अटेरना : यूपी का वो गांव जो सरकार से आगे निकल गया: सीसीटीवी भी हैं, सपने भी!

वेस्ट यूपी

1985 में बिजली नहीं थी 2025 में हर गली में सीसीटीवी

मुफ़्त वाईफाई, हर हाथ में मोबाइल, डिजिटल बोर्ड पर दूसरे गांवों में भी फैला रहे शिक्षा का उजियारा

Dr. Ravindra Rana/ Rajesh Sharma

अटेरना (सरधना), मेरठ से विशेष रिपोर्ट

करीब 62 साल के बुजुर्ग किसान ठाकुर यशपाल सिंह जब अपने बचपन की यादें साझा करते हैं तो लगता है जैसे किसी और युग की बात हो रही हो। “जब हमने पहली बार वोट दिया, तब गांव में न बिजली थी, न सड़कें। ₹1300 हम खुद चंदा करते थे, तब जाकर ₹1300 सरकार से मिलते थे किसी काम के लिए,” वे बताते हैं।

आज वही अटेरना गांव पूरी तरह बदल चुका है। अब हर गली में सीसीटीवी है। मुफ़्त वाईफाई है। हर घर में बिजली है, पक्की सीमेंटेड सड़कें हैं, और लगभग हर युवा मोटरसाइकिल व मोबाइल फोन से लैस है। दिलचस्प बात यह है कि यह गांव लैंडलाइन टेलीफोन से वंचित रह गया और सीधे मोबाइल क्रांति से जुड़ गया। गंगनहर के किनारे बसा एक छोटा सा गांव — अटेरना। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले की सरधना तहसील से मात्र 5 किलोमीटर दूर। अगर आप ग्रामीण भारत की सच्चाई, संभावना और संघर्ष देखना चाहते हैं — तो अटेरना आइए।

यहां इतिहास नहीं बोलता, वर्तमान चुपचाप गवाही देता है।

लोकतंत्र की कहानी: 1951 से आज तक

यह कोई साधारण गांव नहीं। 1951 से लेकर 2021 तक, अटेरना में 11 ग्राम प्रधान चुने जा चुके हैं।
पहले प्रधान थे ठाकुर नैन सिंह। फिर क्रमशः ठा. सुन्हरा सिंह, चमन सिंह प्रधान बने। तीनों बार गांव के लोग एकत्र हुए। हाथ उठाए और ग्राम प्रधान चुन लिया। न बैलेट बॉक्स की जरूरत पड़ी न वोटिंग के लिए लाइन लगी और न ही पुलिस फोर्स की तैनाती हुई। शुरू के पांच प्रधानों का चुनाव इसी तरह से हुआ। शुरू में चार प्रधान इसी तरह बने। पहले तीन प्रधानों का कार्यकाल दस दस साल का रहा। पहली बार जब वोट पडे तो राजकुमार सिंह प्रधान बने।

आरक्षण ने सबको सौंपी प्रधान की कुर्सी

सातवें प्रधान दीप चंद उपाध्याय ओबीसी केटेगरी से बने। उनके पहले सभी प्रधान ठाकुर थे। उसके बाद गांव की प्रधानी रिजर्व श्रेणी में आ गई।  साल 2005 से महिला नेतृत्व की शुरुआत हुई — श्रीमती बीरो देवी, किरण बाला, और आज ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी संभाल रही हैं श्रीमती चंचल सोम, जिनके प्रतिनिधि हैं ठा. मोन्टी सोम। पंचायत अब डिजिटल हो रही है, महिलाएं आगे आ रही हैं। हालांकि राजनीतिक और सामाजिक मोर्चों पर उनके पति मोंटी सोम ही मोर्चा संभालते हैं। साल 2021 में चुनाव हुआ तो प्रधानी सामान्य श्रेणी की महिला के लिए आरक्षित थी।

जनसंख्या और सामाजिक बनावट: आंकड़े भी कुछ कहते हैं

  • कुल जनसंख्या: लगभग 2,900
  • परिवार: 488
  • अनुसूचित जाति: ~37%
  • साक्षरता दर: 74.65% (पुरुष: 83%, महिला: 65%)

