टाइम पर इन्होंने सीकर में और जयपुर में दो बड़ी रैलियां की। एक रैली में सीकर वाली में शायद वाजपेयी जी को भी बुलाया और साथ में कांशीराम जी को भी बुलाया। क्योंकि दलित और जाट का विरोध कोई ना करे। मतलब यह वाइड थॉट था। उस वाइड थॉट के तहत वाजपेयी जी ने वादा किया कि मैं तुम मेरी मदद करो और मैं तुम्हारी मदद करूंगा। और उसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा को 21 सीट मिल गई 25 में से और वाजपेई जी ने बैठते ही सबसे पहले केंद्र का आरक्षण किया राजस्थान के जाट का और जैसे ही राजस्थान के जाट का वाजपेयी जी ने आरक्षण किया शीला दीक्षित जी चीफ मिनिस्टर थी दिल्ली की उन्होंने अगले दिन सुबह रिजर्वेशन कर दिया क्योंकि वहां लोढ़ा कमीशन की रिपोर्ट थी और सिंह जी के समय साहब सिंह जी के समय की और राजस्थान के जाटों ने देवगोड़ा जी के टाइम में ही अपने सर्वे परवे खुल करा के शीशराम ओला जी ने मुझे बताया कि हमारे पेपर्स तैयार रखे हुए थे। हमने सब चीजें फिट करा के रखी हुई थी। केवल हमें यह मौका मिला और हमने इसका फायदा उठा लिया। उसके बाद जो कहीं पे जो स्टेट का रिजर्वेशन था वहां गहलोत मुख्यमंत्री थे। उन्होंने स्टेट का भी ज दिया और इसके बाद मध्य प्रदेश का भी हुआ। इसके बाद उत्तर प्रदेश का भी हुआ और उसके बाद हिमाचल का भी हुआ। इसके बाद बिहार का भी हुआ। इसके बाद गुजरात का भी हुआ। तमाम राज्यों में रिजर्वेशन होने लगे। दो ढाई साल के अंदर-अंदर यह परिवर्तन आया। अब उत्तर प्रदेश के बारे में मैं आपको ज्यादा बताना चाहूंगा। यहां भी परिस्थितियां हमारे अनुकूल आ गई। सन 2000 में क्या अनुकूल आ गई कि राम प्रकाश गुप्ता जी मुख्यमंत्री बने। पश्चिम के ही रहने वाले थे और जाट कौम की स्थिति को जानते थे और वहां पे नरेश अग्रवाल जी ने गुप्ता जी की मदद की कांग्रेस तोड़ के 22 23 25 एमपी बनवाने में और उसमें दो मंत्री हमारे पहुंच गए चौधरी लक्ष्मी नारायण जी जो वर्तमान में गन्ना मंत्री है चौधरी सरदार सिंह जी और एक मंत्री पहले से थे चौधरी वीरेंद्र सिरोही जी तो इन तीनों ने अपने प्रयास किए और तीन तीनों ने प्रयास कर गए इन्होंने गुप्ता जी को मनाया चौधरी चरण सिंह की मूर्ति का अनावरण करना और आरक्षण की घोषणा करना तो मथुरा में वो रैली हुई शायद कोसी में हुई या कोई कोसी में और वहां पे रिजर्वेशन की घोषणा करा दी तो हमें मतलब अवसर मिल गया गुप्ता जी की वजह से क्योंकि वो पश्चिम के रहने वाले थे उनको हमारी कल्चर सब चीजें पता था और वो चौधरी साहब के मंत्रिमंडल में भी शामिल रहे 71 में शायद तो इस तरह से क्या हुआ कि उत्तर प्रदेश के जाट के खिलाफ तुरंत लोग कोर्ट चले गए। तो गुप्ता जी ने एक और बहुत बड़ा समझदारी का काम किया। इस कौम को पूरा धन्यवाद गुप्ता जी को करना चाहिए कि उन्होंने बाबू हुकुम सिंह की एक कमेटी बना दी जो सर्वे करेगी कि भाई जाट की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति क्या थी? बाबू हुकुम सिंह का भी धन्यवाद पूरी कौम को करना चाहिए। उन्होंने ठोक कर ऐसी रिपोर्ट दी कि वो ना हाई कोर्ट से कटी ना सुप्रीम कोर्ट से कटी। तो मेरा यह कहने का मतलब है हमारी लोगों ने राजनेताओं ने मदद की लेकिन कौम का ध्यान राजनेताओं की तरफ नहीं था।
प्रश्न 3: अब ये जो रिजर्वेशन आपको हरियाणा में मिला, राजस्थान में मिला?
यशपाल मलिक: , राजस्थान में मिला। हरियाणा में नहीं मिला। हरियाणा में मिला और कट गया। 94 में हरियाणा में मिलने के बाद कट गया। और राजस्थान में मिला, यूपी में मिला। मध्य प्रदेश में है तो यह जो मिला ये स्टेट में मिला सेंटर स्टेट में मिला राजस्थान को केवल सेंटर में मिला क्योंकि वाजपेयी जी ने तो सेंटर में ही देना था वहां भरतपुर और धौलपुर छोड़ दिए और एक मैं नई बात और बताऊं अभी आपको कि पिछले 2 साल पहले जम्मू कश्मीर के जाट को भी चुनाव से पहले वहां रिजर्वेशन मिल गया है स्टेट में
प्रश्न 4: यानी जाट ऐसी जाति है जो उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग में है और केंद्र सरकार की नौकरियों में वही जाति जनरल फॉरवर्ड कास्ट होगी?
यशपाल मलिक: जो उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्ग में है और केंद्र सरकार की नौकरियों में वही जाति जनरल फॉरवर्ड कास्ट होगी फॉरवर्ड कास्ट हो जाएगा। यहां बैकवर्ड कास्ट हां मतलब यहां के डिप्टी एसपी आप बन सकते हो। एसडीएम बन सकते हो। लेकिन डाखने में चपरासी के लिए इनकम टैक्स में चपरासी के लिए आप जनरल हो। और राजस्थान का जो जाट है भरतपुर और धौलपुर को छोड़ के छोड़ के वो स्टेट और सेंटर दोनों में बस बाकी और कोई नहीं है। और जम्मू कश्मीर में आप जम्मू कश्मीर स्टेट में अभी दिया। बीजेपी ने दिया है। सेंटर में वहां भी नहीं है। सेंटर में वहां भी नहीं। तो यानी यह दो तरह की जो रिजर्वेशन नागरिक हैं हम एक कास्ट के लिए दो तरह की रिजर्वेशन पॉलिसी है। तो इसमें ये हुआ कि लोग बाग जाट बहुत संतुष्टि है। अगर इस साल फसल अच्छी होगी तो चादर तोड़ के सोएगा। मजा आ गया। मतलब अगले साल बहुत प्रयास कम करेगा। इसी तरह नेताओं ने रिजर्वेशन दिला दिए। लेकिन हम शांत हो गए। यार मिल गया बहुत है इतना एक बहुत है और 2006 आते-आते हम लोग भी जाट सभाओं से जुड़े और क्योंकि हम व्यापार कर रहे थे और लोगों में ये चर्चा चलने लगी और हजारों साथियों ने मिलके ये कहा कि भ रिजर्वेशन लेना चाहिए सेंटर में भी सेंटर में भी लेना चाहिए तो 2006 से हमने रैलियों की शुरुआत करी उसके बाद सात में अपने गांव में करी नौ की मेरठ की रैली तो आपने देखी हां वो बहुत हिस्टोरिक वो हिस्टोरिकल उसमें दारा सिंह जी चौधरी महेंद्र सिंह टिकत चौधरी अजीत सिंह और मुझे लगता है 1 लाख से ज्यादा की हां और उसमें तो 5 लाख भी कहते हैं 1 लाख भी कहते हैं कुछ ही कह लो मतलब वो एक बड़ी अनगिनत टाइप रैली थी और उसमें मुलायम सिंह जी ने भेजा कृष्ण किरणपाल जी को और बहन मायावती ने भेजा गजेंद्र जी जो विधायक थे वहां से और सब पार्टियों का प्रतिनिधित्व था। मुलायम सिंह आना चाहते थे किसी कारणों से नहीं आए। उसका खुलासा करना यहां ठीक नहीं है और वह ऐतिहासिक रैली हुई लेकिन जिन लोगों से हम एक्सपेक्टेशन कर रहे थे कि भाई यह दे देंगे कांग्रेस के दौरान तो आंदोलन चलता रहा इसने नहीं दिया तो उनकी सरकार ही नहीं आई तो हम उन लोगों के पास भी गए जैसे भाई सरकार नहीं है तो हम क्या कर सकते हैं अब तो कांग्रेस से ही मांगना है और हम कांग्रेस के जो नेता थे चाहे उस टाइम पे हरेंद्र मलिक थे चाहे चौधरी वीरेंद्र सिंह थे चाहे चाहे हरियाणा के जाट नेता थे। चौधरी वीरेंद्र सिंह, अलीगढ़ से विजेंद्र सिंह थे। हम इनके यहां भी सब लोगों के जाते रहे। भाई कांग्रेस को कन्विंस करो, कन्विंस करो हमारा अधिकार है। और फिर इसको हमने आंदोलन की डगर पकड़ ली। 