मुखिया गुर्जर: एक किसान के बेटे से प्रभावशाली नेता बनने तक का सफर

साक्षात्कार

 आज हमारे साथ हैं राष्ट्रीय पथिक सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष और जाने-माने नेता मुखिया गुर्जर जी। अपने बेबाक अंदाज और किसानों के बीच लोकप्रियता के लिए पहचाने जाने वाले मुखिया जी ने चौधरी अजीत सिंह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ा और समाजवादी पार्टी के साथ जुड़े रहे। उनके बेटे कुलविंदर गुर्जर मेरठ जिला पंचायत के अध्यक्ष रहे। आइए, जानते हैं उनके राजनीतिक सफर और अनुभवों के बारे में।

सवाल: मुखिया जी, आपका राजनीतिक करियर बहुत ही दिलचस्प रहा है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे, फिर अचानक राजनीति की ओर रुझान कैसे हुआ?

मुखिया गुर्जर: इसकी दो वजहें थीं। पहली, जब दिल्ली यूनिवर्सिटी में चीफ एग्जीक्यूटिव काउंसलर का चुनाव हुआ, तो हमारे एक साथी नसीब सिंह को टिकट मिला। मैं तब भगत सिंह कॉलेज में था और हम सबने उनका चुनाव लड़ाया। जब मैंने देखा कि कैसे लोग उनके लिए नारे लगा रहे हैं, तो मुझे महसूस हुआ कि मेरे लिए भी यह संभव है।

दूसरा कारण था जब चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जी ने वोट क्लब पर किसानों के लिए ऐतिहासिक धरना दिया। वह लाखों लोगों का आंदोलन था। मुझे लगा कि हमारे समाज के नेताओं की सेवा करनी चाहिए और वहीं से मेरी राजनीति में सक्रियता बढ़ गई।

सवाल: आपने कई बड़े आंदोलन किए हैं। सबसे पहला बड़ा आंदोलन कौन सा था?

मुखिया गुर्जर: मेरा पहला बड़ा आंदोलन 1993 में था, जब वन गुर्जरों के पुनर्वास की मांग को लेकर मैंने पार्लियामेंट में प्रदर्शन किया। वन गुर्जरों की भैंसें जहरीली घास खाकर मर गई थीं और सरकार उनके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही थी। तब मैंने अपनी टीम को लेकर हरिद्वार से दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन किया और अंततः सरकार को वैकल्पिक पुनर्वास की योजना बनानी पड़ी।

सवाल: आपके चुनावी सफर के बारे में बताइए। आपने लोकसभा और विधानसभा चुनाव कैसे लड़े?

मुखिया गुर्जर: मैंने बागपत लोकसभा सीट से चौधरी अजित सिंह जी के सामने दो बार चुनाव लड़ा। मैंने दोनों लोकसभा चुनावों में खेकड़ा विधानसभा सीट के अंदर चौधरी साहब से पहली बार 37,000 और दूसरी बार 24,000 वोट ज्यादा लिए। लेकिन छपरौली ने सारा हिसाब किताब बराबर कर दिया। छपरौली की मतपेटियां खुलीं तो मैं सीधे दो लाख वोट पीछे हो गया। दिलचस्प बात ये है कि छपरौली में जब मैंने प्रचार किया, तो जाटों ने बहुत सम्मान दिया, पर वोट गिने गए तो किसी गांव में मुझे 8 वोट मिले, किसी में 6! बाद में गांव के बुजुर्गों ने बताया कि चौधरी चरण सिंह जी उनके सपने में आए और कहा कि वोट चौधरी अजित सिंह को ही दें! यह मेरे चुनावी जीवन का सबसे रोचक अनुभव था।

सवाल: आपकी राजनीति का स्टाइल काफी आक्रामक और अनोखा रहा है। आपने विधानसभा में भैंस बांधने का अनोखा प्रदर्शन क्यों किया?

मुखिया गुर्जर: यह 1994 की बात है। दिल्ली की भाजपा सरकार ने फैसला लिया कि राजधानी से सभी डेयरियों को हटाया जाएगा। मैंने देखा कि भाजपा वाले कहते थे ‘गाय हमारी माता है’ और कांग्रेस वाले दूध व्यवसाय से जुड़े लोगों की अनदेखी कर रहे थे। तब मैंने नारा दिया—‘गाय भाजपाइयों की माता है, भैंस कांग्रेसियों की भूपी है।’ और विरोध में विधानसभा के गेट पर भैंस बांध दी।

सवाल: आप चौधरी चरण सिंह और मुलायम सिंह यादव को अपना आदर्श मानते हैं। उनके बारे में क्या कहेंगे?

मुखिया गुर्जर: चौधरी चरण सिंह जी और मुलायम सिंह जी दोनों ही जमीन से जुड़े नेता थे। ऐसा कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव जब हवाई जहाज से उड़ते थे, तो नीचे देखकर बता देते थे कि कौन सा गांव आ रहा है। मैं भी उनकी तरह समाज से जुड़कर राजनीति करना चाहता हूं।

सवाल: आपकी राजनीति में आगे की क्या योजना है?