यह गांव उत्तर प्रदेश के औसत से बेहतर शिक्षित है। लेकिन माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए अब भी बच्चों को सरधना या मेरठ जाना पड़ता है। हालांकि ये आंकड़े 2011 की जनगणना के हैं। तब से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है। जनसांख्यिकी भी और पढ़ाई लिखाई भी।

टेक्नोलॉजी का अनोखा सफर

प्रधान प्रतिनिधि मोंटी सोम बताते हैं कि उनके यहां कभी लैंडलाइन नहीं लगा, और गांव सीधा मोबाइल नेटवर्क की ओर बढ़ गया। पहले इंटरनेट भी नहीं चलता था, लेकिन प्रधान द्वारा प्रयास कर Jio का टावर लगवाया गया जिससे बच्चों की पढ़ाई और लोगों की बातचीत आसान हो गई।

जब गांव में आया था पहला डीटी 14 ट्रैक्टर और यजदी मोटरसाइकिल

गांव के लोग बताते हैं कि गांव में पहला पहला ट्रैक्टर डीटी 14 करीब पांच दशक पहले आया था। तब प्रधान राजकुमार पहली यजदी मोटरसाइकिल लाई थी। जो सुबह के वक्त मुश्किल से स्टार्ट होती थी। उसमें धुआं निकलने के लिए दो साइलेंसर होते थे। अब तो गांव के 80 फीसदी युवा सेल्फ स्टार्ट और लाइट वेट बाइक पर घूमते हैं। गांव के 80 फीसदी से ज्यादा किसानों के पास ट्रैक्टर हैं और EV से घर घर से कूड़ा उठाने की व्यवस्था है। कचरा निस्तारण केंद्र पर सेग्रीगेशन होता है।

यशपाल सरकार से मांग करते हैं कि पुराने वाहनों की उम्र सीमा बढ़ाकर कम से कम 20–25 साल की जाए, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में वाहन कम चलते हैं और उनका रखरखाव अच्छा होता है।

सरकार को ठेका चाहिए

गांव में शराब का ठेका है गांव के कितने लोग ठेके तक जाते होंगे ये पूछने पर ठाकुर यशपाल कहते हैं कि कम से कम 60 फीसदी। वे यहीं नहीं रुकते कहते हैं कि आसपास के भी आठ दस गांवों से लोग ठेके पर आते हैं। वो कहते हैं कि सरकार को ठेके से आमदनी होती है।

इससे पता चलता है कि शराब अब एक पेय पदार्थ के रूप में बडी जगह ले चुका है। वो आगे कहते हैं कि गांव के प्रधान अनुशासन बनाए रखते हैं और हुड़दंग की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते।हालांकि बुजुर्ग ये भी बताते हैं कि गांव में इतनी महिलाएं मंदिर नहीं जातीं जितने लोग ठेके तक पहुंचते हैं।

पुलिस चौकी और श्मशान

गांव में अब पुलिस चौकी है और एक सुंदर श्मशान भी बन गया है, जो पहले कभी नहीं था। इससे गांव की सामाजिक व्यवस्था और अंतिम संस्कार की सुविधाएं बेहतर हुई हैं।

जल संकट नहीं, जल सुविधा है

गांव में लगभग 600 से अधिक घरों में पानी का कनेक्शन है। सुबह-शाम नलों में पानी आता है और लोगों की दैनिक जरूरतें आसानी से पूरी हो जाती हैं। भूमिगत जलस्तर भी मात्र 30-40 फीट पर है, जिससे यह गांव आसपास के कई इलाकों से बेहतर स्थिति में है।

गांव की शांति और तरक्की की मिसाल

आज अटेरना  गांव ना केवल विकास की मिसाल बन रहा है, बल्कि यह दिखा रहा है कि अगर स्थानीय नेतृत्व मजबूत हो और जन-सहभागिता हो, तो छोटे गांव भी स्मार्ट बन सकते हैं। गांव में जियो का टावर लगा है और बच्चों को पंचायत की तरफ से फ्री वाईफाई के जरिये नेट मिला, पढ़ाई की रफ्तार बदली