2009 की रैली के बाद और 2009 की रैली के बाद पहला आंदोलन हुआ दिल्ली में जो जन इस पे रामलीला मैदान में रैली बुलाई। वहां से दिल्ली कच किया गया। सोनिया गांधी के आवास पर रात के बजे बरसात में बैठकर फैसला हुआ। यह भी 8 फरवरी थी 2009 वह भी 8 फरवरी 2010 थी। बरसात भी दिल्ली में हो रही थी और वहां फैसला हुआ कि आपकी सुनवाई डे बाय डे होगी। लेकिन उसके बाद सुनवाई नहीं हुई। फिर चंडीगढ़ में एक रैली की कि भाई हरियाणा के जाट को भी आरक्षण मिले। फिर उसके बाद हमने 13 जून 2010 को दिल्ली का पानी रोक दिया। मुराद मुरादनगर से और जब दिल्ली का पानी रोक दिया तो सरकार ने बात की क्योंकि हमारा कोई पॉलिटिकल एजेंडा नहीं है। हमारा कोई तोड़फोड़ का एजेंडा नहीं है। तो सरकार ने बात की सरकार ने कहा नहीं डे टू डे सुनवाई करेंगे आपके उस पे। हमने पानी खोल दिया अगले दिन सुबह। उसके बाद बात आई कि भाई अगर सरकार हमारा कॉमनव्थ गेम तक नहीं करेगी तो हम कॉमनव्थ गेम पर भी प्रदर्शन करेंगे और एक दिन कब्जा भी रहा जाटों का कॉमनव्थ गेम हेड क्वार्टर पे और उसके बाद फिर हमने सब धर्मों के जाटों को जोड़ने के लिए 29 अगस्त से एक पूरे तीन चार राज्यों में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से यात्रा की शुरुआत की और 2000 13 सितंबर 2000 को एक हमारा भाई हरियाणे में शहीद हो उसमें क्योंकि उसमें उस दिन देश में 62 जगह पे प्रदर्शन थे केवल शांतिपूक ट्रैक के मतलब हाईवे के बराबर में कोई हाईवे पर प्रदर्शन नहीं था। लेकिन वहां एक एसपी था सुभाष यादव। उसने उस बच्चे के गोली मार दी। कोई झगड़ा नहीं था। कोई आंदोलन हिंसक नहीं था। कोई सड़क नहीं रुकी हुई थी। लेकिन केवल कहासनी में वो औरतों की बेइज्जती कर रहा था। यह बच्चा सामने आया। उसको गोली मार दी और उसके बाद वहां पर भी आंदोलन हिंसा में कन्वर्ट हो गया। तो इस तरह से यह होता रहा 2011 12 2011 में काुरपुर से रेल रोको आंदोलन 23 दिन का चला और हां अमरोहा में और तब हमें पता लगा कि हमारे साथ क्यों नहीं हो रहा हमारा आरक्षण आंदोलन शुरू करने से 15 दिन पहले मुझे राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने चिट्ठी लिखी कि आपका रिप्रेजेंटेशन आया था और वो 98 में रिजेक्ट कर दिया गया और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को यह अधिकार नहीं था वह किसी भी जाति का अपने से करें नहीं दोबारा से सुन ले हम तो फिर हमारा फैसला हुआ चिदंबरम साहब के साथ 19 मार्च को और उन्होंने कहा कि मैं दो-ती महीने में गजट नोटिफाई करके पिछड़ा वर्ग आयोग में संशोधन करा दूंगा और 3 मई 2011 को राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को अधिकार कह गया कि किसी की अगर एप्लीकेशन कैंसिल कर रखी तो उसको दोबारा कर सकते हैं। दोबारा कर सकते हैं। और फिर अच्छा समय आया हमारा आंदोलन तो चलता रहा। 2012 में भी चला। चौधरी अजीत सिंह ने कांग्रेस जॉइन कर ली और हमें एक बड़ा वकील वहां भी मिल गए और कांग्रेस के जो नेता भी थे हरेंद्र मलिक, विजेंद्र इनको भी बल मिला और उधर हुड्डा साहब मुख्यमंत्री थे वे हरियाणा का आरक्षण देने में देर कर रहे थे। लेकिन केंद्र के आरक्षण के लिए वह भी कहीं ना कहीं कुछ किया उन्होंने। लेकिन अगर वे देर ना करते हरियाणा के जाट को पहले आरक्षण दे देते तो यह रिजर्वेशन 2011 में ही मिल जाना था और उसके बाद यह हुआ कि 2014 के चुनाव से एक दिन पहले 4 मार्च 2000 14 को हमें नौ राज्यों के जाट को भरतपुर धौलपुर को भी और आठ राज्यों के अन्य जाटों को केंद्र की सूची में शामिल कर लिया गया। लेकिन उसमें भी दुर्भाग्य देखिए राजनीतिक रूप से हरियाणे की राजनीतिक नफरत ने हमें गर्त में पहुंचा दिया। वहां कुमारी शैलजा सामाजिक न्याय मंत्री थी। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग उसके अंतर आता था। मैं तीन बार उसके घर गया। बहन जी इसको आयोग की रिपोर्ट को ठीक करा दो। मुझे दिखाई देखो मेरे पास सब जाट रहते हैं। मेरे पिताजी को जाटों ने बहुत मदद की। मुझे की लेकिन उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति हमारे खिलाफ थी। चौधरी वीरेंद्र सिंह ने भी उनको चारप बार कहा कि भाई यह रिपोर्ट ठीक जानी चाहिए और रिपोर्ट गई आयोग की खिलाफ खिलाफ तो जब आयोग की रिपोर्ट खिलाफ हो गई तो कैबिनेट ने तब भी अप्रूव कर दिया आवाज ठीक आ रही है देवांश प्रूव कर दूं कंटिन्यू तो कैबिनेट ने फिर भी अप्रूव कर दिया लेकिन उस पे नोट्स नहीं लिखा कि हम किस बेस पे इसकी रिपोर्ट को खारिज कर रहे हैं और क्यों हम इनको रिजर्वेशन देना चाहते हैं। अगर कैबिनेट प्रॉपर लीगल उस पर लिख देती तो शायद सुप्रीम कोर्ट में हमारा टिक जाता। और एक हरियाणे में क्या काम किया हुड्डा जी ने दूसरी जातियों को खुश करने के लिए जाट के अधिकारों पर डकैती डालने के लिए उन्होंने यह काम किया कि हरियाणे में 10% अलग से आरक्षण दिया जाट को एसबीसी के तहत जो पूरे देश में मैं हरियाणे वासी के लिए कोई टंच नहीं कर रहा। पूरे देश में चाहे मराठों को अलग मिला, चाहे कापू को अलग मिला, चाहे पटेलों को अलग मिला। वे सब आरक्षण कैंसिल हुए हैं। तो वो भी कैंसिल होना था और वो एक ही नोटिफिकेशन में थे वेब एसबीसी आरक्षण लिए हुए लोग। यानी यह पहले से प्लान में था उनके कि देना है और रिजेक्ट करा देना। हां। मतलब हुड्डा जी बहुत श्रूड पॉलिटिशियन है। तो ऐसा क्यों चाहते थे? वो श्रूड पॉलिटिशियन है। वो चाहते थे कि हरियाणे में जाट बड़े भाड़ में जाए लेकिन तेरी वह ना हो कि भाई जाट को आरक्षण दे दिया। मैंने तो उनको यहां तक भी कहा कि हरियाणा में अभी आरक्षण बाकी है। 3% 50% तक हो सकता है। आप जाट को 3 ही परसेंट में दे दो। कम से कम केंद्र में तो उसे पूरा मिल जाएगा। वो बहुत स्लूट पॉलिटिशियन है। पॉलिटिशियन देश में अगर किसी आदमी ने गड़बड़ की है तो केवल वो है। बाकी सब नेताओं ने देश में बाकी सब नेताओं ने देश में जो है 2014 में जो रिजर्वेशन मिला इलेक्शन के ठीक एक दिन पहले नोटिफिकेशन के वो कैसे खारिज हुआ? वह इसलिए खारिज हुआ कि एक तो उसमें राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट नहीं थी और कैबिनेट ने उसको अप्रूव कर दिया और अप्रूव करने के टाइम पे प्रॉपर नोटिंग नहीं लिखी गई कि भाई किस कारण से हम राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने जो रिजेक्शन किया हम वो किस वजह से उसको कर रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ? ये इंटरनल पॉलिटिक्स थी हरियाणे की। हरियाणे में शैलजा और हुड्डा के 36 का आंकड़ा था। इधर से यह चाहते थे। इन्होंने खुद अपने आप दिसंबर 2013 में