जैव विविधता का संकट और मानव भविष्य

वेस्ट यूपी


मेहरआलम ख़ान

कंसल्टेंट, सिनेइंक पॉडकास्ट्स, लंदन (यू.के.

लंबे समय तक जैव विविधता को एक अलग-थलग विषय समझा गया। यह माना गया कि इसका संबंध जंगलों, जानवरों और प्राकृतिक सुंदरता से है, न कि अर्थव्यवस्था, सुरक्षा या जन-स्वास्थ्य जैसे “गंभीर” मुद्दों से। आज यह धारणा तेज़ी से टूट रही है। जैव विविधता का नुकसान अब 21वीं सदी में मानव जीवन के लिए एक बड़े और खतरनाक संकट के रूप में सामने आ चुका है—ऐसा संकट, जिसे हम अब भी पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं।

हर साल 22 मई को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 2026 हमें यही याद दिलाता है कि सवाल यह नहीं रहा कि जैव विविधता ज़रूरी है या नहीं, बल्कि यह है कि हम इसके बावजूद उदासीन क्यों बने हुए हैं। प्रकृति का यह नुक़सान अब सीधे हमारे भोजन, हमारे स्वास्थ्य, जलवायु संतुलन और आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर रहा है—यानी उन बुनियादी चीज़ों को, जिन पर आधुनिक समाज टिका है।

यह दिवस संयुक्त राष्ट्र के तहत मनाया जाता है और इसकी जड़ें 1992 की जैव विविधता संधि में हैं। जो पहल कभी संरक्षण तक सीमित थी, वह आज एक गंभीर चेतावनी बन चुकी है कि हमारी विकास की दिशा में कहीं गहरी गड़बड़ी है।

जैव विविधता का अर्थ सिर्फ़ अलग-अलग प्रजातियाँ नहीं है। इसमें बीजों और नस्लों की विविधता, जीव-जंतुओं की अनेकता और पूरे पारिस्थितिक तंत्र शामिल हैं। यही तंत्र इंसान की ज़िंदगी और उसकी गतिविधियों को सहारा देता है। आज यह तंत्र अभूतपूर्व रफ़्तार से टूट रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार धरती की लगभग तीन-चौथाई ज़मीन और समुद्र का बड़ा हिस्सा मानवीय गतिविधियों से बदल चुका है। जंगलों की कटाई, संसाधनों का अत्यधिक दोहन, प्रदूषण, बाहरी प्रजातियों का फैलाव और जलवायु परिवर्तन—इन सबके कारण क़रीब दस लाख प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं।इतिहास में पहले भी बड़े पैमाने पर जीवों का नाश हुआ है, लेकिन इस बार वजह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि इंसान द्वारा बनाई गई आर्थिक और विकास की व्यवस्था है।

अगर कहीं जैव विविधता पर हमारी निर्भरता साफ़ दिखती है, तो वह है भोजन। दुनिया का ज़्यादातर भोजन पौधों से आता है, लेकिन खेती लगातार एक जैसी होती जा रही है। आज सिर्फ़ तीन फसलें—चावल, गेहूँ और मक्का—दुनिया की आधी से ज़्यादा कैलोरी ज़रूरत पूरी करती हैं।यह व्यवस्था शुरुआत में सुविधाजनक लग सकती है, लेकिन लंबे समय में बहुत जोखिम भरी है।फ़सलों में विविधता कीटों, बीमारियों और मौसम के बदलते असर से बचाव करती है। जब यह विविधता घटती है, तो पूरी खाद्य व्यवस्था एक झटके में डगमगा सकती है। जलवायु बदलाव के कारण फ़सलें ख़राब होना और खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतें इसके संकेत हैं।

समुद्रों की हालत भी अलग नहीं है। दुनिया के अरबों लोग मछली पर निर्भर हैं, लेकिन ज़्यादा शिकार और समुद्री पर्यावरण के नाश ने कई मछली भंडारों को खत्म होने की कगार पर पहुँचा दिया है। Coral Reefs (प्रवाल भित्तियाँ), जो समुद्री जीवन का बड़ा आधार हैं, गर्म होते समुद्र और प्रदूषण से तेज़ी से नष्ट हो रही हैं।(प्रवाल भित्तियाँ (Coral Reefs) समुद्र में रहने वाले छोटे जीवों (पॉलीप्स) द्वारा निर्मित कठोर चट्टान जैसी संरचनाएँ हैं।ये मुख्य रूप से कैल्शियम कार्बोनेट से बनती हैं और इन्हें “समुद्र का वर्षावन” भी कहा जाता है, क्योंकि ये महासागर के केवल 1% हिस्से में होने के बावजूद लगभग 25% समुद्री जीवों को आश्रय देती है।) इसका सीधा मतलब यह है कि भोजन की सुरक्षा अब सिर्फ़ किसानों की समस्या नहीं, बल्कि पूरी प्रकृति से जुड़ा सवाल है।

जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य का संबंध हमेशा साफ़ दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका असर बहुत गहरा होता है। स्वस्थ और विविध पारिस्थितिक तंत्र बीमारियों को फैलने से रोकने में मदद करते हैं। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो नई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