मेरठ जिले के एक सामान्य से गांव अटेरना में कुछ असामान्य हो रहा है। यहां की महिला प्रधान चंचल सोम सिर्फ पंचायत की मुखिया नहीं हैं उनके पति मोंटी सोम उनके साथ एक सजग योजनाकार, तकनीक-साक्षर और व्यवस्था को समझने वाले नेता के तौर पर साथ खड़े हैं।

जहां कई प्रधान आज भी काम सरकारी बाबुओं पर छोड़ देते हैं, वहीं चंल सोम सोम अपने गांव के भविष्य की स्क्रिप्ट खुद लिख रही हैं — उनके पति मोंटी सोम पोर्टलों पर योजना खोजते हैं, मानकों की बारीकी समझते हैं, और सोशल मीडिया से सीखकर गांव को नई ऊंचाई तक ले जा रहे हैं।

श्मशान घाट नहीं, सम्मान घाट

गांव की पहचान उसकी जीवित आबादी से होती है — लेकिन मोंटी सोम ने गांव के अंतिम पड़ाव को भी इज़्ज़त दी।

24 लाख 36 हजार की विशेष योजना के तहत गांव में आधुनिक श्मशान घाट बनवाया गया है, जिसमें ईंधन कक्ष, शौचालय, कार्यालय और प्रवेश द्वार तक की व्यवस्था है।
पहले जहां बरसात में शव यात्रा फंस जाती थी, अब चार दाह संस्कार एक साथ संभव हैं।
श्मशान के पास पुराना तालाब पुनर्जीवित किया जा रहा है — जीवन और मरण का ये सुंदर संतुलन शायद ही किसी गांव में दिखे।

पहले दो लोग फावड़ा लेकर जाते थे, अब गांव खुद खड़ा है”

मोंटी सोम बताते हैं — “पहले जब गांव में किसी का निधन होता था, तो दो लोग पहले फावड़ा लेकर श्मशान की सफाई करने जाते थे। कीचड़, झाड़ियां और सांप-बिच्छुओं का डर बना रहता था। अब ये सब बीते कल की बात है।”

हम सिर्फ प्रधान नहीं, नीति के पाठक भी हैं”

मोंटी सोम की पत्नी चंचल सोम सिर्फ नाम मात्र की प्रधान नहीं हैं।
वो सरकारी पोर्टलों पर नजर रखती हैं — कौन सी योजना किस विभाग से आ सकती है, मानक क्या हैं, आवेदन प्रक्रिया क्या है — उन्हें यह सब मालूम है।

मोंटी सोम कहते हैं—

“श्मशान योजना का पैसा तभी मिलता है जब कब्जा मुक्त जमीन 700 मीटर से ज़्यादा हो। साथ ही राजनीतिक एप्रोच भी जरूरी है। मैं सोशल मीडिया और सरकारी सेमिनारों से सीखता हूं कि क्या नया किया जा सकता है।”

चंचल अपने पति मोंटी सोम के साथ हाल ही में वो देशभर के 550 प्रधानों के राष्ट्रीय सम्मेलन में भी शामिल हुईं, जहां उन्होंने अन्य राज्यों से आए बेस्ट प्रैक्टिसेज देखीं और सीखा कि कैसे सीमित बजट में गांव को बेहतर बनाया जा सकता है।

निधि तो है, पर सिस्टम में गड़बड़ियां भी कम नहीं

मोंटी सोम का दावा है कि उन्होंने पांच साल में करीब 15 करोड़ रुपये के काम गांव में कराए हैं, जबकि गांव की सरकारी निधि महज 90 लाख के करीब थी।

इसमें से:

  • 18% जीएसटी में चला जाता है,
  • करीब 3 लाख प्रधान व स्टाफ के मानदेय में,
  • और बचता वही है जिससे पूरे गांव की उम्मीदें जुड़ी होती हैं।

