भारत दुनिया के लगभग आधे आम उगाता है, लेकिन निर्यात में उसकी हिस्सेदारी नाममात्र है। बागानों में रसायनों का बढ़ता उपयोग, फलों को पकाने में प्रतिबंधित रसायन, और बार–बार लगने वाले विदेशी प्रतिबंध — ये सब मिलकर भारत के सबसे प्रिय फल को संकट में डाल रहे हैं। यह आलेख आम की उस कहानी को पेश करता है, जिसमें गौरवशाली विरासत है, लेकिन वर्तमान में गंभीर सवाल भी।
मेहर-ए-आलम ख़ान
सलाहकार, सिनेइंक पॉडकास्ट्स, लंदन (यू.के.)
मुख्य संपादक, (अंग्रेज़ी मासिक) नर्सरी टुडे, नई दिल्ली (भारत)

हर गर्मी में भारत इतना आम पैदा करता है कि एक महाद्वीप का पेट भर जाए। फिर भी इसका बड़ा हिस्सा देश के भीतर ही खप जाता है — ताज़ा खाया जाता है, अचार बनता है, पल्प में बदल जाता है या फिर कोल्ड-चेन की कमी के कारण खराब हो जाता है। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय बाज़ार भारतीय आम की मांग करता है, लेकिन गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों पर बार-बार सवाल उठते हैं। नतीजा यह है कि फलों का राजा आज खुद असुरक्षित है — और इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं।
यादों से भी पुराना फल
वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि आम की उत्पत्ति पूर्वोत्तर भारत, म्यांमार और बांग्लादेश क्षेत्र में लगभग ढाई से तीन करोड़ वर्ष पहले हुई।कुछ जीवाश्म विज्ञानियों का मत है कि आम इस क्षेत्र में पाँच से छ: करोड़ साल पहले मौजूद था। 1500 वर्ष ईसा पूर्व तक इसका नाम आम्र वेदों में दर्ज हो चुका था। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में आम के पेड़ को दिव्य माना गया है।
उगादी, विशु और गुड़ी पड़वा जैसे पर्वों पर आज भी आम के पत्ते दरवाज़ों पर टांगे जाते हैं — सजावट के लिए नहीं, आस्था के प्रतीक के रूप में।
कश्मीरी पैसली डिज़ाइन की आकृति आम से प्रेरित मानी जाती है। ‘मैंगो’ शब्द पुर्तग़ालियों के माध्यम से प्रचलन में आया, जिन्होंने 15वीं सदी में केरल पहुँचकर मलय शब्द मन्ना को मांगा बना दिया।

सम्राट अकबर ने दरभंगा के पास एक लाख आम के पेड़ लगवाए — जिसे लक्खी बाग़ कहा गया। सातवीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग आम को चीन ले गए। मिर्ज़ा ग़ालिब की चिट्ठियों और उनकी मसनवी मसनवी दर सिफ़त–ए–अम्बा में आम से उनका इश्क़ साफ नज़र आता है। अकबर इलाहाबादी ने अपने एक दोस्त को ख़त में लिखा —
नामा न किसी यार का पैग़ाम भेजिए
इस फ़स्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए
शायद ही कोई दूसरा फल हो, जो भारतीय संस्कृति में इतना गहराई से रचा-बसा हो।
22 जुलाई: उत्सव और चेतावनी
22 जुलाई को राष्ट्रीय आम दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत 1987 में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड ने की थी। यह तारीख आम के मौसम के अंतिम चरण से जुड़ी है। यह दिन उत्सव का भी है और आत्ममंथन का भी — कि हम अपनी इस विरासत के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं।
विशाल उत्पादन, सीमित पहुंच
भारत हर साल लगभग 228 लाख टन आम पैदा करता है — जो दुनिया के कुल उत्पादन का लगभग आधा है। 24.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती होती है और देश में एक हज़ार से अधिक नामी किस्में हैं — रत्नागिरी का अल्फ़ान्सो, गिर का केसर, उत्तर प्रदेश का दशहरी और लंगड़ा, आंध्र प्रदेश का बागनपल्ली और बंगाल का हिमसागर।
उत्पादन में उत्तर प्रदेश पहले, आंध्र प्रदेश दूसरे और कर्नाटक तीसरे स्थान पर हैं। इसके बावजूद भारत अपने कुल आम उत्पादन का एक प्रतिशत से भी कम निर्यात करता है। घरेलू बाज़ार लगभग पूरा फल खपा देता है।

