Virendra Verma

हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रहते 1991 में वीरेंद्र वर्मा ने भी उठाई थी चौगामा नहर के लिए आवाज

वेस्ट यूपी

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मुजफ्फरनगर, मेरठ और बागपत के हजारों किसानों के लिए जल संकट कोई नई समस्या नहीं है। दशकों से इस क्षेत्र के लोग सिंचाई और भूजल संकट से जूझ रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने वालों में एक नाम पूर्व राज्यपाल वीरेंद्र वर्मा का भी है। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रहते हुए 1991 में उन्होंने चौगामा नहर योजना के लिए आवाज उठाई थी और तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को इस संबंध में पत्र भी लिखा था।

वीरेंद्र वर्मा के इस ऐतिहासिक पत्र को अब उनके निजी सचिव रह चुके बलराम सिंह सोलंकी ने अपनी फेसबुक वॉल पर साझा किया है, जिससे यह मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस पत्र में उन्होंने मुजफ्फरनगर की तहसील बुढ़ाना व कैराना तथा मेरठ जिले की तहसील बागपत के हिन्डन और कृष्णी नदियों के दोआबे में बसे 200 से अधिक गांवों के किसानों की समस्याओं को विस्तार से रखा था।

बलराम सोलंंकी । पूर्व केंद्रीय मंत्री सोमपाल शास्त्री और हिमााचल प्रदेश के गवर्नर वीरेंद्र वर्मा के निजी सचिव रहे हैं।

जल संकट से जूझ रहे थे किसान

वीरेंद्र वर्मा ने पत्र में उल्लेख किया था कि इस क्षेत्र की हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि जल संकट से प्रभावित हो रही है। भूजल स्तर 80 फीट से भी नीचे चला गया है और हर साल इसमें और गिरावट आ रही है। सरकारी और निजी नलकूप बुरी तरह प्रभावित हो चुके हैं। गर्मियों के मौसम में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब नलकूप मुश्किल से दो घंटे ही चल पाते हैं।

सूखे की मार झेल रहे किसानों को मजबूरी में गहराई तक बोरिंग करानी पड़ी, लेकिन पहले इस्तेमाल की जाने वाली 7.5 और 10 हॉर्सपावर की मोटरें इस गहराई से पानी नहीं खींच सकीं। इस कारण उन्हें 12.5 और 15 हॉर्सपावर की मोटरें लगाने पर मजबूर होना पड़ा, जिससे बिजली की लागत भी दोगुनी हो गई।

तालाब सूखे, हैंडपंप बंद, पशुओं के लिए पानी की किल्लत

गर्मी के मौसम में पीने के पानी की स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि हैंडपंपों ने पानी देना पूरी तरह बंद कर दिया। तालाब भी सूखने लगते हैं, जिससे पशुओं को पानी पिलाना और नहलाना बड़ी समस्या बन जाता है। वीरेंद्र वर्मा ने चेताया था कि अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो यह पूरा क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील हो सकता है।

सरकार ने रोकी थी 5.65 करोड़ की सिंचाई योजना

वीरेंद्र वर्मा ने अपने पत्र में यह भी लिखा था कि करीब 14 साल पहले, 1978 में, प्रदेश सरकार ने सिंचाई विभाग से इस क्षेत्र का सर्वे कराया था। इसमें सुझाव दिया गया था कि वर्षा ऋतु में हिन्डन और कृष्णी नदियों से पानी उठाकर ( चौगामा नहर )सिंचाई की जाए। इस योजना की लागत 5.65 करोड़ रुपये आंकी गई थी, और 1978 में इस पर कार्य भी शुरू हुआ था। लेकिन कुछ महीनों बाद सरकार ने इसे रोक दिया

चौगामा नहर पर के बारे में जानने के लिए लिंक खोलकर हमारी ये खास रिपोर्ट जरूर पढ़ें।

वीरेंद्र वर्मा ने दिया था समाधान

वीरेंद्र वर्मा ने इस समस्या का समाधान भी दिया था। उन्होंने सुझाव दिया था कि:
कृष्णी नदी पर खड़ाना माजरा, गांगडोली और बामनोली गांवों के पास बांध बनाया जाए
हिन्डन नदी में ग्राम नगढ़ी और पांचली बरनावा के निकट बांध निर्मित किया जाए

उनका मानना था कि अगर यह कदम उठाए जाते, तो नदियों में सालभर जल प्रवाह बना रहता और जलस्तर में गिरावट रुक जाती।

मुख्यमंत्री से हुई थी चर्चा

वीरेंद्र वर्मा ने इस योजना को लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह और सिंचाई मंत्री लोकपति त्रिपाठी से भी कई दौर की बातचीत की थी। 1989 में त्रिपाठी ने उन्हें आश्वासन दिया था कि इस परियोजना को आठवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल किया जाएगा

क्या अब जागेगी सरकार?

बलराम सिंह सोलंकी द्वारा साझा किया गया यह पत्र एक बार फिर चर्चा में है। यह न केवल अतीत की एक महत्वपूर्ण योजना की याद दिलाता है, बल्कि सरकार और नीति-निर्माताओं के लिए एक चेतावनी भी है कि अगर आज भी इस क्षेत्र के जल संकट को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आने वाले वर्षों में हालात और भी बदतर हो सकते हैं।

अब देखना यह है कि क्या सरकार इस ऐतिहासिक दस्तावेज को संज्ञान में लेकर चौगामा नहर और जल संरक्षण की अन्य योजनाओं पर कोई ठोस कदम उठाएगी या यह मुद्दा फिर से इतिहास के पन्नों में ही दबकर रह जाएगा?

सहारनपुर, मेरठ जनपद में गिरते भू जल की विकरालता आने वाले कल की सबसे बड़ी समस्या हैl स्वर्गीय वीरेंद्र वर्मा जी के साथ राजभवन शिमला के अपने कार्यकाल के समय इस सन्दर्भ में उनका तत्कालीन मुख्यमन्त्री को भेजा गया पत्र इस विषय पर चिंतन के लिए सरकार का ध्यान खींचता है। बलराम सोलंंकी

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