आरक्षण दिया। एक तो इनका आरक्षण लेट हुआ। इन्होंने जो सर्वे करा उस सर्वे पर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे। उसके बाद जो नोटिफिकेशन 10% अलग किया इन्होंने जाट का एसबीसी बना के स्पेशल बैकवर्ड क्लास। उस तरह से जहां-जहां भी आरक्षण मिले, चाहे मराठों को मिले, चाहे कहीं पटेलों को मिले, चाहे कापूज को मिले, जहां भी मिले देश में वो कैंसिल हुए। अलग से कोई प्रोविजन ही नहीं है आरक्षण देने का। तो ये इनकी श्रूटनेस रही होगी कि भाई दूसरे जब की हरियाणा में उन्होंने ईबीसी का आरक्षण भी किया। इकोनमिक बैकवर्ड क्लास को भी 10% अलग दिया। जो बाद में केंद्र में भी आरक्षण अप्रूव किया ईबीसी का और वहां जो नौकरियां एसबीसी में लग गई थी उनको नौकरियां नहीं मिली। और बाकी ईबीसी में जो नौकरी लग गई थी उनको मिल गई अगली सरकार ने क्योंकि वहां जाट गैर जाट का बहुत भेदभाव है और इस सब चीज को हर राजनेता इससे डरता है वो चाहे कोई हो देवीलाल के बाद ऐसा कोई परिवार नहीं हुआ जो किसी से ना डरता हो बाकी तो सब लोग अपनी घुट्टी पिलाने में फिट रहते हैं कि भाई मेरी जाती ये ये 14 वाला जो रिजर्वेशन था ये कितने दिन टिका रहा ये 15 मार्च 2015 तक सुप्रीम कोर्ट में बड़ी बहस हुई चौधरी चौधरी अजीत सिंह ने भी केटीएस तुलसी को भेजा कोई वकील भेजे जाट सभाओं ने भी वकील किए मेरठ जाट साहब ने भी वकील किए सूरजमल संस्थान ने भी वकील किए हमने भी वकील किए लगभग 10 वकील वहां खड़े थे अपने जस्टिफाइड करने के लिए और उस को बचाने में हम नाकामयाब रहे। इस बीच में कुछ लोगों को नौकरियां मिली इस बहुत बड़ी संख्या में दाखिले हुए। दिल्ली यूनिवर्सिटी में भारी संख्या में दाखिले हुए। आईआईटीज में दाखिले हुए। मेडिकल्स में दाखिले हुए क्योंकि वो 15 में मिला मार्च में जुलाई में रिजल्ट आने थे और आईएएस में तो 199 बच्चों के इंटरव्यू कैंसिल हुए और बैंकिंग में 10,000 बच्चे लगे थे सभी बैंकों में उनकी जिसकी जॉइनिंग नहीं हुई थी वे सब घर आए पीओज में बच्चे लगे थे वे घर आए बड़ी संख्या में लोग भाग गए रोजगार में हिस्सेदार जिनकी जॉइनिंग हो गई थी वो वो रहे वो रहे तो लोग यह कहते हैं कि जाटों को रिजर्वेशन की क्या जरूरत है जाट इस पूरे इलाके में जिसकी आप बात कर रहे हैं हरियाणा, वेस्टर्न यूपी या राजस्थान का इलाका, पंजाब का इलाका लोग कहते हैं कि जाट समर्थ हैं इकोनमी में। वह मजबूत स्थिति में हैं। ड्राइविंग सीट पे हैं। पॉलिटिकली एडवांस हैं। देखिए पॉलिटिकली एडवांस होना तो यादव भी पॉलिटिकल एडवांस है। कई राज्यों में मुख्यमंत्री है। कुर्मी भी पॉलिटिकल एडवांस है। 20 साल बिहार में मुख्यमंत्री रहे हैं। जितनी देश में पिछड़ी जातियां हैं। चाहे बंगाल चले जाओ चाहे कहीं चले जाओ। सब किसान जातियां पॉलिटिकली एडवांस है। गुर्जर भी पॉलिटिकली एडवांस है। उप मुख्यमंत्री दो-दो रहे हैं। तो मेरा यह कहना इसमें पॉलिटिकली तो जहां आपकी जितनी संख्या वो पॉलिटिकली आपको रिप्रेजेंटेशन मिलेगा। इसमें पॉलिटिकली एडवांस जो रिजर्वेशन का कांसेप्ट है सोशली और एजुकेशनली बैकवर्डनेस। आज भी देश में यह बताते हैं कि कृषि पर जो है 92% किसानों के पास एक एकड़ से कम भूमि है। एजुकेशन सर्वे नेशनल एजुकेशन सर्वे यह बताता है कि जो है जो ग्रेजुएट है वह 14% से ऊपर ग्रामों में जाते ही नहीं है। वो पहले वो छोड़ देते हैं। कोई भी खेती हर जाती है। अगर कपड़े अच्छे पहनने से अगर वह संपन्न नजर आती है तो गांव के हालात तो आप देख सकते हो। आज टोटल जाट क्रेडिट कार्ड पे है। जमीनों की एकदड़ से ज्यादा जमीनों की किसी की हैसियत नहीं है। और जाट पहले से खानेपीने पे अपना ध्यान किया तो उसकी सेहत अच्छी है। बाकी तो लैंड होल्डिंग अब हमारे एरिया में गुर्जरों की भी इतनी है जितनी हमारे पास है बेहतर ही होगी। यादवों के पास भी और पूरे देश में तो जाट है नहीं। दक्षिण भारत में 69% आरक्षण है तमिलनाडु में। वहां की जाति भी इतनी संपन्न है। आप जाइए कर्नाटका में। कर्नाटका की किसान जाति भी इतनी संपन्न है। आप जाइए किसी भी प्रदेश में मराठों में दो गुट है। एक कुबी एक मराठा। कुबी इतना ही संपन्न है जितना मराठा कुबी को मिल गया। मराठे मांग रहे हैं। तो इस तरह की भावनाएं तो लोगों को जाती या नफरत फैलाने का एक राजनीतिक लोगों को षड्यंत्र है। हम लोग पिछले 26 साल से रिजर्वेशन में है स्टेट में। और स्टेट में रिजर्वेशन में होते हुए सेंटर में नहीं है। तो ये कहां की बात है? आज आज देश की सब जातियां रिजर्वेशन में है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने जो गरीब लोग दूसरी जातियों के स्वर्ण जातियों के थे उनके लिए 10% अलग आरक्षण अलग कर दिया और ओबीसी आरक्षण भी क्रीमी लेयर बेस है। जो क्रीमी लेयर स्वर्णों के लिए है वही क्रीमी लेयर यहां के लिए है। तो इसलिए यह सब चीजें कहना एक लोगों को गुमराह करना है। दूसरे को यह बताना कि भाई हम जाट के खिलाफ हैं। जिस बीजेपी ने आपको यूपी में रिजर्वेशन दिया बैकवर्ड कास्ट में जी जी उस बीजेपी के पास आप लोग गए थे जी गृह मंत्री से बकायदा हां आपकी मीटिंग हुई थी जी जी और डिस्कशन हुआ और ये मीडिया रिपोर्ट्स आई कि अब मिलने जा रहा है सेंटर में भी मैं वो तो आप और आगे चले गए। मैं इससे पहले की गंभीरता बताता हूं। जिस दिन 15 मार्च 2015 को रिजर्वेशन कैंसिल हुआ और देश में यह पहली घटना है। आज लोग किसी के साथ इस तरह की घटना नहीं घटी। माननीय प्रधानमंत्री जी ने तमाम प्रदेश के जाट नेताओं को यह कहा कि आप अपना प्रतिनिध जाट जाट समाज के जो प्रतिनिधि हैं सामाजिक प्रतिनिधि उनको लेके आइए। चाहे वह खाप होके हो चाहे कोई हो। 24 मार्च को सरदार वल्लभ भाई यूनिवर्सिटी में बीजेपी के नेताओं ने पूरी यूपी से आदमी बुलाए। उनमें से कुछ आदमी छांट के कहा कि 26 को प्रधानमंत्री से मिलोगे। उसमें मैं भी था। चौधरी नरेश टिकटैत भी थे। उसमें राजेंद्र बाबा गठवाड़ा भी थे। और हमारे हर जिले से एक-ए दो आदमी था। हरियाणे के लोग भी थे। उसमें पंजाब मतलब पंजाब में तो नहीं है। बाकी सब जगह के लोग दिल्ली के लोग भी थे। और उन्होंने अपने आवास पर बुला के 26 मार्च 2015 को वहां इतनी अच्छी तरह से हमें समझाया कि पहले मैं आयोग कैंसिल करूंगा। दूसरा आयोग बनाऊंगा जो कानूनी दर्जा होगा जिसकी रिपोर्ट कोई खारिज नहीं कर सकता। आप केवल शांति रखें। जब इतने दिन शांति रखी तो इतने दिन और शांति रख ले। मैं कानूनी रूप से आपको आरक्षण दूंगा। इससे बड़ा क्या आश्वासन हो सकता है? उसी के घर से निकल के अमित शाह जी के यहां बैठे। अमित शाह जी ने तीन घंटे समझाए जाट कि सड़क पर मत आना। पहले मैं आप लोगों को और हरियाणे के लोग भी वहां थे। लेकिन जैसे ही नवंबर 2014 में हरियाणे की