निर्यात क्यों पिछड़ा है
मेक्सिको आम के निर्यात से लगभग 575 मिलियन डॉलर कमाता है, जबकि भारत — जो उससे कई गुना अधिक आम उगाता है — करीब 154 मिलियन डॉलर पर सिमटा हुआ है।
2024–25 में भारत ने केवल 30 हज़ार मीट्रिक टन ताज़ा आम निर्यात किया।कारण साफ़ हैं। देश की विशाल आबादी ख़ुद आम खा जाती है। 25 से 30 प्रतिशत फल भंडारण और परिवहन की कमी से ख़राब हो जाता है। 93 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे हैं, जिनके पास पैकहाउस और निर्यात बाज़ार तक सीधी पहुंच नहीं। हवाई भाड़ा लागत का आधे से अधिक हिस्सा खा जाता है। जापान और अमेरिका जैसे देशों के लिए आवश्यक उपचार सुविधाएँ सीमित हैं।दूसरे शब्दों में, भारत के पास आम है, लेकिन मजबूत व्यवस्था नहीं।
विदेशों में रोक, देश में सवाल
2014 में यूरोपीय संघ ने फल-मक्खी पाए जाने के बाद भारतीय अल्फ़ान्सो आम पर प्रतिबंध लगाया, जो 2015 के अंत तक चला। 2026 की शुरुआत में जापान ने फिर भारतीय आम के आयात पर रोक लगा दी, क्योंकि तय सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं हुआ। यह चार दशकों में दूसरी बड़ी रोक थी।
हर बार कहानी एक जैसी रहती है — विदेश में सवाल उठते हैं, सुधार का वादा होता है, कुछ समय सख़्ती रहती है और फिर ढील। सबसे अहम सवाल यह है कि जब विदेशी एजेंसियाँ मानक उल्लंघन पर कार्रवाई करती हैं, तो भारत के भीतर बिकने वाले फलों की निगरानी कौन करता है?
बाग़ों में रसायनों का इस्तेमाल
आम की खेती में ऑर्गेनोफॉस्फेट जैसे कीटनाशकों का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। उत्तर प्रदेश में हुए अध्ययनों में पाया गया कि लंबे समय तक छिड़काव करने वाले मज़दूरों में सांस की बीमारियाँ सामान्य आबादी से कहीं अधिक हैं।
जलवायु परिवर्तन ने कीटों की समस्या और बढ़ा दी है, जिससे रसायनों पर निर्भरता भी बढ़ी है।इसके अलावा कैल्शियम कार्बाइड का अवैध उपयोग आज भी जारी है। यह रसायन एसिटिलीन गैस छोड़ता है, जिसमें आर्सेनिक और फॉस्फ़ोरस के अंश होते हैं।भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण इसे प्रतिबंधित कर चुका है, लेकिन हर गर्मी में यह बाज़ारों में दिख जाता है।
आगे का रास्ता
सरकार निर्यात बढ़ाने के लिए नई पहलें कर रही है। एपीडा पैकहाउस और बुनियादी ढांचे पर सब्सिडी देता है। समुद्री मार्ग से आम भेजने के प्रयोग हो रहे हैं, जिससे लागत कम हो सकती है।संयुक्त राष्ट्र की संस्था ओईसीडी‑एफएओ का अनुमान है कि 2034 तक भारत का आम उत्पादन 3.6 करोड़ टन तक पहुँच जाएगा। समस्या उत्पादन की नहीं, भरोसे और अनुपालन की है।
पल्प, प्यूरी और फ्रोज़न आम जैसे प्रोसेस्ड उत्पाद वैश्विक बाज़ार तक पहुँचने का व्यावहारिक रास्ता हो सकते हैं।लेकिन असली सुधार खेत से शुरू होगा। मई में किया गया गलत छिड़काव जून में पूरे बाज़ार को बंद करा सकता है। एक बार टूटा भरोसा लौटने में सालों लगते हैं।
वह फल जो सबका है
मौसम बीत जाता है, पेड़ शांत हो जाते हैं, लेकिन यादें रह जाती हैं — कुर्ते पर आम का दाग, तपती दोपहर में ठंडा फांक, घरों में अल्फ़ान्सो बनाम चौसा या रटौल और लंगड़ा की बहस, छत पर रखे अचार के मर्तबान।आम सिर्फ़ एक फल नहीं है। वह पहचान है, स्मृति है, साझा विरासत है।
लेकिन विरासत अपने-आप नहीं बचती। उसे देखभाल चाहिए, जवाबदेही चाहिए।
इसे आम इसलिए नहीं कहा जाता कि यह साधारण फल है।बल्कि इसे आम इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह सबका प्रिय फल है।




