प्रख्यात चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता केएन गोविंदाचार्य आज (22 April 2015) मेरठ में थे। मौका था किसान सम्मेलन का। गोविंदाचार्य जी किसानों के मौजूदा संकट पर बडे सवाल उठाए। उनकी बातों को ज्यों का त्यों लिख पाना तो मेरे लिए संभव नहीं पर जो कुछ उन्होंने कहा उसे सबसे साझा करना मुझे आज के दौर में बेहद प्रासंगिक लग रहा है। आम लोगों की जिंदगी की कहावतों, आपसी बातों के जरिए नेशनल इंटरनेशनल मसले समझाने में गोविंदाचार्य की क्षमता अदभुत है।
पढिए उन्होंने क्या क्या कहा….
खेती एक जैविक प्रक्रिया है। खेती के चक्र के पीछे नेचर का विशेष खेल है। आपने देश में नहरों से खेत खेत तक पानी पहुंचा दिया जिससे क्रॉप पैटर्न बदला। नमी बढी तो नमी के कीडे आए। इनसे निपटने के लिए कीटनाशक आए। अब कीडे इन कीटनाशकों के प्रति रेजिस्टेंट हो गए। अब और कीटनाशक खोजने की जंग शुरू हो गई। पिछले दिनों मैं होशंगाबाद में था तो वहां लोगों को कहते हुए सुना कि अबकी बार जितने मच्छर हैं उतने कभी नहीं देखे। हां एक बात और सुनी कि अबकी मेंढक दिखाई नहीं दिए। मेंढक सुसुप्तावस्था के दौरा नमी की तलाश में मिटटी के अंदर चले जाते हैं। ग्राउंड वाटर लेवल पाताल चला गया तो नमी भी नीचे चली गई। बारिश हुई नहीं तो मेंढक नमी की तलाश में अंदर तक घुसते गए। बारिश हुई तो नमी ज्यादा नीचे तक तब पहुंची जब बरसात का सीजन खत्म होने को था। तब तक मच्छरों का प्रकोप बढ गया। मेंढक मच्छरों का लारवा खाता है जिससे उसके पैदा होने की संख्या कंटरोल होती है। बीते साल में अमेरिका में था वहां बताया गया कि किसानों पर अचानक सांपों के हमले बढ गए हैं। दरअसल कीटनाशकों के प्रयोग से वहां मेंढक खत्म हो गए। सांप मेंढक को खाता है। जब सांप को भोजन नहीं मिला तो वह बौखलाहट में किसानों को डसने लगे। नेचर का अपना एक कंटरोल सिस्टम है। हमने खेती का जो मॉडल अपनाया है उससे नेचर का यह सिस्टम चौपट हो गया है। यानी इकोसिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
फ्रांस का उपनिवेश मारीशस रहा तो फ्रांस ने वहां गन्ने की खेती कराई। गन्ने की ऐसी प्रजातियां वहां भिजवाईं जिनकी एक बार बुआई के बाद कम से कम छह बार कटाई होती थी। ज्यादाता गन्ना पैदा हुआ तो ज्यादा मुनाफा हुआ। फ्रांस की कंपनियों ने वहां किसानों को मोटा पैसा देकर जमीन ही खेती के लिए कांटरेक्ट पर ले ली। पैसा आया और किसान जमीन सो कट गया तो आरामतलबी पैदा हो गई। पूरे देश में फ्रांस की कंपनियां गन्ना उपजाती रहीं और मारीशस की जनता आरामतलबी में आ गई। इस मौज मस्ती को वहां उस वक्त जादू का पंजा कहा गया। दवा,दूध, मशीन आदि के लिए मारीशस फ्रांस पर निर्भर होता गया। मेहनत खत्म हो गई जिसका नतीजा यह हुआ कि मारीशस की 60 फीसदी आबादी डायबिटीज का शिकार हो गई। वहां गोवंश छह लाख से आठ हजार पर आ गया। देखिए जो जादू का पंजा फ्रांस से मारीशस में पहुंचा था उसकी कीमत क्या है::: जिंदगी। इससे कम कुछ नहीं। आजादी के बाद से ही हमने देश में खेती का जो माडल अपनाया उसकी कीमत क्या है। हम आगे बढे या पीछे हटे यह देखना होगा। यूपी के ही आंकडे देख रहा था मैं यहां हर किसान औसतन चार लाख के कर्ज में है। विदर्भ में पानी इतने नीचे चला गया कि 68 जिलों में पीने के लायक नहीं रहा। इसमें इतना आसेर्निक घुल गया कि पीने पर लोग बीमार हो रहे हैं।