जंगलों की कटाई, वन्यजीवों का व्यापार और ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव इंसान और जानवरों के बीच संपर्क बढ़ाते हैं। इससे ऐसी बीमारियाँ फैलने लगती हैं, जो जानवरों से इंसानों में आती हैं। हाल की महामारियों ने दिखा दिया है कि पर्यावरण को नुक़सान पहुँचाने की कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ सकती है।

दवाइयों की दुनिया भी प्रकृति पर निर्भर है। कई अहम दवाइयाँ पौधों और सूक्ष्म जीवों से मिलती हैं। विकासशील देशों में आज भी बड़ी आबादी पारंपरिक चिकित्सा पर निर्भर है, जो स्थानीय जैव विविधता से जुड़ी है। प्रजातियों का ख़त्म होना भविष्य के इलाज़ के रास्ते भी बंद कर देता है।

अक्सर जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता को अलग-अलग समस्याएँ माना जाता है, जबकि दोनों गहराई से जुड़ी हैं। जंगल, दलदली ज़मीन, घास के मैदान और महासागर बड़ी मात्रा में कार्बन सोखते हैं।जब ये नष्ट होते हैं, तो जमा हुआ कार्बन वातावरण में चला जाता है और धरती और गर्म होती है। बढ़ती गर्मी फिर जीव-जंतुओं और पौधों के लिए नई मुश्किलें खड़ी करती है। इस तरह एक ख़तरनाक चक्र बन जाता है।इसीलिए जलवायु से निपटने की कोई भी नीति, अगर प्रकृति को नज़रअंदाज़ करती है, तो वह अधूरी है। जंगलों और तटीय इलाक़ो की बहाली जैसे उपाय न सिर्फ़ जलवायु संकट से लड़ते हैं, बल्कि रोज़गार और भोजन की सुरक्षा भी बढ़ाते हैं।

जैव विविधता का संकट सब पर बराबर नहीं पड़ता। आदिवासी और स्थानीय समुदाय दुनिया के बचे हुए प्राकृतिक इलाक़ों की देखभाल करते हैं, लेकिन नुक़सान सबसे ज़्यादा वही झेलते हैं।इन समुदायों के पास पीढ़ियों का अनुभव और प्रकृति को समझने का ज्ञान है। कई जगह यह देखा गया है कि जहाँ इन्हें अधिकार और सम्मान मिलता है, वहाँ पर्यावरण बेहतर हालत में रहता है। इन्हें नज़रअंदाज़ करने से संरक्षण कमज़ोर हुआ है और टकराव बढ़ा है।बिना सामाजिक न्याय के पर्यावरण संरक्षण टिक नहीं सकता।

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 2026 “स्थानीय पहल, वैश्विक असर” पर ज़ोर देता है। यह माना जाने लगा है कि सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय समझौते काफ़ी नहीं हैं। 2030 तक प्रकृति के नुक़सान को रोकने के लिए बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं।लेकिन हक़ीक़त यह है कि ज़मीन पर काम धीमा है। पैसों की कमी है और जैव विविधता को अब भी विकास के मुख्य मुद्दों से अलग रखा जाता है। नतीजा यह है कि घोषणाओं और अमल के बीच दूरी बढ़ती जा रही है।

जैव विविधता का संकट हमारी विकास की सोच की बड़ी कमी दिखाता है। हमने तरक़्क़ी को आँका, लेकिन प्रकृति के नुक़सान को नहीं। परागण, साफ़ पानी, बाढ़ से बचाव और उपजाऊ मिट्टी—इन सबकी आर्थिक क़ीमत बहुत बड़ी है, फिर भी इन्हें हिसाब-किताब में जगह नहीं मिलती।इसका नतीजा यह हुआ कि हम प्रकृति का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल करते रहे और भविष्य के ख़तरों को नज़रअंदाज़ करते रहे। जैसे-जैसे जैव विविधता घटती है, आपदाओं, बीमारियों और भोजन की कमी की क़ीमत बढ़ती जाती है। यह मान लेना कि तकनीक हर जगह प्रकृति की जगह ले सकती है, अब और भी अवास्तविक लगता है।

जैव विविधता की रक्षा को अक्सर नैतिक ज़िम्मेदारी कहा जाता है। लेकिन यह सिर्फ़ नैतिक सवाल नहीं है, यह हमारी सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। स्वस्थ प्रकृति के बिना न अर्थव्यवस्था टिक सकती है, न समाज।

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस सिर्फ़ एक औपचारिक दिन नहीं है। यह चेतावनी है कि हम ऐसे मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ से आगे बढ़ने की क़ीमत बहुत भारी हो सकती है।सवाल सीधा है—क्या हम जैव विविधता को न बचाने की क़ीमत चुका सकते हैं।2026 में तस्वीर साफ़ है। जैव विविधता कोई शौक़ या अय्याशी नहीं, बल्कि मानव जीवन की बुनियाद है। अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी राजनीति और नीतियाँ विज्ञान की चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेती है—इससे पहले कि हमें सहारा देने वाली प्रकृति हमेशा के लिए कमजोर पड़ जाए।

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