सत्ता निकल गई जाटों के हाथ से तो उन्होंने समझा सब कुछ निकल गया। और वे वहां पर पहले तो हम लोग आंदोलन कर रहे थे। उसमें चार जिले शामिल होते थे। हिसार, भिवानी, दादरी का कुछ हिस्सा और साथ में जींद का कुछ हिस्सा और फतेहाबाद की देसी बेल्ट। और कोई आरक्षण नहीं मांग रहा था। रोहतक, झज्जर, सोनीपत का एक भी आदमी 2014 तक आरक्षण नहीं मांग रहा था। लेकिन जैसे ही सरकार उनकी चली गई उनके लिए देश का सबसे प्रमुख मुद्दा आरक्षण हो गया। इनको यह चीज समझाई गई उनके राजनीतिक नेताओं ने जिनकी सत्ता गई थी और उनको तैयार कर दिया कि क्या प्रधानमंत्री होता है? क्या होता है? आप आंदोलन करो। आप सरकार दबा के लठ चढ़ा के आरक्षण ले लोगे। और उन्होंने मई 26 मार्च को मई जून 2000 में जंतरमंतर पर हरियाणा वालों ने मीटिंग रख दी। जिसमें कुछ उन्होंने जाट भी बुलाए। हम गए तो हमारी हुटिंग हुई। और भी कुछ लोग गए। उनकी वटिंग हुई जो समझाने का प्रयास कर रहे थे। और वहां हरियाणा तीन जगह बट गया। एक तो रोहतक झज्जर सोनीपत की खापों ने अलग मोर्चा संभाल लिया। एक जींद की खापे सुबह सिंह सम्मान के नेतृत्व में अलग संभाल लिया मोर्चा। और एक तीसरा मोर्चा हवा सिंह सांगवान जो हमारा ही पहला अध्यक्ष था 2011 में चला गया था छोड़ के उन्होंने मोर्चा संभाल लिया। और इन तीनों ने आंदोलन की घोषणा कर दी। 1 फरवरी से लेकर 14 फरवरी तक अलग-अलग डेट की। एक ने 8 फरवरी करी, एक ने 12 फरवरी करी, एक ने 14 8 फरवरी वाले मान गए। 12 वाला एक दिन रेलवे ट्रैक पे बैठ के मान गया। हवा सिंह सांगवान 8 फरवरी में जींद की खाप पे और ये 14 वाले नहीं माने क्योंकि इन्होंने तो पहले आरक्षण की लड़ाई लड़ी नहीं थी। और ना यह व्यवस्थित थे। ना इनके यहां कोई नेतृत्व था। यह किसी खाप के 20 गांव, किसी खाप के 10 गांव, किसी खाप के 30 गांव और इन्होंने 14 तारीख से आंदोलन की कॉल दे दी। जब इन्होंने आंदोलन की कॉल दे दी, सरकार ने समझाने का प्रयत्न किया। दो-तीन नेता भी इनके पास गए। समझौते का प्रयास किया। 17 तारीख में इनसे समझौता कर लिया सरकार ने चंडीगढ़ बुला के। यह फिर वापस नहीं गए। 18 17 की रात को के हिंसा ना हो। यूथ ना बढ़के हॉस्टल खाली कराना कराने के लिए इन्होंने पुलिस गई और पुलिस ने सख्ती से काम किया। लड़कों की पिटाई करी और उसका रोष हुआ और अगले दिन आईजी के दफ्तर पर प्रदर्शन हुआ और प्रदर्शन होने के बाद दो लड़कों के गोली मार दी गई। आंदोलन हिंसक हो गया और दो मार दिए दूसरे लोगों ने और यह हिंसा पूरे हरियाणे को चपेट में ले लिया जिसमें आर्मी बुलानी पड़ी। ना उसमें हमारा कोई मतलब था ना हम हरियाणा में गए वहां की खाप पे आंदोलन चला रही थी उन्होंने ही लोग मरवाए उन्होंने ही लोग जेल भिजवाए और इसका जो 20 तारीख को जब वहां 18 को गोलियां चलनी शुरू हो गई तो उत्तर प्रदेश की खापे और सामाजिक संगठनों ने अपनेपने जिले पर धरने देने शुरू कर दिए कि भाई गोली ना चलाई जाए। 20 तारीख को दोपहर को हम सोरम की पंचायत में मैं भी टिकत साहब भी गठवाले के बाबा भी और तमाम खाप के चौधरी वहां बैठे हुए थे और चर्चा कर रहे थे भाई हरियाणा में बहुत बुरा हो गया यू काम नहीं होना चाहिए तभी संजीव बालियान जी का फोन आया कि राजनाथ जी दिल्ली वालों से और आप लोगों से मिलना चाहते हैं। शाम को गए उन्होंने शांति की अपील करी। उनके सामने मांग रखी कि भाई आप बहुत लोग मर गए हैं। इनको कुछ मुआवजा दे दो। कुछ इनको नौकरी पोकरी का इंतजाम कर दो। कितने लोग मारे गए सुशह में? टोटल 31 जिसमें 13 नॉन जाट और 18 जाट। संपत्ति बहुत फूंकी। कैप्टन अभिमन्यु का घर फूंक दिया। प्रेस फूंक दी। उसका स्कूल फूंक दिया। तो यह आंदोलन थोड़ा था। एक नेता को टारगेट करा रहे थे। नहीं ये तो आप लोगों के हाथ से निकल गया ना। नहीं हमारे तो हाथ में था ही नहीं। हमारे हाथ में आंदोलन कहां था? उनकी खापों के हाथ में था। हमारे हाथ में आंदोलन कहां था? वो आपके साथ नहीं थे। ना कोई नहीं हम ही उनके साथ नहीं थे।
प्रश्न 5: थोड़ा अतीत में जाइए। ये मूवमेंट अखिल भारतीय जाट महासभा और उससे एसोसिएटेड अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति…
यशपाल मलिक: ये मूवमेंट अखिल भारतीय जाट महासभा और उससे एसोसिएटेड अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति नहीं नहीं जाट महासभा से हमारा कोई मतलब नहीं था। 2009 के बाद हमने जाट महासभा राजनीतिक राजनीतिक संगठन था। हमने छोड़ दिया था क्योंकि उनके अध्यक्ष बीजेपी के थे और अब भी उनके अध्यक्ष कांग्रेस के हैं तो वह राजनीतिक जाट सभा है तो हमने उनको छोड़ दिया था कि क्योंकि हर राज्य की राजनीतिक स्थिति अलग-अलग है। वह आप किसी राजनीतिक दल का अध्यक्ष बना के आप जाटों का संगठन नहीं चला। अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति इसे लीड कर रही थी। हां, लीड कर रही थी। 14 में नहीं लीड कर रही थी। उसमें जो 16 में हुआ उसको लीड कर रही थी। कांपे 14 तक हम लोग लीड कर रहे थे। आरक्षण मिल गया था। हम प्रधानमंत्री की बात से 100 शतप्रिशत सहमत थे। हर राज्य का जाट प्रधानमंत्री की बात से सहमत था सिवाय हरियाणा के तीन जिले छोड़ के। हरियाणा के जाट भी सहमत थे। उन्होंने भी जींद की खापों ने आठ एक तारीख को फैसला कर लिया था।
प्रश्न 6: तो ये मतभेद क्यों पैदा हुए? पहले मतभेद नहीं होते।
यशपाल मलिक: पहले मतभेद नहीं होते। ये देखो आप राणा जी मतभेद नहीं है। ये राजनीतिक पपट्स थे कुछ जो हरियाणा को जलमाना चाहते थे। उसमें कुछ लोग बीजेपी में भी थे राजकुमार सैनी जैसे लोग। इसमें कुछ लोग विपक्ष की पार्टी जिनकी सत्ता गई थी उनमें भी थे। उनकी तमाम वीडियो वायरल हुई है कि भाई तुम्हारे यहां जल गया। हमारे यहां जल गया। तुमने क्यों नहीं जला? दूसरे जिलों को फोन करके कह रहे थे तत्कालीन मुख्यमंत्री के लोग। तो मेरा यह कहना है कि इस तरह की चीजों को वो वो आंदोलन हमने लीड ही नहीं किया। उसके बाद जब हिंसा हो गई उनका फैसला हो गया 22 तारीख को और फैसला होने के बाद जब उनकी गिरफ्तारियां होने लगी तब वे लोग दिल्ली वालों के पास आए जो दिल्ली की जाट आरक्षण संघर्ष समिति थी वे उन्हें मेरे पास लेकर आए। नांगड़ोई जाट धर्मशाला में मीटिंग हुई। मैंने एक कंडीशन रखी। मैं किसी आंदोलन को तब लीड कर सकता हूं जब उसमें 100% शांति की गारंटी दे लो। तो 100% शांति की क्योंकि हम पहले तीन लोग खो चुके थे। 2010 में खो चुके थे। 2000 11 में एक ट्रैक पे वो तो नेचुरल डेथ थी उसकी। वो कोई ऐसा नहीं था कि भाई वो कैंसर था उसको। 2012 में फिर ऐसे ही एक बच्चा शहीद हो गया था मैयर ट्रैक पे। तो मेरा यह कहने का मतलब है जब मैं अपने बच्चों को नहीं मरवा सकता। मैं दूसरे के बच्चों को क्यों मरवाऊं?