मुखिया गुर्जर: मैं हमेशा किसानों और समाज के हक के लिए लड़ता रहूंगा। मेरी कोशिश यही रहेगी कि गरीबों और वंचितों की आवाज बनूं और राजनीति में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करूं।

प्रश्न: नेताजी से आपका जुड़ाव कैसे हुआ?

उत्तर: (हंसते हुए) देखिए, 1996 की बात है। उस समय नेताजी यानी मुलायम सिंह यादव जी के तो मंत्री होते हुए उन्होंने मेरी सभा में आकर भाषण दिया था। उन्हीं के द्वारा ही फैसला हुआ था, और तभी से मेरा उनसे जुड़ाव हो गया। जब मेरा चुनाव आया, तो 29 अप्रैल 1996 को नेताजी ने मेरा टिकट घोषित किया।

प्रश्न: नेताजी ने आपको कैसे पहचाना?

उत्तर: नेताजी को पहले से मेरी राजनीतिक सक्रियता के बारे में जानकारी थी। मैं कभी पार्लियामेंट में भैंस लेकर चला जाता था, तो कभी विधानसभा में गोबर की बगिया लेकर घुस जाता था। आदरणीय प्रोफेसर रामगोपाल यादव जी, जो नेताजी के भाई और हमारे गुरु हैं, दिल्ली के प्रभारी थे। नेताजी ने कहा कि कोई नया गुर्जर लाओ, क्योंकि उस समय हमारे समाज में राजनीतिक चेतना बहुत कम थी। तब मेरी सिफारिश प्रोफेसर साहब, केसी त्यागी जी, नरेंद्र भाटी और रामचरण दास जी ने की।

प्रश्न: जब आपको टिकट मिला तो परिवार की क्या प्रतिक्रिया थी?

उत्तर: जब मैंने घर पर फोन किया कि मेरा टिकट हो गया है, तो मेरे पिता जी ने पहले विश्वास ही नहीं किया। बोले, “अरे, हमें पागल बना रहा है? तेरे बराबर में बंसल 25 साल से नगर निगम का टिकट नहीं ले पाया और तुझे एमपी का टिकट मिल गया?” फिर जब उन्हें यकीन हुआ, तो परिवार ने पूरा समर्थन दिया।

प्रश्न: पहला चुनाव कैसा रहा?

उत्तर: मेरठ से मैंने 3 मई 1996 को पर्चा भरा। चुनाव अप्रत्याशित था। मुझसे पहले 68,000 वोट मिलते थे, मुझे उस समय 2 लाख वोट मिले। चौधरी अजीत सिंह जी जो पहले सिर्फ दो जनसभाएं करते थे, इस बार पूरा क्षेत्र घूमे। जनता ने मुझे भरपूर प्यार दिया।

प्रश्न: दूसरा चुनाव कैसे हुआ?

उत्तर: अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार 13 दिन में गिर गई और फिर उपचुनाव हुआ। तब मैं समाजवादी पार्टी का हिस्सा था, लेकिन नेताजी गठबंधन में थे और मुझे सिंबल नहीं दे सकते थे। कांग्रेस से जुड़ने के बाद मैंने चुनाव लड़ा और 34,000 वोटों से जीता।

प्रश्न: चौधरी अजीत सिंह से आपकी प्रतिद्वंद्विता कैसी रही?

उत्तर: मैंने दो बार चौधरी अजीत सिंह जी को हराया, लेकिन मैं हमेशा उनका सम्मान करता था। चुनावी टक्कर के बावजूद, वे बहुत शरीफ इंसान थे। चुनाव के बाद भी उन्होंने मुझे समझाया और मेरे साथ बातचीत की।

प्रश्न: आपकी शादी कब हुई और पारिवारिक जीवन कैसे संभाला?

उत्तर: मेरी शादी 14.5 साल की उम्र में हो गई थी। मेरा संयुक्त परिवार है, पिता जी के चारों भाई एक ही हवेली में रहते हैं। मेरी पत्नी ने हमेशा मेरा साथ दिया, कभी कोई शिकायत नहीं की। परिवार की परंपराएं आज भी बरकरार हैं।

प्रश्न: जेल जाने का भी अनुभव रहा?

उत्तर: हां, 17 बार जेल जा चुका हूं। राजस्थान में आरक्षण की लड़ाई लड़ते हुए पाकिस्तान बॉर्डर के पास भी जेल में रहा। राजनीति में संघर्ष बहुत किया है, लेकिन यह सब समाज के लिए किया है।

प्रश्न: अब आगे की क्या योजना है?

उत्तर: अब मैं समाज को जोड़ना चाहता हूं। राजनीति में आगे बढ़ते हुए, जनता की सेवा करना ही मेरा लक्ष्य है।

मुखिया गुर्जर का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। उन्होंने हमेशा अपनी बात बेबाकी से रखी और अपने आंदोलनों से सरकारों को झुकने पर मजबूर किया। यह इंटरव्यू हमें उनके जीवन, राजनीति और संघर्षों की एक झलक देता है।

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