मेरठ की सड़कों पर एक बैटरी से चलने वाली ट्राइसाइकिल अपनी धीमी लेकिन स्थिर गति से आगे बढ़ रही थी। उसके हैंडल पर मज़बूती से जकड़े हाथ, आँखों में सपनों की झलक और चेहरे पर संघर्षों की लकीरें थीं। ये थे राजकुमार, जो अपने नाम की तरह अपनी तक़दीर के बादशाह तो नहीं बन सके, लेकिन अपनी ज़िंदगी के योद्धा जरूर बन गए।
कदमों की बेड़ियां और सपनों की उड़ान
राजकुमार का जन्म हुआ तो परिवार ने सोचा था कि वह भी आम बच्चों की तरह दौड़ेगा, खेलेगा और एक दिन खुद के पैरों पर खड़ा होगा। लेकिन महज़ 11 महीने की उम्र में पोलियो ने उनके पैरों को जकड़ लिया। वह चलने से महरूम हो गए। उनके माता-पिता ने उन्हें कभी बोझ नहीं समझा, लेकिन स्कूल जाने के लिए उन्हें गोद में उठाकर ले जाना पड़ता था।
फिर भी राजकुमार ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने हिंदी, इंग्लिश और इकोनॉमिक्स में ग्रेजुएशन किया और बीएड भी किया, ताकि वह शिक्षक बन सकें। लेकिन नौकरियां नहीं थीं। रिजर्वेशन था, लेकिन सीटें इतनी कम कि हजारों में सिर्फ कुछ ही को मौका मिलता।
संघर्ष की गवाही देती ट्राइसाइकिल
राजकुमार को सरकार से एक बैटरी वाली ट्राइसाइकिल मिली। यह कोई मामूली गाड़ी नहीं थी—यह उनके संघर्ष की साथी थी। पहले वह हाथ से चलने वाली ट्राइसाइकिल पर स्कूल, परीक्षा केंद्र और अन्य जगहों पर जाते थे, जिससे वह थककर चूर हो जाते। कभी-कभी तो परीक्षा हॉल तक पहुँचते-पहुँचते इतनी देर हो जाती कि वे पेपर भी नहीं दे पाते।
लेकिन 2018 में जब यह बैटरी वाली ट्राइसाइकिल मिली, तो उनके लिए दुनिया थोड़ी आसान हो गई। अब वह अपने भतीजे को स्कूल छोड़ सकते थे, बाज़ार से सामान ला सकते थे और कहीं भी आने-जाने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।
सरकार से उम्मीदें और हकीकत का तमाचा
राजकुमार की ज़िंदगी भले ही आसान हुई हो, लेकिन उनकी तकलीफें खत्म नहीं हुईं। उन्हें सरकार से महज़ 1000 रुपये की पेंशन मिलती है। इस दौर में जब प्याज 50 रुपये किलो, गैस सिलेंडर 1000 रुपये और टमाटर 70 रुपये किलो है, तो 1000 रुपये में गुज़ारा कैसे हो?
उन्होंने अपनी तक़दीर बदलने की पूरी कोशिश की—उन्होंने दो बार एसएससी क्वालिफाई किया, केवीएस और IBPS की परीक्षाएं पास कीं, CTET भी निकाला—लेकिन नौकरी के नाम पर कुछ नहीं मिला।
“अगर यह ट्राइसाइकिल मुझे पहले मिल जाती तो शायद मैं और बेहतर पढ़ाई कर पाता,” राजकुमार कहते हैं। “शायद मैं किसी अच्छे पद पर होता, लेकिन अब… बस ज़िंदगी को जैसे-तैसे चला रहा हूँ।”
एक गुज़ारिश, जो सबकी है
राजकुमार की कहानी अकेली नहीं है। देशभर में ऐसे लाखों दिव्यांग हैं, जो सिस्टम की सुस्ती और समाज की उदासीनता के कारण पीछे रह जाते हैं। वे न ही नौकरी पा सकते हैं, न ही सम्मानजनक जीवन जी सकते हैं।
“सरकार को चाहिए कि हमारी पेंशन बढ़ाई जाए, और नौकरियों में दिव्यांगों को सही मायनों में आरक्षण मिले,” राजकुमार सरकार से अपील करते हैं।
राजकुमार का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। वह अब भी हर दिन अपने हौसले की ट्राइसाइकिल चलाते हैं, उम्मीद की सड़कों पर आगे बढ़ते हैं और उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब सच में ‘सबका साथ, सबका विकास’ होगा।