वो कहते हैं —

“सरकार को मानदेय के लिए अलग फंड देना चाहिए, ये विकास निधि से नहीं कटना चाहिए। और जीएसटी का पैसा भी वापस पंचायतों में लगना चाहिए। हम टैक्स दे भी रहे हैं और काटा भी जा रहा है।”

पंचायत सचिव कई बार सर्वेसर्वा बन जाता है”

चंचल सोम यह भी स्वीकारती हैं कि प्रधान के पास अधिकार होते हुए भी, कई बार पंचायत सचिव ही सर्वेसर्वा बन जाता है

“मैंने सीखा कि योजना को समझे बिना कुछ नहीं होगा। मुझे हर विभाग से फंड लाने की समझ बनानी पड़ी — विधायक निधि, सांसद निधि, सिंचाई विभाग, PWD से पैसे लाकर काम कराए।”

एक नज़ीर बना अटेरना

अटेरना की यह कहानी सिर्फ महिला आरक्षण की कहानी नहीं है। यह नेतृत्व, समझदारी और प्रणाली की बारीकियों को पकड़ने की क्षमता की कहानी है

जहां सरकारें और बड़े मंत्रालय विकास के दस्तावेज़ बनाते हैं, वहां प्रधान चंचल सोम अपने पति मोंटी सोम के साथ उन्हें जमीन पर उतार रही हैं।

क्या संदेश देती है अटेरना की कहानी?

  1. पंचायतों को सिर्फ वोट की राजनीति से नहीं, वास्तविक योजना और तकनीक की समझ से जोड़ना होगा।
  2. विकास निधि पर जीएसटी और मानदेय का बोझ हटाना होगा।
  3. प्रधानों को सिर्फ चेहरा न मानकर, प्रशिक्षण और नीति ज्ञान से लैस करना होगा।
  4. गांव की समस्याओं का हल सिर्फ MLA और MP के वादों में नहीं, पोर्टल, योजना और पहल में छिपा है।

चंचल सोम अकेली नहीं, वो उस भारत की प्रतीक हैं जो पंचायतों के सहारे चल रहा है, जब राज्य और केंद्र सरकारें नज़रें फेर लेती हैं।
उनकी कहानी बताती है कि जब इरादे मजबूत हों, तो श्मशान भी शान बन सकता है।

खेती खेत हैं, मेहनत है — लेकिन मुनाफा कहां है?

  • कुल ज़मीन: लगभग 395 हेक्टेयर
  • खेती योग्य भूमि: ~310 हेक्टेयर
  • सिंचाई: मुख्यतः ट्यूबवेल आधारित
  • फसलें: गन्ना, गेहूं, सरसों

गांव को भरपूर जल संसाधन है। पश्चिमी दिशा में गंगनहर बहती है। गांव के बीच से रजवाहा निकलता है। गांव में हैंडपंप दो फीट की पुरानी मशीन वाले भी हैं और सरकारी इंडिया मार्का भी। गांव में पेयजल की सप्लाई ओवहेड टैंक से होती है। सभी घरों में पानी के कनेक्शन हैं। गन्ने की खेती पर निर्भर इस गांव में खेती किसानी से जुडे कई सवालों के जवाब नहीं हैं। MSP की अस्थिरता, बढ़ती लागत और रोजगार के लिए पलायन — ये तीन शब्द गांव की कृषि की हकीकत बयां करते हैं।

स्वास्थ्य सुविधाएं: गांव की सबसे बड़ी कमजोरी

  • कोई सरकारी अस्पताल नहीं
  • मामूली बीमारी से लेकर प्रसव तक के लिए 5–10 किमी दूर जाना पड़ता है

सरकार से नहीं रोजगार की उम्मीद खुद तलाश रहे रास्ते

गांव के 42% लोग दिहाड़ी, खेतिहर मजदूरी या श्रम पर निर्भर हैं।
स्किल सेंटर नहीं है, स्थानीय रोज़गार के अवसर नहीं हैं — यही कारण है कि मेरठ, नोएडा और दिल्ली की ओर युवाओं का पलायन जारी है। गांव के जो युवा यहीं हैं, वे या तो खेती में हाथ बंटा रहे हैं या फिर बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि सरकार अब नौकरी नहीं दे रही। हर विभाग का निजीकरण हो रहा है।

