Dr. Ravindra Rana/ Rajesh Sharma
जब सेठ दयानंद गुप्ता मेरठ की सड़कों पर अपनी चमचमाती गाड़ी से निकलते थे, तो लोग नजरें झुका लेते थे। लेकिन बहुत कम लोग जानते थे कि यही दयानंद एक समय में फटे पायजामे और बिना चप्पल के स्कूल जाया करते थे। उनका एक वाक्य अक्सर दोहराया जाता था:
“मैं फटे पायजामे और टूटी चप्पलों में स्कूल जाता था, पर सपने हमेशा चमचमाते थे।”

यह पंक्ति उनके जीवन का निचोड़ थी—संघर्ष से सफलता तक की सीधी लेकिन कांटों भरी राह। पीपलीखेड़ा गांव से निकलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से केमिकल इंजीनियर बने, फिर मोदी पोन फैक्ट्री से होते हुए खुद के सात सल्फर प्लांट और पेपर मिलों के मालिक बने। लेकिन दयानंद सिर्फ एक उद्योगपति नहीं थे। वो मेरठ की राजनीति, शिक्षा और सामाजिक ढांचे का भी एक मजबूत हिस्सा बन चुके थे।

उन्होंने कॉलेज बनाए, मेयर और कैंट सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ा, कांग्रेस के प्रदेश कोषाध्यक्ष बने। उन्होंने रिश्तों को जाति या खून से नहीं, विश्वास और व्यावहारिकता से जोड़ा। पर जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़ा, रिश्तों की नींव दरकने लगी।
सबसे बड़ी दरार आई वहीं, जहां सबसे बड़ा भरोसा था। उनके छोटे भाई डॉक्टर ओपी अग्रवाल के साथ। जिनके डॉक्टर बनने में उन्होंने सब कुछ लगाया, वही ओपी बाद में उनसे अलग हो गए।

ओपी की पत्नी डॉ. सरोजिनी अग्रवाल एक पढ़ी-लिखी, महत्वाकांक्षी महिला— अब इस कहानी का केंद्रीय चेहरा हैं।
सरोजिनी की राह: रिश्तों की दरार और दौलत की दीवार


सरोजिनी मेरठ के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आई थीं। उनके भाई विष्णु शरण अग्रवाल, एक बॉयलर इंस्पेक्टर, ने अपनी मलाईदार नौकरी छोड़ दी और बहन के साथ व्यवसाय में कूद पड़े। यह साझेदारी एक सपना थी—स्कूल, कॉलेज और फिर मेडिकल संस्थान बनाने का सपना।
शुरुआत उत्साहजनक रही, लेकिन जल्द ही मतभेद गहरे होते चले गए। संपत्तियों के साथ-साथ संबंध भी बंटने लगे।
अब न भाई-बहन, न साझेदार
सरोजिनी के हिस्से में नोएडा का एमआईईटी कॉलेज और सिटी वोकेशनल स्कूल आया, जबकि विष्णु ने मेरठ, गाजियाबाद, हल्द्वानी तक अपनी अलग श्रृंखला खड़ी की।
राजनीति में सरोजिनी ने समाजवादी पार्टी से शुरुआत की। जिला पंचायत अध्यक्ष बनीं, विधान परिषद पहुंचीं और सत्ता बदली तो भाजपा का दामन थाम लिया। उनका सपना था—एक भव्य मेडिकल कॉलेज और MBBS की सौ से बढ़ाकर डेढ़ सौ सीटें।
तीन बेटियां, विवाह और बिखराव
सरोजिनी और ओपी की तीन बेटियां। तीनों पढ़ी-लिखी, इनमें दो डॉक्टर बनीं. एक डॉक्टर बेटी महिला आयोग की सदस्य। लेकिन जैसे जैसे व्यावसायिक साम्राज्य बना, घर के रिश्ते ढहने लगे। एक बेटी के पति की हादसे में मौत हो गई. दो को तलाक मिला। एक मां ने अपने बच्चों को सब कुछ दिया—दौलत, प्रतिष्ठा, सुविधा—लेकिन शायद स्थायित्व नहीं दे पाईं।

शायद रिश्तों की थाली में बहुत कुछ था, पर…
सरोजिनी खुद कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ीं। शारीरिक लड़ाई उन्होंने जीत ली, पर मानसिक अकेलापन गहराता गया। कभी जहां आज़म खान जैसे रसूखदार नेताओं की गहमागहमी रहती थी, वो घर अब सन्नाटे और शंका से भरा है।
1 जुलाई 2025
उस दिन सुबह सीबीआई ने मेरठ में छापा मारा।
फर्जी फैकल्टी, फर्जी दस्तावेज, फर्जी मरीज—सब कुछ सामने आने लगा।
जांच में नाम आया—डॉ. शिवानी अग्रवाल।
वही बेटी, जिसके लिए साम्राज्य खड़ा किया गया था।
सरोजिनी ने सफाई दी—“एक कर्मचारी की गलती थी।”
पर अगले दिन दस्तावेज लीक हुए। आरोप था कि सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए फर्जीवाड़ा किया गया।
डॉ. शिवानी अब केस में अभियुक्त हैं। गिरफ्तारी कभी भी हो सकती है।
पर सिर्फ शिवानी नहीं, पूरा परिवार जांच के घेरे में है।
सरकार में बैठीं डॉ.हिमानी क्या कुछ कर पाएंगी या नहीं—ये चर्चा का विषय है।
और सरोजिनी का रसूख—क्या अदालत तक चलेगा या वहीं दम तोड़ देगा—यह तारीख तय करेगी।
अंतिम सवाल: क्या ये कहानी सिर्फ एक फर्जीवाड़े की है?
नहीं।
ये एक वटवृक्ष की सूखती शाखाओं की कहानी है।
जहां एक आदमी ने फटे पजामे से महल तक का सफर तय किया।
जहां एक स्त्री ने सत्ता, शिक्षा और साम्राज्य तीनों में झंडे गाड़े।
पर वहीं, रिश्ते पीछे छूटते गए।
सेठ दयानंद की बहू, जो कभी विरासत की पहरेदार थीं, आज अपनी बेटी के केस की फाइल में डूबी हैं।
जो कभी MBBS सीटों के लिए संघर्ष कर रही थीं, अब सीबीआई की तारीखों का इंतज़ार कर रही हैं।
क्या दौलत रिश्तों की जगह ले सकती है?
क्या सत्ता वह सुरक्षा दे सकती है जो एक भाई का हाथ देता है?
क्या एक मां की सफलताएं बेटी की सजा को रोक पाएंगी?
ये सवाल सिर्फ सरोजिनी से नहीं, हम सब से हैं।
शायद जवाब अभी सीबआई के अगले कदम में नहीं,
बल्कि उस खामोशी में छिपा है जो अब उनके आलीशान घर में पसरी है।
इस गाथा की आखिरी लकीरें अभी बाकी हैं।
CBI की रिपोर्ट, अदालत का फैसला—जो भी हो—पर यह स्पष्ट है:
यह जीत की कहानी नहीं, अकेलेपन की कीमत पर खरीदी गई ऊंचाई की दास्तान है।