प्रश्न 7: अब कहां खड़ा है आपका मूवमेंट?
यशपाल मलिक: अब मूवमेंट यह खड़ा है। मतलब यह घटनाएं घट गई। 17 में बड़े स्तर पर शांतिपूर्वक आंदोलन हुआ और अमित शाह जी और सबके साथ बैठकर और सरकार से फैसला हुआ। मरने वालों को जो है नौकरी मिली। मरने वालों को सरकार ने 10 ₹1 लाख दिए। समाज ने भी 9090 लाख एक करोड़ रुपए दिए। वहां के समाज ने, दिल्ली के समाज ने जिसकी भी जो इच्छा थी और उसके बाद जो घायल थे उनको भी मुआवजा मिला और कुछ लोग लंबे समय तक वहां जेल में बंद रहे वो यह भी बता दूं कुछ लोग अभी भी जेल में नहीं नहीं एक एक है वो हत्यारा है। उसने एक गुर्जर के लड़के का मर्डर किया था। उसमें सजा हो रही और उस पर वैसे भी 70 केस है दूसरे भी एक दलजीत सिसाई जेल में बंद है जिसकी तमाम वीडियो डालते हैं लोग जिसको हीरो बनाते हैं वो आंदोलन के आखिरी दिन पास के गांव में कोई टशन हुई होगी रिजर्वेशन के ऊपर हुई या किस लिए हुई और उसने उसको वो गुर्जर के लड़के की हत्या कर दी हत्या के तो केस जो मुजफ्फरनगर में अब तक चल रहे दंगों में हत्या का केस कोई वापस नहीं ले सकता दुनिया में उसके बाद जो अभिमन्यु के केस में थे लगभग 100 आदमी के करीब वे 3 साल जेल में रहे। अभिमन्यु ने केस जब वापस लिया जब चुनाव हार लिया। राजनीतिक मैं उसके पास गया अभिमन्यु के केस होते ही मैंने कुशामंद की भाई आपके साथ यह दुर्घटना राजनीतिक लोगों ने कराई। बोलना मुझे उनको एक्सपोज करना। अरे भाई एक्सपोज तो तू कर लेगा लेकिन जिनके नाम लिख रहे उनमें से कुछ घटना में शामिल हो सकते हैं। ज्यादातर लोग कह रहे हैं हम शामिल नहीं थे। वो भी राजनीतिक एजेंडा था कि भाई हम इनके समर्थकों के नाम लिखवाएंगे। हरियाणा बहुत मिसमैच हो गया था राणा जी। उसके बाद वे सारे फैसले हुए 2017 में और 2017 में लोग उसके बाद भी कुछ जेल में रहे लेकिन जेल में बंद रहे जो हत्याओं में थे जेल में बंदे जो अभिमन्यु के आगजनी में थे जेल में वेब बंद थे जिन्होंने थाना लूट रखा था तो इसलिए वहां कुछ ऐसे केस थे जो वापस नहीं हो सकते थे 1500 केस अनट्रेस किए 489 केस वापस लिए सरकार ने 2000 के करीब तो ये हो गए और जो 489 वापस लिए उस पे एक अनुपम गुप्ता ने पीआईएल फायर कर दी कि आप कह रहे न्याय मिलेगा जो मुरथल रेप कांड था यह तो केस ही वापस लेने लग रहे वह आज तक बंद पड़ा हुआ सरकार के सेक्रेटरी ने सरकार ने सब ने केस वापसी के लिए भेज दिया था तो हरियाणा बहुत मिसमैच है वहां आदमी सामाजिक से ज्यादा पॉलिटिकल है तीन जिलों में तीन जिलों में पूरा हरियाणा ही नहीं और इन तीन जिलों के भी सब आदमी नहीं मात्र 1000 आदमी मात्र 1000 बाकी जाट पूरे देश का इतना सीधा है कि उसका इस्तेमाल किया है हरियाणा में राजनीतिक लोगों ने दोनों पार्टियों ने। तो आज हम कहां खड़े हैं मैं आपको यह बताना चाहता हूं। इस घटना के बाद जो गृह मंत्री जी और प्रधानमंत्री जी ने बुलाए 2017 में हमने फिर जगह-जगह घूम के प्रेस कॉन्फ्रेंस करी और कहा भाई प्रधानमंत्री का वादा है इसको पूरा कर दे। अमित शाह जी ने 8 फरवरी को चौधरी वीरेंद्र सिंह के घर पे हर जिले से जाट बुला के चुनाव से पहले राष्ट्रवास्त किया कि रिजर्वेशन देंगे। लेकिन क्योंकि आयोग 2016 में भंग हो चुका था। 17 में आयोग बन था ही नहीं तो आरक्षण कहां से देते? 19 में फिर हमने यह अभियान चलाया कि भाई 18 में भी कुछ जगह मीटिंगें की। 19 में अभियान चलाया। लेकिन जो हिंसा पहले हो चुकी थी उसके कारण हम भी डर रहे थे कि भाई यह हो और 19 के चुनाव से पहले फिर परवेश वर्मा के घर पर मीटिंग हुई जाटों की और उन्होंने कहा कि हम आरक्षण देंगे। उसके बाद कोरोना आ गया। कोरोना के बाद 13 महीने किसान आंदोलन आ गया और फिर उसके बाद आंदोलन शिथिल पड़ता चला गया और उस लेकिन 22 और 24 में भी आवाज उठी तो आज जो पपज है वह पपज है कि सरकार ने एक बार भी ना तो आपके विरोध में खड़ी है और यह मांग अब पूरे देश के जाट की नहीं है। हरियाणे का आरक्षण स्टे का जो बिल उन्होंने पास किया था 17 के समझौते के तहत उस पे स्टे लगा हुआ है। जम्मू कश्मीर में ताजा आरक्षण मिल गया है। अब हम लोग यह चाहते हैं उत्तर प्रदेश में हम पिछले 26 साल से आरक्षण में है। राजस्थान का आरक्षण मिला तो हमारा रास्ता खुल गया। अगर हमें आरक्षण मिल जाएगा तो और के भी रास्ते खुल जाएंगे। उनकी भी मांग पूरी हो जाएगी। तो इसलिए मेरा अब यह निवेदन है कि भाई हम उत्तर प्रदेश में एक जन जागरण अभियान चला रहे हैं। और एक रैली है 4 अक्टूबर को बुढ़ाना में। गांव-गांव में जा रहा हूं। मैं 100 गांव से ज्यादा कवर कर चुका। सीमित संसाधन है। हमारे पास राजनीतिक लोग तो हम है नहीं। आप जैसे भाइयों की मदद से प्रचार कर लेते हैं सोशल मीडिया पे। तो इसलिए मैं गांव-गांव जा रहा और मैं कह रहा भाई किसान की भी लड़ाई लड़ लेना। सारी लड़ाई लड़ लेना। एक बार इन बच्चों के लिए सरकार से मांग तो लो। ना हम कोई रास्ता रोकने की प्लान ना हमारा कोई धरना देने की प्लान। हम यह केवल सरकार को यह कहना चाहते हैं। प्रधानमंत्री जी ने वादा किया, गृह मंत्री जी ने वादा किया, 2014 जैसे हालात हैं। चौधरी साहब भी वहीं बैठे हैं। आप मांगोगे तो मिलेगा। नहीं मांगोगे तो कुछ नहीं मिलना। तो मांगने के लिए जाट जो है हाथ जोड़ के खड़ा कि भाई हम प्रदेश में आरक्षण में है। केंद्र में हमें आरक्षण मिल जाए। बुढ़ाना के बाद कहां? तो बुढ़ाना के बाद बुलंदशहर है। 25 अक्टूबर 15 की अह नवंबर की मथुरा है और दिसंबर के पहले हफ्ते में बिजनौर है। तो यह टाइमिंग इसलिए चुनी है आपने कि 27 का चुनाव करीब है। प्रेशर बिल्ड अप देखो ना प्रेशर तो सरकारों पे कोई बिल्ड अप नहीं कर सकता। आप पहले यह बात मुझे तो कांसेप्ट समझ में आ गया। कांसेप्ट कोई नहीं कर सकता। देश में पैदा सरकार के ऊपर हां मांग मान सकता है। अगर मांग मजबू मजबूती से मानी गई 13 महीने लोग बॉर्डर पर पड़े रहे तो प्रधानमंत्री जी ने कहा कि मैं समझा नहीं पाया। कानून मेरे अच्छे थे। तो बिल्ड अप तो प्रेशर नहीं होता कि भाई मैं एक दिन की रैली में कोई प्रेशर बिल्ड अप कर लूंगा। लेकिन वायदा याद दिलाने के लिए लोग इकट्ठा हो और कहे जी वादा पूरा कर दो। केवल यह है प्रेशर बिल्ड अप नहीं।
