विकास किसके लिए? मेरठ से प्रयागराज तक गंगा एक्सप्रेसवे बनाम ट्रेन की असली कहानी!

विकास वेस्ट यूपी

मेरठ से प्रयागराज के बीच गंगा एक्सप्रेसवे अभी खुलना है। इसके टोल रेट सामने आते ही एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि यह रास्ता असल में किसके लिए है। आम आदमी के लिए या उन लोगों के लिए जिनकी जेब पहले से ही मजबूत है।

खबर के मुताबिक मेरठ से प्रयागराज तक कार का टोल 1515 रुपये होगा। पहली नजर में यह आंकड़ा छोटा लगता है, लेकिन जब पूरे खर्च का हिसाब लगाया जाए तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है।

मेरठ से प्रयागराज की दूरी लगभग 600 किलोमीटर है। अगर एक सामान्य कार 15 किलोमीटर प्रति लीटर का औसत दे तो करीब 40 लीटर पेट्रोल लगेगा। उत्तर प्रदेश में पेट्रोल की कीमत औसतन 96 रुपये प्रति लीटर मानें तो सिर्फ पेट्रोल पर लगभग 3840 रुपये खर्च होंगे। इसमें टोल के 1515 रुपये जोड़ दीजिए तो खर्च 5355 रुपये हो जाता है।

लेकिन कार का खर्च यहीं खत्म नहीं होता। इंजन की घिसाई, टायर की घिसाई, सर्विसिंग और मेंटेनेंस की लागत भी जुड़ती है। ऑटोमोबाइल सेक्टर में इसे रनिंग कॉस्ट कहा जाता है, जो औसतन 3 रुपये प्रति किलोमीटर मानी जाती है। 600 किलोमीटर पर यह करीब 1800 रुपये बैठती है। इस तरह कुल खर्च लगभग 7150 रुपये हो जाता है।

यानि गंगा एक्सप्रेसवे पर कार से मेरठ से प्रयागराज तक जाने का वास्तविक खर्च सात हजार से साढ़े सात हजार रुपये के बीच पहुंचेगा।

इसके साथ एक और कीमत जुड़ी है जो पैसों में नहीं गिनी जाती। दस से बारह घंटे की ड्राइविंग, आंखों और दिमाग पर लगातार दबाव, कोहरा, तेज रफ्तार वाहन और हादसे का खतरा। कार में आदमी खुद ड्राइवर भी होता है और यात्री भी।

अब जरा ट्रेन की तरफ नजर डालिए।

ट्रेन आम आदमी का साधन है।

ट्रेन में आदमी सिर्फ यात्री होता है।

ट्रेन के किराये पर नजर डालें तो

थर्ड एसी का किराया लगभग 1300 से 1700 रुपये के बीच होता है।

सेकंड एसी का किराया लगभग 2000 से 2600 रुपये के बीच।

फर्स्ट एसी का किराया लगभग 3200 से 4200 रुपये के बीच।

ट्रेन में सबसे बड़ी सुविधा यह है कि यात्री बर्थ पर लेटकर यात्रा कर सकता है। वह सो सकता है, आराम कर सकता है, थकान से बच सकता है। न गाड़ी चलाने का तनाव, न सड़क की चिंता, न एक्सीडेंट का सीधा जोखिम।

समय की तुलना करें तो

कार से यह सफर एक्सप्रेसवे पर भी लगभग 9 से 10 घंटे का होगा, वह भी तब जब मौसम, ट्रैफिक और हालात पूरी तरह अनुकूल हों।

ट्रेन से यही सफर औसतन 10 से 12 घंटे में पूरा हो जाता है।

मतलब समय का फर्क बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन आराम और सुरक्षा का फर्क बहुत बड़ा है।

अब सवाल यह है कि इस इलाके की जनता की आर्थिक हैसियत क्या है।

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी करीब 24 करोड़ है, जो पूरे देश में सबसे ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों और प्रमुख अखबारों में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2024–25 में उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय लगभग 1 लाख 8 हजार रुपये के आसपास है। यानी औसतन एक व्यक्ति की मासिक आय करीब 9 हजार रुपये बैठती है।

यह आंकड़ा यूपी सरकार के नियोजन विभाग और हिंदुस्तान टाइम्स जैसी राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में प्रकाशित हो चुका है। इसका सीधा मतलब यह है कि राज्य का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसकी पूरी महीने की कमाई ही 9 से 10 हजार रुपये के आसपास है।

अब सोचिए जिस आदमी की महीने भर की कमाई 9 हजार रुपये होवह एक यात्रा में 7 हजार रुपये सिर्फ कार के खर्च पर कैसे लगाएगा, यही वह जगह है जहां गंगा एक्सप्रेसवे और रेलवे के बीच फर्क साफ दिखता है।

गंगा एक्सप्रेसवे असल में उन्हीं लोगों के लिए है

जो दस से बारह लाख रुपये की कार खरीद सकते हैं

जो हर सफर में हजारों रुपये पेट्रोल और टोल पर खर्च कर सकते हैं

जो मेंटेनेंस और बीमा का बोझ उठा सकते हैं

यानी यह सुविधा उच्च और उच्च मध्य वर्ग की है।

दूसरी तरफ ट्रेन है।

ट्रेन उस बेरोजगार छात्र की है जो प्रतियोगी परीक्षा के लिए प्रयागराज जाता है।

ट्रेन उस युवा की है जो रोजगार की तलाश में भटक रहा है।

ट्रेन उस आदमी की है जो अपने मुकदमे की तारीख पर हाईकोर्ट जाता है।

ट्रेन उस सरकारी कर्मचारी की है जिसे विभागीय काम से जाना पड़ता है।

मेरठ सहारनपुर मंडल और वेस्ट यूपी के जिलों से प्रयागराज जाने वालों में बड़ी संख्या इन्हीं वर्गों की होती है।

ट्रेन में

थर्ड एसी में वह 1500 रुपये के आसपास सफर कर सकता है।

सेकंड एसी में 2200 रुपये के आसपास।

और उसे रिजर्वेशन टिकट के साथ यात्री बीमा भी मिलता है।

किसी दुर्घटना या अनहोनी की स्थिति में रेलवे की तरफ से बीमा सुरक्षा होती है।

कार में यह सुरक्षा अलग से लेनी पड़ती है और वह भी अलग खर्च में।

एक तरफ एक्सप्रेसवे है

जो रफ्तार देता है

लेकिन शर्त यह है कि आपकी जेब मजबूत हो

दूसरी तरफ ट्रेन है

जो थोड़ी धीमी है

लेकिन बराबरी का हक देती है

एक तरफ एक्सप्रेसवे है

जो संपन्न वर्ग का रास्ता बनेगा

दूसरी तरफ ट्रेन है

जो आम आदमी की असली सवारी है

इसलिए गंगा एक्सप्रेसवे को विकास का प्रतीक कहा जा सकता है,

लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि यह आम आदमी का रास्ता है।

आम आदमी का रास्ता आज भी वही है

रेल की पटरियों पर दौड़ती ट्रेन

जहां कम पैसों में सफर होता है

जहां बर्थ पर लेटकर यात्रा होती है

जहां सुरक्षा होती है

जहां बीमा होता है

और जहां यात्रा आज भी उसकी हैसियत के भीतर रहती है।

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