सरकार से नहीं, अब खुद तलाश रहे हैं रोजगार के रास्ते
गंगनहर के किनारे बसा मेरठ का गांव अटेरना विकास के रास्ते पर दौड़ रहा है — लेकिन एक मोड़ ऐसा भी है, जहां युवाओं को खुद रास्ते बनाने पड़ रहे हैं।

यह गांव अब सीसी सड़कों, ओपन जिम, सीसीटीवी और सौर ऊर्जा से चलने वाली जल परियोजनाओं के लिए पहचाना जाता है, लेकिन स्थानीय रोज़गार की अनुपलब्धता और स्किल सेंटर के अभाव में गांव का युवा नोएडा, दिल्ली, मेरठ की ओर पलायन करने को मजबूर है।

गांव के 42% लोग खेतिहर मजदूरी, दिहाड़ी या श्रम आधारित कार्यों पर निर्भर हैं। नौकरी की तलाश में भटकते हैं, लेकिन सरकार से अब कोई विशेष उम्मीद नहीं रखते।

अब सरकार नौकरी नहीं देती” – कहते हैं गांव के बुजुर्ग

पेड़ के नीचे खाट पर बैठे यशपाल जैसे बुजुर्ग साफ कहते हैं — “अब तो सरकार कोई नौकरी देती ही नहीं। हर विभाग प्राइवेट हो गया है।”


यशपाल बताते हैं कि गांव में बिजली तो 1985 में आई, लेकिन तब गिनती के पांच-सात कनेक्शन ही थे। आज हर घर में बिजली है, मोबाइल फोन है, और बुजुर्ग भी स्मार्टफोन पर रील्स और समाचार देखते हैं।

“अब कोई बच्चा बिना यूट्यूब के नहीं रहता,” वो हँसते हुए कहते हैं, “हम भी देख लेते हैं… कभी नाच गाना, कभी हंसी-मजाक।”

हरेंद्र और सुमित: सरकारी नौकरी नहीं, खुद का रास्ता

लेकिन गांव में हरेंद्र और सुमित सोम जैसे युवा भी हैं, जिन्होंने तय किया कि नौकरी की आस नहीं लगाएंगे।
हरेंद्र ने मैथ से बीएससी की, UPSC प्रीलिम्स भी क्लियर किया, लेकिन शादी और परिवार की ज़िम्मेदारियों के चलते अब गांव में ही दो स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। रूहासा गांव में उन्होंने अपना कोचिंग सेंटर भी शुरू किया है।

उनके छोटे भाई सुमित सोम, बीए, एमए, डिप्लोमा और बीटेक कर चुके हैं, लेकिन किसी के अधीन काम करने में उन्हें मज़ा नहीं। उन्होंने घर पर ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और आज 80 से ज्यादा बच्चे उनके पास पढ़ते हैं।

सुमित कहते हैं, “खुद का काम करने की आज़ादी ही सबसे बड़ी आज़ादी है।”

डिजिटल इंडिया की असली तस्वीर

सुमित और हरेंद्र ने बच्चों को पढ़ाने के लिए 1.5 लाख का डिजिटल बोर्ड खरीदा है। इसके ज़रिए वे ऑनलाइन क्लासेस भी लेते हैं और दो यूट्यूब चैनल — एग्जाम जोश’ और ‘एग्जाम कनेक्शन’ भी चलाते हैं, जिन पर मिलाकर 8 हजार से अधिक सब्सक्राइबर हैं।

इनके पिता बताते हैं, “मेरे पास सात बीघा जमीन है। मैं खुद दसवीं पास हूं। लेकिन बच्चों ने खुद का रास्ता चुना है। कोई नौकरी की पीछे नहीं भागा।”