प्रश्न 8: आप बुढ़ाना से ही क्यों शुरू कर रहे हैं? कुछ लोग यह भी कहते हैं यशपाल मलिक जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा है, सदन जाना चाहते हैं।
यशपाल मलिक: कुछ लोग यह भी कहते हैं यशपाल मलिक जी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा सदन जाना चाहते हैं। देखो मैं शायद इसलिए बुढ़ाना से दूसरी बात मैं आपको बताऊं मैं छात्र नेता भी रहा हूं। बड़े भाई हरिंदर मलिक जी मेरे से चारप साल सीनियर होंगे। मैं चाहता तो मैं उस टाइम राजनीति में जा सकता था। मैं बड़े चौधरी साहब के भी नजदीक था। सतपाल मलिक के भी नजदीक था। राजनीति में हर आदमी नहीं जा सकता। राजनीति में जाकर सफल वो होगा जिसका परिवार 100% राजनीतिक माइंड का होगा। मुझे अपने बच्चे पढ़ाने थे। अपना बिजनेस करना था। मैं 2009 में भी जा सकता था। इतनी बड़ी रैली की थी। जिन्होंने मेरे बाद रैली की वे एमएलए भी बन गए। बड़े नेता भी बन गए। जाति के नाम पे जिन्होंने रैलियां की थी। चाहे वो किसी भी जाति की वे बड़े नेता बन गए। मुझे 2014 में भी ऑफर में जा सकता था। मैं टिकट मांगना पड़ेगा मैं। मेरे संबंध थे हर राजनीतिक दल में। ना कभी नहीं मांगा ना भविष्य में मांगू ऐसा हो सकता है परिवर्तन के लिए किसी आंदोलन में शामिल हो जाऊं मेरी फितरत नहीं है राजनीति की मेरी फितरत राजनीति की नहीं है मेरे साथ के जितेंद्र सतवे जिला अध्यक्ष था विधायक नहीं बना जो ओलक साहब है वो उस एरिया के अध्यक्ष थे एमएलए नहीं बने ऐसे बहुत लोग हैं हमारे लोकदल में पांच लोग जिला अध्यक्ष हैं लोकदल की कार्यकारिणियों में हमारे लोग हैं जो आंदोलन में भाजपा में, कांग्रेस में तमाम जगह ऐसे लोग हैं।
प्रश्न 9: तो यशपाल, आपको यह अफसोस होता है कि अगर मैंने भी सोचा…
यशपाल मलिक: कि अगर मैंने भी सोचा मुझे यह अफसोस नहीं होता। इसलिए नहीं होता कि जब मैंने सोचा नहीं तो मैं अफसोस क्यों करूं? अगर मैं सोचूं तो मैं यह काम राजनीति के लिए कर सकता हूं रैलियां कराने का और उसका मुझे कौन मना करेगा? आप चले जाओ, कोई चले जाओ देश का आदमी किसी राजनीतिक दल में जॉइ कर लो। उनके लिए काम करो। 510 साल में टिकट मिल जाएगा। जो आदमी मैं जाट के लड़कों को यह समझाता हूं कि जो तुम जाट जाट चिल्ला के राजनीति करना चाहते हो राजनीति जाति से नहीं होगी। हमारे यहां तो बड़े किसान नेता हुए देश के इनसे बड़ा कोई किसान नेता ही नहीं हुआ। दो बार ट्राई कर ली जमानत जप्त। अब तीसरी बार हाथ जोडू घूम रहे तो यशपाल मलिक तो पढ़ा लिखा जाट है। यशपाल मलिक अनपढ़ जाट नहीं राणा जी पढ़ा लिखा जाट है। और उसको भविष्य का पता कि मैं अगर जाति की लड़ाई लड़ रहा हूं। इस जाति को परिवर्तन के लिए मैं एजुकेशन पे कोई और दूसरे मूवमेंट्स में मैं जा सकता हूं। जैसे मैंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भी पिछली बार वकालत की भाई मिलना चाहिए। तो लेकिन मेरा उद्देश्य राजनीति नहीं है। मैं आपको क्लियर और मैं हर मंचों से कहता हूं।
प्रश्न 10: तो आप यह चाहते हैं कि इन रैलियों के बाद सरकार बातचीत के लिए डेलीगेशन को बुलाए और बैठकर बात करे?
यशपाल मलिक: बात वार्ता के लिए डेलीगेशन को बुलाए और बैठ के ये भी मैं ये भी मैं आपको क्लियर बता दूं। रैली अगर बड़ी होंगी तो बुलाया कौन जाएगा? पार्टी के नेता पहले नंबर पर आएगा जयंत चौधरी दूसरे नंबर पर आएगा भूपेंद्र चौधरी तीसरे नंबर पर आएगा संजीव बालिया चौथे नंबर पर आएंगे तेजबीर सिंह वहां से पांचवें नंबर पर आएंगे बुलंदशहर के बड़े जाट नेता जो बीजेपी में है छठे नंबर पर आएंगे मुरादाबाद मंडल के जो जाट नेता बड़े नीति में यशपाल मलिक के पास सीधा किसी का फोन नहीं आना तो और आप इन नेताओं से मिल लीजिए सीधे नहीं इनसे तो मैं मिलता रहा मैं लगातार पिछले वो कहते हैं भाई समाज मांगेगा तभी तो कोई देगा। यशपाल मलिक आप मेरे पास आकर बैठ जाओ और मैं आपको आरक्षण दे दूं। मुझे भी तो वही बुलाएंगे। उन्हें भी तो वही बुलाएंगे। राजनीतिक कार्य के लिए बुलाएंगे। बिरादरी में भेजेंगे। अब ये जितने जाट नेता हैं हर जिले में ये बिरादरी के नाम के नहीं है। गुर्जर नेता गुर्जरों में जाएगा। दूसरे जातियों में भी जाएगा। ब्राह्मण नेता ब्राह्मणों में जाएगा। बनिया नेता बनियों में जाएगा। भाई आजादी के बाद से जब से सरकार बननी शुरू हुई एक वर्ग था किसानों का किसान नेता हुए उसके बाद अब जाति के नाम पे टिकट मिलते हैं। मेरठ के टिकट आप बताओ किसे मिलेगा? पर्टिकुलरली शहर की सीट है तो दो ही जातियों को या तीन जातियों को मिलेगी। कोई ऐसा तो है नहीं कोई आके शहर की सीट किसी कश्यप को दे देगा या किसी को सैनिक को दे देगा। मुजफ्फरनगर की शहर की सीटें वैसे मिलेगी। तो यह सब चिन्हित है। हम लोग जानते हैं। तो इसलिए हम अपने नेताओं के पास ऐसा तो नहीं है कि आपकी जो नई जनरेशन है हम वो यह कहती है। अब
प्रश्न 11: अब नई उम्र के लड़के ये कहते हैं कि रिजर्वेशन इररेलेवेंट हो गया है। सरकारी नौकरियां तो बची नहीं हैं, प्राइवेट सेक्टर में है नहीं। तो आपको क्या लगता है, कितनी यूटिलिटी है इसकी?
