एक्सक्लूसिव इंटरव्यू: क्यों बोलते हैं शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती?

साक्षात्कार

इन दिनों ‘शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज मेरठ के योगीपुरम में अपने प्रवचनों के कारण चर्चा में हैं। हमने उनसे विशेष बातचीत की, जिसमें उन्होंने गौ सेवा, भारत की सभ्यता, संस्कृति, जल, जंगल, जमीन, धर्म, राजनीति और समाज के तमाम मुद्दों पर अपनी अहम राय दी। आइए जानते हैं कि उन्होंने किन-किन मुद्दों पर अपनी विचारधारा साझा की।

सवाल: स्वामी जी, इस समय का समाज और विशेष रूप से युवा पीढ़ी को आप किस दृष्टिकोण से देखते हैं?

स्वामी जी:“समाज को देखकर ऐसा लगता है कि हमारे अस्तित्व के जो आधार हैं, जैसे संस्कृति, सनातन धर्म और राष्ट्रीयता, वे सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि हम इन सबको सही से नहीं संजोएंगे, तो हमारा अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। हमारे युवा ही इस समय में बदलाव लाने की क्षमता रखते हैं, क्योंकि वही इस समय के उत्तरदायी हैं। अगर ये सारे मूल तत्व सुदृढ़ हो जाएं, तो हमारा अस्तित्व भी सुदृढ़ रहेगा।”

सवाल: आपने सन्यासी जीवन चुना, क्या कभी आपको ऐसा महसूस हुआ कि ये आपका खुद का चुनाव था या नियति ने आपको चुना?
स्वामी जी:“यह सच है कि कभी-कभी हम कुछ चुनते हैं और कभी नियति हमें चुन लेती है। मेरे मामले में नियति ने जो चुना वही हुआ। जगतगुरु शंकराचार्य जी, हमारे पूज्य गुरु जी का आशीर्वाद और उनके सानिध्य का लाभ हमें मिला। 20 वर्ष तक उनके साथ रहने का मौका मिला। यह हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय था।”

सवाल: शंकराचार्य बनने की प्रक्रिया और उसमें कितनी तपस्या की आवश्यकता होती है, इसके बारे में थोड़ा बताइए।
स्वामी जी:“शंकराचार्य का पद एक बड़े दायित्व का प्रतीक है। इसका चयन गुरुजन करते हैं और यह निर्भर करता है कि शिष्य में कितनी क्षमता है। तप, त्याग, और संस्कार जीवन में स्वाभाविक रूप से आते हैं, लेकिन गुरु ही तय करते हैं कि कौन योग्य है।”

सवाल: सन्यासी जीवन में कठिनाई क्या होती है और आपकी दिनचर्या कैसी रहती है?
स्वामी जी:“सन्यासी जीवन में कठिनाई और सरलता का कोई फर्क नहीं है। अगर आप किसी नए जीवन को अपनाते हैं, तो शुरुआत में कठिनाई हो सकती है, लेकिन अगर आपकी प्रकृति उसी ढंग की है, तो कोई कठिनाई नहीं आती। पवित्र जीवन जीना एक आनंद की बात है। हम दिन में ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं, स्नान करते हैं, पूजा करते हैं, ध्यान और प्राणायाम करते हैं, और फिर शिष्यों को शिक्षा देते हैं। हमारा दिन पूर्ण रूप से सेवा और साधना में व्यस्त रहता है।”

सवाल: राजनीति और धर्म का घालमेल अब बढ़ रहा है। क्या यह सही है?
स्वामी जी:“धर्म और राजनीति का घालमेल नहीं होना चाहिए, लेकिन अगर दोनों मिलकर अच्छे कार्य कर रहे हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। अगर दोनों एक-दूसरे के अच्छे कार्यों में सहयोग कर रहे हैं, तो इसमें कोई हानि नहीं है। लेकिन अगर एक-दूसरे का स्वार्थ सिध्द करने के लिए मिलते हैं, तो यह सही नहीं है।”

सवाल: कुंभ मेले में अव्यवस्थाओं के बारे में आपकी क्या राय है?
स्वामी जी:“जो आयोजक होते हैं, वे हमेशा अपनी तारीफ करते हैं, लेकिन वास्तविकता वही होती है जो जन-समूह में होती है। अगर सरकार कह रही है कि कुंभ मेला अच्छा हुआ, तो यह स्वाभाविक है, क्योंकि आयोजक हमेशा अपनी सफलता ही बताते हैं। जनता के दृष्टिकोण से ही यह समझा जा सकता है कि कितना अच्छा हुआ।”

सवाल: नदियों की स्थिति पर आपका क्या विचार है? क्या वे वास्तव में खतरे में हैं?
स्वामी जी:“नदियां तो हमेशा रहेंगी, लेकिन उन नदियों के किनारे जो सभ्यताएं पनपी थीं, वे अब खत्म हो रही हैं। नदियों का अस्तित्व खतरे में है, लेकिन असल चिंता इस बात की है कि इन नदियों के किनारे जो जीवन था, वह नष्ट हो रहा है। इन नदियों के अविरल प्रवाह को रोकने से उनका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।”

सवाल: नदियों के पुनर्जीवन के लिए सरकार की नीतियों पर आपका क्या कहना है?
स्वामी जी:“सरकार ने नदियों की सफाई के लिए बहुत योजनाएं बनाई हैं, लेकिन जमीन पर उनका प्रभाव नहीं दिखता। जो नदियां सूख रही हैं, उनके बारे में लोग बात नहीं करते। अगर हम नदियों का पुनर्निर्माण चाहते हैं, तो हमें उनके प्रवाह को अविरल बनाना होगा, न कि केवल पैसे की बारिश करना होगा।”

सवाल: धर्म और सत्ता के बारे में आपने जो राय दी, क्या आपको कभी इसका विरोध झेलना पड़ा है?
स्वामी जी:“हम धर्म के क्षेत्र में बोलते हैं, और इसमें हमारा क्षेत्राधिकार है। जब धर्म का मामला होता है, तो हम खुलकर बोलते हैं, क्योंकि यह हमारा दायित्व है। राजनीति से जुड़े लोग अगर हमारी राय से असहमत होते हैं, तो वह एक अलग मुद्दा है। हम हमेशा धर्म के क्षेत्र में ही अपनी बात रखते हैं, और इसका पालन करते हैं।”

सवाल: आपकी टिप्पणी पर सोशल मीडिया में बहुत बहस होती है, क्या आपको कभी इसका असर महसूस हुआ है?
स्वामी जी:“हम जो भी बोलते हैं, वह धर्म के विषय में ही बोलते हैं। यदि किसी ने हमारी बातों का गलत तरीके से प्रचार किया है, तो हम इसे स्वीकार नहीं करते। हमें केवल उस क्षेत्र में बोलने का अधिकार है जो हमारा है। जहां धर्म की बात होती है, वहां हम चुप नहीं रहते।”

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के साथ की यह बातचीत समाज, संस्कृति, राजनीति, और नदियों के संकट पर उनके गहरे विचारों को उजागर करती है। वे हमेशा धर्म और संस्कृति की रक्षा के पक्षधर रहे हैं और समाज के हर पहलू पर अपनी स्पष्ट राय रखते हैं। उनके विचार हमारे समाज को सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

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