तेजवीर की दोहरी जिम्मेदारी

गांव के ही तेजवीर सिंह सात बीघा खेत में खेती भी करते हैं और साथ ही सकौती चीनी मिल में नौकरी भी।
उनका कहना है, “गांव में बहुत बदलाव आया है — लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट की कमी अब भी है। सरधना, दौराला, सकौती या मेरठ — कहीं जाने के लिए बाइक ही एकमात्र सहारा है।”

गांव से सरधना 6 किमी, सकौती 7 किमी, दौराला 9 किमी और मेरठ 25 किमी है। लेकिन न बैंक है, न डाकघर, न पशु चिकित्सा केंद्र और न ही हेल्थ सेंटर। इन सभी जरूरतों के लिए लोगों को सरधना जाना पड़ता है।

बच्चों की बातें, सपनों की उड़ान

हमने गांव के बच्चों से भी बात की। दसवीं में पढ़ने वाले रजत कहते हैं, “मैं सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता हूं।”
परम, जो बारहवीं में बायोलॉजी से पढ़ाई कर रहे हैं, कहते हैं, “अगर डॉक्टर नहीं बन पाए, तो बी फार्मा करेंगे और मेडिकल स्टोर खोलेंगे।”
छोटे से शौर्य का सपना है — “मैं फौजी बनूंगा!”

गांव में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन रोजगार नहीं’

एक स्कूटी सवार युवक कहते हैं, “गांव में तो सब कुछ हो गया — सीसी रोड, गेट, श्मशान घाट तक! गिन नहीं सकता कि क्या-क्या हो गया है। पर नौकरी नहीं हुई।”

गांव में सीसीटीवी कैमरे, सौर ऊर्जा से जल आपूर्ति, भूजल और वर्षा मापन यंत्र, ओपन जिम, डिजिटल पंचायत सचिवालय — यह सब तो है, लेकिन रोज़गार की सीधी सुविधा नहीं है।

राजनीति में उम्मीद और मतभेद

बुजुर्ग कहते हैं, “निर्विरोध प्रधान चुने जाने पर सरकार 5 लाख रुपये देती है, लेकिन जातीय मतभेद और राजनीतिक झुकाव के कारण हर बार चुनाव होते हैं, और गांव को वो ईनाम नहीं मिल पाता।”

वे यह भी कहते हैं कि “गांव के वाहन शहरों जैसे नहीं चलते, फिर भी सरकार उन्हें 10-15 साल में बंद करने की बात करती है। कम से कम 20-25 साल तक तो चलने देना चाहिए।”

जब रोजगार बनता है खुद की हिम्मत से

अटेरना की यह कहानी बताती है कि विकास की योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन युवाओं की उम्मीदों को दिशा देने के लिए रोज़गार के विकल्प जरूरी हैं

हरेंद्र और सुमित जैसे युवाओं ने यह साबित कर दिया है कि अगर स्किल हो, संकल्प हो और साधन जुटाने का हौसला हो — तो गांव में रहते हुए भी एक नयी दुनिया बनाई जा सकती है।

सरकारें सीसी रोड बनवा सकती हैं, स्ट्रीट लाइटें लगवा सकती हैं, लेकिन जीवन को रोशन करने की जिम्मेदारी अब खुद लोगों ने उठा ली है।
अटेरना इस आत्मनिर्भर सोच की एक जीती-जागती मिसाल है।

गंगनहर के किनारे बसा मेरठ का गांव अटेरना, आज सड़कों से लेकर सीसीटीवी कैमरों तक, सौर ऊर्जा से लेकर डिजिटल शिक्षा तक, कई मानकों पर एक आदर्श गांव बन चुका है।

यह कहानी महज विकास कार्यों की नहीं है — यह कहानी है ग्रामीण भारत के भीतर खड़ी होती दो दुनियाओं की
एक तरफ वह दुनिया है जिसे पंचायतों ने अपने सीमित संसाधनों से सजाया संवारा है।
दूसरी तरफ वह अंधेरा हिस्सा है, जहां सरकारी नीतियों की चुप्पी और बेरोज़गारी की सच्चाई अब गांव के युवाओं को खुद राह खोजने पर मजबूर कर रही है।

