हरिद्वार। 17 June 2025
भारतीय किसान यूनियन द्वारा हरिद्वार (उत्तराखंड) में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय चिंतन शिविर के दूसरे दिन देश के कई राज्यों से आए किसान नेताओं ने भारत की कृषि नीति पर गहरी चिंता जताई और एकजुट होकर केंद्र सरकार की नीतियों का विरोध करने का संकल्प लिया। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और बिहार से आए किसानों ने ‘लाल कोठी’ परिसर में आयोजित पंचायत में भाग लिया।

शिविर में राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत ने कहा कि “देश की खेती आज गंभीर संकट में है। फसलों के उचित दाम नहीं मिलने के कारण किसान लगातार कर्ज में डूबता जा रहा है।” उन्होंने कहा कि सरकार को खेती को बचाने के लिए ठोस नीति बनानी चाहिए वरना यह वर्ग पूरी तरह टूट जाएगा।

राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत ने पंचायत में संगठन को गाँव की इकाइयों तक मज़बूत बनाने पर बल दिया और कहा कि “यदि किसान को न्याय दिलाना है, तो आंदोलन की ताक़त को ज़मीनी स्तर तक फैलाना होगा।” उन्होंने आगाह किया कि आने वाला समय संघर्ष का होगा और इसके लिए तैयारी अभी से जरूरी है।
राष्ट्रीय महासचिव चौधरी युद्धवीर सिंह ने सरकार की नीतियों को किसान विरोधी बताया और कहा कि “हमें सरकार की मंशा को समझना होगा क्योंकि आज की नीतियां किसान, मज़दूर और आम नागरिक के खिलाफ हैं।”

पंचायत में प्रमुख रूप से ज्ञानी जैल सिंह के पौत्र इंद्रजीत सिंह रामगढ़िया और विश्वकर्मा समाज के प्रतिनिधि भी शामिल हुए। इसके अलावा हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष रतन मान, युवा अध्यक्ष रवि आज़ाद, उत्तर प्रदेश अध्यक्ष राजपाल शर्मा, दिल्ली अध्यक्ष दलजीत डागर, उपाध्यक्ष दानवीर सिंह सहित राष्ट्रीय और राज्य कार्यकारिणी के सदस्य मौजूद रहे।
प्रधानमंत्री को सौंपा गया ज्ञापन:
भारतीय किसान यूनियन ने देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को हरिद्वार जिलाधिकारी के माध्यम से एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें आठ प्रमुख मांगें रखी गई हैं:
प्रमुख मांगे:
गन्ना मूल्य 500 रुपये/कुंतल:
गन्ना किसानों को जलवायु परिवर्तन और बीज प्रणाली में बदलावों से बचाने के लिए विशेष नीति बनाई जाए। साथ ही मिलों पर बकाया भुगतान अविलंब किया जाए।
व्यापक ऋणमाफी:
कॉरपोरेट घरानों की तरह किसानों का कर्ज भी बिना शर्त माफ किया जाए, क्योंकि कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर रहे हैं किसान।

एमएसपी गारंटी कानून (C2+50 फार्मूला):
एमएसपी को कानूनी दर्जा दिया जाए। खुद प्रधानमंत्री मोदी जब कृषि समिति के सदस्य थे, तब उन्होंने इसकी सिफारिश की थी, अब उसे लागू करें।
एनजीटी व जीएसटी मुक्त खेती:
कृषि यंत्रों और इनपुट पर जीएसटी हटाया जाए तथा खेती को एनजीटी नियमों से बाहर किया जाए।
विद्युत व संस्थाओं का निजीकरण बंद हो:
विद्युत निजीकरण के दुष्परिणाम सामने हैं। किसान इसका बोझ झेल रहे हैं। साथ ही जीवन से जुड़ी संस्थाओं का निजीकरण भी रोका जाए।
जीएम बीजों पर प्रतिबंध:
जेनेटिकली मोडिफाइड बीज खेती, पर्यावरण और जीवन के लिए खतरनाक हैं। यूनियन इसका विरोध करती है और देशभर में ट्रायल रोकने की मांग करती है।
भूमि अधिग्रहण में मुआवजा:
किसानों से अधिग्रहित भूमि का मुआवजा न देकर सरकार अन्याय कर रही है। 2013 का भूमि अधिग्रहण अधिनियम पूरे देश में लागू हो।
एनपीएफ ऑन एएम नीति रद्द हो:
हाल ही में केंद्र सरकार ने जो नई कृषि विपणन नीति (एनपीएफ ऑन एएम) लागू की है, वह राज्यों और किसानों के अधिकारों पर हमला है। इसे तत्काल रद्द किया जाए।
भारतीय किसान यूनियन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इन मांगों पर केंद्र सरकार ने शीघ्र विचार नहीं किया तो एक बार फिर से किसान आंदोलन तेज़ किया जाएगा। राष्ट्रीय चिंतन शिविर में पारित प्रस्तावों के साथ संगठन ने संविधान और लोकतंत्र के मूल्यों को बनाए रखने के लिए देशभर के किसानों को एकजुट होने का आह्वान किया।