यशपाल मलिक: िलेवेंट हो गया है। एक थ्योरी ये भी है कि साहब सरकारी नौकरियां तो बची नहीं है। प्राइवेट सेक्टर में है नहीं। तो इसलिए बहुत उपयोगिता रिजर्वेशन की बची नहीं। जो जिनको मिला हुआ है ऑलरेडी उनको नौकरियां नहीं मिल रही है। उनको जगह नहीं मिल रही है। तो आपको क्या लगता है? कितनी यूटिलिटी है इसकी? देखिए मैं आपको यूटिलिटी बताता हूं। हम पॉलिटिकल रिजर्वेशन प्राप्त कर रहे हैं जिला पंचायत तक जिला पंचायत अध्यक्ष तक तो जो गांव में लड़ रहे हैं अगर यह यूपी का भी खत्म करवा दो और जो पूरे जाट बोल गांव है उनकी क्या हालत होगी क्या हालत होगी जब 27% ओबीसी में सीट आएगी किससे ले आएंगे पकड़ के पहली बात तो इन राजनेताओं को दूसरी बात और बता दूं अगर कांग्रेस की सरकार 29 के बाद या 34 में भी आती है 39 में में भी आती है। ओबीसी का रिजर्वेशन पार्लियामेंट और असेंबली में भी होना है। यह लोग मुखर हो चुके हैं। अब इस बात पे ठीक। यह गलतफहमी है हमारे नेताओं को यह होगा नहीं। यह करेगी सरकार बिल ले आएगी। कैसे इतनी बड़ी पपुलेशन को आप धकिया दोगे? नहीं धकाया जा सकता। तीसरी बात उन यूथ को यह नहीं पता। एडमिशन में तो लोगे आप। एक लड़के का मेरठ यूनिवर्सिटी में एडमिशन हो रहा है। 96% पर उसका 95% स्टीफन में हो जाएगा। कहां पढ़ेगा वो? कहां पढ़ेगा? एजुकेशन प्रायोरिटी है। आज 1400 सीट मेडिकल की है। जिनमें से 60000 70000 सीट गवर्नमेंट की है। 15% सीट हर स्टेट को सेंटर को देनी पड़ती है। यानी 70 हजार सीट पर सीट सेंटर में जानी है। आपके स्टेट में तो रिजर्वेशन लागू है जो बच गई। 6000 में से 900 सीट आपने सेंटर को दे दी। 5100 पे रिजर्वेशन रहेगा। अब आप चले जाइए दूसरा। अब जैसे ही सेंटर की सीट आएगी तो उसमें से 1 डेढ़00 सीट 27% कोटे में भी आएगी। तो क्या इन जो स्टूडेंट मेडिकल की तैयारी कर रहे हैं इन्हें नहीं चाहिए? जो गांव से तैयारी कर रहा है और जो दिल्ली से तैयारी कर रहा है दोनों में जमीन सामान का अंतर है। तो ये एक डिफरेंस आता है। एक दो नंबर का डिफरेंस भी बहुत बड़ा फर्क डाल दिया। फॉरवर्ड कास्ट के लोग कहते हैं कि रिजर्वेशन उनका रास्ता रोकता है। फॉरवर्ड कास्ट को 10% ईडी ईडब्ल्यूएस दे दिया सरकार ने और आप अभी देखना चेक करना आईआईटी की मेरिट इसकी मेरिट मेडिकल की वो ओबीसी से नीचे गई है। ईडब्ल्यूएस की मेरिट क्यों गई है? उसमें अधिकतर शहर शहरी गरीब कवर कर रहा है और शहरी गरीब की हालत भी हमारे जैसी थी तो प्रधानमंत्री जी ने वह काम कर दिया तो अब क्रीमी लेयर बेस ही ओबीसी आरक्षण है ओबीसी आरक्षण में भी 8 लाख की लिमिट है तो एक तो यह गलतफहमी निकाल दे जो बच्चे बड़े घरों के बच्चे वे इरिवेंट कहते हैं इरिलवेंट है भाई इलेंट तेरे लिए है ही नहीं ये रिजर्वेशन ये तो गरीब ओबीसी के लिए है यह गरीब इकोनॉमिक बैकवर्ड के लिए है एससी एसटी की तरह नहीं है। सबको मिलेगा। उसके बाद मैंने बताई मेडिकल उसके बाद आईआईटी चले जाइए। उसके बाद क्लैट चले जाइए। उसके बाद एमबीए में चले जाइए। आई एम में चले जाइए। एमबीए के अच्छे कॉलेज में चले जाइए। जो गवर्नमेंट के सेंट्रल यूनिवर्सिटीज में चले जाइए। तो आप अभी आप दूसरी चीज सोचिए। नौकरी चलो मैंने मान ली कि भाई बहुत जगह नौकरी नहीं। टीचर की नौकरी खत्म नहीं हुई। आठ पैरामिलिट्री फोर्स हैं। उनमें रिजर्वेशन लागे है। आप यूपी पुलिस की तैयारी कर रहे। आठ फार्म आपको भरने के लिए भी मिल गए। 9 10 यूटी है यूनियन टेरिटरी उनकी पुलिस है। उनमें आपको अवसर मिल गया। जब आपको भरना ही सिपाही है तो एक की जगह 20 फॉर्म भरोगे आप। 20 में से हो सके। 100% नौकरियां लोगों को नहीं मिलनी है। नौकरियां अगर आपको अभी 1% मिल रही है, आप दो से तीन चार 5% तक जा सकते हैं।
प्रश्न 12: जाट फॉरवर्ड कास्ट है या बैकवर्ड? अब इसके उदाहरण बताओ, किस तरह का दूं मैं आपको?
यशपाल मलिक: सामाजिक रूप से बैकवर्ड है। अब इसके उदाहरण बताओ किस तरह का दूं मैं आपको? सन 70 में सामाजिक बैकवर्डनेस किसे कहते हैं? पहली बात तो बैकवर्डनेस का मतलब यह नहीं कि आप किस चीज से पिछड़े हुए हो। आप मानव नहीं हो। आप मानव हो लेकिन जब संविधान बना तो आप 1000 साल ले ले आप 5000 साल ले ले आप 15000 साल ले ले राजशाही थी राजशाही में अच्छा राज्य आएगा खराब भी आएगा और अलग-अलग राजा अपना व्यवहार करते थे जिसज देश में संविधान लागू हुआ हमारे देश में संविधान लागू हुआ तो संविधान में यह बताया गया कि भ यहां ऊंचनीच है भाई मेरे घर पे सन 70 में अगर हमारे पंडित जी आते थे और उनका 20 साल का लड़का भी आता था और मेरा बाबा सिराना बैठा तो सिराना छोड़ के खड़ा हो जाता था आजा भाई दादा आजा तो यह क्या वो नहीं थी उसके बाद हमारे घर पे कोई त्यौहार है और उस पर हम पंडित जी को जिमाएंगे तो जब पंडित जी को जिमाएंगे तो उसमें हमारा क्या था भाई के उसकी घर से ही औरत आएगी वह शुद्ध औरत थी हमारी मां अशुद्ध औरत थी अब वह स्थिति नहीं रही क्योंकि देश में संविधान लागू हो गया नौकरियों में सब चले गए सब बढ़िया खा रहे, बढ़िया फिरे। आज ब्राह्मण, बनिया, जाट सब एक जगह बैठकर रोटी खा रहे। लेकिन जब यह संविधान बना, जब यह आरक्षण लागू हुआ, तब तो सामाजिक पिछड़ापन था और शैक्षणिक पिछड़ापन इसलिए था कि जाट 99% गांव में रहता है। एजुकेशन में भेदभाव था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों को आप छोड़ दें और हरियाणा के कुछ जिलों को छोड़ दें। तो एजुकेशन सिस्टम में जाट बहुत पिछड़ा हुआ था। क्योंकि यहां
प्रश्न 13: अब आपका लक्ष्य क्या है? अब टारगेट क्या है?