पंचायत का काम… गांव में दिखता है बदलाव

गांव के हर कोने में विकास की रेखाएं खिंची हुई हैं:

  • गांव में 29 सीसीटीवी कैमरे,
  • हर घर जल योजना के तहत ओवरहेड टंकी और पाइप कनेक्शन,
  • सौर ऊर्जा से चलने वाली पानी की मोटर,
  • मॉडल पंचायत सचिवालय,
  • भूजल और वर्षामापन यंत्र,
  • जूनियर हाईस्कूल व प्राइमरी स्कूल,
  • ओपन जिम और
  • डिजिटल बोर्ड के साथ ट्यूशन सेंटर

गांव की प्रधान चंचल सोम के पति मांटी सोम युवा हैं, और उन्हें गांव के बच्चे अपने ‘टीचर प्रधान’ के रूप में भी जानते हैं।

पर जहां सरकार जिम्मेदार थी, वहां गांव आज भी ठहर गया है

लेकिन यह तस्वीर अधूरी है।
जो काम पंचायत स्तर पर संभव थे, वे तो हो रहे हैं, लेकिन जहां ज़रूरत थी नीति की, योजना की और सरकार की, वहां गांव आज भी संघर्ष कर रहा है।

  • गांव में कोई स्किल सेंटर नहीं है।
  • स्थायी या स्थानीय रोज़गार का कोई साधन नहीं।
  • पब्लिक ट्रांसपोर्ट नहीं है — न मेरठ के लिए, न सरधना, दौराला या सकौती के लिए।
  • न डाकघर,
  • न बैंक,
  • न पशु चिकित्सा केंद्र,
  • न हेल्थ सेंटर

इन बुनियादी ढांचों की अनुपस्थिति को देखकर साफ कहा जा सकता है कि पंचायतें जितना कर सकती थीं, कर रही हैं — पर राज्य और केंद्र सरकार का हाथ यहां नदारद है।

हरेंद्र और सुमित की कहानी: जब सरकार चुप रही, युवाओं ने खुद रास्ता खोजा

गांव में हमें हरेंद्र सोम और सुमित सोम जैसे भाई मिले, जिन्होंने न तो सरकार की नौकरी के भरोसे रहे, न ही पलायन का रास्ता अपनाया।

हरेंद्र सोम, जिन्होंने बीएससी मैथ्स से की, UPSC प्रीलिम्स पास किया, लेकिन सरकारी सिस्टम की अनिश्चितताओं को समझते हुए गांव में ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। दो स्कूलों में पढ़ा रहे हैं, और पास के रूहासा गांव में कोचिंग सेंटर भी खोल चुके हैं।

उनके छोटे भाई सुमित सोम, बीए, एमए, पॉलिटेक्निक और बीटेक तक पढ़े हैं। लेकिन कहते हैं, “नौकरी में किसी के नीचे काम करने का मन नहीं है। अपने काम में आज़ादी है।”

80 बच्चे उनके पास पढ़ने आते हैं1.5 लाख का डिजिटल बोर्ड खरीदा है और दो यूट्यूब चैनल भी चला रहे हैं — एग्जाम जोश’ और एग्जाम कनेक्शन’, जिन पर मिलाकर 8 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं।

इनके पिता कहते हैं, “हमारी जमीन सात बीघा है, बच्चे सरकारी नौकरी के पीछे नहीं भागे। उन्होंने खुद का रास्ता चुना और उस पर चल पड़े।”

गांव के बुजुर्ग: तकनीक से जुड़े, लेकिन सरकार से कटे हुए

यशपाल, गांव के बुजुर्ग हैं। बताते हैं, “पहले बिजली 1985 में आई। पांच-सात लोगों के पास ही कनेक्शन था। अब तो हर घर में लाइट, मोबाइल और इंटरनेट है।”
हाथ में स्मार्टफोन है। हँसते हुए कहते हैं, “हम भी रील्स देखते हैं… गाना, नाच, खबर… सब कुछ।”