किसान को कोई और आमदनी नहीं बस नदगी फसल पर जिंदा है। विदर्भ में जब मैं गया तो एक दिन पहले ही एक किसान की मौत हो गई थी। मैं उसके घर गया तो वहां सन्नाटा मिला। आसपास लोगों से पूछा तो पता चला कि अब उसके घर में पत्नी और एक बच्चा है और वह दोनों खेत में गए हैं। मैं खेत गया तो वह महिला खेत में काम कर रही थी। आज पति की मौत हो गई अगले दिन पत्नी खेत में काम कर रही थी।लोगों से पूछा तो बताया कि काम नहीं करेगी तो खाएगी क्या।घर में कुछ है नहीं। देख्रिए जो मॉडल हमने अपनाया वह इंसान को कितना संवेदनहीन बनने को मजबूर कर रहा है। पति एक दिन पहले मर गया पर अगले दिन महिला काम नहीं करेगी तो बच्चे का पेट नहीं भरेगा। कहीं मौत हो जाती थी गांव में तो दस दिन तक तो कम से कम पास पडोस कुनबे वाले दुख बांटने से लेकर खाने पीने सोने तक की व्यवस्था करते थे। तेरहवीं तक तो कोई पास पडोस वाला भी पीडित परिवार को संभालने के सिवा कुछ न करता था। हां उस महिला के घर के बगल में ही एक मकान पर एक एनजीओ का बडा सा बोर्ड लगा था””” किसान रक्षा समिति। बराबर में लगा यह बोर्ड चिढा रहा था। संवेदनहीनता की एक तस्वीर है यह।
सियासी दलों की छोडिए। उनमें कोई सांपनाथ है कोई नागनाथ। जमीन अधिग्रहण के लिए अध्यादेश इस तरह लाया जा रहा है मानो जमीन के मामले में देश में आपातकाल हो। वैसे ही बीते सालों में देश में खेती योग्य कुल साढे बारह फीसदी जमीन में से एक करोड 80 लाख हेक्टेयर जमीन कम हो गई है। सरकार के पास पहले ही 80 लाख हेक्टेयर से ज्यादा का लैंड बैंक है देश में। विकास का ऐसा कौन सा बडा प्लान है जिसके लिए जमीन अधिग्रहण अध्यादेश की जरूरत आन पडी। बस विदेशी कंपनियों को दावत दे रहे हैं। आइए। लूटिए। एक कंपनी आई थी डेढ सौ साल पहले कितना ले गई। आज आपने हजारों कंपनियों को दावत दे दी है। मोदी सरकार की प्राथमिकता कारपोरेट है। गांव गरीब किसान और मजदूर नहीं। देश विदेशी कंपनियों की लूट के लिए खोला जा रहा है। विदेशी निवेश पूरी तरह सिर्फॅ पूंजीपतियों के पक्ष में है। आंकडे बताते हैं कि विदेशी निवेश का देश की तरक्की में योगदान महज पांच फीसदी रहा है। देश की तरक्की में 70 फीसदी योगदान छोटी’छोटी बचतों से आए पैसे का रहा है।
अब 100 स्मार्ट शहर बसाने की बात हो रही है। इसकी कीमत जानते हैं आप। कम से कम 70 हजार गांव। इतने गांव खत्म हो जाएंगे देश के कुछ छह लाख गांवों में से। देश में ब्राजील का मॉडल लागू करने की बात हो रही है। ब्राजील की जितनी आबादी है उतने लोग हमारे देश में झुगग्गियों में रहते हैं। यानी 20 करोड से ज्यादा लोग। 70 फीसदी आबादी यहां खेती पर गुजर बसर कर रही है। यानी 80 करोड से ज्यादा लोग। आप इनसे जमीन छीन लेंगे तो क्या करेंगे यह लोग। देश का क्या होगा आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं। खेती के जिस मॉडल पर हम चलते आ रहे हैं उसका नतीजा इन लोगों से जमीन छिन जाने का ही होगा।
देश में किस चीज की कितनी खेती होगी। देश को स्वस्थ रखने के लिए यहां रहने वाली आबादी को कितना प्रोटीन, कितना काबोहाइडरेट, कितना विटामिन चाहिए। इसकी कैलकुलेशन कौन करेगा। कौन तय करेगा कि इस जरूरत को पूरा करने के लिए कौन सी फसल कितनी बोनी होगी।
मौजूदा हालात में किसान क्या करे।
अंगरेजी में कहा जाता है कि फॉरेस्ट प्रोटेक्ट़स टाइगर एंड टाइगर प्रोटेक्टस फॉरेस्ट।
हम जब जिएंगे तब लडेंगे। लडेंगे तभी तो जीतेंगे। इसलिए आत्महत्या नहीं विकल्प जिंदगी है। खेती से जीने लायक जुटाते हुए बेहतरी के लिए लडने को तैयारी करनी है। खेती के साथ पशुपालन जरूरी है। इन दोनों के बीच कष्ण बलराम का रिश्ता है। किशन यानी ग्वाला और बलराम यानि हलधर किसान। इनके बीच जुगलबंदी जरूरी है। यह जुगलबंदी करें। सहफसली खेती कम जोत में ज्यादा फसलें। सादा जीवन और बेहतरी का संघर्ष करने के लिए खुद को संगठित करना और एकजूट होना। यही रास्ता है।
और इस लडाई में मैं आपके साथ हूं।