यशपाल मलिक: अब टारगेट क्या अब मेरा लक्ष्य तीन चार बड़ी जनसभाएं रखने ये मेरा लक्ष्य ये नहीं है। मेरा लक्ष्य ये है कि मेरा लक्ष्य नहीं ये कौम का लक्ष्य है। पहली बात तो मैं अपना शब्द का इस्तेमाल ही नहीं करता। मेरा काम कौम है। लक्ष्य ये है कि उनको ये पता लगे कि हम केली दिल्ली लौटने के लिए या ट्रैक्टरों से बॉर्डर तोड़ने के लिए आई नहीं है। जिस काम पे जाट को लगाया गया। ठीक? हम यह कहना चाहते हैं कि ए फॉर आरक्षण भी है। जी फॉर गन्ना नहीं। ठीक। ए फॉर आलू नहीं। वी फॉर वेजिटेबल नहीं। जाट चार हिस्सों में जहां रह रहा एक हिस्सा आलू का क्षेत्र है। एक हिस्सा गन्ने का क्षेत्र है। हापुड़ वेजिटेबल्स का क्षेत्र है। किसानों की मांग है वे जीवन भर चलती रहेगी। कभी ओढ़ा पड़ेगा, कभी बीमारी आएंगी, कभी फसल खराब होगा, कभी भाव खराब होंगे। लेकिन नस्ल खराब ना हो। नस्ल को उसके अधिकार मिल जाए। इसलिए जाट की हम मांग कर रहे हैं और सब लोगों से निवेदन कर रहे कि हाथ जोड़ के मांगो, लठ चढ़ा के मत मांगो। पित दिखा के मत मांगो। अगर किसान भी मांगना चाहा तो पणी दिखा के मत मांगो। भाई मांगना हमारा अधिकार है। देना सरकार का अधिकार है। और हमारे साथ पांच बार वादा कर चुकी सरकार। हमने पिछले 40 सालों में अपनी एोगेंस की वजह से राजनीति खत्म हुई है। हमारी एोगेंस की वजह से किसी और की नहीं। हमने गांव में गलत भाषा का इस्तेमाल किया दूसरी जातियों के साथ। हम वह भी मुहिम चलाएंगे। हमारा कहने का ये मतलब है कि एोगेंसी से बाहर आओ। सन 70 में जाट को मैं जब 78 में पढ़ रहा था दसवीं में साल में एक बार जूते मिले थे 300 बीघे के कास्तकार को भी और अगर मुझे मेरी मां ने किसी कश्यप के यहां भेजा है तो वो रिश्ता बता के भेजती थी कि तेरा चाचा लगे। अगर किसी हरिजन के यहां भेजा तो वो बताती थी तेरा ताऊ लगे। हम जाकर रिश्तों से बात करते थे। आज हमारी क्या जबान है यह हमारी संस्कृति हमारी सभ्यता जो गांव में रिश्तों की थी वह आज छिनभिन है और जातियों में हम बेतुके बट चुके हैं और हम चाहते हैं राजनीतिक तरक्की हो जाएगी। चौधरी साहब की राजनीतिक तरक्की इसलिए थी कि देश में फसलाना सिस्टम था खेत किसान के साथ और हर जाति किसान के साथ थी और वह किसान नेता थे। वो जाट नेता नहीं थे। तो इसलिए यह भी कहना कि भाई जाट नेता है यह हमारा नेता है। यह जितने नेता यह तो पार्टियों के नेता या किसान के और गरीब के नेता जो भी नेता है चौधरी जयंत कोई जाट नेता थोड़ा है। हम खाए फिराएंगे जाट जाट जाट भाई सब जातियां वोट देगी तब काम चलेगा। संजीव बालियान कोई एक जाति का नेता है। भूपेंद्र चौधरी कोई एक जाति का नेता है। बीजेपी का नेता है। जो उनके साथ हिंदू जातियां हैं जिस तरह का व्यवहार उनका है वो उसको उसको करेंगे जो उनकी पार्टी की आईडियोलॉजी है। देश में कोई भी नेता मान लीजिए सपा का नेता तो उसको मुसलमान का ज्यादा समर्थन मिल जाएगा। क्या उसके बगैर वो जीत जाएगा? यादव है तो उसको दूसरी जातियों का समर्थन चाहिए। क्या अखिलेश यादव पीडीए का नारा दे रहा? अगर हम पिछड़े में होते तो हम भी तो यह नारा दे लेते। पिछड़ा। अगर जाट पिछड़े में होता तो यह नारा हम भी तो दे सकते थे। आज हम इस नारे को नहीं दे रहे। मानसिक रूप से नहीं मान रहे। अगर राजनीतिक मजबूती चाहिए तो पिछड़े में आना भी जरूरी है। जो 90 तक किसान वर्ग था। अब वह वर्ग है ओबीसी, अब वह वर्ग है दलित, अब वह वर्ग है अल्पसंख्यक। और यह तीनों मिले अगर हम आते हैं तो राजनीतिक बदलाव देश में बड़े स्तर पर होगा। और कुछ लोग जो आपने मुझे कहा जिन बाप दादाओं ने स्कूल बनाए उन्हें उसका प्रिंसपल नहीं बनना था। तो अगर जो हम विचार लेके आए हैं हमें इसका प्रिंस्पल नहीं बनना। इस विचार का हम अपने समाज को समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया सर। आपने बहुत डिटेल में पूरा जाट रिजर्वेशन, जाट पॉलिटिक्स और एग्रेरियन इश्यूज पे बात की। बहुत शुक्रिया आपका। भविष्य में फिर हम आपसे समय लेंगे।
प्रश्न 14: कुछ आप दर्शकों को कुछ कहना चाहें, कुछ ऐड ऑन करना चाहें?
यशपाल मलिक: , कुछ ऐड ऑन करना चाहें? मेरा तो यह कहना है कि कोई भी राजनीतिक आदमी अभी एक बड़ी समस्या चल रही कि गांव में दो परिवारों का झगड़ा हो गया और उसको जातीय रंग दे दिया। झगड़ा कभी भी होगा। वह जातियों में नहीं होगा। आज मेरा सम्मेलन है मेरी बराबर में दूसरे का दोनों परिवारों के झगड़े होते रहेंगे। गांव देहात में आप अपने शूज है दो परिवारों के। ऐसी कई घटनाएं जाट समाज के साथ घट चुकी। गुर्जर समाज के साथ घट चुकी। राजपूतों के साथ भी घट चुकी और कश्यपों के साथ भी घट चुकी। जाटव भाइयों के साथ भी घट चुकी। हर जाति के साथ ऐसी घटनाएं घट चुकी के आपसी झगड़ों को हम राजनीतिक रंग दे रहे हैं। अपनी राजनीति के लिए हम उनको जातीय दंगों में कन्वर्ट कर रहे हैं। धार्मिक दंगों में कन्वर्ट कर रहे। मुसलमान और हिंदू का झगड़ा हो गया। झगड़ा शुरुआत होता है इंडिविजुअल दो व्यक्तियों का। तो मेरा तो पूरे देश की जनता से यह निवेदन है कि वो अपने गांव स्तर पर ही जो विवाद हो उन परिवारों को बैठकर समझाने का प्रयत्न करें और जो बाहर के लोग आकर रोटियां सेकते हैं उनको रोटियां सेकना बंद कर दें। को वह उस गांव के भाईचारे को खत्म करने का प्रयत्न कर रही है। उस गांव के भाईचारे में जातियां जहर घोड़ ले ना तो नफरत से पढ़ाई में तरक्की कर सकते ना नफरत से राजनीति हो सकती ना नफरत से जिंदा रह सकता आदमी वो हर टाइम अपने घर में लेट के भी ये सोचता रहेगा इधर को जाऊं ना जाऊं इधर वह जाती इधर वह जाति तो इस तरह की बातें समाज के लोग ना करें किसी भी समाज के लोग मेरी अपने समाज से अपील नहीं और अपने समाज से आपके माध्यम से अपील करना चाहता हूं कि मांगना लो सीख और 4 अक्टूबर को बड़ी संख्या में अगर आप पहुंच गए तो मुझे उम्मीद है कि सरकार का कोई गलत रवैया आपके साथ आज तक नहीं रहा तो निश्चित रूप से आपको मिल जाएगा। तो दोस्तों आपने यशपाल मलिक जी को सुना जो जाट आरक्षण संघर्ष समिति के नेशनल लेवल पर कन्वीनर हैं। इस समय संयोजक हैं। हम ऐसे ही कुछ सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर लगातार बातचीत करते रहेंगे। फिर हाजिर होंगे एक नए वीडियो में एक नए मेहमान के साथ। आप कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा कि आप मलिक साहब की किन बातों से सहमत