लेकिन जब बात रोजगार, स्कूलों के बाद भविष्य की, अस्पताल या यातायात की आती है — तो यशपाल जैसे लोग सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाते हैं
“सरकारें तो योजना बनाकर अखबार में छपवा देती हैं, असल में काम पंचायत कर रही है। पर पंचायतें भी हर जगह तो नहीं पहुंच सकतीं।”


युवाओं के सपने, और सरकारी चुप्पी

स्कूल बंद होने की छुट्टी में खाट पर बैठे रजत, आर्यन, परम और शौर्य जैसे बच्चे, बड़े सपने देखते हैं।

  • रजत सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना चाहता है।
  • परम कहता है, “डॉक्टर नहीं बन पाया तो मेडिकल स्टोर खोल लूंगा।
  • शौर्य की आंखों में फौज का सपना है।

पर इनके पास स्किल सेंटर नहीं, न कोचिंग की स्थायी व्यवस्था, और न सरकारी योजना जो इन सपनों को दिशा दे।

पंचायतें जिम्मेदारी निभा रही हैं, अब सरकारों की बारी है

अटेरना विकास के उस संतुलन की मिसाल है, जहां पंचायतें अपना कर्तव्य निभा रही हैं, लेकिन सरकारों की अनुपस्थिति हर मोड़ पर खटकती है

यह गांव पूछ रहा है —

  • सरकारी रोज़गार की योजनाएं कहां हैं?
  • ट्रांसपोर्ट और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सेवाओं की जिम्मेदारी किसकी है?
  • युवाओं को गांव में रोकने के लिए कौन सी नीति है?

अगर पंचायतें डिजिटल शिक्षा और सीसीटीवी तक पहुंच सकती हैं,
तो क्या सरकारें रोजगार, अस्पताल और स्किल सेंटर तक नहीं पहुंच सकतीं?

अटेरना अब जाग रहा है।सरकारों को भी जागना पड़ेगा।

बुनियादी ढांचा: सुधार की उम्मीद बाकी है

  • बिजली: लगभग सभी घरों में कनेक्शन
  • पानी: 600+ नल कनेक्शन, लेकिन जलशुद्धिकरण की व्यवस्था नहीं
  • सड़क: बनी हैं, लेकिन मानसून में टूटती हैं
  • पुलिस चौकी और श्मशान: हाल के वर्षों में बने हैं, शांति बनी हुई है

दारू के ठेके तक तो हैं, अस्पताल क्यों नहीं?”

गांव में एक सरकारी शराब का ठेका है, जहां आठ गांवों से लोग आते हैं। बुजुर्ग कहते हैं, “इतनी औरतें मंदिर नहीं जातीं, जितने लोग ठेके पर जाते हैं।”
60% आबादी कभी न कभी शराब के संपर्क में है — लेकिन एक PHC नहीं है, एक MBBS डॉक्टर तक नहीं। गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि शराब के ठेके पर आसपास के भी कई गांवों के लोग आते हैं।

गांव की पहचान: न शोर, न विवाद — बस उम्मीद

  • जातीय टकराव कम
  • पंचायत सक्रिय
  • महिलाएं सामाजिक कार्यों में भागीदारी कर रही हैं
  • शांति और संतुलन की मिसाल
  • गंगनहर के किनारे जीवन की नमी और हवा में उम्मीद

अटेरना वो गांव है जो समस्यानहीं, ‘संभावनाहै

यह गांव विकास के चीखते विज्ञापनों में नहीं दिखता। न यहां दंगे की खबर है, न दलितों पर अत्याचार की सुर्खियां। यही कारण है कि यह पत्रकारिता की टीआरपी-साइलेंट ज़ोन है — लेकिन यही असली पत्रकारिता की परीक्षा है।

जहां सवाल ज़िंदा हैं, वहां जवाब भी पैदा होते हैं। अटेरना, शायद उन्हीं सवालों की ज़मीन है।”

PoliticalAdda.com की यह 360 डिग्री ग्राउंड रिपोर्ट सिर्फ अटेरना की नहीं, बल्कि वेस्ट यूपी के उन गांवों की कहानी है — जहां अब भी ज़िंदगी उम्मीद से सांस ले रही है।

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